अरविंद पांडेय
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काव्य, गायन और मीडिया

कवि और गायक। मुकेश जी की परंपरा में गायन, बिहार गौरव के गीत, नशामुक्ति की कविताएँ। परावाणी पर पूरी डायरी।

टेलीग्राफ और अन्य माध्यमों ने उनके प्रेम-काव्य और बिहार-गौरव गीतों को कवर किया। यूट्यूब चैनल ArvindPandeyIPS पर उनके संदेश उपलब्ध हैं।

नीचे अरविंद पांडेय आईपीएस के सार्वजनिक वीडियो हैं — 2016 का कार्यक्रम और एनआईटी पटना में युवाओं पर भाषण।

सोशल मीडिया पर सकारात्मक संदेश — नशामुक्ति, संस्कृति, सेवा — इनकी निरंतर पहचान है।

अरविंद पांडेय की सार्वजनिक उपस्थिति और भाषण।

अरविंद पांडेय आईपीएस — सार्वजनिक कार्यक्रम, पटना (14 फ़र 2016)

पटना में अरविंद पांडेय आईपीएस की सार्वजनिक उपस्थिति — आर्काइवल वीडियो।

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युवाओं का बौद्धिक सशक्तिकरण — एनआईटी पटना में अरविंद पांडेय आईपीएस का भाषण (भाग 3)

एनआईटी पटना में अरविंद पांडेय आईपीएस का युवा बौद्धिक सशक्तिकरण पर प्रेरक भाषण — Creative Policing Yoga आधिकारिक मीडिया इंडेक्स।

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अरविंद पांडेय — आधिकारिक पेज

गूगल खोज “Arvind Pandey IPS”, “arvind pandey ips bihar” — प्रामाणिक स्रोत creativepolicing.yoga।

कविता-डायरी

परावाणी

अरविन्द पाण्डेय की कविता-डायरी। मूल लेख परावाणी पर।

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गर्मी में शिमला की ठंडक अमरीका तक पहुँचाएगें.

· अरविन्द पाण्डेय



गर्मी में शिमला की ठंडक अमरीका तक पहुँचाएगें.
बुलडोज़र  के  बल रशिया में सारा यूक्रेन मिलाएँगे.
मैं नहीं मिखाइल सेर्गेविच, मैं वीर पुतिन कहलाता हूँ.
जो बाइडेन या दुनियां हो, तोपों से दिल दहलाता हूँ.
-अरविन्द पाण्डेय




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वीर शिवराज इस धरती पर आए थे

· अरविन्द पाण्डेय


छत्रपति शिवाजी महाराज की स्मृति में मेरी काविता : 

हिंदू पद पादशाही हिंद में चलाया था
मुग़ल शैतानों के छक्के छुड़ाए थे.

अफजल का पेट चीर, सेना बिदार डाली,
उत्तर के, दक्षिण के गगन पर छाए थे.

सपने में देख डरा करता औरंगजेब,
डरी म्लेच्छ सेना ने चेहरे छुपाए थे.

धर्म-रक्षार्थ, गुरु रामदास शिष्य, शेर
वीर शिवराज इस धरती पर आए थे.
🇮🇳 अरविन्द पाण्डेय 🇮🇳
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गान्धी की मूर्तिपूजा

· अरविन्द पाण्डेय


महापुरुष प्रतिमा सम्मान और सुरक्षा अधिनियम :
प्रतिमाओं की स्थापना के संबंध में सनातन धर्म में एक विशेष प्रक्रिया विहित की गई है. सभी जानते हैं कि जब हम किसी देवता या देवी की प्रतिमा स्थापित करते हैं तो उसमें शास्त्रीय विधि के अनुसार प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. उसके लिए गर्भगृह का निर्माण होता है.प्राण प्रतिष्ठा के बाद उसे जीवंत माना जाता है. सजीव माना जाता है.
     देव प्रतिमा के सम्मान की दृष्टि से उन्हें स्नान कराने के लिए, उन्हें भोग लगाने के लिए, उनकी आरती के लिए एक पुजारी की विधिवत नियुक्ति की जाती रही है.
     भारत, यूनान, रोम और मिश्र तथा यूरोप के अन्य देशों की तरह नहीं है जहां किसी भी देवता या महापुरुष की प्रतिमा चौराहों पर या अन्य पार्को में स्थापित कर दी जाए.
     यूरोप और अन्य देशों के अनुकरण में भारत में भी महापुरुषों की प्रतिमाएं चौराहों पर और अन्य स्थलों पर स्थापित करने की एक परंपरा तो प्रारंभ हुई किंतु उन प्रतिमाओं की दैनिक देखभाल, स्वच्छता आदि कार्य के लिए अथवा उनकी सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं बनाया गया.
     अब आवश्यकता है कि इस तरह का कानून बनाया जाए कि यदि कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी सार्वजनिक स्थल पर किसी महापुरुष की प्रतिमा स्थापित करे तो उस प्रतिमा की देखभाल के लिए, उस प्रतिमा को निरंतर स्वच्छ बनाए रखने के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति भी करे और प्रतिमा की सुरक्षा का भी उपाय करे तभी ऐसी प्रतिमाएं स्थापित किए जाने की अनुमति सरकार द्वारा दी जानी चाहिए.
     यदि कोई इन शर्तों को पूरा नहीं करता है कोई तो उसे प्रतिमा स्थापित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए       
      बिहार के चंपारण जिले में जहां बैरिस्टर गांधी 1917 में आए थे और अपने अद्भुत, अप्रतिम, अभूतपूर्व सत्याग्रह के प्रयोग का प्रारंभ किया था  और उसके सफल प्रयोग के बाद बैरिस्टर गांधी संपूर्ण विश्व में महात्मा गांधी कहे जाने लगे थे, उसी चंपारण के मोतिहारी जिले में दो जगहों पर स्थापित महात्मा गांधी की प्रतिमा के साथ अपमानजनक व्यवहार कुछ अपराधियों द्वारा किया गया.
     यह एक प्रस्तर मूर्ति को अपमानित करने की घटना नहीं है बल्कि अत्यंत गंभीर आपराधिक घटना है. 
     पुलिस तत्परता पूर्वक इन मामलों में अनुसंधान भी कर रही है किंतु अब महापुरुषों की प्रतिमाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए कानून बनाया जाना आवश्यक हो गया है क्योंकि महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, डॉ आंबेडकर आदि की प्रतिमाएं सार्वजनिक स्थलों पर लगाई जाती हैं और इन प्रतिमाओं के अपमान के बाद लोक व्यवस्था तथा विधि व्यवस्था भंग होने की संभावना भी बलवती होती है. इस अप्रिय स्थिति से मुक्ति के लिए कानून बनाया जाना आवश्यक है.
🇮🇳 अरविन्द पाण्डेय 🇮🇳
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय - एक राहुग्रस्त सूर्य

· अरविन्द पाण्डेय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तक "राष्ट्र चिंतन" और "राष्ट्र जीवन की दिशा" मैंने हाई स्कूल के विद्यार्थी के रूप में पढी थी...
    अनेक विस्मयकारी और मौलिक चिंतन से समृद्ध इन पुस्तकों में "मैं और हम" शीर्षक लेख मुझे आजतक हर सामाजिक या राष्ट्रीय समस्या और उनके समाधान के अन्वेषण के समय एक सम्पूर्ण समाधान के रूप में दिखाई देता है..यह लेख शाश्वत और सार्वभौम चिंतन का एक उच्छल सागर है..इस लेख को आधार बनाकर अनेक ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं... 
     1967 के संसदीय निर्वाचन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पवित्र नेतृत्व में भारतीय जनसंघ को 35 संसदीय क्षेत्रों में विजय प्राप्त हुई थी जो अभूतपूर्व और अप्रत्याशित मानी गयी थी किन्तु इससे यह सिद्ध हो गया था कि भारतीय जनमानस राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति से अनुप्राणित है और यदि उसकी इस प्रसुप्त राष्ट्रवादी चेतना को जागृत किया जाय तो भारतीय राष्ट्रीय चेतना का महजागरण सम्भव है..
    1967 में उनके प्रखर नेतृत्व को यह सफलता प्राप्त होती है और 1968 की फरवरी में ही उनकी अतिरहस्यमय रूप से हत्या कर दी जाती है..
    उनकी हत्या के बाद उनका शव तत्समय मुगलसराय सराय नामक रेलवे स्टेशन की रेल पटरियों पर पाया गया था जब वे पटना के लिए रेलयात्रा पर थे..
    इस प्रकरण में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उन्हें उस दिन लखनऊ से दिल्ली जाना था किंतु पटना से एक महत्वपूर्ण व्यक्ति ने फोन कर उन्हें पटना के किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया और उन्होंने लखनऊ से दिल्ली की यात्रा की जगह लखनऊ से पटना के लिए प्रस्थान किया और उनकी हत्या कर दी गयी..
     इस रहस्यमयी हत्या का अनुसंधान सीबीआई ने किया और आश्चर्यजनक रूप से सीबीआई, इस अतिमहत्वपूर्ण हत्या के षड्यंत्र पक्ष पर कोई साक्ष्य संकलित नहीं कर सकी..
    "एकात्म मानववाद" उनका एक अभूतपूर्व चिंतनपरक ग्रंथ है जिसमें उनकी एक और सार्वभौम शाश्वत चिंतन की मंदाकिनी है जिसमे स्नान करके कोई भी व्यक्ति अपने सामाजिक व्यक्तित्व को शुद्ध और पवित्र कर सकता है.. 
    बाद में उन्हीं के अनुयायियों द्वारा "गांधीवादी समाजवाद" शब्द द्वारा कुछ नया करने की वासना में इस एकात्म मानववाद के विचार को प्रतिस्थापित कर दिया गया.
      दीनदयाल जी की अनेक पुस्तकों में से एक अतिशय रोचक और प्रेरक पुस्तक  "सम्राट चंद्रगुप्त" भी है जो उन्होंने चुनार के किले में प्रवास करते हुए 24 घण्टे के अंदर ही लिखकर पूर्ण की थी..
     दीनदयाल जी यद्यपि भारतीय जनसंघ नामक राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष थे किन्तु उनकी पुस्तकों और उनके दर्शन का अवगाहन प्रत्येक भारतीय को स्वयं को बौद्धिक रूप से समृद्ध करने हेतु किया जा सकता है... 
     आज ऐसे तपस्वी को उनके महाप्रयाण दिवस पर विनत श्रद्धांजलि 🌹
🇮🇳 अरविन्द पाण्डेय 🇮🇳
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मैं प्रथम प्रयास में आईपीएस कैसे बना

· अरविन्द पाण्डेय





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सभ्यता की विचित्र कालावधि : कोरोना काल

· अरविन्द पाण्डेय

सभ्यता की विचित्र कालावधि है यह .. कोरोना के लॉक डाउन में हज़ार किलोमीटर दूर अपने गांव देस की ओर  पैदल चलता हुआ राष्ट्रनिर्माता, अन्नप्रदाता श्रमिक थककर अचेतन होकर गिर जाता और अपने प्राण त्यागता है...वह अपने गांव इसलिए जाना चाहता था कि अगर कोरोना से ही मरेंगे तो अपने गांव में ही मरेंगे ...उसकी ये छोटी सी इच्छा भी यह विराट शक्तिसम्पन्न समाज पूरी नहीं करता ...
....उसकी मृत्यु इस सभ्यता के लिए कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं बनती...इस सभ्यता की वाहक सोशल मीडिया में उसे कोई श्रद्धांजलि नहीं देता...ये विचित्र सभ्यता है जहां के अधिकांश सभ्य लोग, किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसके चर्चित होने की शक्ति के आधार पर श्रद्धांजलि देते हैं..सभ्यता का विचित्र काल-खण्ड है यह !
.... तो मेरी ओर से उन सभी अन्नप्रदाता , राष्ट्रनिर्माता श्रमिकों को सादर विनम्र क्षमायुक्त श्रद्धांजलि जिन्होंने इस कोरोना-काल में अपनी जन्मभूमि के प्रति असीम प्रेम के कारण उसी की ओर चलते चलते मार्ग में ही अपने प्राण त्याग दिए !
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लेकिन उस पेड़ के पास न जाना !

· अरविन्द पाण्डेय

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस्लाम के अनेक विद्वानों के अनुसार कुरआन में वर्णित हज़रत आदम स्वर्ग से धरती पर भेजे जाने के बाद पर भारतभूमि पर ही अवतरित हुए थे.उनके स्वर्ग से अवतरण की कथा को इस तरह से समझा जा सकता है.खुदा सभी को बेरोक-टोक खाने पीने की इजाज़त तो देता है मगर उस पेड़ के पास जाने की इजाज़त नहीं देता जिसके पास जाने से इंसान क्या आदम को भी खुदा के गुस्से को झेलना पडा था.
ये पेड़ क्या है ? ये पेड़ उन हसरतों के गुच्छे का  नाम है  जिन्हें पूरी करने की इजाज़त नहीं है.ऐसी हसरतें जो इंसान को इंसानियत से नीचे गिरा देती हैं.जो एक इंसान को दूसरे इंसान का हक छीन लेने के लिए उकसाती हैं .. जो इंसान को अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी करने की वजह बनती हैं.
..जब खुदा ने ज़मीन में आपना नायब बनाने की बात फरिश्तों को बताई और उन्हें और शैतान को आदम को सजदा करने का हुक्म दिया....तब फरिश्तों ने तो आदम को सजदा किया मगर शैतान ने  नहीं किया.इस पर , अल्लाह ने आदम से कहा कि तुम अपनी बीबी के साथ जन्नत में रहो..बेरोक-टोक खाओ पिओ मगर उस पेड़ के पास न जाना.मगर, शैतान के असर की वजह से आदम फिसल गए और उन्हें ज़मीन में आना पडा ...जन्नत से ज़मीन पर आने की नौबत सिर्फ इसलिए आई क्योकि आदम ने अल्लाह की नेमतों को तो अपना लिया मगर उसकी पाबंदियों को नहीं माना.
इसलिए हर मुसलमान को इस बात पर गौर करना  चाहिए कि जब अल्लाह हमको बेरोक-टोक खाने पीने की इजाज़त देता है और हम खुदा की इनायत से खुशहाल ज़िंदगी जी रहे होते हैं तब, अल्लाह की पाबंदियों पर भी हमें गौर रखे रहना चाहिए.और जो पाबंदिया हमारे लिए लगाईं गईं हों उस ओर रुख नहीं करना चाहिए.क्योकि,अल्लाह,बेशक,रहम करनेवाला और माफ़ करने वाला है मगर वह जानबूझ कर कुफ्र और शिर्क करने वालों को सज़ा भी देता है.
ॐ 
- अरविन्द पाण्डेय 
पुलिस महानिदेशक सह नागरिक सुरक्षा आयुक्त, बिहार.
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Poor Economics : अभिजीत बनर्जी

· अरविन्द पाण्डेय

#Esther_Duflo और #अभिजीत_बनर्जी ने विश्व के 7 महाद्वीपों में से 5 महाद्वीपों  ( कितने देशों में - यह पता चलते ही लिखूंगा ) में उन उन देशों के राजनीतिज्ञों+ शासकों द्वारा गरीबी उन्मूलन हेतु किए गए उपायों का अध्ययन किया और उन उपायों का गरीबों पर क्या असर हुआ - यह भी लिखा ! 
इन दोनों लेखकों के महाप्रयास के बाद लिखी गई महापुस्तक है  #Poor_Economics  जिसकी समीक्षाएं लंदन, अमेरिका के बड़े बड़े अखबारों में  प्रकाशित कराईं गयीं.....
... पुस्तक को प्रसिद्धि दी गयी और अंततः नोबेल समिति द्वारा पुरस्कार दिलाया गया !
... हाँ, गरीबी ऐसा विषय है जो बीसवीं शताब्दी में लोकतांत्रिक देशों में चुनाव जीतने का मुख्य शस्त्र और शास्त्र बन चुकी है ...मैंने सुना है कि इसी गरीबी-शास्त्र के एक सूत्र का उपदेश श्री बनर्जी ने 2019 के प्रारम्भ में भारत के कुछ लोगों को दिया था जिसके अनुसार 25 करोड़ परिवारों को 72 हज़ार रुपए वार्षिक दान दिया जाना था जो भारत सरकार के कुल बजट का 13% होता ! 
.... इस दान की महाघोषणा करने वाले महानुभाव से जब लोगों ने पूछा कि ये पैसा आप लाएगें कहां से ? 
तो उन्होंने ने बड़ा आसान सा उत्तर दिया था कि अम्बानी और अडानी से पैसे लेकर यह दान-योजना पूरी की जाएगी ! श्री बनर्जी ने शायद उन्हें इस योजना के लिए पैसे जुटाने की तकनीक नहीं बताई होगी तो उन्हें जो समझ में आया, बोल गए !
... मगर, इतना सुनते ही भारत के गरीब, जो पैसे से गरीब हैं किंतु बुद्धि विवेक में Esther Duflo से भी अमीर हैं, ने इस पूरी योजना को नकार दिया ... क्योंकि उनके सामने 16 करोड़ शौचालय निर्माण, 
6 करोड़ गैस सिलिंडर का वितरण, 
15 करोड़ से अधिक प्रधानमंत्री आवास और 
आयुष्मान योजना में 5लाख तक का इलाज खर्च दिए जाने और इन जैसी 80% सफल अनेक योजनाएं मुस्कुराती हुई दीख रही थीं जिनका उन्हें 5 सालों से प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा था..
.....मैं मानता हूँ कि इन योजनाओं का भी 20% हिस्सा भ्रष्टाचार का शिकार हुआ होगा किन्तु जितना हिस्सा क्रियान्वित हुआ वह भारत के गरीबों के इस विश्वास को प्रबलता के साथ सशक्त कर गया था कि भविष्य में ये योजनाएं 100%सफल होगीं क्योंकि इन योजनाओं के साथ साथ ताकतवर भ्रष्टों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की योजना भी चलाई जा रही थी ..
.... भारत और दूसरे महाद्वीपों की गरीबी और उन गरीबों के साथ निम्नमध्यवर्ग, मध्यवर्ग का व्यवहार भिन्न है ....यहां भूखा व्यक्ति भी यदि #श्रीहनुमान जी के मंदिर के पास बैठा रहे तो उसे कोई न कोई भोजन कराएगा ही और देने के भाव के साथ नहीं पुण्य लेने के भाव से भोजन कराएगा... #गुरुद्वारा में जाकर कोई भी भूखा व्यक्ति लंगर में सम्मानसाहित पूर्ण भोजन प्राप्त कर सकता है...#मस्जिद के पास कोई भी किसी भी निष्ठावान मुस्लिम द्वारा इज़्ज़त के साथ #जकात पा सकता है ! यह अफ्रीका में, अमरीका में, यूरोप में नहीं है जहां भोजन, शिक्षा , स्वास्थ्य की भूख से तड़पते हुए व्यक्ति को मारकर दूसरा भूखा व्यक्ति अपनी सत्ता, संपत्ति, समृद्धि की भूख मिटाता है...
... बनर्जी और Esther Duflo के चिंतन और क्रियान्वयन का अंतर्विरोध भी समझना जरूरी है... बनर्जी यह मानते हैं कि किसी गरीब को शतप्रतिशत दवा या कोई अन्य सहायता देना ठीक नहीं क्योंकि तब उस सहायता का मूल्य उसे नहीं समझ में नहीं आएगा और इस तरह वे अनुदान=सब्सिडी को बेहतर मानते हैं किन्तु भारत में उनकी प्रस्तावित न्याय योजना में सरकार के लिए बिना कुछ काम किए ही वार्षिक रूप से 72 हज़ार रुपए, 25करोड़ लोगों को देने की चर्चा कैसे की गई - यह आश्चर्यजनक है... ख़ैर, यह सब तो सिद्धांतों की बात है .... इन दोनों लेखकों को नोबेल मिला जिसमें पैसे के अलावा आभासी यश भी भरपूर मिलता ही है ... इन दोनों लेखकों को संयुक्त बधाई 👍💐💐
🇮🇳 अरविंद पांडेय 🇮🇳
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मंदी, भ्रष्टाचार में

· अरविन्द पाण्डेय

मंदी,  भ्रष्टाचार  में, भ्रष्ट  हुए  हैं  मंद.
कुछ रिमांड पर रहे,कुछ जेलों में बन्द.
🇮🇳🇮🇳

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अलीगढ़ कांड और निर्भया फण्ड

· अरविन्द पाण्डेय

अलीगढ़ कांड और  निर्भया फण्ड
निर्भया कांड के बाद भारत सरकार ने निर्भया कोष बनाया जिसके लिए आवंटित राशि से महिलाओं के विरुद्ध अपराध के निवारण-निरोध के लिए काम किया जाना था... क्या आपको पता है कि आपके अपने अपने राज्यों में उस कोष का कहां किस तरह का प्रयोग किया गया ?? नहीं ! तो उसे जानने की कोशिश कीजिए !
....उस कोष के प्रयोग के लिए  मैंने IG  कमज़ोर वर्ग के रूप में एक प्रस्ताव भारत सरकार के गृह मंत्रालय को 2013 में ही भेजा और वीडियो कॉन्फ्रेंस में भी उस प्रस्ताव की उपयोगिता पर विस्तृत रूप से बताया था !
... वह प्रस्ताव था -
1. महिला अपराधों से प्रभावित प्रत्येक थाना में एक अलग "महिला एवं बच्चों के लिए कक्ष" संस्थापित हो जो महिला अपराधों के संबंध में त्वरित कार्रवाई केंद्र
और
परामर्श केंद्र
के रूप में कार्य करेगा !
2. उस कक्ष में केवल महिला अधिकारी और महिला सिपाही प्रतिनियुक्त रहेगीं जिन्हें बच्चों और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के संबंध में नियमित रूप से विशेष प्रशिक्षण दिया जाता रहेगा !
3. थाना में इस कक्ष के लिए एक अलग वाहन रहेगा जिसका प्रयोग उस कक्ष में पदस्थापित प्रभारी महिला अधिकारी द्वारा महिला या बच्चों के विरुद्ध अपराध के  संबंध में ही किया जाएगा !
.... उनकी योजना क्या थी ?
जिले में एक one stop centre स्थापित किया जाएगा जहां पुलिस अधिकारी, डॉक्टर, मनोचिकित्सक आदि रहेगे जो किसी भी महिला के विरुद्ध अपराध के बाद कानूनी कार्रवाई आदि करेगें !
... मैंने विमर्श में कहा कि यदि पटना के  मोकामा के किसी गांव में 12 बजे रात कोई इस तरह का अपराध होता है तो वह पीड़ित महिला पटना ज़िला मुख्यालय में स्थापित centre में कैसे आ पाएगी ??  उसे तुरंत सहायता चाहिए तो रात में उसे 30 किलोमीटर दूर आने के लिए विवश करना उचित है कि 2 किलोमीटर दूर उसके अपने थाना में लाकर महिला कक्ष के माध्यम से उसकी सहायता करनी उचित है ??
... मैंने कहा कि पीड़ित के रूप में सोचते हुए ही हमें कोई योजना क्रियान्वित करनी होगी...
... तो निर्भया फण्ड को गूगल में सर्च कीजिए पता कीजिए कि आपके अपने अपने राज्यों में उसका क्या उपयोग हुआ और कृपया टिप्पणी में लिखिए भी !
... 21 सदी में 18 वीं सदी की सोच रखने वाले नौकरों के कारण ही इस तरह की समस्याओं का वास्तविक समाधान नहीं हो पा रहा !
- अरविंद पांडेय
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गांधी जी की हत्या के उपेक्षित पहलू

· अरविन्द पाण्डेय

गांधी जी की हत्या के उपेक्षित पहलू :
महात्मा गांधी ने भारत विभाजन के प्रकरण पर कहा था कि बटवारा मेरी लाश पर होगा..
.... 14 अगस्त 1947 के बाद वे अपने इस संकल्प और अभीप्सा के साथ ही श्वास ले रहे थे...विभाजन की असह्य वेदना उन्हें पल पल मार रही थी...उनका सारा राजनीतिक दर्शन उन्हें स्वयं इस रक्तरंजित विभाजन के साथ ही झूठा लग रहा था .....
.......वे भारत_पाकिस्तान के विभाजन और इस क्रम में जिन्ना और उसके गिरोह द्वारा किये गए नरसंहारों से मर्माहत थे और अपनी जिजीविषा को वे स्वेच्छया तिलांजलि दे चुके थे.....
...… और इसलिए जब मदनलाल पहवा ने 20 जनवरी 1948 को दिल्ली में गांधी निवास बन चुके बिरला हाउस पर बम चलाया और गांधी जी की सुरक्षा बढ़ा दी गयी तो उन्होंने गृहमंत्री सरदार पटेल को बुलाकर कहा कि उन्हें सुरक्षा नहीं चाहिए और अगर सुरक्षा हटाई नहीं गयी तो वे अनशन करेगें..... सरदार पटेल गांधी जी को जानते थे कि वे सुरक्षा नही हटाने पर आमरण अनशन करेगें... उन्हें दो स्थिति बनती दिख रही थी उन्हें -
1. सुरक्षा नही हटी तो गांधी जी अनशन करेगें और उनका वह अनशन उनकी मृत्यु का कारण बन सकता था .
2. सुरक्षा हटाने पर पाकिस्तान से दिल्ली में आये शरणार्थियों से गांधी जी पर आसन्न प्राण संकट था क्योंकि मदनलाल पहवा 20 जनवरी को गांधी जी पर असफल हमला कर चुका था...
..... गृहमंत्री सरदार पटेल ने दूसरा विकल्प चुना और गांधी जी को अनशन से बचाने के लिए उनकी  सुरक्षा को  हटा देने का आदेश दिया...
..... मैं पुलिस अधिकारी के रूप में हमेशा से सोचता रहा  हूँ कि गृहमंत्री के उस अनुचित आदेश को दिल्ली पुलिस प्रमुख ने क्यों मान लिया ? दिल्ली पुलिस प्रमुख कह सकते थे कि ---
"जबतक मैं पुलिस प्रमुख हूँ सुरक्षा नहीं हटाई जाएगी क्योंकि गांधी जी पर हमले की संभावना है..आप चाहें तो मुझे हटा दें.."
.... किन्तु दिल्ली पुलिस प्रमुख ने गृहमंत्री सरदार पटेल के अनुचित आदेश का पालन किया और गांधी जी की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी सभी लोगों द्वारा गांधी जी को असुरक्षित छोड़ दिया गया...
....30 जनवरी 1948 को सरदार पटेल गांधी जी  की हत्या के 15 मिनट पहले तक उनके साथ बिरला हाउस में थे......वे बिरला हाउस से निकलते हैं और गांधी जी प्रार्थना सभा की ओर बढ़ते हैं.... नाथूराम ने स्वयं भी देखा कि भारत के गृहमंत्री यहां हैं.... और प्रार्थना स्थल पर गांधी जी के पहुँचने के पहले ही  नाथूराम ने बड़ी आसानी से गांधी की हत्या कर दी...
.... गांधी जी वास्तव में अपने "ईश्वर अल्ला तेरो  नाम" के राजनीतिक दर्शन के साथ जिन्ना और उसके नरसंहारी गिरोह द्वारा किए गए विश्वासघात के बाद जीवित रहना ही नहीं चाहते थे...उन्होंने कहा था कि विभाजन मेरी लाश पर होगा और इस वचन पर अडिग रहते हुए उन्होंने स्वयं को इतना असुरक्षित हो जाने दिया कि उनकी जीवित देह को लाश में बदल देने में पागल हत्यारे को कोई अवरोध या असुविधा नहीं हुई....
..... स्वतंत्र भारत में पुलिस कर्तव्यों में यह पहला राजनीतिक हस्तक्षेप था जिस कारण महात्मा गांधी जी की हत्या संभव हो पाई....
.... नाथूराम ने कोर्ट के सामने दिए गए अपने बयान में यह कहा था कि गांधी जी की सुरक्षा हटाकर वास्तव में उन्हें हमले का शिकार बन जाने के लिए छोड़ दिया गया था... और अगर सुरक्षा बनी रहती तो उन्हें मारना संभव नहीं था...
..... महात्मा गांधी के प्रति और इस देश के प्रति भक्ति रखने वालों को उनकी हत्या के इन उपेक्षित पहलुओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए...

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हल्दीघाटी का महायुद्ध

· अरविन्द पाण्डेय

हल्दीघाटी का महायुद्ध
बस एक सूत्र सिखलाता है.
दर्शक बनकर जो देख रहे,
उनको इतना बतलाता है !

राणा यदि यह रण हार गए
तो मुग़ल सल्तनत आएगी.
लड़ना होगा सैकड़ों साल,
पीढ़ियां बहुत पछताएगीं !

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वाल्मीकीय रामायण में श्रमिक के अधिकार

· अरविन्द पाण्डेय

वाल्मीकीय रामायण में वर्णित है कि जब श्री भरत जी, श्री शत्रुघ्न जी के साथ ननिहाल से वापस आते हैं
और
उन्हें ज्ञात होता है कि उनकी माता कैकेयी को दो वर देकर महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो चुके हैं तथा
सीता जी के साथ श्रीराम और  श्री लक्ष्मण वनगमन कर चुके हैं
तब वे स्वयं को इन दुर्घटनाओं का कारण मानते हुए ग्लानिग्रस्त होते हैं तथा माता कौसल्या के भवन में प्रवेश करते हैं...
....माता कौसल्या अति शोकार्त थीं और श्री भरत को देखकर उन्होंने कहा कि "अब तुम निष्कंटक राज्य भोग करो ..."
...... माता का यह वचन श्री भरत को असीम पीड़ा देते हुए आहत करता है और वे रघुवंश की इस महादुर्घटना में अपनी सहमति न बताते हुए माता के समक्ष अनेक शपथ  लेते हैं... उन शपथों में से एक शपथ थी -

कारयित्वा  महत्कर्म भर्ता  भृत्यमनर्थकं
अधर्मो योSस्य सोस्यास्ति यस्यार्योनुमते गतः

अर्थात
यदि श्रीराम के वनवास में मेरी किसी भी प्रकार से सहमति रही हो तो मुझे भी वही पाप लगे जो किसी सेवक से कार्य कराने के बाद उसे उचित पारिश्रमिक न देने वाले स्वामी को लगता है..
.... न्यूनतम मजदूरी न देना वाल्मीकीय रामायण में महापाप माना गया है... रामायण में धर्मधुरीण श्री भरत का वचन है यह... वाल्मीकीय रामायण को पूर्णतः हृदयंगम करने से ही शुद्ध मनुष्य का निर्माण सम्भव होगा ... आज के नीतिनियन्ता यदि माता कौसल्या के समक्ष श्री भरत द्वारा ली गयी शपथों का ज्ञान एवं सम्मान करें तो वे आम जनता को मिथ्या वचन देने के महापाप से बच सकते हैं !
.......... और जो लोग 1 मई-मजदूर दिवस पर कम्युनिस्ट शब्दावली में कुछ लिखने की औपचारिकता निभा रहे हों उन्हें वाल्मीकीय रामायण वे वर्णित श्रमिक के अधिकार का सिद्धांत पहले पढ़ना चाहिए !

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सोशल मीडिया पर संपत्ति की घोषणा

· अरविन्द पाण्डेय

संपत्ति की सार्वजनिक-घोषणा :
लोकसेवा के सभी महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत सभी सेवकों को सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार के संदर्भ में जनता के टूटते हुए विश्वास को बचाने के लिए अब सोशल मीडिया पर भी अपनी चल-अचल संपत्ति की घोषणा करनी चाहिए !
.... उसका परिणाम क्या होगा ?
... यदि ऐसे अधिकारी या नेता का #फ्लैट, भूखंड, भवन आदि होगा तो लोग उसकी सूचना विजिलेंस या सरकार को देगें !
.... जैसे -  मेरी चल-अचल संपत्ति निम्नवत है :
1. अचल संपत्ति : उत्तरप्रदेश के मिर्ज़ापुर ज़िले के प्रसिद्ध महाशक्तिपीठ विंध्याचल में मेरे पास एक पुराना मकान और 12 बिस्वा (कट्ठा) कृषिभूमि है.
....... बिहार झारखंड के 6 जिलों में मैं SP रहा. 3 रेंज में DIG रहा और 1 ज़ोन में IG के रूप में कार्यरत रहा... इसके अतिरिक्त CID में IG और ADG के रूप में भी कार्यरत रहा....
..... बिहार या झारखंड या देश-विदेश में किसी जगह मेरी कोई अचल संपत्ति - फ्लैट, भूखंड, भवन आदि नहीं है !
2. चल संपत्ति : मेरे पास लगभग 7-8 लाख रुपए की चल संपत्ति है..
..... अब यदि मेरी कोई अचल संपत्ति कहीं हो तो उसकी सूचना सरकार को अवश्य दीजिए !
..... मैंने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हूँ कि CBI के आलोक वर्मा, राकेश अस्थाना सहित देश के महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत सारे अधिकारियों को सोशल मीडिया पर अपनी संपत्ति की घोषणा करनी चाहिए जिससे CBI की और उन उन पदों और संस्थाओं की  विश्वसनीयता अखंड और अक्षुण्ण रह सके !
.... इसीतरह सभी महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक लोक सेवकों को सोशल मीडिया पर अपनी संपत्तियों को घोषणा करनी चाहिए !

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आज भारत बंद है

· अरविन्द पाण्डेय

दवा बिना मर गई बालिका,
ठेले, रिक्शे  टूट  गए.
नोटा वालों की कारों के
शीशे चकनाचूर हुए.

मेहनतकश का काम गया,
दूकाने धड़ धड़ बंद हुईं.
बंदबाज़ दो चार थे मगर,
लाठी खूब बुलंद हुई.

जनता की सेवा को व्याकुल
भीड़ देख, सब भाग चले.
टेम्पो,टैक्सी,ट्रेन थम गई,
वायु यान पर खूब चले.

दस करोड़ गरीब गुरबा को
आज काम कुछ नहीं मिला.
पांच सितारा में मदिरा का
प्याला, लेकिन खूब चला.

जन - सेवा  को  व्याकुल
लोगों ने हुड़दंग प्रचंड किया.
सोच रही जनता, भाई ये
कैसा भारत बंद किया 🤔

"यदि सच्चाई हो इसमें तो,
शेयर कॉपी पेस्ट करें ! "

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भारत बंद

· अरविन्द पाण्डेय

कल देश के  अधिकांश हिस्सों में 125 करोड़ लोगों में से सिर्फ 1-2 लाख लोग सड़कों पर बैनर तख्ती लेकर निकलेंगे और बाकी करोड़ों लोगों का चलना,फिरना, स्कूल जाना, अस्पताल जाना, सब्ज़ी-सामान बेचना-खरीदना  मुहाल कर देगें .....
उच्च न्यायालयों के अनेक न्याय निर्णयों द्वारा अवैध घोषित बंद कल फिर होगा !!
.... इन बंद-बाज़ लोगों के पास पेट्रोल डीज़ल पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा वसूले गए टैक्स को किस किस काम में खर्च किया गया - , इसका विवरण नहीं होगा , बस कुछ नारे होंगे, कुछ स्टेटमेंट्स होंगे और कुर्सी पर बैठने की ललक होगी.....
.... पेटोल डीज़ल 50 रुपये में बिक सकता है अगर पूरा देश यह निर्णय करे कि अगले 10 सालों तक कोई ताजमहली बिल्डिंग नहीं बनेगी, 5 स्टार होटलों में कोई सरकारी सेमिनार नहीं होगा, और दूसरे गैरज़रूरी खर्चे नहीं किए जाएंगे ! लाखों करोड़ रुपए किसानों की कर्जमाफी के नाम पर खर्च किये जाते हैं -- ये पैसा भी पेट्रोल डीज़ल पर टैक्स लगाकर ही इकट्ठा किया जाता है....
..... आइए मैदान में मगर समाधान के साथ आइए  ...
.... क्योंकि आपकी इस बंदबाज़ी से जिस दिन 125 करोड़ लोग नाराज़गी व्यक्त करने के लिए आमने सामने होंगे तो क्या होगा ।

-- अरविंद पाण्डेय

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कब तक भारत बंद करोगे ?

· अरविन्द पाण्डेय

कब तक बंद करोगे,बोलो,
भारत को,   भारत वालों.
कब तक लड़ना चाह रहे हो,
आपस में लड़ने वालों.

आधा भारत पहले से ही
बंद पड़ा है  सदियों  से.
ताकत  है तो मुक्त करो
इस भारत को  हथकड़ियों से.

आधा भारत तरस रहा है
कैसे उसको   काम  मिले.
पर,तुम केवल सोच रहे हो
सत्ता  कैसे आन मिले.

हर निर्णय को जाति-धर्म का
वस्त्र तुम्हीं पहनाते हो.
फिर लोगों को मिलजुल कर
रहने का पाठ पढ़ाते हो.
-- अरविंद पांडेय.

शेयर , कॉपी पेस्ट कर सकते हैं!

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भारत का संविधान ईश्वर वादी है

· अरविन्द पाण्डेय

हमारा संविधान ईश्वरवादी_है :
कृपया इसे पढ़ें और इच्छा हो तो शेयर कॉपी पेस्ट भी करें :
..... संविधान की तीसरी अनुसूची में
संघ और राज्यों के मंत्रियों के शपथ का प्रारूप दिया गया है जिसका प्रारम्भ होता है --
" मैं , अमुक, ईश्वर की शपथ लेता हूँ  / सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ "  -- इसका अर्थ क्या हुआ ?
.... इसका स्पष्ट अर्थ है कि हमारी संविधान सभा
तथा
संविधान निर्मात्री समिति को
ईश्वर के अस्तित्व में अखण्डविश्वास था
क्योंकि संविधान निर्माता किसी ऐसी सत्ता के नाम पर मंत्रियों को शपथ लेने का प्रावधान नहीं कर सकते थे जिसका अस्तित्व ही न हो या जिसके अस्तित्व पर उन्हें अखंड विश्वास न हो...
..... इसलिए भारत में ईश्वर एक आध्यात्मिक सत्य तो है ही, संवैधानिक सत्य भी है जिसके नाम पर शपथ लेकर केंद्र और राज्य के मंत्रिमंडल के सदस्य कर्तव्य निर्वहन करते हैं और करते रहेगें....
..... और इसलिए, भारत में कोई भी स्वयं को सहस्रबाहु ईश्वर के समकक्ष न समझे क्योंकि ईश्वर एक संवैधानिक सत्ता है जिसके नाम पर शपथ लेकर देश का राजकार्य संचालित होता है...

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शाहे-इंक़लाब अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान

· अरविन्द पाण्डेय

शाहे-इंक़लाब अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान साहब को
जन्मदिन मुबारक़ 💐💐💐

गद्दार के धोखे से गिरफ्तार जब हुए.
मज़हब के बहाने से पुलिस ने थे यूँ कहे-
"दोगे जो गवाही तुम साथियों के बर खिलाफ.
सरकार से कहेंगे कि वो कर दे तुम्हें माफ़."

अशफ़ाक़ ने कहा-सुनो अंग्रेज़ के कप्तान.
मेरी तो है सरकार ये अज़ीज़ हिंदुस्तान.
तख्ते पे फांसियों के हम चढ़ेंगे यूँ पुरजोश.
अंग्रेज़ सल्तनत के उड़ाएंगे वहीं होश.

कह कर यूँ तुम चले गए ऐ शाहे-इंक़लाब.
तुम मादरे वतन के लाडले थे लाजवाब.
तुमसे ही तो रहेगी हिंदुस्तान की पहचान .
लाखों सलाम तुमको ऐ अशफ़ाक़ुल्ला खान.
-- अरविन्द पांडेय .

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अभिव्यक्ति की आज़ादी

· अरविन्द पाण्डेय

उन्हें  चाहिए अभिव्यक्ति की आज़ादी,
क्योंकि चाहिए उन्हें मुल्क़ की बरबादी.

अभिव्यक्ति की आज़ादी जब पा जाएंगे,
हर #विद्यालय को #युद्धालय में बदलेगें.

रावण, महिषासुर को फूल चढाएगें.
राष्ट्रगान की जगह गीत यह गाएंगे -
"अफ़ज़ल हम शर्मिन्दा हैं,
  तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं."

मगर सुनों अब जाग उठा है हिंदुस्तान.
जाग उठा क़ानून और सोया सुल्तान.
-- अरविन्द पांडेय .

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अपने ही शस्त्रों से आहत

· अरविन्द पाण्डेय

जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

अपने  ही  शस्त्रों  से  आहत, रुधिर-विरूपित वेष.
विवश हुआ पश्चिम भी, अब दे रहा शान्ति-उपदेश.
जब  तक  था आतंकित  पूरब, तब तक थे निश्चिन्त.
अब यूरोप  और  अमरीका भी हैं परम सचिन्त.

जिन  देशों  के  हथियारों  से  भरा विश्व - बाज़ार .
अचरज,वे ही आज कर रहे व्याकुल शांति-प्रचार.
आज  बनी  रणभूमि  हमारी धरा धन्य रमणीय.
नहीं मार्ग अब शेष,  युद्ध लघु ही अब है वरणीय.

युद्ध आज आवश्यक है अपने ही कुविचारों से .
बच  सकते  हो  बचो  चित्त  में फैले  अंगारों से .
धधकेगी युद्धाग्नि निकट,फिर होगा कौन तटस्थ.
पूर्व  और  पश्चिम  दोनों  होंगे आहत , अस्वस्थ .
-- अरविन्द पांडेय

फ़्रांस में हुए आतंकावादी हमले का सन्दर्भ

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ओ नवाज़ !

· अरविन्द पाण्डेय



ओ नवाज़ !


मैं जन्म दिवस पर तुझे 
बधाई देने खुद घर आया था. 
तेरी माँ के चरणों में अपनी
माँ सा शीश झुकाया था .


पर, ओ नवाज़ ! तूने तो 
मेरी भारतमाँ को रुला दिया.
धोखे से उसके बेटों को 
सोते सोते ही सुला दिया.

मैंने तुझको समझा शरीफ,
पर, तू निकला कमज़र्फ,यार. 
लड़ने का दम है नहीं, मगर,
तू लड़ पड़ता है बार बार.

अब सुन ले हमको कभी 
न फिर से तू धोखा दे पाएगा.
कश्मीर-मीर रटते, तू सिंध,
बलूचिस्तान गंवाएगा .


-- अरविन्द पांडेय .



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सारी दुनियां के लिए खतरनाक आदमी

· अरविन्द पाण्डेय

नवाज़ शरीफ़ ने कल 
संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने वक्तव्य में 
5 बार खांसते हुए आतंकी बुरहान की स्तुति की 
और कश्मीर में आतंकवाद के परोक्ष समर्थन 
करने के अपने संकल्प को दुहराया ...., 
.... उन्की खांसी यह बता रही थी कि वे यह 
जानते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं और उरी के 
बाद भारत के गुस्से से डरे हुए है .... 
..... नवाज़ शरीफ़ 1990 से पाकिस्तान के 
प्रधानमंत्री बनते रहे हैं और अब तक न तो वे 
बेनज़ीर भुट्टो की तरह आतंकवादियों द्वारा मार डाले 
गए हैं और न तो ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की तरह 
फांसी पर चढ़ाए गए हैं...... 
...... इसका सीधा अर्थ है कि 
नवाज़ के नेतृत्व को स्थायी रूप से 
आतंकवादियों , 
पाकिस्तानी सेना और 
ISI 
ने बहुत पहले से स्वीकार कर लिया है ..... 
.... यह आदमी पूरी दुनियां के लिए 
खतरनाक बन चुका है ...... 





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तुम हो वही ..

· अरविन्द पाण्डेय

तुम हो वही,तुम थे यही,फिर क्या बदल गया.
चूहे निकल कर  बिल से , परेशान कर  रहे !!

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डिग्रियां

· अरविन्द पाण्डेय

मिलती हैं डिग्रियां जहां चेहरे को देखकर,
उस दौर में तुम पूछते हो डिग्रियां मेरी

ऐ दोस्त, अब तो दौर यहां #Odd_Even का,
मुमकिन है Even डिग्रियां भी Odd सी लगें.

है फ़र्क़ नज़रिये का कोई Odd ना Even,
कहते हो जिसे Odd, Even लोग कह रहे.

जब डिग्रियों की शर्त संविधान में नहीं,
फिर डिग्रियों की फ़िक़्र क्यूँ सता रही तुम्हें

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कुछ बच्चे ....

· अरविन्द पाण्डेय

कुछ बच्चे रोटियां चुरा के बेईमान हो गए.

मगर जो मुल्क़ की इज़्ज़त ही चुरा लेते हैं,
उन्हें बेईमान क्या कहा, वो परेशान हो गए.

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Chhupa Lo Yun Dil Me Pyar Mera cover by Samiksha

· अरविन्द पाण्डेय

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#मनुवाद और #ब्राह्मणवाद

· अरविन्द पाण्डेय

#मनुवाद और #ब्राह्मणवाद
यदि आपके मन में सनातन धर्म और महाराज मनु के प्रति ज़रा भी सम्मान हो तो आपको  मनुवाद और ब्राह्मणवाद जैसे शब्दों को अपने स्वार्थवश अनावश्यक लांछित करने वाले लोगों का पूरा बहिष्कार करना चाहिए और देश के किसी भी राज्य में अथवा दुनियां के किसी भी देश में उन्हें किसी भी तरह का समर्थन नहीं देना चाहिए चाहे ऐसे लोग आपके द्वार पर करबद्ध भिक्षुक-विशेष के रूप में नतशिर होकर ही क्यों न खड़े हों......
...... यहाँ फिर दावा किया जाता है कि जिन दो चार श्लोकों के आधार पर महाराज मनु को स्त्री और शूद्र विरोधी घोषित किया जाता है वे उनके  द्वारा नहीं लिखे गए अपितु अंग्रेजों द्वारा मनुस्मृति के सम्पादन के समय षड्यंत्रपूर्वक डाल दिए गए ....
.... वास्तव में महाराज मनु ने मानव धर्म सूत्र लिखा था जो सैकड़ों वर्ष पहले से अनुपलब्ध है ....

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पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म नवाज़ शरीफ के लिए

· अरविन्द पाण्डेय

पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म नवाज़ शरीफ के लिए एक नज़्म 💚
क्या  बात  है  हुकूमत  हटती  नहीं तुम्हारी ,
बदले न एक तुम हो, बदली है दुनियां सारी.

बुश से भी तुम मिले थे, हाथों में हाथ डाले,
अब तो बराक के भी प्याले से सटे प्याले .

हर इक वज़ीरे आज़म हिन्दोस्ताँ का तुमसे
मिलता है  गले  जैसे  यारी हो जाने कब से.

हाफ़िज़ सईद फिर क्यूँ फैला रहा ज़हर है,
दाऊद सा दरिंदा  क्यूँ  पाक़ के  शहर  है.

चीनीफरोश हो तुम दुनियां ये जानती है,
फिर फ़ौज क्यूं तुम्हारी बन्दूक तानती है.

उन फ़ौजियों को भी कुछ,चीनी कभी खिलाओ,
अपनी तरह ही यारी का पाठ कुछ पढ़ाओ.

वर्ना  जो  सब्र  फिर से  हिन्दोस्ताँ का  छूटा,
फिर हिन्द की वजह से, कहना न पाक़ टूटा.

--- अरविन्द पाण्डेय 💚💚💚💚

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श्रीश्रीहनुमज्जयंती विजयते

· अरविन्द पाण्डेय

हरिः ॐ तत्सत् महाभटचक्रवर्तीरामदूताय नमः

श्री हनुमान जी महाराज को गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में स्तुति करते हुए लिखा है :
दनुजवनकृषानुं ज्ञानिनामग्रगण्यं
श्री हनुमान् जी महाराज को ज्ञानिनामग्रगण्यं क्यों कहा गया - यह जानने के लिए प्रत्येक श्रद्धालु को श्री वाल्मीकि कृत रामायण का सुन्दरकाण्ड अवश्य पढ़ना चाहिए ।
आज श्री हनुमान् जयन्ती है । श्री हनुमान् जी महाराज को प्रणमन
और आप सभी को
#श्रीहनुमान्-जयन्ती की #मंगलकामनाएं

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Kuchh na Kaho Arvind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय

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Aye Nargise Mastana cover by Arvind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय

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Aashao ke Sawan Cover by Arvind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय

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Dil Ko Na Mere Tadpao cover by Arvind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय

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तांस्तथैव भजाम्यहम

· अरविन्द पाण्डेय

ईश्वर सदा अपने ऊपर अखंड विश्वास रखने वाले की इच्छा पर ही प्रकट होते हैं............ प्रहलाद जी ने कह दिया खम्भे में भी हैं, तो वे खम्भे से ही प्रकट हो गए.....

.............. जिसे ईश्वर पर विश्वास नहीं है या जो ईश्वर की सत्ता का निषेध करता है उसे विश्वास दिलाने के लिए ईश्वर प्रकट नहीं होने वाले.............



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''साहब'' लोग थोड़ा ''सहज'' हो जाइए

· अरविन्द पाण्डेय



ईश्वरीय-सन्देश का भयावह स्वरुप  :
अपना जीवन कितना मूल्यवान लगता है ,,,,,,,,,,,,,,,,, अपना जीवन बचाने के लिए एक ही पल में कुर्सी छोड़-छोड़ कर बड़े लोग उसी तरह खुले आसमान के नीचे आ गए जैसे राजकुमार सिद्धार्थ एक ही पल में अपना  साम्राज्य छोड़ कर खुले आकाश के नीचे चले गए थे......................
..................... अगर इसी तरह आम नागरिकों के जीवन को बचाने के लिए भी लोग एक पल में ही कुर्सी छोड़ने को तैयार रहें तो भूदेवी भूकंप से पीड़ित ही नहीं होगीं.............
.................. मगर लोगों द्वारा, कुर्सी को पाने और उस पर बैठे रहने के लिए के लिए कुर्सी के लिए बनायी गयी सारी आचार-संहिताएँ अपने लोभ-कंप और अहंकार-कंप से उसी रहा ध्वस्त कर दी जाती हैं जैसे भूकम्पों से भूदेवी के वक्ष पर निर्मित अट्टालिकाएं  ध्वस्त हो जाती हैं ............. 
...................... हज़ारों युवा वृक्षों को यही कुर्सी छोड़ कर भागनेवाले लोग अपने पर्यावरण-विरोधी चित्त-दोष के कारण क़त्ल कर देने का हुक्म देते है............. सारे देश में वृक्षों का क्रूर कत्ले-आम देखा जा सकता है..........
................ तो अब कुर्सी छोड़ के भागते क्यों हैं साहब  ,, इसलिए कि आपका जीवन खतरे में दिख रहा था............. 
...................आप ईश्वर को नहीं मानते हैं न,,, ठीक है,,,, तो ये समझिये कि प्रकृति के समक्ष आम लोगो के जीवन का भी वही मूल्य है जो आपके जीवन का है....... आम लोगो के लिए अस्पताल, स्कूल , और रहने का घर, सांस लेने के लिए शुद्ध हवा तो दीजिये ............ 
........................अपने और आम लोगों के जीवन में इतना बड़ा फर्क न कीजिये साहब.............
............. अभी भी  समय है............ वृक्षों का क्रूर कत्लेआम रोकने, पारिस्थितिकी और पर्यावरण की रक्षा आम लोगो को स्वास्थ्य, शिक्षा और सुजीवन देने के लिए  कुर्सी की ताकत का प्रयोग कीजिये.............
  
''साहब'' लोग  थोड़ा  ''सहज'' हो जाइए ,,,  सब ठीक हो जाएगा........
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पृथिवी शान्तिः

· अरविन्द पाण्डेय


भूकंप सदृश संकट में निर्भय-चित्त और अक्षत-विवेक बने रहने से आप उस संकट से बचने में और दूसरों को बचाने में सफल होंगें .......
.............. इसलिए चित्त और अभिव्यक्ति के स्तर पर निर्भय बनें रहें और स्वयं को तथा अन्य संकटग्रस्त लोगों को बचाने हेतु भौतिक, संकल्पात्मक,बौद्धिक, मानसिक, आध्यात्मिक प्रयास करते रहें ............
............. अपने निजी स्वार्थ में पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय असंतुलन पैदा करने वाले लोगों पर इस संकट का सीधा प्रभाव नहीं पड़ रहा है वे बचकर भी निश्चिन्त न रहें............
............... उन्हें भी उनकी नियति ले जायेगी उस गर्त में जहां गिर कर वे अपने द्वारा किये गए प्राकृतिक अपराधों के प्रति पश्चात्ताप करेंगें .........



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मनु हैं तो मानवता है

· अरविन्द पाण्डेय

बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर यदि आज अपने द्वारा लिपिबद्ध भारत के संविधान का अवलोकन करें तो वे आश्चर्यान्वित रह जायेगे क्योकिं उनके द्वारा लिपिबद्ध संविधान में इतने परिवर्तन हो चुके हैं जितने परिवर्तनों की उन्होंने कभी कल्पना भी न की थी ! उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यदि इस संविधान से देश की सभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो यह संविधान के कारण नहीं बल्कि संविधान को लागू कराने के लिए उत्तरदायी लोगों के कारण होगा
................................उसी तरह ,महाराज मनु ने जिस संहिता का निर्माण किया था उसे मानव धर्मसूत्र के रूप में वर्तमान मनुस्मृति के लिपिबद्ध होने के हज़ारों साल पहले से जाना जाता रहा है..........किन्तु, मानव धर्मसूत्र का लिपिबद्ध संस्करण अब अप्राप्त है............
.............. वर्तमान मनुस्मृति में लिपिबद्ध अनेक प्रावधान और नियम, परवर्ती राजनीतिक-सत्ताओं द्वारा अपनी विशिष्ट शासन-नीतियों को संपोषित करने के लिए महाराज मनु के नाम पर अंतःस्थापित कर दिए गए...........
.............. जैसे डॉ. अम्बेडकर, भारत के संविधान के लिपिकार के रूप में सर्वज्ञात होने के बावजूद उन सारे संशोधनों के लिपिकार नहीं हैं जो उनके समय में संविधान में अंतर्विष्ट नहीं थे किन्तु आज हैं, इसीतरह महाराज मनु वर्तमान मनुस्मृति के उन नियमों और प्रावधानों के लिपिकार नहीं हैं जो मानव-धर्म अर्थात मानवता के विरुद्ध हैं...
..................... अपने मानव अधिकारों की रक्षा के लिए मानव-अधिकार आयोग की शरण लेने वाले भी आज महाराज मनु के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर अपने द्विधाग्रस्त चित्त का प्रमाण देते हैं........... जिन मानव अधिकारों की बात लोग करते हैं वे मानव अधिकार भी महाराज मनु ने ही दिए हैं.......मनु समाप्त होंगें तो मानवता कहाँ बचेगी ..............
............... मनु हैं तो मानवता है....
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ग़म है या खुशी है तू - मेरे स्वर में

· अरविन्द पाण्डेय

मेरे स्वर में .
ग़म है या खुशी है तू  -







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हर रोज़ होगी होली , हर रोज़ दिवाली.

· अरविन्द पाण्डेय



हर रोज़ अगर दोगे तुम साथ गरीबों का,
हर  रोज़ होगी  होली , हर  रोज़ दिवाली.


होली की असीम शुभकामनाएं !

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धिक्कृताः धिक्कृताः धिक्कृताः

· अरविन्द पाण्डेय


पानी भी कुछ महंगा ही है उन सब के ईमान से.
अफज़ल गुरु नाम ले रहे जो अब भी सम्मान से.

धिक्कृताः
धिक्कृताः 
धिक्कृताः

अफ़ज़ल को भारत की न्याय-प्रक्रिया और अन्य संवैधानिक प्रावधानों का पूर्ण और विलंबित पालन करते हुए फांसी दी गयी थी , और इसलिए,
जो लोग उसकी फांसी को अन्याय-पूर्ण या अनुचित कह रहें हैं वे वास्तव में भारत के संविधान और तदनुसार-सृजित भारत की न्याय-पालिका को अपमानित कर रहे हैं......
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Sab Kuchh Sikha Hamane Arvind Pandey Sings Mukesh

· अरविन्द पाण्डेय

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किशोर कुमार का समां है सुहाना सुहाना मेरे स्वर में

· अरविन्द पाण्डेय

Sama Hai Suhana Suhana Arvind Pandey: http://youtu.be/PM7pIcWBqfQ
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किशोर का समां है सुहाना सुहाना मेरे स्वर में

· अरविन्द पाण्डेय

Sama Hai Suhana Suhana Arvind Pandey: http://youtu.be/PM7pIcWBqfQ
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O Mere Shahe Khuba Arvind Pandey Sings Rafi

· अरविन्द पाण्डेय

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अम्बर की अनुकम्पा

· अरविन्द पाण्डेय



अम्बर की अनुकम्पा से जल-विन्दु अवनि पर उतर रहे.
मानो प्रफुल्ल नंदन-कानन से तरल-सुरभि अनवरत बहे.
मानव के द्वारा मानव पर अत्याचारों से पीड़ित-जन,
नभ-जल से अभिषिन्चन कर कर संताप हृदय का बुझा रहे .
-- अरविन्द पाण्डेय...
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सारे भारत की हुंकार.

· अरविन्द पाण्डेय

अब तो : 
सारे  भारत  की  हुंकार.
बंद करो मानव व्यापार.



हम इसे एक आन्दोलन का रूप देना चाहते हैं...

आज वैशाली का प्रथम दिन था मानव व्यापार विरोधी दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का...........अब नौ जिले और बाकी है...जिसके बाद राज्य के सभी जिलों में यह कार्यशाला होगी......
.
दूसरी बात : 
1. बिहार में मानव व्यापार के विरुद्ध पुलिस द्वारा की जा रही कार्रवाई,  देश के अन्य राज्यों से अधिक प्रभावी है और मुक्ति-अभियान पूरी तरह से क़ानून-सम्मत तरीके से संचालित और संपन्न होता है,,
2. बिहार में अन्य राज्यों की पुलिस की तुलना में पुलिस द्वारा मानव अधिकारों के उल्लंघन की घटनाएँ बहुत ही कम होती हैं.....कोई भी व्यक्ति मानव अधिकार आयोग की वेब साइट में यह तथ्य देख सकता है ,,,
3. देश का प्रथम राज्य है बिहार जहां पाक्सो अधिनियम में न्यायालय द्वारा अपराधी को दण्डित किया जा चुका है.
शुभ रात्रि !
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पुलिस का नया प्रयोग - सशक्तीकरण सभा :

· अरविन्द पाण्डेय


पुलिस का नया प्रयोग - सशक्तीकरण सभा :




आज इस सभा का आयोजन अब पुलिस का एक आन्दोलन बन चुका है....... बिहार के चालीस  जिलों में सभी महिला थानाध्यक्षों द्वारा महाविद्यालयों में जाकर यह सभा आयोजित की जा रही है जिसमें '' छात्राओं को आत्म-सुरक्षा के प्रति स्व-संवेदनशील '' बनाने के लिए संवाद किया जाता है...... आई जी,कमजोर वर्ग के रूप में मैंने महिला थानाध्यक्षों के नेतृत्त्व में यह सभा बिहार के सभी जिलों में महिला महाविद्यालयों - कन्या विद्यालयों में आयोजित किये जाने का निर्देश दिया था .........................जो अब बिहार पुलिस का एक आन्दोलन बन चुका है............





............छात्राओं का आत्म-विश्वास बढ़ रहा है और उनमें एक सशक्त महिला बनाने के बीज का अंकुरण देखा जा रहा है ..





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सशक्तीकरण : लेखक : अरविन्द पाण्डेय

· अरविन्द पाण्डेय

पुस्तक का नाम '' सशक्तीकरण '' : लेखक : अरविन्द पाण्डेय !!



बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी जी द्वारा 23 अगस्त 2014 को संवाद भवन,पटना में ''सशक्तीकरण'' का लोकार्पण किया गया..


इस पुस्तक में 9 खंड हैं...... इसमें मेरे द्वारा सृजनात्मक पुलिसिंग के लिए किये गए कुछ प्रयोगों से सम्बंधित अध्याय भी हैं ...... 1.सशक्तीकरण सभा..2. किशोर्न्याय सभा. 3. परामर्श सभा -- ये तीन अध्याय अतिशय फलप्रद और जनोन्मुख पुलिसिंग के आधार-स्तम्भ बन सकते हैं....
...................अनेक वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में बिहार के आदरणीय पुलिस महानिदेशक और समाज कल्याण विभाग के प्रधान सचिव श्री अमरजीत सिन्हा, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के सचिव श्री हुकुम सिंह मीणा द्वारा भी अपने विचार व्यक्त किये गए.......
......................... यह पुस्तक मानव-व्यापार निरोध, अत्याचार निवारण और निरोध, किशोर न्याय और स्त्री के विरुद्ध अपराध के विभिन्न पक्षों पर विधिक हस्तक्षेप की प्रविधियां प्रस्तुत करती है..........इसे बिहार के सभी पुलिस अधिकारियों को निःशुल्क उपलब्ध कराया जाएगा ..........
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बंद करो मानव व्यापार.

· अरविन्द पाण्डेय



सारा भारत करे पुकार.
बंद करो मानव व्यापार.


बिहार के 20 जिलों में कमजोर-वर्ग द्वारा चलाई जा रही ग्यारहवीं कार्यशाला का समापन आज पटना के एस.के.मेमोरियल सभागार में हुआ ..................... 
..................इस दो दिवसीय ' मानव व्यापार निरोध ' विषयक कार्यशाला में पटना के सभी थानाध्यक्षों सहित अन्य पुलिस अधिकारियों ने समर्पण की स्वतः प्रसूत पवित्र भावना के साथ भाग लिया .... 
................उदघाटन-समापन के अवसरों पर कार्यशाला में पटना के सभी वरीय अधिकारियों - आई.जी. डी.आई.जी. एस एस पी , डी . एम. ने अपने अनुभवों से प्रतिभागियों को लाभान्वित किया....

.................... कार्यशाला में मैंने सभी को मानव-व्यापार निरोध की तकनीकों को अपने निजी अनुप्रयोगों के माध्यम से बताया..... कार्यशाला का एक दृश्य.......




अरविन्द पाण्डेय
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वे दोनों हैं रत्न ...

· अरविन्द पाण्डेय

हज़ारों साल कुदरत खुद ही खुद में कसमसाती है.
तभी जाकर रफ़ी जैसी कोई आवाज़ आती है.


कोई आवाज़, जब महसूस हो,जन्नत से आई है.
किसी बच्चे को अभी मुकेश ने लोरी सुनाई है .



भारत के 100 अरब से अधिक जीवित और स्वर्गवासी लोगों के जीवन को अपने स्वर-सौरभ से रफ़ी साहब और मुकेश जी ने सानंद बनाया ............ मेरे विचार से सबसे पहले इन दो महान भारतीयों को '' भारत रत्न '' मिलना चाहिए.....


.............. सुभाष बाबू तो रत्न नहीं रत्नागार थे......... 
उनके प्रेरक व्यक्तित्व से तो रत्नों का निरंतर जन्म होता रहता है......
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Shiv hi is Sansar Me Sabke Paalan Haar Aravind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय



शिव  ही  इस  संसार  में   सबके    पालनहार .
शिव को तू मत भूलना,हर पल शिव को पुकार.





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Wadiya Mera Daman Arvind Pandey Sings Rafi

· अरविन्द पाण्डेय




On July 31 ,, Immortal Rafi !!Dedicated to all lovers of Md.Rafi Sahab !
In my voice ---
Wadiya Mera Daaman ,
Raaste Meri Bahen,
Jaao Mere Siwa Tum Kaha Jaaoge .......

-- अरविन्द पाण्डेय
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Jaane Man Jaane Man Arvind Pandey Sings Kishor Kumar

· अरविन्द पाण्डेय

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O Duniya Ke Rakhwale Arvind Pandey Sings

· अरविन्द पाण्डेय


मेरे स्वर में :  ओ दुनिया के रखवाले 


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यह एवरेस्ट क्यों झुक सा अभी गया है..

· अरविन्द पाण्डेय



सत्ता के पौरुष का पर्याय पुलिस है.
पर,कौन घोलता इस अमृत में विष है.
यह शक्ति-पुंज कैसे असहाय हुआ है.
यह एवरेस्ट क्यों झुक सा अभी गया है.


षड्यंत्र घृणित दिखता जो, वह किसका है.
है सूत्रधार वह कौन, सूत्र किसका है.
विधि के शासन की गरिमा कौन लुटाता.
मर्यादा की रेखा है कौन मिटाता.


दावा करता है कौन न्याय का, नय का.
सारे समाज के शुभ का और अभय का.
वह कौन कि जिसने स्वर्णिम स्वप्न दिखाया.
पर, कर्म किया प्रतिकूल, मात्र भरमाया.


जब जब शासक,खल के समक्ष झुकता है.
तब तब ललनाओं का सुहाग लुटता है.
जब कर्म-कुंड की अग्नि शांत होती है.
तब दुष्टों से धरती अशांत होती है.


जब उच्छृंखल,अपवाचक लोग अभय हों.
जब सत्यनिष्ठ जन को सत्ता का भय हो.
जब श्रेष्ठ,श्रेष्ठता से मदांध सोता है.
वर्चस्व तब अनाचारी का होता है.


विधि के शासन की गरिमा तब लुटती है.
मर्यादा की सब रेखाएं मिटती हैं.
पौरुष का पर्वत भी झुक सा जाता है.
सारा समाज आतंक तले आता है.


इसलिए,अगर सम्मान सहित है जीना 
आतंक का न अब और गरल है पीना .
तब नपुंसकों का बहिष्कार करना है.
क्यों बार बार, बस,एक बार मरना है.

---  अरविन्द पाण्डेय 
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Chingari Koi Bhadke by Aravind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय

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Hame Aur Jeene Ki Chahat Na Hoti Aravind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय

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Aapke Pahloo Me Aakar Aravind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय

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हमला वही करता है जो जीता है खौफ में.

· अरविन्द पाण्डेय

हमला वही करता है जो जीता है खौफ में.
बेख़ौफ़ कलंदर है सिकंदर सुकून का. 
--   अरविन्द पाण्डेय 

गांधी जी कहते थे कि हिंसा वही करता है  जो भयभीत होता है.....
............... अनेक अपराधों विशेषतः डकैती के अपराध की पूरी घटना के विश्लेषण में मैंने यह पाया है कि लूटते समय अपराधी पकडे जाने के भय से अत्यंत काँप रहा होता है और उस वक्त यदि किसी ने ज़रा भी प्रतिरोध किया तो उसका भय और बढ़ जाता है और वह तुरंत अपने सामने वाले पर प्राणघातक हमला कर बैठता है....
............ महात्मा गांधी की अहिंसा  का दर्शन मूलतः भगवान पतंजलि के योगसूत्र की अहिंसा के संप्रत्यय से निःसृत था..... और उनका प्रत्येक कथन शुद्ध मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोगों पर आधारित होता था....
............ कल,अपने विरुद्ध दर्ज अनेक मामलों से भयाक्रांत रामदेव नें एक व्यक्ति के विरुद्ध  ऐसी वाचिक-हिंसा कर दी है जो मूलतः मानवता के विरुद्ध अपराधों की श्रेणी में परिगणित किया जाना चाहिए और जो भारत के महान संविधान के मूलाधारों के विपरीत है.....

इस पोस्ट पर कृपया राजनीतिक टिप्पणी न करें..
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मेरे स्वर में- Ek Tha Gul aur Ek Thi Bulbul- Aravind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय




Dedicated to Respected Nanda Ji , 

The Famous '' Bulbul " of Hindi Film - Jab Jab Phool Khile....

In My Voice - Ek Tha Gul aur Ek Thi Bulbul ....

Singing is the best way to worship God...
My voice follows Mukesh ji, Rafi Sahab , Kishor KUmar Ji and other legends of Hindi and other Indian Music World... So, I sing my favorite singers and pay my salute to them,,,,,,,

Aravind Pandey
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Aravind Pandey recites William Wordsworth and Sings Kishor

· अरविन्द पाण्डेय

ईस्टर पर ईश्वर-पुत्र ईसा की स्मृति में उन्हीं को समर्पित :

Aravind Pandey recites William Wordsworth : 
The Poem : By the Sea..... 

यह सुहासिनी सुन्दर संध्या , शान्तिमान एवं स्वतंत्र है...........

and Sings Kishor .................

आ चल के तुझे ............

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भगत, सुखदेव अब कभी न यहाँ आएगें ..

· अरविन्द पाण्डेय

23 मार्च 
इन्कलाब जिंदाबाद 

दिया जला के शहादत का हमको छोड़ चले
हुए फना पर आँधियों का भी रुख मोड़ चले 
मगर सोचा न था-ऐसा भी वक़्त आएगा
बस एक दिन ही भगत याद हमें आयेगा 

हर एक बाप ये सोचेगा कि उसका बेटा 
कहीं अशफाक,भगत सा न ज़िन्दगी दे लुटा 
हर एक नौजवाँ सलमान की तस्वीर लिए
बस,उस जैसा ही बन के जीने के लिए ही जिए 

किया है हमने जो सलूक शहीदों से,सुनो
उसे न माफ़ ये तारीख करेगी , सुन लो 
जो लूटते हैं मुल्क को वो मुस्कुराएगें 
भगत, सुखदेव अब कभी न यहाँ आएगें 

-- अरविन्द पाण्डेय


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Ek Tera Sundar Mukhada Aravind Pandey

· अरविन्द पाण्डेय

मेरे स्वर में रफ़ी साहब का मधुरतम गीत ,
हिन्दी फिल्म : भाई भाई

इक तेरा सुन्दर मुखड़ा , इक तेरा प्यार से भरा दिल,
मिलना मुश्किल ....


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प्रकृति का श्रृंगार तब तक रहेगा बिल्कुल अधूरा

· अरविन्द पाण्डेय


प्रकृति का श्रृंगार तब तक रहेगा बिल्कुल अधूरा.
जब तलक प्रत्येक जन का स्वप्न हो जाए न पूरा.
गिरि, नदी, पर्वत सभी में चेतना है सुप्त, तन्द्रिल,
किन्तु, प्राणी में प्रकट है प्रकृति का संकल्प पूरा.


अरविंद पाण्डेय 
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भारत के जन जन में अब तुम प्रकट बनो, हे राम

· अरविन्द पाण्डेय

दासोऽहं कोशलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः 

राम, तुम्हारी रावण-जय का अब हो नहीं विराम.
भारत के जन जन में अब तुम प्रकट बनो, हे राम.

शुद्ध-बुद्ध-प्रतिबद्ध विभीषण का हो अब अभिषेक 
स्वर्णमयी लंका का शासक हो सम्बुद्ध - विवेक .

............ प्रत्येक मनुष्य का हृदय स्वर्णमयी लंका है जिस पर अशुद्ध-राग, निजी-द्वेष, विश्वासघात, छल-छद्म, धर्म-विरुद्ध वासनाओं जैसे विकृत दश-मुख रावण का नियंत्रण बहुधा पाया जाता है...
............. स्वर्णिम लंका पर वास्तव में धर्म-सम्मत राग, अखंड विश्वास, धर्म-सम्मत कामना रूपी विभीषण का राज्याभिषेक किया जाना ही महाप्रकृति की इच्छा होती है....

...... श्री रामभद्र का धरा-अवतरण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ ..........

............. कलिकाल में अमिताभ बुद्ध, ईश्वर-पुत्र जीसस और पैगम्बर मुहम्मद के माध्यम से उनकी वाणी पुनः अवतरित हुई और संसार को मार्ग-दर्शित किया ..........

श्री रामनवमी इसी ऋत के स्मरण का महापर्व और शुभ अवसर है.....

आप सभी मित्रों को श्री राम नवमी की शुभ कामनाएं ......... 

ईश्वर , सभी को अशुद्ध-राग, निजी-द्वेष, विश्वासघात, छल-छद्म, धर्म-विरुद्ध वासनाओं से मुक्त करें और 
असतो मा सद्गमय की अनुकम्पा करें.....

अरविंद पाण्डेय 
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Moti Jaisa Rang Ang mei in my voice

· अरविन्द पाण्डेय



 अरविंद पाण्डेय 
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श्री माँ के श्री चरणों में

· अरविन्द पाण्डेय


यो माम् जयति संग्रामे, यो मे दर्पं व्यपोहति.
यो मे प्रतिबल: अस्ति, स मे भर्ता भविष्यति : 

श्री दुर्गा सप्तशती मे भगवती चंडिका का संवाद 

मैं वही शक्ति, जिसने शैशव में शपथ लिया 
नारी-गरिमा का प्रतिनिधि बन, हुंकार किया -- 

'' जो करे दर्प-भंजन, जो मुझसे बलवत्तर 
जो रण में करे परास्त मुझे, जो अविजित नर । 

वह पुरूष-श्रेष्ठ ही कर सकता मुझसे विवाह 
अन्यथा, मुझे पाने की, नर मत करे चाह । 

आज महानिशा-पूजन के अवसर पर श्री माँ के श्री चरणों में 
मेरा वर्ण-पुष्प :

अरविंद पाण्डेय 
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भगत ! बचो फांसी से,कर दो इनका काम तमाम.

· अरविन्द पाण्डेय


23 मार्च !! 

भगत ! बचो फांसी से,कर दो इनका काम तमाम................

नहीं शहादत देना है,  अब  तो  शहीद  करना है.
हिन्दुस्तां के रखवालों अब खुद न कभी मरना है.
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की फांसी को भूल,
कुछ  काले  अँगरेज़  भोंकते हैं भारत  को  शूल. 

इन्कलाब  का नारा  लेकिन इरविन  जैसा काम.
भगत ! बचो फांसी से,कर दो इनका काम तमाम.

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इस ज़मीं से कोई खुशबू ले रहा, काँटा कोई.

· अरविन्द पाण्डेय


दो तरह के पेड़ इक काँटों भरा, इक फूल का.
इस ज़मीं से कोई खुशबू ले रहा, काँटा कोई.
दो तरह के लोग हैं दुनिया के दस्तरख्वान में,
एक लगता मिर्च सा, दूजा लज़ीज़ इफ्तार सा .


अरविंद पाण्डेय 
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हमें है फिक्र कि होली में अम्नो-ओ-चैन रहे.

· अरविन्द पाण्डेय

कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं

तुम्हें हसरत है कि होली में खूब रंग मलो,
हमें है फिक्र कि होली में अम्नो-ओ-चैन रहे.

तो फिर,कुछ इस तरह से लाल किसी को करना,
कि वो गुस्से में न हो लाल, न फिर बात बढे.

अरविंद पाण्डेय
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उन प्राणों की क्या चिंता

· अरविन्द पाण्डेय

ॐ ,,,  आमीन 

न जायते म्रियते वा कदाचित् ...

क्षण क्षण क्षरण-शील जीवन में,
अनासक्त होकर तन-धन में,
केवल कर्म वही श्रेयस्कर 
जिससे हो सबका कल्याण.

उन प्राणों की क्या चिंता जो,
जन्म-जन्म से अविश्वस्त हैं,
तुम्हें छोड़कर निष्ठुरता से,
करते बारम्बार प्रयाण ...

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क्या कहें

· अरविन्द पाण्डेय


किसी को गैस है इतनी कि पेट जलता है.
किसी की रोटियाँ बननी भी आज मुश्किल हैं..


अरविंद पाण्डेय 
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गण-तन्त्र सदा ही विजय करे.

· अरविन्द पाण्डेय



गौरव से मस्तक उन्नत हो,
श्रद्धा से किन्तु सदा नत हो.

करुणा से हृदय प्रकाशित हो.
शुभ,शील,सत्य से प्रमुदित हो.

जन-गण में नव-उत्साह भरे.
गण-तन्त्र सदा ही विजय करे.
-- अरविन्द पाण्डेय 

गण-तंत्र दिवस की शुभ कामनाएं !!

अरविंद पाण्डेय
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कवि कुमार विश्वास के लिए एक कविता

· अरविन्द पाण्डेय



कवि कुमार विश्वास के नाम एक कविता 




जब अनियंत्रित हो नदी,शिखर से बहती है.
फिर, कैसे बची रहेगी कलुषित धारों से .
निर्बंध महत्त्वाकांक्षा यदि उच्छल होगी ,
फिर 'आप' बचेंगें कैसे हेय विचारों से.

तब, जुबां बंद हो जायेगी उन मुद्दों पर,
जो भारत के जन-जन को विचलित करते है.
तुम विवश रहोगे और कहोगे फर्जी था 
जब वीर हमारे मुठभेड़ों में मरते हैं.

गर , कुर्सी की लपटों से कुछ ईमान बचा,
तो करो समर्थन अफ़ज़ल गुरु की फांसी का. 
गर, सच को सच कहने की ताकत नहीं बची,
फिर, नाम न लो कविता में झांसी रानी का .

अरविन्द पाण्डेय 

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और वो कंधा आज भी खून से लथपथ है.

· अरविन्द पाण्डेय




कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो इंसान को मारने के लिए
उसे क्रिकेट की गेंद की तरह आसमान पे उछालते हैं.

कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो आसमान से गिरते हुए 
उस इंसान को अपने कन्धों पे अस्पताल पहुंचाते हैं. 

कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो गेंद की तरह उछाले जाते हुए
और अस्पताल में पड़े हुए उस इंसान को मुद्दा बनाते हैं.

कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो इन दोनों तरह के इंसानों पर
फ़िल्में बनाकर पुरस्कार लेते हैं और करोड़ों कमाते हैं.

कोई मैदान में गेंद से खेलकर इन्सान को नचाता है .
कोई मैदान में अपनी जान पे खेलकर इंसान को बचाता है.

किसी के हाँथ में बैट और तमगे हैं,
किसी की जुबान पे सिसकती हुई शपथ है. 

मगर, वो इंसान आज भी अस्पताल में है 
और वो कंधा आज भी खून से लथपथ है. 


..............पटना के एस एस पी श्री मनु महाराज के उन अंगरक्षकों में से एक है मृत्युंजय यादव जो गांधी मैदान में हुए विस्फोट के उन साक्षियों में से हैं जिनके सामने तीन इंसान बम-विस्फोट के बाद ज़मीन से ऊपर की और उड़ गए जैसे फिल्मों में दिखाया जाता है.... और उस वक्त भी पटना के पुलिस प्रमुख के साथ साथ उनके सारे अंगरक्षक वहां से हिले तक नहीं......वहां उपस्थित जन-समुदाय पुलिस वर्दी देखकर आक्रोशित हो उठा था किन्तु एस एस पी मनु महाराज और उन चार पुलिस के जवानों को अपनी चिंता नहीं थी ....वे चिंतित थे कि विस्फोट में घायल लोगों को तुरंत अस्पताल कैसे पहुचाया जाय ....ऐसे वक्त जब भीड़ उनके ऊपर घातक हिंसक हमला कर सकती थी तब भी उन्होंने घायलों को अपने कंधे पर उठाया और अस्पताल पहुचाया....
इन्हें किस पुरस्कार से पुरस्कृत किया जाय..........ये जन-समुदाय निर्णय करे .......
.........इस फोटो में मृत्युंजय यादव गांधी मैदान के एक घायल को कंधे पे उठाये हुए अस्पताल की और बढ़ रहे हैं..........वहां उपस्थित बिहार के लोगों ने अद्भुत संयम दिखाया...घटना के बाद पुलिस के प्रति आक्रोश स्वाभाविक था फिर भी वहा शान्ति सुरक्षित रही.. धन्य है बिहार-भूमि और यहाँ के निवासी .......


..पटना पुलिस के जवान मृत्युंजय यादव को समर्पित...

अरविंद पाण्डेय

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आओ, उन्हीं के नाम दिया पांच जलाएं.

· अरविन्द पाण्डेय






दहशत के पटाखों में जो शहीद हो गए.
हाफ़िज़ की बेरुखी के जो शिकार हैं हुए.
आओ, उन्हीं के नाम दिया पांच जलाएं.
पुरअम्न-ओ-पुरअश्क़ दिवाली ये मनाएं.

अरविंद पाण्डेय
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दिया, खुद अपनी शहादत का, जलाया जाए.

· अरविन्द पाण्डेय

 कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं 



तरह  तरह के बिक रहे  हैं चिरागान  यहाँ.
जिन्हें  खरीदने  को  लोग  परेशान  यहाँ.
 कोई चिराग ना मिला कि जो दिल खुश कर दे.  
सदी की स्याह सियासत में  रोशनी  भर दे.

तो आओ दोस्त, सियासत को जगाया जाए 
दिया, खुद अपनी शहादत का,  जलाया जाए.

Aravind Pandey 

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खिले चाँद की दीद मुबारक !

· अरविन्द पाण्डेय

ॐ आमीन।


 परमानन्द - मयी   यह    ईद  !
शुभ हो, सब को, शशि की दीद !

सब को हो यह  ईद मुबारक !
खिले चाँद  की दीद मुबारक ! 

एक  मास की  ईश-भक्ति  का  पुण्य    हुआ  साकार 
नील - गगन  का  किया काल ने  शशि से शुभ श्रृंगार 
शिव-ललाट की चन्द्र-रश्मि, झरती,जल बन,अम्बर से 
ईद  और  श्रावण  में  देखो ,  सौम्य सुधा-रस   छलके    


अरविंद पाण्डेय 
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मौसिकी की मय

· अरविन्द पाण्डेय

मौसिकी की मय 


अरविंद पाण्डेय
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वर्ण-विहीन समाज व्यवस्था

· अरविन्द पाण्डेय




भविष्य में चीन द्वारा भारत में अवैध रूप से घुसकर बनाए गए और न हटाए गए तम्बुओं को ये लोग अकेले अकेले हटा पायेगे..???

...........आजकल फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स पर अनेक प्रोफाइल , पेज या ग्रुप में अपनी अपनी जाति की उत्कृष्टता , सर्वोच्चता आदि की बाते प्रस्तुत की जा रही हैं............. यह सत्य भी है कि प्रत्येक जाति या वर्ण की अपनी विशिष्टताएं होती हैं और समाज के सर्वांगीण विकास में उनका विशिष्ट उपयोग भी है ............. किन्तु, इस देश को अगर महाशक्ति बनाना है तब जाति-वाद, वर्ण-वाद समाप्त करना होगा................ 

...........अगर हम इतिहास और अन्य प्रमाणों के आधार पर देखें तो पायेगे कि ब्राह्मण , ब्रह्मर्षि. कायस्थ या क्षत्रिय -------- ये चार नहीं बल्कि केवल २ वर्ण हैं ........ और इसीतरह पिछड़े-वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजातियों में परिगणित लगभग २०० जातियां वास्तव में २०० नहीं अपितु केवल २ वर्ण हैं.................इसलिए अब, हम भारत के लोग ३०० जातियों में विभाजित न होकर, अगर सिर्फ एक ''वर्ण'' बन जायं -- तो देश का हित होगा......... 

..........ब्राह्मण , ब्रह्मर्षि या कायस्थ, क्षत्रिय आदि के विशिष्ट पेज और ग्रुप फेसबुक पर उपलब्ध हैं ............. जिनके अवलोकन से स्पष्ट होता है कि उसके लिखने वाले व्यक्तियों के अपने कुछ सामूहिक लक्ष्य हैं.... 


............मगर क्या वे लक्ष्य , अकेले प्राप्त हो सकेगे.....??? यदि लोकतंत्र में संख्या का अपना विशिष्ट व्यावहारिक महत्त्व रखती है तब क्या अकेले - अकेले ये तीनो स्वघोषित लक्ष्य प्राप्त कर पायेगे...??? ............ और क्या इन वर्गों के के नौजवानों की रोज़गार की समस्या का समाधान अकेले चलने से हो पायेगा...?? 


............. क्या इन लेखों को लिखने वालों को पता है कि उनकी अलग-अलग जनसंख्या क्या है ???? 


.............. और अगर एक काफिले में आ जांय तब उनकी जनसंख्या क्या होगी ...?? 


.......और अगर आज की व्यवस्था में जनसंख्या का कोई विशिष्ट महत्त्व है तब क्या एक काफिले में चलना श्रेयस्कर नहीं है .??? 



अरविंद पाण्डेय
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भगवान पतंजलि : राजनीतिक और आध्यात्मिक स्फोटवाद के द्रष्टा :

· अरविन्द पाण्डेय

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ऐसा दीप कहाँ से लाऊं..

· अरविन्द पाण्डेय



ॐ : आमीन 

तुम ही पुष्पों में परिमल बन महक रहे हो,
तुम्हें कौन सा कुसुम चढाऊं..
जिसकी सुरभि न तुम्हें मिली हो,
ऐसा फूल कहाँ से लाऊं.

तुम भास्कर बन सकल जगत को भासित करते,
तुम्हें कौन सा दीप दिखाऊं,
जो तुमको प्रकाश से भर दे ,
ऐसा दीप कहाँ से लाऊं..

अरविंद पाण्डेय
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बहुत कुर्बानियां दी हैं हमारे कुनबे ने...

· अरविन्द पाण्डेय




हर इक शहीद ने दिया जो शहादत देकर,
वही पैगाम मैं ज़िंदा ही देने आया हूँ. 
बहुत कुर्बानियां दी हैं हमारे कुनबे ने, 
मैं इस दफा उन्हीं को जिब्ह करने आया हूँ. 


ये पंक्तियाँ वास्तव में क्रुद्ध-कवि श्री Desh Ratna की एक कविता के पढने के बाद निकलीं...उन्हें धन्यवाद .......... 

.......अब बलिदान के संकल्प का नहीं अपितु राष्ट्र-शत्रुओं की बलि चढाने के संकल्प लेने का युग है............


अरविंद पाण्डेय
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अमृत-विंदु खिचता है ..

· अरविन्द पाण्डेय




श्रीकृष्णार्पणमस्तु 

धरती के अन्तस्तल से जब अमृत-विंदु खिचता है 
ताप, तरणि का संश्लेषित,जब पादप से मिलता है 
मानव  की  निःश्वास-वायु  से  होता  परिसंपुष्ट ,
प्रकृति-नटी के इतने श्रम के बाद पुष्प खिलता है .



अरविंद पाण्डेय
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स्वर भी तुम, अक्षर भी तुम

· अरविन्द पाण्डेय





कृष्णं वन्दे 

तुम स्वर में उतर पड़े हो,
मैं चुप कैसे रह जांऊ .
स्वर भी तुम, अक्षर भी तुम,
मैं तुम्हें लिखूं फिर गाऊं..



अरविंद पाण्डेय
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श्रम से शिव का अभिषेक करें.

· अरविन्द पाण्डेय





मैं श्रमिक ईश के उपवन का, 
मैं ही मादक मधु, मधुवन का. 
मेरे ही श्रम से महक रहा , 
कोना कोना नंदन-वन का. 

श्रम से संकल्प संवरता है, 
श्रम से सौन्दर्य निखरता है. 
जो श्रमिक वही फलदार वृक्ष सा 
मधुर स्वादु फल, फलता है. 


श्रम से शिव का अभिषेक करें. 
आओ श्रम से संताप हरें . 

अरविंद पाण्डेय 
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जय जय श्री हनुमान..

· अरविन्द पाण्डेय

हरिः ॐ तत्सत्महाभटचक्रवर्तीरामदूताय नमः 

जब संकट आए कोई , हों व्याकुल मन प्राण.
शत्रु शक्तिशाली करे मारक शर - संधान . 
स्मरण करे एकाग्र हो , करे बस यही गान -
रामदूत रक्षा करो , जय जय श्री हनुमान. 

© अरविंद पाण्डेय..
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श्री श्री दुर्गा बत्तीस नामावली : स्वर : अरविंद पाण्डेय

· अरविन्द पाण्डेय

श्री श्री दुर्गा बत्तीस नामावली
अरविंद पाण्डेय 
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प्रथमं शैलपुत्री च !

· अरविन्द पाण्डेय

ॐ नमश्चण्डिकायै 
प्रथमं शैलपुत्री च !
.......... आप सभी मित्रों को नवरात्र महापर्व के लिए मंगल कामनाएँ ! ...........
...........माँ विंध्यवासिनी का यह  भजन आप सभी के लिए ............

-----------------
तुम कर दो अब कल्याण,सुनो कल्याणी
हम शरणागत है माँ विंध्याचल-रानी
१
तुमने ही तो कृष्ण -रूप में ब्रज में रास रचाया
युगों युगों तक भक्त जनों के मन की प्यास बुझाया
शिव ही तो राधा बनकर ब्रज की धरती पर आए
इस प्यासी धरती पर मीठी रसधारा बरसाए

हम रस के प्यासे लोग, न चाहे भोग, सुनो कल्याणी
हम शरणागत है माँ विंध्याचल -रानी

२
सारे ज्ञानी-जन कहते हैं तुम करुणा की सागर
फ़िर कैसे संसार बना है दुःख की जलती गागर
तुम हो स्वयं शक्ति जगजननी फ़िर ये कैसी माया
इस धरती पर पाप कहाँ से किसने है फैलाया

हे माता हर लो पीर, बंधाओ धीर ,सुनो कल्याणी
हम शरणागत है माँ विंध्याचल -रानी

३

बिना तुम्हारे शिव शंकर भी शव जैसे हो जाते
तुमसे मिलकर शिव इस जग को पल भर में उपजाते
तुमने स्वयं कालिका बनाकर मधु-कैटभ को मारा
दुःख में डूबे ब्रह्मा जी को तुमनें स्वयं उबारा

हम आए तेरे द्वार, छोड़ संसार, सुनो कल्याणी
हम शरणागत है माँ विंध्याचल -रानी
==============================
यह गीत मेरे द्वारा लिखा गया और इसकी धुन तैयार की गयी । वीनस म्यूजिक कंपनी द्वारा इसे अन्य भक्ति गीतों के साथ २००३ में एक एलबम के रूप में रिलीज़ किया गया ।
इस गीत में शिव के श्री राधा रानी के रूप में अवतार लेने तथा महाकालिका के श्री कृष्ण के रूप में अवतार लेने के रहस्य का वर्णन है ।
अरविंद पाण्डेय 
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मै पूर्ण, शून्य, सर्वत्र आज ..

· अरविन्द पाण्डेय


ॐ

नभ की अनंतता सिमट सिमट,
मुझमे है आज समाई.
मै पूर्ण, शून्य, सर्वत्र आज 
मेरी ही सत्ता छाई..

............तुम जो सोचते हो वही हो और अभी नहीं हो तो शीघ्र हो जाओगे 
........इसलिए , यह तुम पर निर्भर है कि तुम क्या होना चाहते हो ...................


अरविंद पाण्डेय 
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आएंगें तुम्हें याद हमारे ही सबक , दोस्त !

· अरविन्द पाण्डेय


ॐ आमीन 

मुमकिन है भूलना हमें  नाम-ओ-निशान से 
हम  मिट  न  सकेगें, मगर,दौर-ए-जहान से
आएंगें तुम्हें याद हमारे ही  सबक  , दोस्त 
जब जब कभी गुजरोगे किसी इम्तिहान से  


भारत की आज़ादी के प्रथम योद्धा, अमर शहीद श्री मंगल पाण्डेय को,,
मेरी ओर से ,, आप सभी की ओर से समर्पित पंक्तियां ..............
सभी मित्रों को नमस्कार और शुभ शर्वरी !


अरविंद पाण्डेय
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दिल भी खिले जो चाँद सा तो बात बने

· अरविन्द पाण्डेय




श्रीकृष्णार्पणमस्तु

खिलता है हर इक रोज़ चाँद आसमान में .
दिल  भी  खिले  जो चाँद सा तो बात बने .

मिलता है हर इक रोज़ फलक इस ज़मीन से 
इन्सां  से  जो  इन्सां   मिले  तो  बात  बने 


अरविंद पाण्डेय
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मोमिन है वो जो मस्त मौसिकी की मय पिए.

· अरविन्द पाण्डेय



ॐ
आमीन
कुछ लोग पिया करते हैं मयखाने की शराब ,
मोमिन है वो जो मस्त मौसिकी की मय पिए.

पीने पे सभी को नशा होता है, मेरे दोस्त,
पीता वो अस्ल में, जो है नशे में बिन पिए.


अरविंद पाण्डेय
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कान्हा न माने Samiksha Nandita sing Holi Song

· अरविन्द पाण्डेय




Happy Holi to all Music Lovers !!
Traditional Holi Song , Composed by Aravind Pandey and Sung by Samiksha Pandey and Nandita Pandey ..


अरविंद पाण्डेय 
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जो हर बेरंग को रँग दें , वो दुनिया जीत लाते हैं '

· अरविन्द पाण्डेय




श्रीकृष्णार्पणमस्तु

चलो होली में तुमको इक अजब दास्ताँ सुनाते हैं 
बहुत लंबा नहीं बस, एक मिसरा गुनगुनाते हैं-
' न अब है वक़्त कोई जंग तलवारों से लड़ने का
जो हर बेरंग को रँग दें , वो दुनिया जीत लाते हैं '

सभी मित्रों को होली की मंगल कामनाएं 

अरविंद पाण्डेय 
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मन में शिव-संकल्प सदा हो....

· अरविन्द पाण्डेय




तन्मे मनः शिवसंकल्प मस्तु 

गगन बना करता है साक्षी 
प्रतिदिन चन्द्र-उदय का .
किन्तु , मनुज के अंतर में 
फिर, क्यों बादल है भय का. 

मन में शिव-संकल्प सदा हो,
वाणी में मधु-विन्दु .
तभी ह्रदय में उदित 
हुआ करता आनंदित इंदु . 



अरविंद पाण्डेय 
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भगत, सुखदेव अब कभी न यहाँ आएगें

· अरविन्द पाण्डेय







23 मार्च 
इन्कलाब जिंदाबाद 
  
दिया जला के शहादत का, हमको छोड़ चले 
हुए फना, पर, आँधियों का भी रुख मोड़ चले 

मगर सोचा न था-ऐसा भी वक़्त आएगा 
बस एक दिन ही भगत याद हमें आयेगा 

हर एक बाप ये सोचेगा कि उसका बेटा 
कहीं अशफाक,भगत सा न ज़िन्दगी दे लुटा 

हर एक नौजवाँ सलमान की तस्वीर लिए 
बस,उस जैसा ही बन के जीने के लिए ही जिए 

किया है हमने जो सलूक शहीदों से,सुनो 
उसे न माफ़ ये तारीख करेगी , सुन लो 

जो लूटते हैं मुल्क को वो मुस्कुराएगें 
भगत, सुखदेव अब कभी न यहाँ आएगें 


अरविंद पाण्डेय 
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ढलेंगें हम न कभी,हमको यूँ ही चलना है

· अरविन्द पाण्डेय




चरैवेति 
अगर अवाम के तन पर नहीं कपडे होंगे
अगर गरीब हिन्दुस्तान के भूखे होंगे
समझ लो फिर ये आज़ादी अभी अधूरी है
अभी मंजिल में और हममे बहुत दूरी है

हो सुबह,रात हो या गर्म दुपहरी की तपिश
हमें हर हाल में मंजिल की ओर बढ़ना है 
ढले महताब, सितारे या शम्स ढल जाए
ढलेंगें हम न कभी,हमको यूँ ही चलना है



अरविंद पाण्डेय
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जय जय जय जयति परावाणी

· अरविन्द पाण्डेय




जो वाणी, परिनिष्ठित ऋत में ,
वह वाणी, सिद्ध परावाणी ! 
क्षण क्षण जो क्षरण-शील कण है,
वह  अक्षर  करे,  परावाणी !

बिखरी वैखरी विकल जो है ,
वह वाणी अविरत है आकुल ,
वीणा सी जो झंकार करे ,
जय जय जय जयति  परावाणी

अरविंद पाण्डेय
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वक़्त के पहिये के नीचे पिस रही हर शय यहाँ...

· अरविन्द पाण्डेय




थक चुके हों गर कदम,फिर भी तुझे चलना ही है. 
हो बहुत गहरा अन्धेरा,शब को, पर, ढलना ही है. 
वक़्त के पहिये के नीचे पिस रही हर शय यहाँ. 
आज जो सरताज,कल मुफलिस उसे बनना ही है. 


अरविंद पाण्डेय 
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मुझे तो चाहिए बस आज वही हिन्दुस्तां.

· अरविन्द पाण्डेय



हर एक दिल में ही जब ताजमहल सजता हो.
हर एक शख्स ही जब शाहजहां लगता हो.
हर एक दिल में हो खुदा-ओ-कृष्ण का ईमां.
मुझे तो चाहिए बस आज वही हिन्दुस्तां.


अरविंद पाण्डेय
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गर, हमारे सर की तरफ,आँख उठा देखोगे,..

· अरविन्द पाण्डेय



गर, हमारे सर की तरफ,आँख उठा देखोगे,
तो सुन लो - हाँथ भर की रस्सी के फंदे में,
तुम अपने सर को लटकता हुआ भी देखोगे. 

अरविंद पाण्डेय 
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जीवन बस यूँ ही चलता है .

· अरविन्द पाण्डेय




ॐ आमीन 

जीवन बस यूँ ही चलता है .

कुछ खोता,फिर, कुछ पाता है,
पाकर ज्यूँ ही इठलाता है,
दो पल चमक चमक कर सूरज,
बेबस हो, यूँ ही ढलता है ,

जीवन बस यूँ ही चलता है  ..



अरविंद पाण्डेय
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मेरी नई पुस्तक

· अरविन्द पाण्डेय

 द्वारा प्रकाशित 

हम बिहार के बच्चे हैं.

ये पुस्तक बिहार के स्कूलों में बच्चों के बीच बिहार भक्ति आंदोलन ट्रस्ट द्वारा निःशुल्क बाटी जायेगी .... To Get this BOOK Free on internet, kindly click and download : नीचे लिंक क्लिक कीजिये....


अरविंद पाण्डेय 
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टूटे हुए कुछ ख्वाब, हों कुछ पूरी मुरादें,

· अरविन्द पाण्डेय




सुप्रभात और नमस्कार सभी मित्रों को...आज की परावाणी आपके लिए :

है कौन वो सपने न रहे जिसके अधूरे,
ख़्वाबों के महल जिसके हुए हूबहू पूरे.
टूटे हुए कुछ ख्वाब, हों कुछ पूरी मुरादें,
दोनों को लिए साथ, तू बढ़ता चला जा रे.

अरविंद पाण्डेय 
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अब मोहम्मद मुस्तफा तशरीफ लाये हैं.

· अरविन्द पाण्डेय



चांदनी ने हर तरफ़ चादर बिछाए हैं
अब मोहम्मद मुस्तफा तशरीफ लाये हैं.

नूर का दरिया बहा चारो तरफ़ देखो
प्यारे पैगम्बर मोहम्मद मुस्कुराए हैं

चौदवीं के चाँद सा जो मुस्कुराते हैं
वो हमारे दिल पे छाने आज आए हैं

हर तरफ़ छाई अमन-ओ-सुकून की खुशबू
प्यारे मोहम्मद करम बरसाने आए हैं

-- अरविंद पाण्डेय


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यही वक़्त है लटका दो अफ़ज़ल गुरु भी, देश मेरे !

· अरविन्द पाण्डेय




यही वक़्त है लटका दो अफ़ज़ल गुरु भी, देश मेरे !
आज रात ही उन्हें बता दो अपनी ताक़त, देश मेरे !
उन सब को दो, देश निकाला,जो उनके हमदर्द यहाँ,
सरकश के दर सर झुकता है जिनका,उनको,देश मेरे!


आज गांधी यही कह रहे हैं सुभाष के साथ , सुनो-
बनो नहीं अब और अहिंसक तुम, सीमा पर,देश मेरे !


अरविंद पाण्डेय 
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बंगाल में रहकर भी रवीन्द्रनाथ से अपरिचय ....

· अरविन्द पाण्डेय



मेरा श्रृंगार , तुम्हें करता हर्षित अपार !
फिर क्यों मेरे सुन्दर मुख से कर रहे रार !

अजीब बात है ...... बंगाल में रहकर भी रवीन्द्रनाथ से अपरिचय .... कैसी विडम्बना है यह .......... अभिजित दा ने शायद गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर को ठीक से नहीं पढ़ा ..... अन्यथा 
वे ये बात समझ पाते कि वे जिस डेंट-पेंट की बात कर रहे थे वह स्त्री ही नहीं पुरुष के लिए भी ,, प्रत्येक व्यक्ति के लिए ,, क्यों और कितना आवश्यक है ........... 
............एक बार महात्मा गांधी , गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से मिलने गए थे .... साथ साथ शान्तिनिकेतन-भ्रमण के लिए निकलने के पूर्व, गुरुदेव ने दर्पण के सामने खड़े होकर, अपने श्वेत कुन्तलों ,, श्वेत श्मश्रु को सौम्यता के साथ संवारा और मुखमंडल को और अधिक दीप्तिमान और निर्दोष बनाने के लिए उसके एक एक अंश को ध्यान से देखा और त्वचा को अपने कोमल कर-स्पर्श और अङ्गुलि-संचालन से और अधिक स्फूर्तिमय बनाते हुए अपने वार्धक्य की भव्यता पर स्वयं ही मुग्ध से होकर, दर्पण के सामने संस्थित से हो रहे थे ..... जब उन्हें लगा कि अब वे भव्य और आकर्षक दिख रहे हैं तब महात्मा की ओर स्मित-मत्त सा होकर देखा ... महात्मा कुछ पल स्तब्ध सा उन्हें देखते रहे और फिर बोले - इस वृद्धावस्था में इतना श्रृंगार ! 
....... गुरुदेव तो अपने वार्धक्य की भव्य रम्यता की मस्ती में थे ... मुस्कुरा कर देखा महात्मा की ओर फिर कहा -- यौवन होता तब श्रृंगार की इतनी आवश्यकता न थी ... .. किन्तु , वार्धक्य में इतना श्रृंगार न करें तो मेरा अल्प भी असौंदर्य, मुझे देखने वाले को व्यथित कर सकता है ,, सुंदर वस्तु या सुंदर व्यक्ति को देखकर दर्शक प्रसन्न होता है ,, इसलिए ,, अब और अधिक सुन्दर दिखने का प्रयास करता हूँ ,,, असुंदर दिखकर , किसी दर्शक को निराश कैसे करून,, किसी को निराश करना भी तो हिंसा करना ही है ... अहिंसा के लिए ही तो श्रृंगार करता हूँ मैं कि जो मुझे देखे वह प्रसन्न हो जाए .... 
.............महात्मा , गुरुदेव की इस अहिंसा-वृत्ति को देख, पुनः स्तब्ध-प्रसन्नता से परिपूर्ण हो गए थे और शायद यही वह क्षण था जब महात्मा ने रवीन्द्रनाथ को गुरुदेव कहना प्रारम्भ किया था ............
अब अभिजित दा ने यह दृश्य देखा होता तो पता नहीं क्या टिप्पणी करते .............. !!
!! डेंट-पेंट !!

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माताएं बुला रहीं हैं तुमको सिहर - सिहर

· अरविन्द पाण्डेय



ॐ : आमीन 

हे  शुभ्र- वर्ण, शुभ्राम्बर, सुन्दर,  शुभ्र - नयन
अविरल-अनुकम्पा-अनुरंजित,अपराजित-मन
आओ , अपराधों से कलुषित  अब   धरती पर 
माताएं  बुला  रहीं  हैं   तुमको  सिहर - सिहर

कोलाहल  में   है  दबी  हुई   ॐ कार - ध्वनि
आकुल , अविरल आँसू  से भीगी आज अवनि


अरविंद पाण्डेय 

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मगर, जो दूसरों के लब पे तबस्सुम रख दे

· अरविन्द पाण्डेय

कृष्णं वन्दे जगदगुरुं : 

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन 

.............भारत में प्राचीन काल से ही शुद्ध और वास्तविक समाज-सेवा को प्रसन्नता-पूर्ण जीवन जीने के आवश्यक उपायों में बताया गया था .... पञ्च-ऋण से मुक्त होने और प्रतिदिन पञ्च-महायग्य करने का विधान प्रत्येक गृहस्थ के लिए किया गया है...किन्तु अज्ञानता के कारण आज अधिकाँश लोग इन उपायों का अवलंबन नहीं करते..... किन्तु सच ये है कि 

हंसी  हो लब पे तो दुनिया हसीन सजती है .
खिजां, बहार सी ताज़ातरीन लगती है.
मगर, जो दूसरों के लब पे तबस्सुम रख दे,
ज़मीं , फिरदौस से भी बेहतरीन लगती है.

........................अमरीका के मनोवैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में यह पाया है कि जो लोग शुद्ध और वास्तविक समाज-सेवा में स्वयं को व्यस्त रखते है वे अन्य समान-स्थिति वाले व्यक्तियों से अधिक प्रसन्न और तनावमुक्त जीवन जीते हैं......
........................अब पश्चिमी देशों में भी स्वयं को प्रसन्न रखने के लिए समाजसेवा को एक औषधि के रूप में प्रयोग किये जाने का प्रचलन प्रारम्भ हुआ है .....

सभी मित्रों को सुप्रभात और नमस्कार...

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अरविंद पाण्डेय
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प्रकाश-पुंज का न तो लिंग होता , न जाति होती है, न धर्म होता है..

· अरविन्द पाण्डेय




...... मलाला यूसुफजई एक ऐसे प्रकाश-पुंज का नाम है जो न स्त्री है न पुरुष ..क्योकिं प्रकाश-पुंज का न तो लिंग होता , न जाति होती है, न धर्म होता है..
और न ही वह पूर्वाग्रह के कारण प्रकाश का वितरण करता है..
...प्रकाश समानभाव से अपनी सीमा में आने वाली सभी वस्तुओं को मुक्त रूप से आलोकित करता है..
...........मलाला को लडकी के रूप में वर्गीकृत करके, उसे शिक्षा से वंचित करने के असफल प्रयास को नहीं देखा जा सकता .. जो अशक्त और असमर्थ होगा उसके साथ यह संभावित होगा...
..........आज भी भा
रत और विश्व के अनेक देशों में करोड़ों पुरुष ऐसे हैं जो शिक्षा से वंचित किये गए हैं,, जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिल रही .. जिन्हें मज़दूरी कराने के बाद न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं देकर क़ानून का खुला उल्लंघन किया जाता है.. 
..............इसलिए मलाला एक स्त्री नहीं है ... उसने शिक्षा-शत्रुओं के विरुद्ध कुछ किया नहीं ..बल्कि , शिक्षा-शत्रुओं ने उसके द्वारा वितरित हो रहे प्रकाश को उसी तरह धूल फेंक कर ढकने की कोशिश की जैसे कोई मूर्ख , सूर्य की ओर धूल फेंक कर उनके प्रकाश को अवरुद्ध करने का प्रयास करता है...
आप इस कविता को ज़रूर पढ़ें...


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अरविंद पाण्डेय 
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पुलिस द्वारा आयोजित कार्यशाला

· अरविन्द पाण्डेय

राष्ट्रीय सहारा , पटना , ४ दिसंबर.२०१२ 


मल्टी मीडिया मोबाइल फोन आपका बहुत अच्छा दोस्त साबित हो सकता है मगर यह आपका खतरनाक दुश्मन भी बन सकता है... कुछ दिन पहले बिहार के सभी पुलिस अधीक्षकों को मैंने महिला महाविद्यालयों तथा विद्यालयों में कार्यशाला आयोजित करने को कहा था जिससे छात्र
छात्राओं  में मल्टी मीडिया सेल फोन और इंटरनेट की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सके..
राज्य के दो जिलों -- सुपौल तथा शिवहर में छात्राओं के बीच यह कार्यशाला पुलिस द्वारा आयोजित की गई जिसके अत्यंत सकारात्मक प्रभाव देखे गए..आगामी कुछ दिनों में पटना सहित एनी जिलों में भी यह कार्यशाला आयोजित की जायेगी.. इस हेतु अपने सुझाव और सलाह यदि आप सभी मित्र देगे तो हमें खुशी होगी 





अरविंद पाण्डेय 
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इस खून की हर बूँद पे वतन का क़र्ज़ है.

· अरविन्द पाण्डेय


26 नवंबर :
संविधान-दिवस
और
संविधान पर आक्रमण का दिवस



हमने तो बहाया है खून बस ये  सोचकर.
इस खून की हर बूँद  पे वतन का क़र्ज़ है.
राहों में बनाएँ हैं शहादत के  कुछ निशाँ, 
उनको तो बचाना अब तुम्हारा भी फ़र्ज़ है.

-- अरविंद पाण्डेय



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एकमेव है चन्द्र किन्तु शत - शत बन इतराता है,

· अरविन्द पाण्डेय



महाकाश,  उत्फुल्ल - धवल  सागर  सा लहराता  है.
एकमेव  है चन्द्र किन्तु  शत - शत  बन  इतराता है.

रात्रि गहन, कल-कल, छल-छल चेतना बही जाती है.
है   सुषुप्ति  का  द्वार खुला  निद्रा  अब  गहराती है.

स्वप्न-हीन हो निशा, दिवस  में  स्वप्न  बनें साकार.
आओ  ,  ऐसा  ही  अद्भुत   हम ,   रचें    एक संसार.



अरविंद पाण्डेय 
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आओ ! षष्ठी - उत्सव पर प्रार्थना करें हम

· अरविन्द पाण्डेय


आओ  षष्ठी - उत्सव  पर  प्रार्थना  करें हम.



सृष्टि - प्रसविता महासूर्य को नमन करें हम.
नयनों से शुभ-दृश्य अमृत-आचमन करें हम.
कर्णों में बस साम-गान की ध्वनि  गुंजित हो.
आओ ! षष्ठी - उत्सव  पर  प्रार्थना  करें हम.

कण - कण में हंसते ईश्वर का हो अब दर्शन.
द्वेष-अमर्ष मिटे , बस  प्रेयस का  हो वर्षण.
ह्रदय सदा पूरित हो छलके  प्रेम - अमृत से.
रहे मनीषा अभिषिन्चित अविरल बस ऋत से.


अरविंद पाण्डेय 
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मिले या ना मिले मंजिल तो भी हंसते रहना.

· अरविन्द पाण्डेय



हर  एक  शख्स  यहाँ  वक्त पर ही चलता है. 
अगर रुक जाय वक्त भी तो तुम चलते रहना. 
ये  जिंदगी  है तो  बस आबशार खुशियों का.
मिले या ना मिले मंजिल तो भी हंसते रहना.



अरविंद पाण्डेय

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वो भी मजहब के रिवाजों की बात करते हैं..

· अरविन्द पाण्डेय





जिन्हें कुरआन  से,गीता से वास्ता  न रहा, 
वो भी मजहब के रिवाजों की बात करते हैं.
कभी मज़ार पे,मस्जिद में,कभी मन्दिर में,
कभी मोमिन,कभी पंडित का स्वांग भरते हैं.

हर एक सर,जो  है सज़दे में, ज़रूरी तो नहीं.
कि वो झुका हो इबादत में,बस,खुदा के लिए.
हमने देखा है कि मछली की ताक में अक्सर,
यहाँ  बगले  भी  इबादत  सा किया  करते हैं.


अरविंद पाण्डेय


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यह समय सुचिन्तन और सचिंत होने का है

· अरविन्द पाण्डेय



हमारे लिए वैयक्तिक-उपनिवेशों के रूप में उपलब्ध ब्रिटेन और अमेरिका सहित अन्य यूरोपीय देशों में बेरोजगारी तथा उससे उत्पन्न अपराध आदि अन्य समस्याओं में निरंतर वृद्धि हो रही है इसलिए चीन, जापान , कोरिया आदि को छोड़कर अन्य एशियाई देशों को आगा
मी कुछ वर्षों में ही उस विकल्प के लिए तैयारी करनी होगी जिसमें कि हम अपने युवाओं को यथायोग्य काम दे सकें अन्यथा इन देशों में एक द्वेषाधारित राष्ट्रवाद का उदय होगा जिसकी तीव्र-तरंगों का आधात इतना भयावह होगा कि वहाँ काम करने वाले हमारे लोग सीधे अपने - अपने देशों में आकर गिरेंगें .
अपने देश में प्रौद्योगिकी और विज्ञान की शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम में होने के कारण हम एक वैज्ञानिक-समाज का निर्माण नहीं कर पाए..किन्तु चीन , जापान , कोरिया आदि एशियाई देशों में प्रद्योगिकी और विज्ञान की शिक्षा का माध्यम उनकी मातृभाषा होने के कारण वहाँ वैद्यानिक समाज का विकास हुआ और आज इन देशों के गावों में कुटीर-उद्योग में बनाए जा रहे इलेक्ट्रानिक सामानों से हमारा बाज़ार भरा पड़ा है.. 
खुली वैश्विक अर्थनीति जिस समय प्रवर्तित हुई उस समय हम प्रतियोगिता के मंच पर अपनी सशक्त भूमिका के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि यहाँ के योग्य युवा यूरोपीय देशों में ही अपना भविष्य देख रहे थे..किन्तु , चीन , जापान आदि ने उस भूमिका को बहुत पहले ही पहचान लिया था और उसके लिए तैयारी भी कर चुके थे.. वास्तव में भारत में खुली अर्थव्यवस्था का समय-पूर्व प्रसव हो गया और परिणाम था कि हम चीन आदि के पुष्ट अर्थ-शिशु के समक्ष कुपोषित शिशु जैसे रह गये और आज भी वह कुपोषण बना हुआ है.. कोरिया की सैमसंग कंपनी का गैलेक्सी अब इस समय अमेरिका के आई फोन से आगे बढ़ने का सफल प्रयास करता हुआ देख रहा और हम इस ऐतिहासिक अर्थ-युद्ध में बाज़ार बन कर मात्र युद्ध-भूमि ही उपलब्ध करा रहे हैं.


इस समाचार क्लिपिंग से स्पष्ट संकेत मिलता है कि भविष्य में आर्थिक-अतृप्ति के कारण उत्पन्न सामाजिक-संकट से ग्रस्त ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देश, हम भारत की युवा-प्रतिभाओं का उसी प्रकार स्वागत नहीं कर पायेगे जैसा वे पहले करते रहे हैं..
यह समय सुचिन्तन और सचिंत होने का है और शायद हमारे यहाँ अधिकांश लोगो का ध्यान इस ओर नहीं है ..

अरविंद पाण्डेय 

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अहं ब्रह्मास्मि,अनलहक की गूँज रूह में है

· अरविन्द पाण्डेय

महाशक्ति पीठ विन्ध्याचल 

लिए मिठास कुछ अमरित सा अपने पानी में.
मेरी  गंगा  यहाँ  मस्ती   में   बही   जाती   है.

बहुत   हंसीन  सी   आवाज़   हवाओं  में   है,
कि  ज्यों  कोई  परी वेदों  की  रिचा  गाती है.

खुद   अपने  तन  के ही करीब हुआ  तो पाया. 
मेरे  इस  गाँव  की मिट्टी की महक आती है.

यहाँ  रमजान की रानाइयां भी  नाजिल हैं .
यहाँ   नवरात्र  के  मन्त्रों  की सदा आती है.

अहं  ब्रह्मास्मि,अनलहक की गूँज रूह में है,
न जाने फिर भी  क्यूँ, ये रूह  कसमसाती है.

-- अरविंद पाण्डेय 


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नीरज जी के साथ एक काव्य मंच पर

· अरविन्द पाण्डेय



यह वीडियो एक मई २००८ को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हुई कवि-गोष्ठी का है .. हिन्दी दैनिक समाचारपत्र दैनिक जागरण द्वारा आयोजित  इस गोष्ठी में मैंने अपने सवक्तव्य  काव्य-पाठ से श्रोताओं से संवाद किया ... श्री गोपालदास नीरज इस गोष्ठी के अध्यक्ष थे तथा उन्होंने भी अपनी कविताओं गीतों के सुरस से श्रोताओं को रस-सिक्त किया ... नीरज जी के साथ यह दूसरा मंच था जहाँ मैंने काव्य-पाठ किया ..इस हेतु मैं  मुजफ्फरपुर के श्री अमरेंद्र तिवारी जी का आभारी हूँ कि उन्होंने मेरे अनुरोध पर यह वीडियो अथक-प्रयास के बाद पहले स्वयं प्राप्त किया फिर मुझे उपलब्ध कराया...

अरविंद पाण्डेय 


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मेरे आँगन में ही,मुफलिस सा,चाँद आया है !

· अरविन्द पाण्डेय

गौर्यै धात्र्यै नमो नमः
-------------
करवा चौथ .

सभी व्रती-नारियों के सम्मान में .आज माँ गौरी का स्मरण करते हुए.
-------------------------

मेरे सनम ! मेरे महबूब ! आज की शब् तो,
मेरे आँगन में ही , मुफलिस सा चाँद आया है.

बड़ा  बेनूर  सा  दिखता  है चौथ का ये  चाँद.
तुझी  को  देख, लग रहा है, ये शरमाया है.

तेरी नज़रों का नूर , दीद में मेरी, हरदम,
मेरे  हमनूर !  जो चारो  पहर  समाया है. 

उसी नज़र-ए-करम की भीख माँगने शायद,
मेरे  आँगन में  ही,मुफलिस सा, चाँद आया है.




-- अरविंद पाण्डेय 
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..फिर दोनों का था रखा नाम-इंदिरा और लक्ष्मी बाई.

· अरविन्द पाण्डेय


31 अक्तूबर

ये क्या रहस्य-उन्नीस नवम्बर को दोनों ऩे जन्म लिया.
ये क्या रहस्य है-दोनों की माँ  ऩे बचपन में छोड़ दिया.
दोनों के नामों का मतलब है एक ,एक सा  जीवन  था.
वैधव्य, पुत्र की मृत्यु,देश के लिए समर्पित तन-मन था.

बचपन में एक छबीली ,  प्रियदर्शिनी  दूसरी  कहलाई.
फिर दोनों  का  था रखा नाम इंदिरा  और लक्ष्मी बाई.


1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध आधुनिक विश्व इतिहास की एक ऐसी सशक्त घटना है जिसमें भारत ने श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में यह दिखाया कि वह सामरिक स्तर भी विश्व की महाशक्ति अमेरिका से मोर्चा लेने का संकल्प ले सकता है और भारत के इस पौरुष के शंखनाद में अमेरिका की पाकितान के लिए निकल रही आह दब कर रह गई .. बस यही एक घटना श्रीमती इंदिरा गांधी को विश्व इतिहास की सबसे सशक्त महिलाओं में से एक रूप में स्थापित करती है..भारत का यह दुर्भाग्य रहा है कि हम ऐसे व्यक्तित्वों को भी दल-गत कुदृष्टि से देखते रहे हैं.. मैंने इस कविता में उन समानताओं का उल्लेख किया है जो श्रीमती इंदिरागांधी और महारानी लक्ष्मीबाई में थीं..यहाँ तुलना नहीं की जा रही ..बस उस संयोग को बताया गया है जो विलक्षण है और भारत की इन दो स्त्री रत्नों में पाया जाता है..
-- अरविंद पाण्डेय
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रामदूत रक्षा करो , जय जय श्री हनुमान

· अरविन्द पाण्डेय



हरिः  ॐ तत्सत् महाभटचक्रवर्ती रामदूताय नमः

जब संकट आए कोई , हों व्याकुल मन प्राण.
शत्रु  शक्तिशाली  करे   मारक शर - संधान .
स्मरण करे एकाग्र हो , करे  बस  यही गान -
" रामदूत  रक्षा  करो ,  जय जय श्री हनुमान "

-- अरविंद पाण्डेय 



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शैशव के ही सन्निकट स्वर्ग हँसता है

· अरविन्द पाण्डेय



स्वप्न और विस्मृति  है  अपना जीवन.
है  सुदूर ,  आत्मा  का  मूल - निकेतन. 
तारक सा ज्योतित नभ से यहाँ उतरता.
आकर वसुधा पर,कुछ विस्मृति में रहता.

गरिमा के जलद-सदृश हम विचरण करते.
ईश्वर   के   शाश्वत  सन्निवास में  रहते.  
शैशव के  ही सन्निकट  स्वर्ग   हँसता  है.
तब,  सार्वभौम शासक  सा शिशु सजता है.

पर,जब यह शिशु, विकसित किशोर में होता.
तब, सघन कृष्ण - छाया  परिवेष्टित  होता.
यह,  किन्तु,  किया करता प्रकाश का दर्शन.
जब   होता   है   उन्मुक्त   हर्ष  का  वर्षण.

-- अरविंद पाण्डेय 
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अब अपनों से आकुल हिन्दुस्तान पुकारे..

· अरविन्द पाण्डेय




बहुत  कर लिया बंद, अब ज़रा भारत खोलो.
कहा खड़े हो  दुनिया  में अब खुद  को  तोलो.
बाजारों   में  कब्ज़ा  है  जापान ,  चीन   का.
कितनी  दौलत  वहाँ  जा  रही ,यह तो बोलो.


एक  वक़्त  था  जब  यूनानी, रोमन सारे.
खूब   खरीदा  करते  थे  सामान   हमारे.
वही  सुनहरी  सदी आज फिर कोई दे दे-
अब  अपनों  से आकुल हिन्दुस्तान पुकारे.

-- अरविंद पाण्डेय 




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रामदेव जी और अन्ना जी के लिए पांच सूत्र !

· अरविन्द पाण्डेय


रामदेव जी और अन्ना जी के लिए पांच सूत्र 
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समस्या भ्रष्टाचार-मुक्त भारत के निर्माण की है: कुछ सूत्र हैं जो उन्हें आंदोलन के रूप में शुरू करना चाहिए जो भ्रष्टाचार-मुक्त भारत के निर्माण के पक्षधर हैं..

१.सभी नागरिक संकल्प लें कि वे हानि उठायेगे किन्तु अपना काम साधने के लिए रिश्वत नहीं देगे..

२.विद्यालयों में विशेषरूप से दून स्कूल और अन्य तथाकथित अच्छे विद्यालयों में '' रिश्वत न लेने के फायदे '' विषय पर पाठ्यक्रम शुरू किया जाय.

३.स्कूलों में डोनेशन देकर प्रवेश देने के कार्य को रिश्वत का अपराध घोषित करने के लिए क़ानून बनाया जाय.

४.स्कूलों में उपहार लेने और देने की सीमा भी निर्धारित की जाय जिससे उपहार आदि के आधार पर स्टेटस का मूल्यांकन होना बंद हो.

५.एक १० करोड या ऊपर के साबित भ्रष्टाचार के लिए मृत्यु दंड का प्रावधान हो..जिससे २००० रुपये की रिश्वत और २०० करोड की रिश्वत में फर्क हो सके...
                  आप सहमत हैं ..यदि हाँ तो अभी --- राजनीति के मोह से बचकर ये सब कीजिये ..
                     वरना जीतने के लिए '' व्यावहारिक '' Practical होना पडेगा फिर क्या होगा उन सपनों का जिन्हें बाँटते हुए यहाँ तक की मंजिल तय की है.

-- अरविंद पाण्डेय 
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कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं

· अरविन्द पाण्डेय

कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं 


हैं सौम्य,शुद्ध,सुप्रसन्न दश दिशाएँ दीपित.
योगी के चित्त-सदृश निर्मल आकाश अमित .
नक्षत्र,ग्रह,उपग्रह,तारक-गण हैं  प्रमुदित.
धरती के ग्राम,नगर,वन-प्रांतर हैं हर्षित.

कल कल निनादमय तटिनी हो होकर उच्छल.
तट का आलिंगन कर, प्रसन्न होती अविरल.
मधुरिम-सुगंध-परिपूर्ण पवन कर रहा गान.
वन में प्रफुल्ल,पुष्पित वृक्षावलि का वितान.

है स्वतः प्रज्ज्वलित, अग्निहोत्र की अग्नि प्रखर.
जो क्रूर कंस के अनाचार से थी अज्वल .
नक्षत्र रोहिणी, भाद्र-कृष्ण-अष्टमी  दिव्य.
है महाकाल के कृष्ण-नमन से निशा भव्य.

कण कण में व्यापक परब्रह्म,सात्वत,विराट.
स्वरराट, स्वयंभू ,स्वप्रकाश,शाश्वत,स्वराट.
देव-स्वरुप देवकी-गर्भ से प्रकट हुए .
दानव-विदलित मानवता के प्रति अभय लिए.

नभ-सदृश वर्ण,मधुरस्मित,अलकावलि कुंचित.
वक्षस्थल है विद्युन्मय स्वर्णिम-रेखांकित.
कौस्तुभ-संदीपित कंठ ,चतुर्भुज ,चतुर्व्यूह .
कटि पर मधुरिम-गुंजित चंचल किंकिणि-समूह.

स्वर्णिम-पीताम्बर-श्रृंगारित था उच्च स्कंध .
चरणों  में सजती  थी पायल ज्यों वेद-छंद.
नयनों से थी बह रही प्रेम की दिव्य-धार.
साकार हो उठा था अब निर्गुण, निराकार.

अक्षर, अनंत श्री कृष्ण सांत में व्यक्त हुए.
वसुदेव, देवकी,देख उन्हें अनुरक्त हुए.
थी देह पुलक-परिपूर्ण,ह्रदय प्रार्थना-पूर्ण.
स्तुति, पूर्ण-तत्त्व की करती थी वाणी अपूर्ण.



----अरविंद पाण्डेय
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गांधी बनना आसान नहीं.

· अरविन्द पाण्डेय

गांधी  बनना  आसान  नहीं
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पहले   गांधी   से   प्रेम   हुआ .
अनशन-साधन  का खेल  हुआ.

जब मिला ज्ञान -यह नहीं खेल.
अनशन, सत्ता   का  नहीं मेल.

तब भाव हृदय के  छलक  उठे .
कुछ   पा  जाने को ललक उठे.

जिसके   विरुद्ध  से  लगते थे.
जिस पर अपशब्द निकलते थे.

उसको  ही तो  बस  पाना  था.
उस  घर  में ही बस जाना था.

जनता  करती थी बस पुकार 
कर दो,कर दो कुछ चमत्कार.

भ्रष्टाचारी  से   मिले मुक्ति.
अब करो तुम्हीं कुछ प्रखर युक्ति.

सपना  तो  सुन्दर  दिखलाया.
कुछ  पाल - जाल से भरमाया.

अनशन से प्राण अशक्त हुआ.
शीतल जब कुछ कुछ रक्त हुआ.

तब, कहा ह्रदय ने नहीं , नहीं.
गांधी  का  मार्ग  वरेण्य नहीं.

जिस पथ से मिलता सिंहासन.
वह पथ कुछ और, नहीं अनशन.

फिर तो अनशन-व्रत टूट गया.
वह  ''मार''  इन्हें भी लूट गया .

गांधी  बनना  आसान  नहीं.
यह धैर्य-हीन का  काम नहीं.

जिसमें  ज़ज्बे की  आंधी  है 
समझो  उसमें  ही  गांधी  है.



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ज्ञानिनामपि चेतान्सि देवी भगवती हि सा ..

· अरविन्द पाण्डेय


श्रीकृष्णार्पणमस्तु  

करते  थे जो शीश झुकाकर चरणों में अभिवादन.
आज उन्हीं से  मांग रहे तुम सत्ता  हेतु समर्थन.
अमृत-पंथ के पथिक ! तुम्हें जाना था अम्बर पार.
किन्तु  'मार' से विजित देख तुमको हंसता संसार.

जिस निषिद्ध फल का प्रचार जब में तुमको करना था.
किसे ज्ञात था स्वयं तुम्हें भी,खाकर फल, गिरना था.


ज्ञान-संपन्न ऋषियों के भी चित्त को भगवती बलात ही मोह की ओर प्रवृत्त करती हैं.. आश्चर्य नहीं हो रहा मुझे कि अभी कुछ ही समय पूर्व जिसके चरणों में शीश झुकाकर शक्तिशाली लोग शिक्षा ग्रहण करते थे , वही उनसे समर्थन के लिए भिक्षाटन कर रहा. 


© अरविंद पाण्डेय



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राजा भैया के माथे पर....

· अरविन्द पाण्डेय


ॐ आमीन :
चन्दा मामा चमक रहे हैं.
जूही  जैसा  महक रहे हैं.
राजा  भैया  के माथे  पर,
मोती  जैसा  दमक रहे हैं. 

© अरविंद पाण्डेय


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हुई है चाँद की तस्दीक

· अरविन्द पाण्डेय


इसी  रमजान  में  इक  रोज़  किसी  रोज़े  में .
मेरे  रज्जाक !  तेरी  रहमतों  की  बारिश हो.
हुई है चाँद की तस्दीक, अब तो इस दिल में,
जो हो ख्वाहिश,तेरे दीदार की बस ख्वाहिश हो.

Aravind Pandey 

www.biharbhakti.com


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श्री केशव अभिरूप हरे !

· अरविन्द पाण्डेय

श्री केशव अभिरूप हरे !

चिति-स्वरुप श्री श्री राधा के 
चारु चित्त को मुदित करें . 

नील-कमल मुख पर स्वर्णिम-मुख 
श्री राधा की कान्ति झरे. 

महारास के रस-रहस्य में 
मानस यह संतरण करे.


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Sabke Paalan Haar Aravind Pandey Presents Shiv Bhajan

· अरविन्द पाण्डेय



आज पवित्र श्रावण की दूसरी सोमवारी को भगवान् सदाशिव को मेरे स्वर में , मेरे अपने ही शब्दों में अर्पित भजन :
यहाँ मैंने  ''मेरा'' शब्द का प्रयोग किया ,,  किन्तु मेरा कुछ भी नहीं,, सब कुछ उन्हीं का है..
आप सभी शिव-भक्त भी इस भजन में वर्णित भगवान् के गुणों का रसास्वादन करें.. 
1.
शिव  ही  इस  संसार  में   सबके    पालनहार .
शिव को तू मत भूलना,हर पल शिव को पुकार.
2.
शिव शिव जप ले रे मना,शिव का कर गुणगान.
तू भी शिव हो जाएगा, शिव  का  कर  ले ध्यान.
3.
शिव की शरण जो आए.
काल छुए ना उसको वो तो,
अजर-अमर हो जाए,

शिव ने जो पिया था हालाहल ,
अमृत बनकर बरसा पल पल,

नाम जपे जो शिव का उसका भव-बंधन कट जाए.
शिव की शरण जो आए.
4.
सुख हो दुःख हो यश अपयश हो मान हो या अपमान.
झूठा  सारा  खेल  है जग़ का, कर  ले शिव का ध्यान.

सब कुछ कर दे शिव को अरपन माया-मोह बिसार. 
मेरे  शिव  हैं  दीनदयाल .मेरे   शिव  हैं दीनदयाल.
5.
शिव की जोत से जगमग करते सूरज चन्दा तारे .
शिव की शरण में कट जाते हैं भव के बंधन सारे.

शिव का ध्यान लगाते चलो. 
प्रेम   की  गंगा  बहाते चलो.

जोत से जोत  जगाते   चलो 
प्रेम  की  गंगा  बहाते  चलो.


Written and Sung and Dedicated to Lord Shiv by Aravind Pandey .
( IPS 1988 Bihar Cadre )
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गुवाहाटी में हम भारत के लोग

· अरविन्द पाण्डेय

गुवाहाटी की घटना से यह संकेत मिलता है कि इस देश में प्रत्येक संस्था , प्रत्येक वर्ग यह मानता है कि अपने सामने घटित होते हुए अपराध में हस्तक्षेप करने या पुलिस को तत्काल सूचना देने या ऐसे अपराधी को गिरफ्तार करके पुलिस के हवाले करने की जिम्मेदारी आम नागरिको की नहीं है ..

मगर क़ानून ऐसा नहीं कहता.. 

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३७ : किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट की मांग पर, प्रत्येक नागरिक, किसी अपराधी की गिरफ्तारी में उसकी मदद करने के लिए कानूनन बाध्य है. 

धारा ३९ : कुछ अपराधों के घटित होने या उस अपराध की योजना की जानकारी मिलने पर प्रत्येक नागरिक पुलिस या मजिस्ट्रेट को सूचना देने के लिए कानूनन बाध्य है..जिसमें लोक-प्रशांति भंग करने का अपराध भी आता है जो गुवाहाटी की घटना में हुआ...

४३ (१ ) कोई भी नागरिक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है जो उस नागरिक के सामने कोई गैर ज़मानातीय और संज्ञेय अपराध कर रहा हो और ऐसी गिरफ्तारी के बाद उसे पुलिस को सौंप सकता है..

गुवाहाटी की घटना के साक्षी और घटना का फिल्मांकन करते हुए वहा उपस्थित लोग, उपर्युक्त कानूनी प्रावधानों का पालन न करने के कारण स्वयं भी आरोपित की श्रेणी में आते हैं . 

और पुलिस की भूमिका की जांच तो होनी ही चाहिए कि घटना के समय वहाँ के क्षेत्रीय पदाधिकारी कहाँ थे और क्या कर रहे थे..

जर्मनी सहित अनेक देशों में ऐसा क़ानून है जो आप नागरिक द्वारा सक्षम रहते हुए अपराध न रोकने के आचरण को गम्भीर अपराध की श्रेणी में परिगणित करता है.. 
भारत में भी ऐसा क़ानून बनाए जाने की आवश्यकता है .. 

३ साल पहले पटना में एक लडकी के साथ दो लोगो ने सड़क पर इसी तरह का अपराध किया था और उसके बाद माननीय मुख्यमंत्री ने उस समय के आई जी , डी आई जी सहित पटना के एस पी का स्थान्तरण दूसरे दिन ही किया था..

मैंने एस पी , डी आई जी के रूप में रांची, चतरा , पलामू, खगडिया, गया, मोतिहारी , बेतिया , सहरसा ,मुजफ्फरपुर आदि जिलो में पैम्फलेट के माध्यम से जनता को प्रशिक्षित किया था कि वे भी आत्मरक्षा के अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपराधी के ऊपर हमला कर सकते हैं और ऐसा करने से उन्हें कानूनी सुरक्षा भी प्राप्त रहेगी..पुलिस द्वारा ऐसा किया जाना चाहिए जिससे आम नागरिक भी अपने कानूनी कर्तव्यों के प्रति सचेत रहें और पुलिस की सहायता निर्भय होकर कर सकें...


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या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी

· अरविन्द पाण्डेय

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी 

आँखे खुली रहना ही नहीं जागना हुआ,
आँखें जो हकीकत से रूबरू, तो फिर क्या बात !
अक्सरहाँ खुली आँख से सोते हैं यहाँ लोग.
उनके लिए तो दिन यूँ गुज़रता है जैसे रात.



© अरविंद पाण्डेय
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The Brilliance of Indian Police Service : Shri Manoje Nath

· अरविन्द पाण्डेय

श्री मनोज नाथ , आई पी एस
(१९७३ बैच .बिहार संवर्ग )



श्री मनोज नाथ : ३० जून को सेवा निवृत्त हुए और आई पी एस मेस में ३० जून को उनके सम्मान में आयोजित रात्रि-भोज में वे ऐसे लग रहे थे मानो राष्ट्रीय पुलिस अकादमी से बस अभी अभी निकला हुआ कोई आई पी एस प्रोबेशनर हो...एक निरंतर प्रज्ज्वलित बौद्धिक-प्रदीप जिसका आलोक उनके जाने के बाद भी बिहार पुलिस को ज्योतित करता रहेगा.
मैं साक्षी हूँ इस सत्य का कि जिस पद पर आने के लिए प्रत्येक आई पी एस अधिकारी कामना करता है और उस कामना को पूर्ण करने लिए अक्सर उस पद की पवित्रता के पणन को अतिशय सहज भाव से स्वीकार कर लेता है उस पद की ओर उन्होंने उससे भी अधिक सहज होकर, देखा तक नहीं .. श्री मनोज नाथ का स्वागत करने को आतुर वह पद , उन्हें देखता ही रह गया और वे अपनी राह पर चलते गये..और , एक आई पी एस प्रोबेशनर की उन्मुक्त प्रफुल्लता के साथ आई पी एस मेस से ३० जून को अपनी चिरंतन स्वतन्त्रता का आलोक बिखेरते हुए विदा हुए .. सेवा-निवृत्ति के बाद अक्सर लोग कहते हैं कि वे स्वतंत्र नागरिक के अधिकारों का उपभोग करने के योग्य हो गये किन्तु श्री मनोज नाथ , सेवा-काल में भी उस स्वतन्त्रता का भोग-आस्वाद करते रहे जिसकी कल्पना तक करने में दूसरों को भय लगता है..
पटना में रहते हुए मैंने बिहार में अपराध-नियंत्रण के लिए उत्तरदायी माने जाने वाले पद पर विराजमान होते हुए और उस पद से मुक्त होते हुए अनेक लोगो को देखा है किन्तु उस पद पर पदासीन को भी मार्गदर्शन देने की क्षमता से संपन्न अधिकारी को पहली बार देखा था ,, अपनी अतुलनीय गरिमा की प्रभा से आलोकित ,, अपने प्रखर किन्तु फिर भी प्रफुल्लित भाव-प्रवाह के साथ..
मैंने उनके साथ एस पी के रूप में चार साल काम किया .. मेरे वे चार साल अगर मेरी सेवा में नहीं जुड़े होते तो शायद मुझे यह भान भी न होता कि मैंने अपने जीवन में क्या खो दिया .. एक वरीय अधिकारी अपने अधीनस्थ को क्या दे सकता है , उसे कितना मूल्यवान बना सकता है ,, उसमें मूल्यों के प्रति कितनी आसक्ति भर सकता है , यह उन्हें ही पता होगा जिन्होंने उनके साथ काम किया.. 
बिहार में २२ साल की सेवा-अवधि में डी जी पी के रूप में अगर किसी की याद करके मुझे रोमांच होता है तो वे थे श्री डी पी ओझा .. किन्तु, श्री डी पी ओझा ने डी जी पी के रूप में जो कुछ किया उससे कहीं अधिक गरिमा के साथ, वह सब कुछ और उससे भी अधिक, श्री मनोज नाथ ने बिना डी जी पी बने ही कर दिखाया .. और यह वे ही कर सकते थे..
सेवा नियमों के कारण , बिहार में ,भारतीय पुलिस सेवा के इस सूर्य का प्रकाश-संवरण हुआ है ..और, भारतीय पुलिस सेवा की वर्तमान और भावी पीढ़ी, भविष्य में शायद यह विश्वास भी न करे कि श्री मनोज नाथ जैसे अधिकारी भी हमारी सर्विस में हुआ करते थे .. 
जिन्होंने उन्हें पहचाना उनका सौभाग्य था और वे दुर्भाग्यशाली हैं जिन्होंने उन्हें पहचान कर भी नहीं पहचाना .. 
श्री मनोज नाथ पहचाने जाने की वासना से मुक्त थे ..

--  अरविंद पाण्डेय 

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सितारे खिल उठे , अब चाँद मुस्कुराएगा

· अरविन्द पाण्डेय


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Sometime think in favour of your Protectors

· अरविन्द पाण्डेय



One must do proper analysis before judgement !

पुलिस की आलोचना के पहले क़ानून द्वारा पुलिस को दिये गए अधिकारों के बारे में भी सोचना चाहिए....

आरा के चर्चित ह्त्या-काण्ड के बाद पटना में घटित घटनाओं के बारे में अखबारों में तथा इंटरनेट पर अनेक विचार व्यक्त किये गए जिसमें पुलिस द्वारा आलोचकों की इच्छा के अनुरूप कार्रवाई न करने के लिए विशेष रूप से आलोचना की गई..इससे चिंतकों को समझना होगा कि -- पुलिस के बल प्रयोग के बाद सरकार , मानवाधिकार आयोग और अन्य मानवाधिकार एजेंसियों द्वारा यह देखा देखा जात है कि वह बल-प्रयोग उचित और क़ानून-सम्मत था या नहीं.?? और यदि वह कानून के अनुसार सही नहीं पाया जाता है पुलिस के लिए समस्या होती है.

इसलिए इस प्रकरण में कुछ बाते और समझनी होंगीं : 

१- अभी जो व्यवस्था काम कर रही है उसमें जिला-मजिस्ट्रेट ही विधिव्यवस्था का प्रभारी होता है..पटना में शवयात्रा के समय उत्पन्न समस्या विधिव्यवस्था की थी और डी एम तथा एस एस पी पटना के संयुक्त आदेश से मजिस्ट्रेट और पुलिस की प्रतिनियुक्ति की गई थी.. 

क़ानून के अनुसार परिस्थिति का मूल्यांकन करके मजिस्ट्रेट को आदेश करना कि पुलिस गैरकानूनी भीड़ के विरुद्ध कैसा बल प्रयोग करे.. 

पटना में उस दिन लगाए गए मजिस्ट्रेटों ने बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं समझी होगी और पुलिस को बल प्रयोग का आदेश नहीं दिया.. 

यहाँ पुलिस की कोई निष्क्रियता नहीं थी.. 

इसलिए उस दिन के लिए पुलिस या पुलिस-प्रमुख के बारे में कही जाने वाली प्रतिकूल बातें अतर्कसंगत हैं और क़ानून के अनुसार सही नहीं हैं.. 

२.जो भी अप्रिय घटना की गई वह पटना शहर के सिर्फ २ किलोमीटर क्षेत्र में घटित हुई..जब कि शवयात्रा का जुलूस आरा से आ रहा था.. इसलिए यह कहा जा सकता है कि जुलूस मूलतः शांतिपूर्ण था ...बाद में पटना आने के बाद उसमें कुछ उपद्रवी लोग मोटरसाइकलों के साथ मिल गए और अकस्मात ये घटनाएँ की. 

मामले दर्ज हैं और जांच के परिणाम सामने आयेगे किन्तु इतना कहा जा सकता है कि उस दिन पुलिस को उत्तेजित करके बल-प्रयोग कराने ( जिसमें पुलिस फायरिंग और नागरिकों की मृत्यु भी संभावित थी ) के षड्यंत्र को पुलिस ने धैर्य-पूर्वक असफल किया और इतने बड़े घटनाक्रम में एक भी गोले नहीं चली ..एक भी नागरिक आहत या मृत नहीं हुआ... 

Aravind Pandey
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यह पूरे समुदाय खींचकर पीछे ले जाने का षड्यंत्र है ..

· अरविन्द पाण्डेय

बिहार के आरा में हुई ह्त्या की घटना एक सुचितित बहुआयामी लक्ष्य प्राप्त करने के लिए की गई और इसका मूल उद्देश्य था कि बिहार और बिहारियों की छवि और प्रतिष्ठा में हो रही विश्वस्तरीय उर्ध्वगति को रोका जा सके.
पूरी दुनिया देख रही है कि बिहार में क्या हो रहा है और हमें बताना होगा कि बिहार के नागरिक बड़े संकटों में भी संयम नहीं खोते ..
घटना के बाद ह्त्या के विरोध में आरा,पटना और दूसरे स्थानों पर जो हुआ , ह्त्या के षड्यंत्रकारी यही चाहते थे..लोग उनके बिछाए जाल में फंस गए..और इस बात को भावुकता में लोग समझ नहीं पाए कि वे जो कर रहे हैं वह उन्हीं के लिए नुकसानदेह है.... अभी भी समय है ..यह बात समझी जानी चाहिए और वैधानिक-सत्ता का प्रयोग करते हुए हत्यारों को शिकस्त देनी चाहिए..
निजी शक्ति का प्रयोग करना प्रतिगामी कदम होगा और अब बिहार के लोग वह कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं हैं..अभी बिहार में एक ऐसी व्यवस्था काम कर रही जो सर्ववर्ग-हितकारिणी है..इस व्यवस्था के प्रति विश्वास रखना होगा और ऐसे किसी भी कार्य से बचना होगा कि लोगों को यह प्रचार करने का मौक़ा मिले कि देखिये बिहार में यह सब हो रहा है..
इस बात को समझना होगा कि यह ह्त्या व्यक्तिगत और सामूहिक - दोनों प्रकार की असावधानी का परिणाम थी...खुद के महत्त्व को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए था..सुरक्षा के जो नियम हैं उनका पालन यदि नहीं होता है तो इतिहास साक्षी है कि अनेक ताकतवर और महत्त्वपूर्ण लोग भी इस षड्यंत्र के शिकार हुए हैं... 
इसलिए शांत-बुद्धि से ह्त्या के पूरे षड्यंत्र समीक्षा करनी होगी क्योकि यह एक व्यक्ति ह्त्या नहीं की गई है .यह एक पूरे समुदाय खींचकर पीछे ले जाने का षड्यंत्र है और मैं जानता हूँ कि हम बिहार के लोग इतने प्रतिभाशाली हैं कि इस बात को समझ सकें..

Aravind Pandey 
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An Appeal by Karl Marx : 1870 के पेरिस कम्यून से बाहर निकलो कामरेड्स

· अरविन्द पाण्डेय





छद्म-माओवाद को वास्तविक  माओवाद ही खत्म कर सकता है क्योकि छद्म-माओवाद के विनाश के बीज स्वयं उसी के गर्भ में विद्यमान हैं.और चूँकि यह विषय आधुनिक विश्व का विशेषतः विगत शताब्दी का सर्वाधिक ज्वलंत विन्दु था इसलिए मार्क्स की बौद्धिक-सफलता और उनकी वैश्विक स्तर पर व्यावहारिक  असफलता मेरे अध्ययन का विषय रही है.
                           वर्ष १९८७ में  यू जी सी की जूनियर अध्येतावृत्ति के साथ ' द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और सांख्य' के साम्य पर शोध कर रहा था तभी भारतीय पुलिस सेवा के लिए मेरा चयन हो गया और बिहार मेरी सेवाभूमि निर्धारित हुई.चूँकि  मार्क्स  मुझे किशोरावस्था से ही प्रिय थे इसलिए पी एच डी   के लिए मैंने स्वयं ही यह     विषय निर्धारित कराया था.
                                        मार्क्सवाद की प्रथम प्रयोगभूमि सोवियत संघ में मार्क्स और लेनिन की प्रतिमाओं और प्रतिमानों के खंडन एवं ध्वंस के बाद भी दुनिया में अगर कहीं कोई संगठन या व्यक्ति उसके पुनःप्रयोग की बात करता है तो यह स्वयं मार्क्स और लेनिन के साथ अन्याय होगा क्योकि पूंजीवाद के विनाश तथा जिस  समाजवादी और साम्यवादी समाज के क्रमिक उदय की भविष्यवाणी की थी वह असत्य सिद्ध हुई है.इसलिए विश्व के लिए विचारणीय यह है कि अब कौन सी व्यवस्था निर्मित की जाय कि मानव द्वारा मानव के किसी भी प्रकार के शोषण की समस्त संभावनाएं समाप्त हो जाँय .
                         माओवाद के नाम पर जो संगठन सक्रिय हैं उनका इस विश्वदृष्टि बिल्कुल परिचय नहीं.जहाँ मार्क्स एक ऐसे स्थिति-विकास को एक ज्योतिषी के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो शताधिक वर्षों बाद क्रियान्वित हो सकता है वहीं ऐसे संगठन अपने 'सम्पूर्ण क्रान्तिक्षेत्र ' को जंगल तक सीमित रखे हुए हैं और ऐसा करने के लिए वे विवश भी हैं क्योकि विज्ञान के विकास और राज्यों की सैन्यशक्ति में असाधारण वृद्धि के कारण अब  अंतर्राष्ट्रीय क़ानून  या राष्ट्रों के क़ानून  के अनुसार अवैध मानी जाने वाली रण-नीति के साथ कोई संगठन सत्ता नहीं पा सकता .वर्ष १९६१ में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा में हुई कथित क्रान्ति के बाद पूरी दुनिया में कहीं कोई क्रान्ति नहीं हुई क्योकि सशस्त्र क्रान्ति अब  संभव ही नहीं है.
        जैसे परमाणु बम के निर्माण ऩे परमाणु बम के प्रयोग की संभावना को ख़त्म कर दिया उसी तरह सशत्र-क्रान्ति के विचार ऩे ही सशत्र-क्रान्ति की संभावनाओं को ख़त्म कर दिया और चूँकि मार्क्स ऩे इस टेक्नीक के अलावा और किसी टेक्नीक का उपदेश अपने शिष्यों को नहीं किया था इसलिए ये धर्मांध लोग अब इससे आगे कुछ सोच ही नहीं सकते.समस्या यह है कि मार्क्स का पुनर्जन्म हो नहीं सकता और वे  सशरीर आकर इन्हें उपदेश नहीं कर सकते कि अब १८७० के पेरिस कम्यून से बाहर भेई निअक्लो इसलिए अब इनका बौद्धिक विकास  वहीं रुक गया है जहाँ १८७० में था जब १० दिनों के लिए  पेरिस  कम्यून बना था 

                   तब प्रश्न है कि ऐसे संगठन क्यों सक्रिय हैं और वे लोगो को क्यों ऐसे स्वप्न दिखा रहे हैं कि वे बस क्रान्ति होने ही वाली है और २०२४-२५ तक माओवाद नामक व्यवस्था दिखाई देने लगेगी?
                     यह इसलिए कि ऐसे संगठनो ने जनता के शोषण की अपनी नयी तकनीक विकसित कर ली है जिसे लेकर वे जंगलों,गाँवों में जाते हैं जिन्हें वे आधार-क्षेत्र कहते हैं.इन आधार क्षेत्रों की खासियत यह होती है कि वहाँ न तो बिजली हो , न सड़क हो आधुनिक मनुष्य के लिए आवश्यक अन्य कोई सुविधा भी न हो..क्योकि यह सब रहने पर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के वहाँ पहुचने का खतरा होगा.तो इनका मूल आधार और मूल लक्ष्य ही है कि इनके समर्थक दरिद्रता का जीवन जी रहे हो.क्योकि यदि इनका समर्थक शिक्षित और ईमानदार हुआ तो इन्हें वह स्वयं खतम कर देगा जैसा कि बड़े स्तर  पर सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के लोगो ने किया . 
                   बिहार में आने के बाद रांची और खगडिया के बाद मेरी पदस्थापना चतरा जिले के पुलिस अधीक्षक के रूप में वर्ष १९९३ में हुई..चतरा जिला अत्यंत अविकसित होने के कारण इन लोगों के आधार क्षेत्र के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान था .
१९९३ का पद्रह अगस्त मुझे याद है क्योकि इस दिन से मैंने वहाँ सक्रिय छद्म माओवादियों को मार्क्सवाद और माओवाद के मूल सिद्धांतों का प्रशिक्षण देना शुरू किया था.मैंने इन्हें पैम्फलेट्स  और सार्वजनिक मंचों से यह बताया कि अगर तुम माओवादी हो तो मैं माओवाद की गंगोत्री मार्क्सवाद में पी एच  डी हूँ.
   मुझे सूचना मिली कि माओवादियों ने पन्द्रह अगस्त के दिन सुदूर क्षेत्रों के कुछ स्कूलों में बच्चों के माध्यम से  काला झंडा लगाने तथा बच्चों का जुलूस  थाना पर भेजने और उनके माध्यम से स्वतन्त्रता-दिवस मुर्दाबाद का नारा लगवाने की योजना बनाई है .मैंने जिला मजिस्ट्रेट से बात की और निर्णय किया कि परेड में सिपाहियों की संख्या कुछ कम भी करके ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में पुलिस बल भेजा जाय और वहाँ काला झंडा फहराने की इनकी योजना को विफल किया जाय.
                    मैंने चतरा में माओवादियों का मुख्यालय माने जानेवाले कुंदा थाना में एक इन्स्पेक्टर के नेतृत्व में पुलिस बल भेजा और उन्हें कहा कि जब बच्चों का जुलूस थाना पर आए तो सावधानी और धैर्य के साथ उनके नारों को सुनना है और जब वे थक  जांय  तब उन्हें टाफी और चाकलेट देना है और स्वतन्त्रता-दिवस का महत्त्व बताना है और उन्हीं बच्चों के द्वारा थाना में राष्ट्रीय ध्वजोत्तोलन कराना है.
                     पुलिस ने वही किया .उनके नारे शांतिपूर्वक सुने फिर उन्हें  को टाफिया खिलाईं और थानाध्यक्ष के स्थान पर खडा करके उनके बाल-नेता द्वारा ध्वजोत्तोलन कराया और वे जो काले झंडे, बैनर ,तख्तियां लेकर वे आये थी उन्हें ले लिया .
                    दूसरे दिन ही जिला मजिस्ट्रेट ने मुझे फोन किया और कहा कि आपकी रणनीति के कारण समस्या हो गई है. कुंदा  के सारे टीचर वहाँ से भाग आए हैं और यह बताया है कि माओवादियों ऩे मान लिया है कि उन्हीं  के बुलाने पर पुलिस आई थी इसलिए उन्हें धमकी दी गई है कि जो झंडा बैनर पुलिस ऩे जब्त किया है वो वापस लेकर आओ वर्ना जन-अदालत में हाथ-पैर काट दिया जाएगा.यह धमकी माओवादियों द्वारा क्रांतिकारी किसान मोर्चा नामक संगठन के लेटर पैड पर लिखकर टीचरों को भेजी गई थी.
   मैंने जिला मजिस्ट्रेट को कहा कि आप चिंता न कीजिये .ये तो एक बड़ा अवसर है इन पाखंडी माओवादियों के जन-विरोधी कार्यों को जनता के सामने लाने का.मैंने कुंदा में विराट जन-सभा बुलाई और वहाँ जिला-प्रशासन के सारे अधिकारियों को लेकर गया.लोगो के बीच दवाइयां और अन्य चीज़े बाटी गई.फिर मैंने कहा कि  मध्य विद्यालय के सभी टीचरों को तब तक के लिए जिलामुख्यालय स्थानांतरित किया जाता है जब तक यहाँ के सभी अभिभावक जुलूस बनाकर माओवादियों के पास जाकर यह नहीं कहते कि -- हमारा टीचर हमें वापस दो .या हमारे बच्चों को तुम खुद पढाओ, परीक्षा दिलाओ और सर्टिफिकेट दो जिससे वे आगे की पढ़ाई कर सकें.. मैंने एक बड़ा सा बोर्ड बनवाया था जिसमें लिखा हुआ था -
एम् सी सी के जन-अत्याचार का प्रतीक 
कुंदा मध्यविद्यालय 
यहाँ के शिक्षकों को एम् सी सी के गुंडों ऩे धमकी देकर भगा  दिया है जिससे यहाँ पढ़ने वाले २४३ बच्चों का भविष्य अन्धकार में है.
एम् सी सी के लोग नहीं चाहते कि यहाँ  बच्चे पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करे.
पुलिस  अधीक्षक 
चतरा 
और हम वापस आ गए .. दूसरे दिन माओवादियों की ओर से एक प्रेस विज्ञप्ति अखबारों में प्रकाशित हुई जिसमें कहा गया कि क्रांतिकारी किसान मोर्चा ऐसी कोई धमकी टीचरों को नहीं दी है बल्कि एस पी ऩे खुद वह लेटर पैड छपवाकर हमें बदनाम करने के लिए यह किया है..हम सभी टीचरों को चेतावनी देते हैं कि वे सही समय से स्कूल आए और बच्चो को पढाये वर्ना उन्हें जन अदालत में सज़ा दी जायेगी.
इस विज्ञप्ति के बाद उन्होंने टीचरों के घर जाकर उन्हें स्कूल जाकर पढ़ाने को कहा..
इस घटना का निहितार्थ यह है कि माओवादियों के खतरे को समाप्त करने के लिए यह साबित करना होगा कि वे माओवादी हैं ही नहीं बल्कि लेवी वसूलने वाले अवैध गिरोह के सदस्य हैं..पुलिस को आमलोगों को यह बताना होगा कि माओवाद और मार्क्सवाद के मूल सिद्धांतो पर पुलिस खुद चलती है और माओवादी उस सिद्धांत की ह्त्या कर रहे हैं.जो लोग इस विचार के हैं कि माओवादियों से वार्ता करके समाधान किया जा सकता है वे मार्क्सवाद और माओवाद की प्रकृति और चरित्र से अनभिग्य हैं . भारत में प्रतिवर्ष न्यूनतम दस हज़ार करोड़ रुपये इन लोगो द्वारा लेवी के रूप में वसूले जा रहे हैं.इतनी बड़ी राशि की आय वाला कोई संगठन खुद को समाप्त कर लेगा - यह एक अव्यावहारिक चिंतन है.
इनके एक रणनीति और है कि इनके विरुद्ध कोई ऐसा संगथान भी खडा हो जो कुछ ऐसे कार्य करे कि जिससे इन्हें अपने आपराधिक कार्यों को करने का नैतिक और व्यावहारिक आधार मिल सके . बिहार में माओवादियों और उनके प्रतिरोध में खड़े किये गए संगठन वास्तव में इन्हीं को मज़बूत करते रहे हैं.
माओवाद को मार्क्स के इस उपदेश का अनुसरण करते हुए ख़त्म किया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था - क्रान्ति के लिए आवश्यक है कि जनता अपनी स्थिति की वीभत्सता पर दहल उठे.

अगर हम इनके आधार क्षेत्र में इतना बता सकें कि इनलोगों ऩे आपकी स्थिति भयावह रूप में वीभत्स बना दी है तो हम इन्हें ख़त्म कर सकते है और इसके लिए स्वयं पुलिस और प्रशानिक अधिकारियों को यह घोषित करना होगा कि हम तुमसे श्रेष्ठ मार्क्सवादी हैं.

मैंने मगध रेंज के डी आई जी के रूप में एक पर्चा छपाकर पूरे रेंज में वितरित कराया था जिसकी अंतिम पंक्तियाँ थीं--
यदि जन-सेवा है साम्यवाद.
है न्याय दिलाना साम्यवाद.

शोषण का खात्मा साम्यवाद 
रिश्वत ना लेना साम्यवाद 

तब मैं हूँ शुद्ध साम्यवादी 
मै हूँ असली  माओवादी 

अरविंद पाण्डेय 
मूल पोस्ट →

स्फोटवाद के द्रष्टा:महर्षि पतंजलि

· अरविन्द पाण्डेय



राजनीतिक और आध्यात्मिक स्फोटवाद के द्रष्टा :महर्षि पतंजलि 
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( बिहार शताब्दी वर्ष के बौद्धिक-समारोह  हेतु बिहार राज्य अभिलेखागार,पटना द्वारा  प्रकाशित   '' बिहार गौरव '' नामक   संग्रह-ग्रन्थ  में प्रकाशनार्थ लिखित   लेख  )



जीवन और जगत के प्रति भारतीय-दृष्टि , विश्व की अन्य संस्कृतियों की  अपेक्षा अधिक व्यावहारिक और शान्ति-परक  रही  है ..  हमने समाज को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाले व्यक्तित्वों के जीवन , जन्म एवं जैव-परम्परा के बारे तथ्य सुरक्षित रखने की आवश्यकता नहीं समझी क्योंकि इसी से मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद के प्रचार की संभावना पैदा होती है.प्राचीन भारत में गायों की सुरक्षा और विश्राम के लिए विभिन्न ऋषियों ऩे आश्रय स्थल बनाए थे जिन्हें गोत्र कहा जाता था..गां त्रायते इति गोत्रं .. अर्थात जहाँ गायों को त्राण मिलता हो उसे  गोत्र कहा गया.सभी अवगत हैं कि भारद्वाज,शांडिल्य , वसिष्ठ आदि ऋषियों के नाम से गोत्र आज भी प्रवर्तित-प्रचलित हैं.और, गोत्र-स्थापना-काल से ही , एक गोत्र की कन्या या पुरुष का विवाह, उसी गोत्र के पुरुष या कन्या से नहीं करने का नियम था.यह नियम, बिना इसकी ऐतिहासिक-वैज्ञानिकता पर पुनर्विचार किये, आज भी उसी रूप में प्रवर्तित है.अर्थात गोत्र-स्थापक  ऋषियों  की जैव या सामाजिक परम्परा सुरक्षित बने रहने के कारण आज गोत्र के नाम पर लोगो के बीच एक अवैज्ञानिक भेद बना हुआ है.
           व्यक्ति की अभिव्यक्ति मूलतः उसके विचारों और उसकी दार्शनिक-दृष्टि के माध्यम से होती है.. किसने, कहाँ जन्म लिया यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं जितना यह महत्त्वपूर्ण है कि जन्म के बाद के उसके अवदान क्या रहे.. उपनिषद में निर्दिष्ट - 
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः 
आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मननेन निदिध्यासनेन  इदं सर्वं विज्ञातं भवति .. 
यह आत्मदर्शनवाद ही भारतीय संस्कृति का वह मूल प्रेरक तत्त्व है जिसके प्रभाव में  हमारी सारी सभ्यता निर्बाध और अव्यवहितरूप से एकस्वर, एकगति से  प्रवाहित होती रही है.. हमने शुद्ध मानव-हितकारी विचारों के विशाल सागर के सदृश , विश्व की समस्त सभ्यताओं की तृषित-भूमि को तृप्त करने हेतु,  ऐसे बादलों को जल-परिपूर्ण किया जो गगन-संतरण करते हुए चिंतन-जल की वर्षा करते रहे और शाश्वत चिंतन-जल के अभाव में तृषित धरा, धन्य होती रही.. 
                 बीज के ज्ञान से उस बीज से निष्पन्न विशाल वृक्ष का पूर्ण ज्ञान हो जाता है..क्योकि बीज का बीजत्व ही वृक्ष के रूप में प्रकट करता है स्वयं को .. इसीप्रकार , किसी व्यक्ति की आत्मा के प्रकाश के बोध से उस प्रकाश को विकीर्ण करने वाले व्यक्ति का भी सम्पूर्ण ज्ञान हो जाता है.. अन्य भारतीय ऋषियों, महाकवियों आदि की तरह  महासेनापति  सम्राट पुष्यमित्र शुंग  के महामात्य महर्षि पतंजलि के जीवन के वस्तुपरक तथ्य हमें उसी सुस्पष्ट रूप में उपलब्ध नहीं हैं जिस सुस्पष्ट रूप में उनकी दार्शनिक-दृष्टि उपलब्ध है ..और, इस लेख में , इसीलिये, हम , महर्षि पतंजलि  के व्यक्तित्व के इस सर्वाधिक अमहत्वपूर्ण  पक्ष पर विशेष चर्चा नहीं करेगे.. 
              महर्षि पतंजलि द्वारा प्रणीत ग्रन्थ-त्रय --  १ . चरक-संहिता २. महाभाष्य ३. योगसूत्र के अध्ययन से कोई भी व्यक्ति यह मानने के लिए विवश होगा कि अब तक के सम्पूर्ण मानव इतिहास में  श्री कृष्ण के बाद पतंजलि सर्वाधिक प्रतिभाशाली व्यक्ति हुए हैं.. यह कहना समीचीन है , प्रशंसित-प्राचीन नहीं कि चरक-संहिता आज तक के चिकित्साशास्त्र के समस्त शोधों को स्वयं में समाहित किये हुए है.. आगे भी जो शोध संभावित हैं उनके बीज और विस्तार भी उसमें प्राप्त हैं..
                      समाज की  सुव्यस्थित प्रगति के लिए व्यक्ति की देह, मन और वाणी का शुद्धीकरण आवश्यक होता है..जिन महापुरुषों में लोकसंग्रह के महाभाव के कारण लोक-कल्याण की इच्छा हुई उन्होंने उपर्युक्त तीन पक्षों पर अपना चिंतन और दर्शन, समाज के समक्ष प्रस्तुत किया..
                    इन सभी महापुरुषों में महर्षि पतंजलि श्रेष्ठतम एवं अतिशय लोकोत्तर हैं क्योकि उनके द्वारा देह-चित्त शुद्धि के लिए चरक संहिता, मानस-शुद्धि के लिए योगसूत्र एवं वाक्-शुद्धि हेतु महाभाष्य का प्रणयन किया गया..महाभाष्य, यद्यपि महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी की व्याख्या है किन्तु यह एक  आत्मपूर्ण दर्शन-ग्रन्थ भी है ..
            भारतीय साम्राज्य के लोक-स्वास्थ्य के लक्ष्य से महर्षि द्वारा प्रणीत  चरक संहिता में एक विशिष्ट ऐतिहासिक काल-खंड का वर्णन किया गया है जिसमें उस संहिता के प्रणयन की आवश्यकता और औचित्य की परिस्थितियां प्रस्तुत  की गई है.. इतिहास के अनुसार, सत्य युग में प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के समस्त नियमों का पालन करते हुए, सर्वभूत-हित के सार्वभौम सिद्धांत के अनुसार जीवन यापन करता था..किसी भी व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति अथवा  चराचर जगत के किसी भी अस्तित्व से कोई संघर्ष नहीं होता था..प्रत्येक व्यक्ति , प्रत्येक अन्य व्यक्ति के साथ समस्वर था..
'' न राज्यं न राजासीत, न दण्डो न च दाण्डिकः 
   धर्मेणैव  प्रजाः सर्वाः  रक्षन्ति  स्म  परस्परं .''
अर्थात , सत्ययुग में न राज्य था, न राजा था, न दंड था न दंड देने वाला था क्योकि सभी व्यक्ति सार्वभौम धर्म के अनुसार जीवन यापन करते हुए अन्य सभी सह-जीवियों के अधिकारों की रक्षा उसी रीति से करते थे मानों वे स्वयं के अधिकारों की रक्षा कर रहे हों..इसलिए, शत्रुता-विहीन समाज का अस्तित्व था सत्ययुग में.. किन्तु, जब सत्ययुग  का अंतिम काल-खंड निकट आया तब लोगों में धर्म के उल्लंघन की प्रवृत्ति उत्पन्न हुई और लोगो का  शरीर  रुग्ण होने लगा..यह काल , सत्ययुग के द्वापर में संक्रमित होने का काल था.. 
                इस स्थिति को देख कर , उस समय के लोक-सेवक , जिन्हें  ब्राह्मण कहा जाता था, अतिशय चिंतन-शील हुए और हिमालय की तराई में इस गंभीर मानवीय समस्या के निराकरण के लिए एक महासम्मेलन आयोजित किया गया जिसमे उस समय के समस्त मन्त्र-द्रष्टा  महर्षि गण , यथा वसिष्ठ,विश्वामित्र,गालव,कण्व,भारद्वाज आदि उपस्थित हुए और उन्होंने मनुष्य-शरीर को नीरोग रखने हेतु एक संहिता के निर्माण का संकल्प लिया .. उस संकल्प को क्रियान्वित करने का दायित्व महर्षि पतंजलि को दिया गया जिन्होंने चरक-संहिता नाम से विश्व का प्रथम चिकित्साशास्त्रीय ग्रन्थ प्रस्तुत किया..इसमें जैव-स्वास्थ्य के समस्त नियमों को संहिता-बद्ध किया..
              चरक संहिता विश्व का  प्रथम चिकित्साशास्त्रीय ग्रन्थ  है जो मनुष्य के समग्र-स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के समस्त उपायों का वर्णन करता  है..इसमें देह के साथ साथ मन और चित्त को भी स्वस्थ रखने के उपायों का वर्णन भी है .. आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र एवं सिगमंड फ्रायड ऩे भी बहुत बाद में, पतंजलि के सिद्धांत को अग्रसर करते हुए , यह स्वीकार किया कि देह में उत्पन्न होनेवाले अधिकांश रोग पहले मन में उत्पन्न होते हैं फिर वहाँ से उनका प्रतिबिम्ब देह में उतरता है जो रोग के रूप में दिखाई देने लगता है.. रोगों की मनोकायिकता के सिद्धांत के आलोक में, चरक-संहिता समग्र-चिकित्सा-प्रणाली का प्रवर्तन करती है..
               चरकसंहिता के पुरुषविचयशारीरं , पंचम अध्याय में महर्षि ऩे आध्यात्मिक-शारीर के विज्ञाता महर्षि अग्निवेश, आत्रेय , पुनर्वसु  आदि का प्रमाण के रूप में सन्दर्भ दिया है..अर्थात इस सन्दर्भ से भारत की वह एकात्मवादी  चिंतन पद्धति भी व्यक्त होती है जिसमे कोई भी महर्षि यह दावा नहीं करते कि कोई विचार उनका निजी आविष्कार है अपितु प्रत्येक महर्षि उस शाश्वत , सार्वभौम , सर्व-जन-कल्याणकारी,प्राचीन होते हुए भी चिर-नवीन ब्रह्मवादी परम्परा के एक प्रतिनिधि के रूप में ही स्वयं को प्रस्तुत करते हैं..यहाँ उल्लेखनीय प्रतीत होता है कि अर्वाचीन ऋषियों में स्वामी विवेकानंद एकमात्र ऋषि  हैं जिन्होंने शिकागो विश्व धर्म सम्मलेन के आयोजकों यह कहा था कि मैं भारत के सभी प्राचीन ऋषियों की ओर से आपको धन्यवाद देता हूँ कि आपने उन ऋषियों द्वारा प्रवर्तित ईश्वरीय दर्शन - एकं सद्विप्रा: बहुधा वदन्ति के दर्शन का अनुसरण करते हुए इस विश्व धर्म सम्मलेन का आयोजन किया है..
               चरक संहिता में , प्रकृति में प्राप्त तत्त्वों के,  मानव शरीर में व्यक्त स्वरूपों का अद्भुत निदर्शन किया गया है.. एक उदाहरण  समीचीन और उपादेय होगा -- यथा खलु ब्राह्मी विभूतिः लोके तथा  पुरुषेप्यान्तरात्मिकी विभूतिः ..यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषे अहंकारः .. तमो मोहः ज्योतिः ज्ञानम् .. यथा कृतयुगमेव  बाल्यं , यथा त्रेता तथा यौवनं , यथा द्वापरं तथा स्थाविर्यं यथा कलिरेवमातुर्यम यथा युगान्तः तथा मरणं .. प्रकृति में प्राप्त तम पुरुष में मोह के रूप में व्यक्त होता ऐ तथा प्रकृति में प्राप्त प्रकाश , पुरुष में ज्ञान के रूप में व्यक्त होता है.. कलियुग को  समाज की वृद्धावस्था के प्रतीक के रूप में प्रस्तुति शरीरविज्ञान की दृष्टि से पूर्ण सार्थक है अर्थात जिस प्रकार पुरुष की  वृद्धावस्था में शरीर के अंग शिशील होने लगते हैं..इन्द्रियों की शक्ति क्षीण होती जाती है ..स्मृतिलोप आदि मस्तिष्क की अनेक समस्याएं जन्म लेती हैं उसी प्रकार कलियुग में विराट पुरुष के अंगो में शैथिल्य का संचार होता है... यहाँ यह ध्यातव्य है कि चरकसंहिता में जहान भी पुरुष शब्द का प्रयोग है व - स्त्री पुरुष दोनों के लिए है .. दिग्भ्रमित स्त्रीवादी इसे पतंजलि के पुरुष-प्रभुत्ववाद के रूप में देख कर द्रष्टि-भ्रम से ग्रस्त हो सकते  हैं - इसलिए यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है.. 
                संहिता के निदानस्थान के उन्माद-निदानाध्याय में उन्माद  के  कारण सहित स्वरूपों की जो प्रस्तुति है वह आज के उन्नत मानस रोग विज्ञान के लिए भी मार्ग दर्शक है.. आज के मनोरोग  वैज्ञानिक, रोगों के लक्षणों और उनके समाधान की आपाततः क्षतिकारक पद्धति प्रस्तुत करते हैं किन्तु महर्षि पतंजलि ऩे उन्माद का वातोन्माद, पित्तोन्माद , श्लेश्मोन्माद  और त्रिदोषोन्माद के रूप में वर्गीकरण करते हुए जो कारण-विश्लेषण और समाधान दिया है वह अधुनातन मनो चिकित्सकों के लिए लाभदायक और अनुकरणीय है..
       वृहत्तर भारतीय साम्राज्य की  लोक-शिक्षा  के लक्ष्य से , पाणिनि की अष्टाध्यायी की व्याख्या करने वाला महाभाष्य, महर्षि पतंजलि द्वारा प्रणीत अध्यात्मिक स्फोटवाद की दृष्टि देने वाला विश्व का प्रथम व्यवस्थित ग्रन्थ है...महाभाष्य , पाणिनि के सूत्रों की व्याख्या तो करता ही है, उन सूत्रों में अन्तर्निहित राजनीति एवं देश , वहाँ के मौसम , संस्कृति और  मानव-विज्ञान  के आधार पर परिवर्तनशील भाषा , एक ही शब्द के परिवर्तनीय उच्चारण के साथ साथ अज्ञेय दार्शनिक तत्त्वों को भी स्पष्ट करता है....एक ही शब्द देवदत्त कैसे देश-भेद से देवदिन्न हो जाता है ..या नरेन्द्र कैसे बंगाल में नरेन् , पंजाब में नरिंदर हो जाता है -- इसकी समाज-राजनीतिक विवेचना की महाभाष्य ऩे..महाभाष्य में प्रस्तुत तथ्यों से ही यह ही इतिहासकारों ऩे यह निर्णीत किया कि जितनी  व्यापक भौगोलिक वस्तु-स्थिति की प्रस्तुति महाभाष्य में की गई है उतनी व्यापकता के साथ लिखने वाला व्यक्ति राजनीति का भी महापंडित रहा होगा.. 
                   यहीं  से इस ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि हुई कि महासेनापति पुष्यमित्र शुंग के महामात्य महर्षि पतंजलि ही हो सकते थे क्योकि जिस '' राजीतिक स्फोटवाद '' का प्रयोग करते हुए पुष्यमित्र शुंग ऩे महान मौर्य साम्राज्य के सम्राट वृहद्रथ का शिरच्छेद करते हुए वृहद्रथ के ही पूर्वज सम्राट चन्द्रगुप्त के राष्ट्रवादी शासन तंत्र को पुनर्स्थापित किया उसका अनुप्रेरण महर्षि पतंजलि जैसा आध्यात्मिक स्फोटवादी   विराट और भगवत्ता के अंश से दीपित व्यक्तित्व ही कर सकता था.. 
               महाभाष्य में मात्र एक बार -- एक व्याहारिक उदारण के रूप में - इह पुष्यमित्रं याजयामः - वाक्य का प्रयोग करते हुए महर्षि पतंजलि ऩे सम्राट को भी गौरवान्वित करने वाले अपने गुरु-सम्बन्ध का व्यपदेश किया .. सम्प्रति-प्राप्त अन्य  किसी भी सन्दर्भ-ग्रन्थ में महर्षि और महासेनापति के संबंधों का उल्लेख दृश्य नहीं है.. संभव है ऐसे सन्दर्भ-ग्रन्थ रहे हों और नालंदा और विक्रमशिला में बुभुक्षित अग्नि-देव ऩे उन्हें उदरस्थ कर लिया हो..
      पुष्यमित्र का राष्ट्रवादी-स्फोट या इस शब्द को और अधिक स्पष्ट करने लिए विस्फोट भी कह लें , एक सुचिंचित राजीतिक-दर्शन और जन-मनोविज्ञान पर आधारित था .. पुष्यमित्र ऩे महर्षि पतंजलि के आदेशानुसार तीन अश्वमेध यग्य किये -- अतएव उन्हें त्रिरश्वमेधयाजी कहा गया, किन्तु, स्वयं को उन्होंने कभी सम्राट विशेषण-युक्त नहीं कराया.. इस निर्णय में वास्तव में उनकी महामात्य चाणक्य के राजनीतिक दर्शन के प्रति गहन श्रद्धा , स्वयं को सम्राट चन्द्रगुप्त का वास्तविक उत्तराधिकारी मानते हुए कर्तव्य-पालन  की अभीप्सा ही मुख्य कारण थी  तथा , यदि, क्षुद्र राजनीतिक दृष्टि से भी देखें तो मौर्य-वंश के प्रति समर्पित राज्य-सेवकों और जन सामान्य के विद्रोह के बीज को समाप्त कर देने का एक व्यावहारिक लक्ष्य भी माना जा सकता है.. विश्व-इतिहास की सभी राज्य-कान्तियों के अध्ययन से सुस्पष्ट होगा कि क्रान्ति करने वाले प्रत्येक नए शासक ऩे पराजित शासक की पूरी परम्परा को प्रतिस्थापित कर दिया और पराजित व्यक्ति के किसी पूर्वज के उत्तराधिकारी के रूप  में कार्य नहीं किया किन्तु पुष्यमित्र की क्रांति से स्वरुप और उसके अनुवर्ती इतिहास से प्रमाणित है कि उन्होंने वैयक्तिक भौतिक लिप्सा या यश के लक्ष्य से क्रान्ति नहीं की थी अन्यथा अखंड भारत के चक्रवर्ती सम्राट के रूप में नामांकित होने की यश-लिप्सा को कौन त्याग सकता है.. यह शेषावतार महर्षि पतंजलि के शिष्य और निदेशित-सम्राट पुष्यमित्र शुंग ही थे जिन्होंने स्थितप्रग्य के रूप में '' सम्राट '' के परम मूल्यवान विशेषण को, अनायास ही, स्पर्श भी नहीं किया... 
            यह कहा जाता है कि पतंजलि-निदेशित पुष्यमित्र शुंग ऩे बौद्ध-वर्ग के विरुद्ध एक जन-अभियान  संचालित किया जिसमें बौद्ध होने मात्र के आधार प्रताड़ित करने की बात कुछ कथित इतिहास-लेखकों  द्वारा कही जाती है वह इस पारंपरिक प्रवाद-अफवाह के आधार पर बिना शोध किये या साक्ष्य प्राप्त किये बिना ही कही गई कि बौद्ध जातकों में पुष्यमित्र की एक सार्वजनिक घोषणा का उल्लेख है जिसमें यह कहा गया था कि - '' जो मुझे श्रमण का एक सर काट कर देगा उसे मैं सौ दीनार दूंगा.. यो मे श्रमणशिरो  दास्यति तस्याहं दीनारशतं दास्यामि .,किन्तु पश्चाद्वर्ती शोध से यह साबित हो चुका है कि किसी भी बौद्ध जातक में यह वाक्य प्रामाणिकतया प्राप्त नहीं था.. यह प्रवाद कथित वामपंथी इतिहास से अनभिग्य लेखकों ऩे प्रचारित किया..इन लोगो ऩे इन सारे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों पर विचार ज्ञानपूर्वक नहीं किया कि पुष्यमित्र शुंग पाटलिपुत्र में ही निवास करते थे.वह उनके विशाल साम्राज्य की राजधानी था और नालंदा तथा तक्षशिला विश्व विद्यालय पाटलिपुत्र के सर्वाधिक निकट एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण  बौद्ध-केंद्र थे किन्तु पुष्यमित्र के शासन-काल में इन विश्व विद्यालयों की महत्ता, प्रगतिशीलता  और  श्रेष्ठता अपने चरम उत्कर्ष पर थी.. इन दोनों विश्वविद्यालयों सरलता से नष्ट किया जा सकता था यदि शुंग-शासन सम्पूर्ण बौद्ध धर्म के विरुद्ध होता.किन्तु ऐसा था नहीं.. महासेनापति ऩे स्वयं को निरपेक्षभाव से पूर्ववर्ती राष्ट्रवादी सम्राट चन्द्रगुप्त के परमोअरा का वाहक ही समझा ..  शुंग-युग ही वह युग है जो आगामी एक हज़ार वर्ष तक  अपराजेय रूप से अव्याहत गति से चलने वाले भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग का सशक्त प्रारम्भिक चरण था जिसमें महामात्य चाणक्य के अर्थशास्त्र के सभी सिद्धांतों को क्रियान्वित करते हुए, गंभीर अनुशासन के साथ , अखंड वृहत्तर भारतीय साम्राज्य की अभिकल्पना, अभिरूपण , अभिव्यक्ति एवं अभिसुरक्षा के समग्र उपाय सुनिश्चित किये गए और यह सब कुछ एक सर्वत्यागी सन्यासी पतंजलि के मार्ग दर्शन में हुआ.
                 भारतीय साम्राज्य में लोक-मुक्ति के दिव्य लक्ष्य  से महर्षि ऩे योग सूत्र की प्रस्तुति की जिसका प्रथम सूत्र है --  अथ योगानुशासनं.ब्रह्मसूत्र  का प्रथम सूत्र है -- अथातो ब्रह्मजिज्ञासा.. योगसूत्र  के प्रथम सूत्र से यह द्योतित संकेतित है कि महर्षि पतंजलि यद्यपि जागृत संत एवं मंत्रद्रष्टा ऋषि  थे किन्तु उनका चिंतन , उस चिंतन की अभिव्यक्ति में शासन-सूत्र धार का  का रंग और उसकी सुगंध सपष्ट व्यक्त होती थी..इसीलिये महर्षि के योगसूत्र का प्रारभ अनुशासन शब्द से होता है.. 
                      महर्षि ने , पुष्यमित्र को माध्यम बनाकर, जिस प्रकार, नागरिक-अधिकारों की सम्पूर्ण सुरक्षा के लक्ष्य से, एक सशक्त, सर्वतो-सुरक्षित एवं अनुशासित समाज को उसके परम वैभव की ओर अग्रसर करने के लिए एक राजनीतिक शासन प्रणाली को प्रवर्तित किया उसी प्रकार , व्यक्ति के चित्त को सम्पूर्ण रूप से अनुशासित करते हुए , उसकी परम मुक्ति हेतु , योग-साधना प्रणाली का प्रवर्तन भी किया ..
                      चरकसंहिता, महाभाष्य और योगसूत्र के अनुशीलन से उसमें प्राप्त उत्प्रेक्षाएं, उपमाएं, प्रतीक-प्रयोग इन तीनों महाग्रंथों के एक ही महर्षि द्वारा प्रणीत होने की  प्रामाणिकता  पुष्ट करते हैं..वास्तव में . योगसूत्र का द्वितीय सूत्र योग की परिभाषा है --  योगश्चित्तवृत्ति निरोधः एवं तृतीय -- तदा द्रष्टु : स्वरूपे अवस्थानं अर्थात चित्तवृत्तियों के निरुद्ध होने से द्रष्टा की स्वरुप-स्थिति हो जाती है..बिल्कुल यही अर्थ चरक संहिता के स्वस्थ शब्द का भी है..स्वस्थ अर्थात स्व में, स्वरुप में , आत्मा में स्थित .. यह आत्मा की ही आत्मा में अवस्थिति, बाधित होती है रोगों से. इसलिए , दोनों शास्त्रों में महर्षि ऩे बाधक-तत्त्वों को क्लेश का नाम दिया. 
                   क्लेश को वर्गीकृत करते हुए महर्षि ऩे सूत्र दिया-अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ..
               अविद्या , अस्मिता, राग, द्वेष अभिनिवेश --ये पांच क्लेश बताये गए . यही पाचों क्लेश आज भी नवीन चिकित्सा शास्त्र के अनुसार शरीर और मन के समस्त रोगों के कारण हैं..राग और द्वेष से ही तनाव उत्पन्न होता है जिससे हृदय-गति.रक्तसंचार आदि की  प्राकृतिक प्रणाली अपने स्वरुप से च्युत हो जाती है जिससे शरीर के सारे घातक रोगों का जन्म होता है..यही  स्वरुपच्युति ही , देह , मन , और आत्मा तीनों के लिए तीनो संहिताओं में व्याख्यायित की गई...
                     अविद्या की जो परिभाषा महर्षि ऩे दी उसके आगे का चिंतन  मानव-मस्तिष्क के लिए संभव नहीं-- अनित्याशचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या अर्थात अनित्य , अपवित्र , दुःखकारी और अनात्म वस्तुओं में नित्य होने, पवित्र होने , सुखकारी होने तथा आत्मस्वरूप होने का भान ही अविद्या है.. यह सूत्र आज की सारी मनो-समस्याओं एवं तदनुसारी दैहिक-समस्याओं  की सकारण व्याख्या करता है..आज भी भौतिक वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और चिकित्सावैज्ञानिक यह मान रहे , यह कह रहे कि प्रत्येक ऐसी वस्तु जो सुखकारी प्रतीत हो अंततः सुख या स्वास्थ्य दे ही - यह आवश्यक नहीं.आज की गत्वर जीवन पद्धति के प्रति सतर्क करते हुए  स्वास्थ्य संबंधी अनेक मार्ग-दर्शन चिकित्साशास्त्रियों द्वारा दिए जा रहे जिनमें आपाततः , स्वादिष्ट , सुखकारी प्रतीत होने वाले फास्ट फ़ूड , तीक्ष्ण -ध्वनि वाले संगीत, एवं इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के द्वारा लिए जाने अन्य विषयों के स्वादों का सकारण वर्जन किया जाता है..यह वास्तव में , अविद्याग्रस्त व्यवहार एवं जीवन-यापन का ही निवारण है..
                        राग की परिभाषा महर्षि ऩे दी है - सुखानुशयी रागः ..आज Addiction अर्थात लत विवश आदतों के बारे में आधुनिक मनोविज्ञान ऩे जो बाते कही हैं वे इस सूत्र की ही व्याख्या या भाष्य हैं.. जिस कार्य में आपाततः सुख की अनुभूति होती है उसे मनुष्य ही नहीं प्रत्येक जीव बार बार करना चाहता है..और यहीं से उस कार्य-व्यापार के प्रति राग या उसकी लत या विवश-आदत जन्म लेती है.. महर्षि ऩे इसे भी क्लेश कहा अर्थात यह एक मनोरोग है..
           यद्यपि इस लेख में यह कहना कुछ पाठकों को अस्वाभाविक प्रतीत हो सकता है किन्तु उपलब्ध वैयक्तिक साक्ष्यों तथा सामान्य साक्ष्यों से मेरा यह मानना है कि कि महर्षि पतंजलि भगवान बुद्ध के पूर्ववर्ती थे एवं क्योकि वे दीर्घजीवी थे और हैं , इसलिए ,पुष्यमित्र के काल में भी वे वर्तमान थे और उन्होंने लोक-संग्रह के लिए, वृहद्रथ की राष्ट्र-घातक नीतियों के कारण, राजनीतिक स्फोट वाद के माध्यम से उन्हें सत्ताच्युत कराया..
                         इस प्रकार ,  भारतीय साम्राज्य के महामात्य के रूप में महर्षि पतंजलि ऩे लोक-स्वास्थ्य, लोक-शिक्षा एवं लोक-मुक्ति के तीन आयामों पर जो व्यावहारिक चिंतन प्रस्तुत किया और जिस शत-प्रतिशत सफलता के साथ उसका क्रियान्वयन पुष्यमित्र शुंग के द्वारा कराया वह विश्व इतिहास में अन्यतम है और अन्यत्र अनुपलब्ध है.
             
-- अरविंद पाण्डेय 

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प्रश्न हमारा स्वयं प्रश्न बन कर उत्तर भी होगा..

· अरविन्द पाण्डेय

अरविंद पाण्डेय 

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माँ ...

· अरविन्द पाण्डेय


Aravind Pandey 
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जो कुछ भी है तू, बस, तेरी माँ का ही है असर.

· अरविन्द पाण्डेय


हो देवता या हो कोई जन्नत का फ़रिश्ता.
पैदा न कर सकेगा खून-ओ-दूध का रिश्ता .
माँ ! तूने अपने खून से ही दूध बनाकर.
पाला है प्यार से खुद अपना दूध पिलाकर.

तू है कहीं जन्नत में यहाँ मै ज़मीन पर.
फिर भी तू मेरे पास है जैसे मेरे ही घर.


बांहों में यूँ लिपटाके मुझे रात को सोना.
बेशर्त मुहब्बत में हरिक पल ही भिगोना.
हर चीज़ ही पाने को मेरा जिद में वो रोना.
सब कुछ मुझे देने को तेरे चैन का खोना.

हर साँस मेरे दिल को देके जाती है खबर.
जो कुछ भी है तू, बस, तेरी माँ का ही है असर.


-- अरविंद पाण्डेय 
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ताप , तरणि का संश्लेषित जब पादप से मिलता है

· अरविन्द पाण्डेय


---  Aravind Pandey 

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वे विराट के अमृत पुत्र थे ..

· अरविन्द पाण्डेय


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विपश्यना थी मधुरिम मदिरा..

· अरविन्द पाण्डेय

बुद्ध  पूर्णिमा 




बुद्ध के बिहार को जानने के लिए इस साइट पर अवश्य जांय :

http://biharbhakti.com/home


-- अरविंद पाण्डेय 
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आओ,ऐसा ही अद्भुत, हम,रचें एक संसार.

· अरविन्द पाण्डेय


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अब बिना रीति, तुमसे ,हे शिव ! हो रही प्रीति..

· अरविन्द पाण्डेय

सर्वं खल्विदं ब्रह्म ..
बस एक भाव, बस एक शक्ति की है प्रतीति.
अब बिना रीति, तुमसे ,हे शिव ! हो रही प्रीति....

अद्वैत भाव की उपलब्धि ही जीवन परम ध्येय है जिसका किंचित आभास न्यूटन , आइंस्टीन जैसे श्रेष्ठ वैज्ञानिकों को जीवन के अन्तिक चरण में मिल पाता है ....... So, Good Morning and Happy This Precious Day of our lives.


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..वरना , ये चाँद मेरे दिल से ही निकलता है..

· अरविन्द पाण्डेय

चन्द्रमा मनसो जातः 



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धर्म और विज्ञान-दोनों के प्रति ही अंध-विश्वास वर्जनीय

· अरविन्द पाण्डेय

धर्म और विज्ञान-दोनों के प्रति ही अंध-विश्वास वर्जनीय है. मैं बता दूं कि मैं आज तक किसी बाबा के पास समस्या लेकर नहीं गया..हाँ, कोई संत धर्म-विज्ञान के संसार में यात्रा कर चुके हैं या नहीं -- यह जिज्ञासा रहती है मुझे..

             अगर निर्मल बाबा कृपा बरसाने में अक्षम हैं तो यह उनकी अक्षमता है..जीसस क्राइस्ट कृपा बरसाते थे..और , स्टीफन हाकिंग ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम में यह कहते हैं कि यदि कोई ऐसा यान बने जो प्रकाश की गति से भी अधिक गति से यात्रा कर सके तो उस बैठ कर यात्रा करने वाला व्यक्ति भविष्य में प्रवेश कर सकता है..किसी को अब हाकिंग कैसे समझाएं कि आज से २०० साल बाद जो दुनिया होगी उसे तुम देख सकते हो,, उसमे रह सकते हो , अगर ऐसा यान मिल जाय...उस दुनिया में क्या हो रहा होगा --यह अभी जान सकते हो..

            विज्ञान का अंध - विश्वासी कहेगा कि '' जीसस क्राइस्ट किसी रोगी को स्पर्श द्वारा रोगमुक्त कर ही नहीं सकते थे क्योकि चिकित्सा विज्ञान ऐसा नहीं कहता.....''

              धर्म का अंध-विश्वासी कहेगा कि '' हम घोड़े की नाल से अंगूठी बनाकर पहने तो संकट-मुक्त हो जायेगें..'' -- ये दोनों ही गलत और अवैज्ञानिक बात कह रहे होगें..


इस सम्बन्ध में मुझे एक आविष्कार की याद आ रही है..


वर्ष १९८८ की बात है..अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के एक वैज्ञानिक के अनुप्रयोग का विवरण मैंने वायस आफ अमेरिका से सुना था..नासा के एक वैज्ञानिक ने अपनी उंगली के इशारे से १२ फिट दूर तक के स्विच से विद्युत उपकरण को आन-आफ करने में सफलता प्राप्त की थी..

सिद्धांत यह था कि हमारे मस्तिष्क से किसी भी अंग के संचालन हेतु आदेश लेकर विद्युत चुम्बकीय तरंगें निकलतीं हैं जो न्यूरान - डेंड्रान-एक्जान से गुज़रती हुई उस अंग तक पहुँचती हैं..तो उंगली तक पहुचने वाली तरंगे उंगली के बाहर भी प्रवाहित की जा सकती हैं जो ईथर के माध्यम से स्विच तक पहुच सकती हैं..इस सिद्धांत के अनुसार उस वैज्ञानिक ने १२ फिट दूर के स्विच पर उंगली का इशारा करते हुए स्विच आन-आफ करके दिखाया था..अब ये बाते समझनी कठिन तो हैं ही , फिर भी पूर्वाग्रह और अंध-विश्वास से मुक्त मस्तिष्क इन्हें समझ सकता है....

अरविंद पाण्डेय
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इश्क ही लिखता हर इक इंसान की तकदीर है

· अरविन्द पाण्डेय


इश्क होता है न महलों में न तख़्त-ओ-ताज में.
इश्क तो अल्लाह के बन्दे की इक जागीर है.
क्या मिला है, क्या मिलेगा बादशाहत से किसे,
इश्क ही लिखता हर इक इंसान की तकदीर है.

अनेक मित्रों ने मुझे  इश्क और मानवीय रिश्तों पर भी कवितायें लिखने को कहा है..
                    यहाँ मैं बता दूं कि एक पुलिस अधिकारी के रूप में मैंने सैकड़ों मामले ऐसे देखे हैं जिसमें शिकायत-कर्ता और आरोपित मामला पुलिस या अदालत में दर्ज होने के पहले प्रेमी-प्रेमिका थे.. और , बस. छोटे छोटे अहंकारों, छोटी जिद, छोटे स्वार्थों के कारण एक दूसरे के दुश्मन बन गए और अपनी सारी ताकत लगाकर, यहाँ तक कि खुद को नुक्सान पहुचाकर भी उसी कथित प्रेमी या कथित प्रेमिका के पीछे पद गए जिसे कभी प्रेम की कवितायें , प्रेम के गीत सुनाया करते / करती थीं..
            वास्तव में प्रेम सिर्फ ईश्वर से हो सकता है या यूँ कहें कि प्रेम सिर्फ ईश्वर ही कर सकते हैं .. यह मनुष्य के वश का नहीं.. यदि कहीं कोई मनुष्य प्रेम में हो तो वह देवता बन चुका होता है..
              प्रेम मनुष्य से देवता बनने की प्रक्रिया का दूसरा नाम है -- यूँ कहें इसे और समझें तो शायद बेहतर होगा,, 


© अरविंद पाण्डेय..
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श्री राम,लोक-अभिराम,सतत-निष्काम,सर्व-नयनाभिराम

· अरविन्द पाण्डेय




जय जय श्री रामनवमी 


१ 

श्रीराम,लोकअभिराम,सततनिष्काम,सर्वनयनाभिराम.
शीतल-तुषार-सिंचित-इन्दीवर-दीपित-शुभ-सर्वांग वाम.
मर्यादा-पुरुषोत्तम,निकाम-पौरुष-परिपूर्ण,पवित्र-नाम .
शतकाम-सदृश सौन्दर्यधाम,वरदान करें-मन हो अकाम.

२ 

अम्बर निरभ्र, तरणि-किरणों से संदीपित.
पवन , सुकोमल मधु-गंध से सुवासित है.
नवमी - मध्याह्न भौमवासर शुभंकर -तिथि ,
जन-मानस प्रमुदित, पशु-पक्षि-दल पुलकित है. 
जिनके चरण-तल में शत-कोटि सूर्य-चन्द्र ,
शत शत ब्रह्माण्ड भी अनादि काल-कल्पित हैं.
वे ही अनंत, अव्यक्त अपरिमेय राम,
कौशल्या-अंक में बालक बन प्रफुल्लित हैं.

(यह सवैया छंद में रचित है )



© अरविंद पाण्डेय
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तुम्हें कौन सा कुसुम चढाऊं..

· अरविन्द पाण्डेय

कृष्णं वंदे 

तुम ही पुष्पों में परिमल बन महक रहे हो,
तुम्हें कौन सा कुसुम चढाऊं..
जिसकी सुरभि न तुम्हें मिली हो,
ऐसा फूल कहाँ से लाऊं.


तुम भास्कर बन सकल जगत को भासित करते,
तुम्हें कौन सा दीप दिखाऊं,
जो तुमको प्रकाश से भर दे ,
ऐसा दीप कहाँ से लाऊं..


श्रीजगदम्बार्पणमस्तु 


© अरविंद पाण्डेय
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तेरे दोनों चारु - चरण को चर्चित करूं , सजाऊँ.

· अरविन्द पाण्डेय

शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुनौ !


अपने हृदय-कमल के कोमल किसलय की माला मैं,
माँ तेरी सुन्दर ग्रीवा में आज मुदित पहनाऊँ,
मन्त्र-पूत प्रज्ञा का सुरभित चन्दन-राग बनाकर 
 तेरे दोनों  चारु - चरण को चर्चित करूं , सजाऊँ.


श्रीजगदम्बार्पणमस्तु 


© अरविंद पाण्डेय
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किताब-ए-कौम में रोशन जो निशाँ रहते हैं.

· अरविन्द पाण्डेय

वन्दे मातरं ! 

23 मार्च ! 

जेहन में जोश हो, पर , फिर भी होश पूरा हो.
न जिसका सोज़, निशाना कभी अधूरा हो.
किताब-ए-कौम में रोशन जो निशाँ रहते हैं.
उसी को राजगुरु , सुखदेव , भगत कहते हैं.

© अरविंद पाण्डेय 
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महाकाल को भी मथकर जो महाप्रलय में करतीं नृत्य.

· अरविन्द पाण्डेय

प्रथमं शैलपुत्री च !

जागृत-जन के लिए सतत जो प्रतिकण में हैं प्रतिपल दृश्य.
कितु,  वही  कालिका , सुप्त को अप्रतीत हैं और  अदृश्य.
महाकाल को  भी  मथकर  जो महाप्रलय में  करतीं नृत्य.
मुझे बोध है मैं उनका प्रिय - पुत्र, और  अनुशासित भृत्य.

© अरविंद पाण्डेय
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कि जिंदगी भी जश्न-ए-मौत अब मनाती है.

· अरविन्द पाण्डेय

कृष्णं वन्दे !!

मुझे पता नहीं कि रात है या दिन है अभी, 

बस एक आग है जो खाक किये जाती है .


किसी पहर जो पलक खोल के जहां देखूं,

तो बस लहर सी इक,फलक पे लिए जाती है.


कभी कोयल की कूक सामगान लगती है ,

कभी महकी हवा कुरआन गुनगुनाती हैं .


ये किस मक़ाम पे लाया है मुझे इश्क मेरा ,

कि जिंदगी भी जश्न-ए-मौत अब मनाती है.


© अरविंद पाण्डेय
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बोलो क्या रहस्य है इस मायामय - जग का , राम ..

· अरविन्द पाण्डेय


शिशु की स्वतःप्रफुल्ल हंसी में दिखे आज तुम श्याम .
स्वतः-सुगन्धित सौम्य सुमन में भी तुम थे अभिराम.
किन्तु, दीन कृश-काय पुरुष में तुम निराश से क्यूँ थे,
बोलो क्या रहस्य है इस मायामय - जग का , राम !!

© अरविंद पाण्डेय 
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हर एक गम जो मिला वो मुझे तराश गया.

· अरविन्द पाण्डेय

वासुदेवः सर्वं ! 

हर एक गम जो मिला वो मुझे तराश गया.
मिलीं जो ठोकरें उनसे भी मिला इल्म नया.
बहुत  सी  कोशिशें  हुईं  मुझे   हराने   की,
करम खुदा का, कि शैतान मुझसे हार गया.



सभी मित्रों का स्वागत और नमस्कार...




© अरविंद पाण्डेय
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मैं खुद भी साथ चल रहा होता तुम्हारे, प्रीस्ट,.

· अरविन्द पाण्डेय


प्रीस्ट वैलेंटाइन का मृत्यु-दिवस ! 



मैं खुद भी साथ चल रहा होता तुम्हारे, प्रीस्ट,
खुल कर जो खड़े होते क्लाडिअस के तुम खिलाफ.
ज़ालिम हो सल्तनत तो ज़रा जोर से कहो.
छुप छुप के इन्कलाब कोई इन्कलाब है.


© अरविंद पाण्डेय




सभी मित्रों का स्वागत और नमस्कार ..

मैं प्रीस्ट वैलेंटाइन द्वारा क्लादिअस के मानवता-विरोधी क़ानून का छुप कर उल्लंघन किये जाने को नापसंद करता हूँ.. उन्हें गांधी जी की तरह खुल कर सिविल नाफरमानी -- सविनय अवज्ञा करनी चाहिए थी..

 अरविंद पाण्डेय 
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तू ही तू बस रहा है दिल के आशियाने में

· अरविन्द पाण्डेय

वासुदेवः सर्वं


हुए हैं रहनुमा बहुत से इस ज़माने में,
सजे हैं शेर नाज़नीं कई , अफसाने में.
मगर तू राह भी,मंजिल भी, रहनुमा भी है .
तू ही तू बस रहा है दिल के आशियाने में.

  अरविंद  पण्डेय 
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फिरदौस की महकी फिजा जैसी.

· अरविन्द पाण्डेय


वासुदेवः सर्वं 

तेरे  तन  पर  तो  बस  परियां  ही परियां उड़ रही है.
तू  अब तो  हो गई फिरदौस की महकी  फिजा जैसी.
ज़मीन-ओ-ख़ाक  पर  तेरा उतरना है बहुत मुश्किल,
ये कैसा हुआ ये फासला कैसे , हुई  ये इब्तदा  कैसी.

© अरविंद पाण्डेय
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रोशन चिरागों को बचाता हूँ...

· अरविन्द पाण्डेय



कभी खुद मैं ही बन कर आँधियां दीपक बुझाता हूँ.
कभी फानूस बन, रोशन चिरागों को बचाता हूँ.
अंधेरा भी कभी बनकर सुलाता हूँ जहाँ को मैं,
मैं ही बन रोशनी सूरज की,गुलशन को सजाता हूँ.


© अरविंद पाण्डेय
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मैं गांधी, जिसको लोग महात्मा कहते हैं

· अरविन्द पाण्डेय



महात्मा गांधी के साथ श्री सुभाषचंद्र बोस  तथा जवाहर लाल नेहरू 


मैं गांधी, जिसको लोग महात्मा कहते हैं.
मैं रहा यूँ कि ज्यूँ आम नागरिक रहते हैं.
डरते थे  मुझको देख, फिरंगी बेचारे. 
जैसे बकरी का झुण्ड, शेर को देख डरे.

चंपारण मे है गाँव एक साठी नामक.
करते खेतों में वहां परिश्रम,लोग, अथक.
पर,अंग्रेजों के क्रूर लोभ का पार नहीं..
अपनी ज़मीन पर खेती का अधिकार नहीं.

मैंने बिहार के लोगो को संगठित किया.
पौरुष-परिपूर्ण अहिंसा का अभिमन्त्र दिया.
फिर, झारखंड के सिद्धो-कान्हो  के जैसा.
था असहयोग सब ओर, कड़कती बिजली सा.

 अंग्रेजों की दहशतगर्दी की नींव हिली. 
चंपारण के तूफां से रानी भी दहली.
भितिहरवा में आश्रम लोगो ने बना दिया.
छः माह वहीं मैंने आन्दोलन-यज्ञ किया.

मैंने चैतन्य महाप्रभु जी के जीवन से.
सीखा था सविनय-अवज्ञान, अर्पित मन से.
नदिया में कोतवाल की आज्ञा को ठुकरा.
कीर्तन करता, प्रभु जी का था जुलूस निकला.

मैंने सीखा श्री रामायण - पारायण से.
सत्याग्रह का रणनीति-ज्ञान, रामायण से.
थे तीन दिनों तक राम स्वयं सत्याग्रह पर.
प्रार्थना-निरत सागर से, सागर के तट पर.

जब विनय नहीं माना समुद्र अभिमानी ने.
जब मार्ग नहीं छोड़ा सागर के पानी ने.
तब कमल-नयन के नयन,अग्नि से दहक उठे.
कोमल-शरीर श्री राम,सूर्य से भभक उठे.

मैं जीवन भर था रहा अहिंसा का साधक.
पर, कभी नहीं था शौर्य-प्रदर्शन में बाधक.
जो भय के कारण हिंसा को अपनाते हैं.
वे कभी वास्तविक वीर नहीं कहलाते हैं.

मैंने सुखदेव, भगत से अतिशय प्यार किया.
पर, उनकी हिंसा को भी अस्वीकार किया.
मैंने चाहा सुभाष, नेहरू के साथ चलें.
पर, दुःख ! सुभाष, रास्ते पर एकाकी निकले. 

चंपारण से जो शुरू हुआ था अश्वमेध.
वह पूर्ण हुआ सैंतालिस में कर,लक्ष्य-वेध.
भारत,स्वतंत्र हो उगा, सूर्य सा चमक उठा.
अपने हांथो में ही अब अपना शासन था.

 मैं एक बात अब दुःख से कहना चाहूंगा.
भितिहरवा के बारे में यह बतलाउगा.
वह दुनिया का पर्यटन केंद्र बन सकता था.
पिछड़ा बिहार, मुद्रा अर्जित कर सकता था.

अपने भारत के सफल राजनीतिग्य सभी.
भितिहरवा की यात्रा करते हैं नहीं कभी.
सबके मन में है भरा अंधविश्वास यही.
जो गया वहां,सत्ता-च्युत होगा शीघ्र वही.

मैंने सुन रखा है बिहार कुछ बदल रहा.
ईमान भरा है  एक व्यक्ति, इस वक्त वहां.
कोई उस तक मेरा सन्देश अगर दे दे.
विश्वास मुझे , शायद वह कुछ ना कुछ कर दे.
============
मैं वर्ष  २००५  में चंपारण क्षेत्र का डी आई  जी था.
भितिहरवा आश्रम की तीर्थयात्रा पर मैं जब जाने लगा तो मुझसे मेरे एक सहकर्मी ने कहा ,
 'सर, वहां कोई साहब लोग नहीं जाते .कोई नेता भी नहीं जाता.वहां जाने से कुर्सी चली जाती है ..'
मै कुछ मुस्कुराया .फिर,कुछ रूककर कहा ,' चलो गांधी जी से ही पूछेंगे कि वे क्यों कुर्सी ले लेते हैं भितिहरवा दर्शनार्थियों की..वैसे मेरी कुर्सी भी छोटी ही है .चली भी जायेगी तो गांधी जी से जिद करके इससे बड़ी कुर्सी ले लेगे.'
मैंने वहां  की आगंतुक-पंजी में कुछ लिखा और देखा तो बरसों बरस तक के पृष्ठों मे किसी अधिकारी का आगंतुक के रूप में हस्ताक्षर नहीं मिला..
किसी राजनीतिग्य का भी..
श्री चंद्रशेखर जी का मैं सादर स्मरण कर रहा इस प्रसंग में क्योंकि वे भितिहरवा आश्रम गए थे और वहां कुछ निर्माण कार्य भी कराया था.
एक बात का उल्लेख ज़रूरी है..भितिहरवा आश्रम की यात्रा के कुछ ही दिनों बाद चंपारण क्षेत्र के डी आई जी पद से मेरा स्थानान्तरण हुआ. किन्तु , महात्मा गांधी के हस्तक्षेप से, मैं मगध क्षेत्र (गया ) के डी आई जी पद पर पदस्थापित किया गया.. महात्मा गांधी की  अहिंसा-साधना की विचार-गंगोत्री बोधगया .. अमिताभ बुद्ध.. मेरा स्वप्न पूरा हुआ-बुद्ध के निकटतम रहने का..उस भूमि को प्रतिदन स्पर्श करने का जहां कभी राजकुमार सिद्धार्थ, ज्ञान-पिपासा से विकल होकर आये थे और परम ज्ञान प्राप्त कर सर्वव्यापी बुद्ध होकर लौटे थे..
मेरा चंपारण से बोधगया जाना  महात्मा गांधी का हस्तक्षेप ही था .क्योंकि बाद में मुझे बताया गया कि प्रस्तावक ने मुझे मुख्यालय  में रखने का प्रस्ताव दिया था किन्तु जिसे निर्णय लेना था, उनके शब्द थे-''इन्हें यहाँ रखने का प्रस्ताव क्यों  दे रहे हैं.ये तो टफ आफिसर हैं.इन्हें गया मे कीजिये..''
और इस तरह मैं गया का डी आई जी बना.
चंपारण से मैंने  अहिंसक पुलिसिंग का अपना अभियान तेज़ किया.दोनों विवाद-ग्रस्त पक्षों को प्रेरणा देकर अब तक  हज़ारों भूमि-विवाद के मुकदमे ख़त्म कराये..झूठे मुकदमों में उलझे हुए दोनों पक्षों को गले मिलाया...

और अंत में, भितिहरवा  आश्रम और कामनवेल्थ गेम मे खर्च हो रहे धन और निवेश की गई रूचि की तुलना करना उपलक्षणीय है..
तथास्तु !!!!!

----अरविंद पाण्डेय
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दीख रहा है सांत, अनंत.

· अरविन्द पाण्डेय


देश-काल से परिच्छिन्न हो,
दीख रहा है सांत, अनंत.
समय-चक्र का सतत चक्रमण ,
बना रहा आवरण दुरंत .

घूर्णित-पृथ्वी संग मनुज यह,
नियति-विवश होता है अस्त.
किन्तु,तरणि-दर्शन में अक्षम ,
कहता , सूर्य हुए हैं अस्त .
---------------------
सभी मित्रों को सुप्रभात .. 

आज की कविता मनुष्य द्वारा कहे जाने वाले उस सबसे प्रचलित किन्तु अशुद्ध प्रयोग के मिथ्यात्व को दर्शित करती है जिसमें कहा जाता है कि सूर्य अस्त हो गए.. वास्तविकता यह है कि हम स्वयं, पृथ्वी की परिधि में विवश , पृथ्वी के साथ घूर्णन कर रहे होते हैं और एक विन्दु पर, सूर्य का दर्शन निरुद्ध हो जाता है .. वातव में, हम स्वयं पृथ्वी के साथ अस्त हो जाते हैं किन्तु कहते है कि सूर्य अस्त हो गए.. चिंतन का विषय... 


--  अरविंद पाण्डेय
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मैं हूँ नरेन्द्र, भारत का चिर जागृत विवेक !

· अरविन्द पाण्डेय

१.
मैं हूँ नरेन्द्र, भारत का चिर-जागृत विवेक.
मैं कण कण में प्रतिभास रहा, हूँ किन्तु एक.

मैं काल-पाश से परे अमृत, अक्षर, अकाल.
आकाश,  नाभि है, स्वर्ग, वक्ष मेरा विशाल.

मैं रामकृष्ण का पुत्र, राम मेरा विराम.
मैं नाम-रूप सा दीख रहा,पर हूँ अनाम.

२.
इस्लाम, देह मेरी , आत्मा हिंदुत्व प्रखर .
जीसस की करूणा रक्त बनी मेरे अन्दर.

मैं अग्नि यहोवा का, नानक का अमृत सबद.
शास्त्रार्थ-दीप्त शंकराचार्य का सात्विक मद.

मैं कृष्ण-प्रेयसी   मीरा का मादक नर्तन,
मैं ही कबीर ,चैतन्यदेव  का संकीर्तन 
३.
मैं हिंद-महासागर का हूँ घन-घन गर्जन.
मैं ही देवात्म हिमालय का नंदन कानन.

मैं काली की कृष्णता, शुभ्रता, शिव की  हूँ.
मैं पञ्च-प्राण बन, प्राणी में अनवरत  बहूँ.

मैं नित्य, त्रिकालाबाधित,शाश्वत सत्ता हूँ.
मैं महाविष्णु के  मन की मधुर महत्ता हूँ.



========================
स्वामी विवेकानन्द  अंगरेजी साहित्य की कक्षा में, एकाग्र मन से, अपने प्राध्यापक श्री हेस्टी का वक्तव्य सुन रहे थे..श्री हेस्टी उस समय विलियम  वर्ड्सवर्थ की प्रकृति संबंधी कविताओं की वास्तविक दिव्यता को व्यक्त करने का प्रयास करते हुए यह कह रहे थे की प्रकृति के सान्निध्य में , मनोरम उपवनों, वन-प्रान्तरों ,लता-गुल्मों के मध्य अपनी ध्वनि-सुगंध विस्तीर्ण करती हुई कोयल जैसी सुरीली प्राणवती  पुष्प-कलिकाओं  को देख कर वर्ड्स वर्थ  समाधिस्थ हो जाते थे और उस समाधि से वापस आने पर वे कवितायें लिखते थे.इसीलिये उनकी कवितायें इतना गहन प्रभाव डालती हैं.........
श्री हेस्टी ने यह भी कहा कि अगर इस भाव् -समाधि को प्रत्यक्ष देखना चाहते हो तो दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण परमहंस को जाकर देखो.......................................
और यही से नरेन्द्रनाथ का मन श्री रामकृष्ण के दर्शन , उनकी भाव् -समाधि के प्रत्यक्षीकरण के लिए व्याकुल होता है..
वे अवसर देखते है कि कैसे उनसे मिला जाय.. जिस सत्य का ,, निरपेक्ष सत्य का, अतीन्द्रिय सत्य का , अज्ञेय सत्य का ज्ञान वे करने के लिए तड़प रहे थे , उन्हें लगा कि अब वह क्षण निकट है..और अंततः वह क्षण आता है जब वे श्री रामकृष्ण के निकट जाते हैं और नरेन्द्रनाथ  से स्वामी विवेकानन्द के रूप में उनका जन्म होता है ..


In my adolescence , I used to study Shri Ramkrishna Vachanaamrit every night before sleep and used to dream to be A Sanyaasi like Swami Vivekanand but Alas ! I failed to be ... 
Destiny Dragged me into Indian Police Service.
My Lust to be A Sanyasi will be alive until it happens..
I know I have to come to this earth again to meet my desire..!! 
हरिः शरणं 

----अरविंद पाण्डेय
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हम तो हांथों में ही, सूरज को लिए फिरते हैं.

· अरविन्द पाण्डेय


ॐ आमीन ..

जो हारकर , छोड़ जाने की बात करते हैं.
हम तो बस उन्हें होश में आने की दुआ करते हैं.

वो खुद के घर को रोशनी से भर रहे बेशक,
मगर, औरों के घरों में तो धुंआ भरते हैं. 


वो जो भी हों ,जहाँ भी हों,खुदा ही खैर करे, 
हम तो हांथों में ही, सूरज को लिए फिरते हैं.

© अरविंद पाण्डेय


प्रिय मित्र ! कल प्रोफाइल में किसी ने किसी का फोटो शेअर किया और दुखित मन से लिखा कि कुछ लोग '' दबाव '' में काम न कर पाने की वजह से सिविल सेवाएं छोड़ देते हैं ,, छोड चुके हैं,, छोड़ देने वाले हैं ,, तो दो पंक्तियाँ कल निकली .. आज समय मिला तो उन दो को और सशक्त कर दिया बस.. आपके क्या विचार हैं.. आप से सच कहूँ-- इन लोगो द्वारा परिभाषित '' दबाव '' क्या होता है ,,अपने २० से अधिक वर्षों की सेवा के बाद भी मैंने नहीं देखा ,, न महसूस किया....

Aravind Pandey 
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दीदावर बस वही है.

· अरविन्द पाण्डेय

King Alexander and Philosopher Diogenes
---------------------
ये रंग रोशनी का जो है दिख रहा तुम्हें .
जो देख रहे तुम वो भी आँखों की सिफत है.
पर,दिख रही जो चीज़,हकीकत में वो क्या है.
जो जान ले ये राज़ , दीदावर बस वही है.

The Color, You are seeing is the spectrum of light.
The form of a thing is based on power of your sight.
But, He , who knows the reality of a perceptible thing,
Is breathes the essence of truth and is Seer - King.

I would not like to be Alexander,I would Prefer to be Diogenes..

© अरविंद पाण्डेय

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किसी ऩे याद किया और कोई याद आया.

· अरविन्द पाण्डेय



चन्द लफ़्ज़ों में ज़िन्दगी ये बयाँ होती है.
किसी ऩे याद किया और कोई याद आया.
जिसे आना न था वो आ गया बहुत पहले,
जिसे आना था वही बहुत देर से आया.


© अरविंद पाण्डेय .
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मैं जीसस हूँ,माता मरियम का यश, उज्जवल

· अरविन्द पाण्डेय

25 दिसंबर
 १ .
 मैं जीसस हूँ,माता मरियम का यश उज्ज्वल
मैं,ईश्वर का प्रिय-पुत्र,धरा  की कीर्ति अमल

 मुझसे   निःसृत होती  करूणा की   परिभाषा
मिटते जीवन  को मिल  जाती मुझसे आशा

है  शूल-विद्ध   मेरा  शरीर ,  बह रहा रक्त
पर, मैं हूँ शुद्ध,बुद्ध आत्मा,शाश्वत विरक्त 
२.


मैं, मेरी मैडगलिन  के अंतर्मन  का स्वर
मैं ,मानवता की महिमा का मूर्तन,भास्वर


मैं रक्त-स्नात करूणा से ज्योतित  क्षमा-मूर्ति
मैं   क्रूर  आततायी  की  हूँ   कामना-पूर्ति


मैं   अपरिसीम ,अव्यक्त वेदना का समुद्र
मुझमें मिलकर अनंत बन जाता,क्षणिक,क्षुद्र 


==============
आज भी,
 यदि कोई,  किसी को शूली पर चढ़ा दे, 
शूल की भयानक वेदना से वह व्यक्ति तड़प रहा हो,
रक्त बहता जा रहा हो,
बेहोशी छाती जा रही हो,
और ऐसे में ,ऐसा व्यक्ति 
शूली पर चढाने वाले के लिए अपने पिता 
परमेश्वर से प्रार्थना करे कि -


'' हे पिता ! इन्हें क्षमा करना क्योकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं..''


तब,
 ऐसे व्यक्ति को,


 आज भी सारा विश्व


 ईश्वर का पुत्र 


कह कर पुकारेगा.


जीसस क्राइस्ट ईश्वर के पुत्र थे !


माता मरियम ,


जीसस 


और 


मेरी मैडगलिन 


को 


नमन 


----अरविंद पाण्डेय
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तो फिर कुछ बात होगी.

· अरविन्द पाण्डेय



तुम आये साथ जो मौसम के तो आना भी क्या आना.
बिना  मौसम  अगर आओ  तो फिर  कुछ बात होगी.
अगर  , बूंदों  को  मुझसे  है  मुहब्बत  तो   मेरे   घर,
बिना  मौसम, मेरी  खातिर ही ,  बस,  बरसात होगी.


जब श्री प्रह्लाद जी ऩे कहा कि श्री हरि सर्वत्र हैं तब भीषण क्रोध के आवेश में हिरण्यकशिपु  ऩे सामने दिखाई दे रहे एक विशाल खम्भे को दिखाकर पूछा , '' अच्छा, क्या इसमें भी तेरा हरि है ?? 
प्रह्लाद जी ऩे कहा , '' हाँ , इसमें भी वे श्री हरि निवास करते हैं..'' 
इतना सुनते ही मृत्यु के वशीभूत उस महाराक्षस ऩे अपने खड्ग से उस खम्भे पर प्रहार किया .. 
श्री मद्भागवत में वर्णित है कि -- प्रहलाद के वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए श्री हरि उस खम्भे से नृसिंह रूप में प्रकट हो गए.................'' 
जिन लोगो ऩे श्रीमद्भागवत का पाठ एवं मनन नहीं किया , मेरी दृष्टि में, वे एक विलक्षण असीम , अनंत आनंद के भोग से वंचित हैं...  
इन चार पंक्तियों में उसी महाभाव को प्रकट किया गया है कि जब, जहाँ जो नहीं है , वह , वहाँ भी प्रकट हो सकता है यदि दर्शक और दृश्य में अनन्य सम्बन्ध हो .. यदि यह नहीं तो दृश्य , अपनी प्रकृति अर्थात अपने स्वार्थ के अनुसार ही दर्शक के समक्ष प्रकट होता है और दर्शक को भ्रम होता है कि वह दृश्य , उसके लिए प्रकट हुआ.. संसार में यही दिखाई देता है .. सूर्य , चन्द्र, तारक, पुष्प, फल, आदि अपनी प्रकृति के वशीभूत उदय-अस्त , प्रफुल्ल-शुष्क हो रहे किन्तु .. मनुष्य-मनुष्य के बीच सारे सम्बन्ध इसी प्रकृति के हैं ..किन्तु , मोह और अज्ञानवश प्रेम , स्नेह  का भ्रम होता है... 
स्वामी विवेकानंद ऩे माया की व्याख्या करते हुए कहा -- पुत्र, माता  का अपमान करता है, किन्तु माता  , पुत्र के प्रति स्नेह ही रखती है,, यही माया है.......,

-- अरविंद पाण्डेय 
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श्री राधा के कर में शोभित..

· अरविन्द पाण्डेय



श्री राधा के कर में शोभित ,
मोहक दर्पण का प्याला.

उसमें सजती केशव की छवि
आज बन गई है हाला.

आँखों से, बस, धीरे धीरे,
नील-वर्ण मधु पीती हैं,

महारास की निशा , धरा पर
उतर , बन गई मधुशाला.

-- अरविंद पाण्डेय 
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कभी खाब में बोल उठा मैं ..

· अरविन्द पाण्डेय


कभी मुझे पंडित ऩे समझा,
मैं , मंदिर जाने वाला. 

कभी मौलवी का गुमान था ,
मैं , कुरान पढ़ने वाला.

कभी खाब में बोल उठा मैं 
अल्लाहुम , गोविन्द कभी,

सभी तरह की मदिरा से 
महकी है, मेरी  मधुशाला.

-- अरविंद पाण्डेय 
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मेरे घर का छोटा आँगन

· अरविन्द पाण्डेय


हरसिंगार,रजनीगंधा के 
वृक्ष बने हैं मधुबाला .

मृदु-समाधि में धीरे धीरे,
ले जाती सुगंध-हाला .

कभी किसी के द्वार न जाता ,
मैं मधुरिम मधु पीने को,

मेरे घर का छोटा आँगन
ही है मेरी मधुशाला.

-- अरविंद पाण्डेय 
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मेरी खुद की मधुशाला

· अरविन्द पाण्डेय


नहीं बनाया कभी किसी ने,
अपनी मर्जी की हाला.

अपना कह कर सभी पी रहे,
किसी दूसरे का प्याला.

किन्तु, हाथ में मेरे, जो तुम 
देख रहे हो चषक नया,

उसे भेजती, हर दिन, मुझ तक,
मेरी खुद की मधुशाला.

----------------
चषक = प्याला 

--------

ऋषयो मन्त्र द्रष्टारः  

उपनिषद् कहते हैं की ऋषियों ने मन्त्रों का दर्शन किया , उन्हें लिखा या उनकी रचना नहीं की जैसे कवी या लेखक करते हैं.. यह व्यवहार में भी देखा जाता है  कि जो जिस कवि या लेखक में अनुभूति जितनी ही गहन होती है उसकी कविता या साहित्य उतना ही प्रभाव उत्पन्न करता है .. 
सदा से ही अधिकांश धर्म के प्रवाचकों में स्वयं के अनुभव का अभाव रहता है.. वे किसी तथाकथित गुरु या सम्प्रदाय के ग्रंथों को पढ़कर या याद करके उसे ही लोगो को सुनाया करते हैं और लोग उनका अनुकरण करना प्रारम्भ कर देते हैं .. 
मेरी उपर्युक्त कविता इसी भाव को प्रस्तुत करती है...

मानो '' हाला '' वह अनुभूति है जो किसी साधना से साधक को प्राप्त होती है..
 '' किसी दूसरे का प्याला '' का अर्थ दूसरे संत द्वारा अनुभव किया गया ज्ञान .. 
अधिकांश कथित संत या धर्म-प्रवक्ता किसी दूसरे के अनुभव को ही बताते हैं... 
'' मेरी खुद की मधुशाला '' मेरी आत्मा , मेरा अपना अनुभविता .. 
जो मैं स्वयं हूँ.. 

सोऽहं ! 
सोऽहं ! 
सोऽहं ! 

-- अरविंद पाण्डेय 
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अब मेरी है मधुशाला ..

· अरविन्द पाण्डेय

२७ नवम्बर 

पान किया जब छक कर मैंने ,
बच्चन की यह मृदु हाला.

बुझा ह्रदय का ताप, बन गया ,
मैं भी मधु का मतवाला .

अब तो जग को भूल, मग्न हूँ,
मैं ,मय के मृदु सागर में,

और किसी की नहीं विश्व में,
अब मेरी है मधु शाला. 

आज श्री हरिवंश राय बच्चन के जन्म दिवस पर, मैं अपने द्वारा १५ वर्ष की उम्र में लिखे गए  उस छंद को प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मैंने अपने पिता जी द्वारा दी गई  '' मधुशाला '' के प्रथम पृष्ठ पर अंकित किया था.. 

--- अरविंद पाण्डेय 
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Learn to Respect the Protectors

· अरविन्द पाण्डेय


२६ नवम्बर 
आहत   ताज
-------

जीना है यदि स्वाभिमान से , 
पीना है मधुरिम हाला.

रक्षक का सम्मान सुरक्षित
 रक्खे हर पीने वाला.

जिस जिस मदिरालय में ऐसा
नहीं हुआ, तो फिर सुन लो.

भक्षक के कब्ज़े में होगी 
जल्दी ही वह मधुशाला.

---------

पुलिस वह रक्षक-संगठन है जो प्रतिदिन , रात-दिन ,हमारी रक्षा में तत्पर रहता  है ..अपनी लाख कमियों के बावजूद, पुलिस ही है जो ताज होटल  और ताजपोशी के सपने के साथ जी रहे लोगों की और बिना सोचे समझे ताजपोशी किसी की भी कर देने  वाले आम लोगो की रक्षा करती है.. 
हम भारत के लोगों को चाहिए कि हम अपने रक्षकों का भी सुखद जीवन सुनिश्चित करें और उन्हें सम्मान देना सीखें ..इसके लिए हमें चाहिए कि हम पश्चिम के विकसित देशों में पुलिस को दी जा रही सुविधाओं और सम्मान समतुल्य ही अपने देश में भी पुलिस को वही सुविधाएं और सम्मान दें... 

-- अरविंद पाण्डेय 
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Mere Mehboob Tere Dam Se Aravind Pandey Sings Rafi .wmv

· अरविन्द पाण्डेय




मेरे सुर जब भी मिलते हैं रफ़ी के सुर से , या अल्लाह !
तेरे रहम-ओ-करम की इस अदा से इश्क होता है.

--  अरविंद पाण्डेय 



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मनु बनी लक्ष्मी बाई..

· अरविन्द पाण्डेय



मुख पर थी चन्द्र-कांति,हांथों में चमक रहा था चन्द्रहास.
डलहौजी का दल दहल दहल,पहुंचा झांसी के आसपास.
पर, मात खा गया महाराजरानी के अद्भुत कौशल से.
था किला मिला खाली-खाली,कुछ मिला नहीं था छल-बल से.

फिर, कौंध उठीं बिजली सी तात्या टोपे संग ग्वालियर में.
भीषण था फिर संग्राम हुआ, अँगरेज़ लगे पानी भरने.
पर,नियति-सुनिश्चित था कि राजरानी धरती का त्याग करें.
उनके रहने के योग्य धरा थी नहीं , स्वर्ग में वे विहरें.

मनु बनी लक्ष्मी बाई , पर वह थी शतरूपा सी मनोज्ञ .
आईं थी मर्त्य-धरा पर , पर थीं वे सदैव ही स्वर्ग-योग्य 


- अरविंद पाण्डेय

चन्द्रहास = तलवार .. 
मनोज्ञ = सुन्दर 
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मेरी आवारगी की राह ले आती है वो मंजिल

· अरविन्द पाण्डेय



मेरी आवारगी की राह ले आती है वो मंजिल .
कि जिसकी चाह में तड़पा किया करते हैं शाहंशाह.


मगर ये राह है ऐसी कि जिस पर जब कोई राही ,
अगर निकला तो वापस लौट,घर को फिर न आएगा..


-- अरविंद पाण्डेय 
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Let My Love be only for You

· अरविन्द पाण्डेय

भीष्म पर कृपा
------
Mercy on Bhishma
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रति हो कितु तुम्हीं से रति हो.
गति हो किन्तु तुम्हारे प्रति हो.
क्रोध-द्वेष भी यदि हो मुझमें,
वह भी मात्र तुम्हारे प्रति हो.

इस मिथ्या संसृति के प्रति अब ,
क्रोध-द्वेष भी नहीं, विरति हो.

Let My Love be only for You.
Let my moves be only towards You.
I will be, sometime, envious,
And angry,but only with You.

The World is not to be even angry with,
Let me be only for You and You and You.

- Aravind Pandey
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मेरा कंठ , कृष्ण की सरगम ...

· अरविन्द पाण्डेय

जोत से जोत जगाते चलो.
( फेसबुक लिंक )
------------

बचपन से श्री ज्ञानेश्वर सा.
गीत यही मैं गाता था.
खिले फूल, हंसते पेड़ों को,
देख देख मुस्काता था.

लगता जैसे कण कण से 
बस कृष्ण नाम - धुन होती है.
उन्हें पूजने को,फूलों की
माला प्रकृति पिरोती है.

वे ही देख रहे आँखों से,
बोल रहे हैं जिह्वा से.
बस, वे ही बस रहे सभी में,
सब जीवित हैं बस उनसे.

--  अरविंद  पाण्डेय  
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देवता के चरण-कमलों पर, स्वतः ही झर रहा हूँ.

· अरविन्द पाण्डेय



पूर्णिमा - परिरंभ से मधुरिम बनी इस यामिनी में,
आज अम्बर में, किरण बन, संतरण मैं कर रहा हूँ.
युग-युगांतर से गगन जो शून्य बन,अवसन्न सा था,
आज उसकी रिक्तता, आनंद से मैं भर रहा हूँ.


पवन-पुलकित पल्लवों के बीच हंसते कुसुम सा मैं,
देवता के चरण - कमलों पर, स्वतः ही झर रहा हूँ.
अब सहस्रों सूर्य , तारक , चन्द्र मेरे रोम में हैं,
था अभी तक रुद्ध,पर,स्वच्छंद ,अब ,मैं बह रहा हूँ.


-- अरविंद पाण्डेय 

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दक्षिण काली के श्री चरणों में कोटि नमन

· अरविन्द पाण्डेय



जिनके कराल-मुख में प्रविष्ट होकर, विनष्ट होते नक्षत्र.
जो घनीभूत स्वयमेव तमोगुण किन्तु,सृजन करतीं सर्वत्र.
जिनके करूणा-कटाक्ष से मैं हूँ आप्तकाम,निष्काम,अकाम.
उन श्री दक्षिण काली के श्री चरणों में मेरा कोटि प्रणाम.

बहुत दिनों की मेरी कामना थी कि - रामकृष्ण परमहंस के लिए जीवंत किन्तु अज्ञान से ढकी हुई आँखों के लिए प्रस्तर-मूर्ति मात्र , जगन्माता दक्षिणेश्वर कालिका का, दक्षिणेश्वर जाकर, दर्शन करूं..यह मनोकामना  पूरी हुई..

गगन-मार्ग से यात्रा के क्रम में भगवान् सविता के दर्शन के अनुभव पर कुछ पंक्तियाँ कल..


अरविंद पाण्डेय 
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आज इस बक़रीद पर कुर्बान करता हूँ उन्हें ..

· अरविन्द पाण्डेय




जो भी नेमत तूने  बख्शी है मुझे, मेरे खुदा.
आज इस बक़रीद पर कुर्बान करता हूँ उन्हें.
हैं सभी मुफलिस, तेरे दरबार में आए हुए.
तेरी चीज़ें ही तुझे कुर्बान कर, मदहोश हैं.

सभी मित्रों को 

आत्म-बलिदान का महापर्व 

बकरीद मुबारक. 


--- अरविंद पाण्डेय 
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दीपावली मेरी..

· अरविन्द पाण्डेय



 मासूम से इक दिल में कल मैंने जलाया इक चिराग.
अजब पुरनूर सी दिखती है ये दीपावली मेरी..
-----------
राष्ट्रीय  सहारा 
२५ अक्टूबर .२०११   



--  अरविंद पाण्डेय 
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स्मित-वदन सविता, धरा पर

· अरविन्द पाण्डेय



आज स्वर्णिम अमृत, मधुरिम,
 दान करने मुक्त मन से.
स्मित-वदन सविता, धरा पर,
उतर आए थे गगन से.

पर, यहाँ पर व्यस्त थे सब, 
स्वर्ण-मुद्रा संकलन में.
अमृत का था ध्यान किसको,
भक्ति थी श्वोभाव धन में.


=================
स्मित-वदन = जिसके चेहरे पर मुस्कान हो .
श्वोभाव = ephemeral  = अल्पकालिक -- यह शब्द कठोपनिषद में प्रयुक्त है. 
 श्वः भविष्यति न वा अर्थात जो कल रहेगा या नहीं रहेगा - यह सुनिश्चित न हो - ऐसी वस्तु 
= शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तु .



-- अरविंद पाण्डेय 
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कहना-खिंचा-खिंचा रहता है दिल,उनको कर याद..

· अरविन्द पाण्डेय


कृष्ण-मित्र सुदामा:

कहना - श्वास श्वास में लेता हूँ उनका ही नाम.
गली-गली फिरता हूँ, मन में ही लेकर व्रज-धाम.
कहना-खिंचा-खिंचा रहता है दिल,उनको कर याद.
कहना-अब मुझको अपना लें,बस इतनी फ़रियाद...

वृदावन की यात्रा पर गए एक मित्र से सुदामा का श्री कृष्ण के लिए सन्देश :


--  अरविंद पाण्डेय 

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महारास : नौ वर्षों की आयु कृष्ण की,सजल-जलद सी काया.

· अरविन्द पाण्डेय



१ 

एक निशा में सिमट गईं थीं   मधुमय निशा सहस्र .
एक  चन्द्र  में  समा  रहे थे अगणित  चन्द्र अजस्र.
स्वर्गंगा का सुरभि-सलिल उच्छल प्रसन्न बहता था.
सकल सृष्टि में  महारास  का  समाचार  कहता था.

२ 
शरच्चंद्रिका निर्मल-नभ का आलिंगन करती थी.
अम्बर के  विस्तीर्ण पृष्ठ पर अंग-राग भरती थी.
तारक,बनकर कुसुम,उतर आये थे मुदित धरणि पर.
प्रभा-पूर्ण थी धरा , शेष थीं किरणें नही तरणि पर.

३
गर्व भरी  गति से यमुना जी  मंद मंद बहतीं थीं .
मैं  भी कृष्ण-वर्ण की  हूँ - मानो सबसे कहतीं थीं.
शुभ्र चंद्रिका,कृष्ण-सलिल पर बिछी बिछी जाती थी.
कृष्णा, आलिंगन-प्रमुग्ध, आरक्त छिपी जातीं थीं.

४ 
पृथुल पुलिन पर, पारिजात,पुष्पित-वितान करता था.
पवन, उसे कम्पित कर,कुसुमास्तरण मृदुल  रचता था.
प्रकृति,परम प्रमुदित,कण-कण,क्षण-क्षण प्रसन्न हंसता था.
आज धरा पर ,  प्रतिक्षण  में  शत-कोटि  वर्ष  बसता था.

५ 
नौ वर्षों की आयु कृष्ण की, सजल जलद सी काया.
कनक-कपिश पीताम्बर, नटवर वपु की मोहक माया.
श्रीवत्सांकित  वक्ष ,  वैजयंती   धारण  करता  था. 
कर्णिकार दोनों कर्णों में श्रुति-स्वरुप सजता था.

६
मस्तक पर कुंचित अलकावलि पवन-केलि करती थी .
चारु-चन्द्र-कनकाभ-किरण चन्दन-चर्चा भरती थी.
चन्दन-चर्चित चरण ,सृष्टि को शरण-दान करता था.
करूणा-वरुणालय-नयनों से रस-निर्झर बहता था.

७ 
पारिजात का भाग्य, आज उसकी शीतल छाया  में.
श्री व्रजराज तनय राजित थे, निज निगूढ़ माया में.
उधर, गगन  में चारु  चंद्रिका, नवल नृत्य करती थी.
इधर, कृष्ण के मधुर अधर - पुट पर वंशी सजती थी.

८ 
महाकाल , तब  महारास के दर्शन  हेतु  पधारे .
व्रज-वनिता का रूप , मुग्ध,साश्चर्य देव थे सारे.
व्रज-सुन्दर ने सस्मित देखा, वंशी मधुर बजाया.
क्लींकार  का  गुंज  गोपिकाओं में मात्र, समाया.

======================

महारास के रहस्य पर श्री कृष्ण को अर्पित मेरी  लम्बी कविता  का यह एक अंश है .. मेरी यह लम्बी कविता , मेरी आगामी पुस्तक का प्रमुख अंश होगी..

जैसे आइन्स्टीन के द्वारा देखे गए सापेक्षता के रहस्य को विश्व में बस दो-चार लोग ही पूरी तरह समझ पाते हैं , उसी तरह महारास के रहस्य को विश्व में श्री कृष्ण-कृपा-प्राप्त कुछ लोग ही, वास्तव में,  समझ पाते हैं.

महारास के समय श्री कृष्ण की अवस्था नौ वर्ष की थी ..

जिन गोपिकाओं ने महारास में भाग लिया था उनमे सभी , श्री कृष्ण से अधिकतम दो वर्ष मात्र  बड़ी थीं.

 श्री राधा जी,  श्री कृष्ण से एक वर्ष बड़ी थीं. ..


-- अरविंद पाण्डेय 

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कोटि कोटि सूर्यों की आभा एक ज्योति में हुई प्रविष्ट

· अरविन्द पाण्डेय

जगन्माता धूमावती -यन्त्र 


महानिशा में किया प्रज्ज्वलित माँ को अर्पित दीप,विशिष्ट 
कोटि कोटि सूर्यों की आभा एक ज्योति में हुई प्रविष्ट.
देखा सूर्य - चन्द्र को लेते जन्म और फिर देखा अंत.
देखा माँ की मधुर-मूर्ति , फिर देखा भीषण रूप , दुरंत.


सो अकामयत एकोsहं बहुस्यां प्रजायेय .. 
उन्होंने -- ईश्वर ऩे कामना की कि मैं एक हूँ , अनेक को जन्म दूं... 
और ये अनंत अपरिसीम ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो गया.. 

पृथ्वी माता , प्रति सेकेण्ड ३० किलोमीटर की गति से , भगवान सूर्य की परिक्रमा कर रही हैं.. 
एक सेकेण्ड के लिए भी उनकी यात्रा रुकी नहीं .. जन्म से अब तक... 

क्या हम पृथ्वी पर अपने अपने अहंकार में डूबे हुए लोगो को यह  अनुभव होता है कि हम एक ऐसे पिंड पर जीवन बिता रहे हैं जो इतनी तेज़ गति से यात्रा कर रहा है अंतरिक्ष में.. 

विज्ञान कहता है की जिस दिन मनुष्य को यह अनुभव हो जाय , उस व्यक्ति की तुरंत मृत्यु हो जायेगी..

-- अरविंद पाण्डेय 

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दुर्गा होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने - Vandita Sings

· अरविन्द पाण्डेय


ॐ नमश्चंडिकायै .

आज नवरात्र पर माँ को पुनः अर्पित:भजन 
==============
मैया होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने.
जननी होइ गईन दयालु आजु मोरे अंगने.
१ 
मैया के माथे पे सोने की बिंदिया .
बैंठीं करके सिंगार आजु मोरे अंगने 

मैया होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने.
२ 
मैया के पैरों में चांदी की पायल.
बाजे रन झुन झंकार आजु मोरे अंगने 

मैया होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने.
३ 
मैया के होठों पर पान की लाली..
पल पल बरसे आजु मोरे अंगने .

मैया होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने. 
४ 
माँ के गले मोतियन की माला.
मुख पे नैना विशाल आजु मोरे अंगने 

मैया होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने.
५ 
गोरे बदन पर चमके बिजुरिया.
जिसपे चुनरी है लाल मोरे अंगने .

मैया होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने.
६ 
मैया करती हैं सिंह सवारी .
नाचे सिंह विशाल आजु मोरे अंगने 

मैया होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने.
जननी होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने.
दुर्गा होइ गइन दयालु आजु मोरे अंगने.

विन्ध्याचल-धाम के घरों में ये गीत गाया जाता रहा है..

अपनी माता जी के स्वर में ये गीत, मैं बचपन से ही, प्रत्येक पारिवारिक उत्सव के अवसर पर, सुनकर आनंदित होता रहा हूँ..

मूलरूप से ये गीत विन्ध्याचल की लोक-भाषा में है.इसे मैंने फिर से लिखा-खडी बोली में.और मुखड़े को छोड़ कर, भाव भी मेरे हैं .. 

वन्दिता ऩे इसे स्वर दिया .२००२ में रिकार्ड हुआ और वीनस ऩे इसे रिलीज़ किया था.. आज नवरात्र पर माँ को पुनः अर्पित..
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माँ तुम एक, प्रतीत हो रहीं , पर, अनेक तुम.

· अरविन्द पाण्डेय





ॐ नमश्चंडिकायै

नारी का नारीत्व, पुरुष का पौरुष हो तुम.
कुसुम-सुकोमल और अशनि के सदृश परुष तुम.
सर्व-व्याप्त हो, सर्वमयी हो किन्तु एक तुम.
माँ तुम एक, प्रतीत हो रहीं , पर, अनेक तुम.

Aravind Pandey 
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माँ,तू रूद्राणी,शूलधारिणी,नारायणी,कराली है.नंदिता पाण्डेय का स्वर-पुष्प

· अरविन्द पाण्डेय


 नवरात्र पर्व के प्रथम दिवस पर .
माँ को अर्पित भक्ति-गीत 
नंदिता पाण्डेय के स्वर में..

गीत लिखे कोई कैसे तुझ पर,चरित अनंत,अपार है माँ.
तू कल्याणमयी वाणी है , तू उसके भी पार है माँ.

१ 

माँ , तू रूद्राणी , शूलधारिणी , नारायणी, कराली है.
विन्ध्यवासिनी माता मेरी , तू ही शेरावाली है.

माँ स्वर्ण-कमल है आसन तेरा , आँखों से करूणा बरसे .
शंख, चक्र औ पद्म लिए तू , माँ , मेरे ही मन में बसे.

तू असुरों का नाश करे औ तुझसे ये संसार है माँ.
तू कल्याणमयी वाणी है , तू उसके भी पार है माँ.

२ 

माँ मधु-कैटभ का नाश किया औ देवों का कल्याण किया.
चामुंडा बन कर तूने ही रक्तबीज का प्राण लिया .

माँ, फिर से धरती पर असुरों का फैला है आतंक बड़ा.
धर्म हुआ कमज़ोर, अधर्मी पापी फिर से सर पे चढ़ा .

ले ले अब तू फिर से इस धरती पर वो अवतार, हे माँ.
तू कल्याणमयी वाणी है , तू उसके भी पार है माँ.

गीत लिखे कोई कैसे तुझ पर, चरित अनंत,अपार है माँ.
तू कल्याणमयी वाणी है , तू उसके भी पार है माँ.

Aravind Pandey
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तेरी ख्वाहिश ही अब मेरी शहंशाही की ग़ुरबत है

· अरविन्द पाण्डेय

हज़रत मूसा , नख्ल-ए-तूर के सामने, वृक्ष  में  प्रकट  ईश्वरीय-प्रकाश  के   दर्शन
से  परमानंदित
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तेरे नज़दीक आ पाता हूँ, अक्सर, मैं इन्हीं के साथ.
मुझे रातों की रानाई से , इस खातिर, मुहब्बत है.
खलाओं की खलिश में ख्वाहिशों की खैरियत मत पूछ,
तेरी ख्वाहिश ही अब मेरी शहंशाही की ग़ुरबत है.

I love the lustre of lonely nights ,
Since, with it, I come closer to You. 
O GOD ,  My desire to get Your affinity
is powerty of My Emperorship, now. 


जिस वृक्ष के सामने हज़रत मूसा को  ईश्वरीय  प्रकाश का दर्शन हुआ था  उसे 
  नख्ल-ए-तूर   कहा जाता है ..

ग़ुरबत = दरिद्रता 
खलिश = चुभन .

Aravind Pandey 

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वह कौन जिसे आँख देखती ही रह गयी..

· अरविन्द पाण्डेय

                              
 मुझसे कई मित्रों ने पूछा कि आप प्रेम की कवितायें या नज़्म किसे लक्षित कर लिखते हैं .. क्योंकि लिखते समय लेखक की दृष्टि में कोई व्यक्ति या वस्तु तो रहनी ही चाहिए जिसे लक्षित कर शब्दों के माध्यम से प्रकट भाव, अपनी यात्रा कर सकें .. इन प्रश्नों पर मैंने कई बार सोचा ।

मैनें एक दिन , किसी प्रणयिनी के प्रसन्न-मन की तरह अनंत रूप से विस्तृत और खिलखिलाते हुए आकाश को देख कर, खुद से प्रश्न किया था ---

'वह कौन जिसे देख गुनगुना उठा ये मन .
वह कौन जिसे छूके गमगमा उठा ये तन
वह कौन जिसे आँख देखती ही रह गयी,
महकी हुई हवा ये बही सन सनन सनन ..

मैनें जब किसी सांस्कृतिक-कार्यक्रम में - चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल' गाया तो भी यही प्रश्न मुझसे कुछ मित्रों ने किया कि आखिर गाते समय जो भाव, स्वर-लहरियों में पग कर, छलकते हैं, वे किसको भिगोने को बेताब होते हैं ॥

ये प्रश्न मुझे अति प्रासंगिक लगे थे और इन प्रश्नों पर मेरा अपना चिंतन है . मै समझता हूँ कि मेरा यह चिंतन, वैज्ञानिक और यथार्थवादी भी है .
चांदी जैसा रंग - क़तील शिफाई की बेहतरीन खूबसूरत नज़्म, जब मैंने पढा तो मुझे लगा कि ये नज़्म , बज्मे कुदरत के लिए लिखी गयी ..

मगर इश्क की हकीकत से महरूम लोगों नें ये समझा कि ये किसी खूबसूरत, परीजाद जैसी स्त्री के हुस्न की तारीफ़ में लिखी गयी .

सत्य यह है कि दुनियावी खूबसूरती एक ऐसा सितारा है जिसे पाने को जो जितना ही आगे बढे वह सारी कोशिशों के बाद , खुद को उतना ही पीछे महसूस करता है ।

एक कार्यक्रम में मैंने ' चांदी जैसा रंग ' गाने के पहले श्रोताओं से पूछा - ' क्या आपमें से किसी ने कोई ऐसी स्त्री देखी है जिसकी देह का रंग चांदी जैसा चमके और जिसके बाल सोने की तरह कान्तिमान हों ।'

सभी ने एकस्वर से कहा - नहीं देखा ।

तो मैंने गाना शुरू किया और कहा की इस गीत को मैं उस मातृभूमि - धरती माता को समर्पित करते हुए गा रहा हूँ जिसका रंग सचमुच चांदी जैसा है और जिसके बाल . वास्तव में स्वर्णिम कान्ति से विभूषित हैं । तालियाँ बजी लोगों ने गीत का स्वाद लिया , आनंदित हुए ..

नयी दृष्टि ने उन्हें बौद्धिक दृष्टि से भी समृद्ध भी बनाया ..

प्रेम की शुद्ध वैज्ञानिक परिभाषा और लक्षण नारद भक्तिसूत्र में प्राप्त होता है । श्री नारद ने प्रेम का लक्षण निरूपित करते हुए कहा -- तत्सुखे सुखित्वं स्यात् अर्थात जिस पुरूष में यह लक्षण मिले कि वह किसी स्त्री के सुखी हो जाने पर स्वयं सुख का अनुभव करता है । या कोई स्त्री, किसी पुरूष के सुखी होने में स्वयं सुखी होने का अनुभव कर रही तो यह लक्षण प्रेम का है ।

मगर संसार में हो क्या रहा अक्सर ? स्त्री और पुरूष एक दूसरे के अस्तित्व का प्रयोग, स्वयं को सुखी करने में कर रहे । तो यह प्रेम का लक्षण तो है नही । फ़िर , चाँद-फ़िज़ा जैसी कथाएं , प्रेम के नाम पर , आतंक का प्रतीक बन, प्रेम शब्द के प्रति भयग्रस्त बना रहीं लोगों को ।

वस्तुओं के प्रति प्रेम ने समाज को घायल कर रखा है । दहेज़-प्रताड़ना के मामलों में अक्सर मैनें पाया कि पत्नी अत्यन्त रूपवती है फ़िर भी उसके रूप की संपत्ति को न आंक पाने के कारण पति ने पैसे के लिए उसे प्रताडित किया । और जब उसे मैंने इस बात के बारे में समझाया तो उसे गलती का एहसास हुआ और पत्नी-पति के सम्बन्ध सुधर गए ।

एक बात और । संसार में जो आकर्षण है स्त्री -पुरूष का एक दूसरे के प्रति, वह किसी भौतिक -गुण के प्रति आकर्षण है न कि उस व्यक्ति के प्रति जिसके प्रति कोई आकर्षित हो रहा । ऐसे आकर्षणों में स्त्री या पुरूष के वे भौतिक गुण यदि अधिक मात्रा में किसी अन्य स्त्री या पुरूष में दिखाई पड़ेंगे तो आकर्षण की दिशा निश्चित रूप से बदल जायेगी । उस ओर जहा वे गुण अधिक दिखाई पड़ रहे । फ़िल्म उद्योग और शोभा डे की सितारों भरी रात्रियों की मस्ती में डूबने वालों के विशिष्ट समुदाय , में इस प्रणय - विचलन की घटनाएँ प्रचुर संख्या में प्राप्त हैं ।

वास्तव में अनंत प्रेम या तो ईश्वर के प्रति ही हो सकता है या जिसे ईश्वर मान लिया जाय उसके प्रति हो सकता है । क्योंकि इश्वर में ही अनंत मात्रा में सौन्दर्य, माधुर्य, कोमलता , ऐश्वर्य , पौरुष, यशस्विता , श्री , उपलब्ध है जिसके कारण कोई भी किसी के प्रति संसार में आकर्षित होता है ।

अनेक प्रेम-अपराधों के अनुसंधान में मैंने यही पाया कि अपराध इसलिए हुआ क्योंकि श्री नारद की परिभाषा के अनुरूप वहाँ प्रेम था ही नही मात्र प्रेम का आभास था जिसे प्रेम कहा जा रहा था । लोग स्वयं को सुखी बनाने के लिए दूसरों की ताकत का प्रयोग कर रहे थे और यह स्वयमेव एक अपराध है ।

समाज को समृद्ध , शांत और सुंदर बनाने के लिए यह ज़रूरी है की लोग प्रेम का प्रशिक्षण प्राप्त करें , उसे समझें और यह देखें कि वे जिसे प्रेम करते हैं उसे कितना सुखी बना रहे । दूसरों को सुखी करने वाले में ही प्रेम घटित हो सकता है वरना इश्के मिजाजी का तो यही हाल देखा और लिखा -

इस इश्के मिजाजी की तो है बस इतनी दास्तान
इक तीर चुभा , खून बस बहता ही जा रहा
हर शख्स की ज़ुबान , आँख , कान बंद है
इक मैं हूँ जो बस दर्दे दिल कहता ही जा रहा


----अरविंद पाण्डेय
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तेरी रहमत,मेरी आँखों से दिल में यूँ उतरती है

· अरविन्द पाण्डेय

श्री राधा म्रदुभाषिणी मृगदृगी  माधुर्यसन्मूर्ती थीं .
''प्रियप्रवास'' महाकाव्य में श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय ' हरिऔध'
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तेरी रहमत,मेरी आँखों से दिल में यूँ उतरती है 

कि जैसे शम्स की किरनें उतरती हैं खलाओं में .
कि जैसे खुश्क मौसम में कोई राही परेशां हो,
मगर,बस यूँ अचानक,इत्र घुल जाए हवाओं में.
कि जैसे आसमां में हो कोई आवारा सा तारा .
मगर मिल जाए उसको ताज कोई कहकशाओं में 

तेरी रहमत , मेरी आँखों से दिल में यूँ उतरती है ,
कि चिड़िया का कोई बच्चा ज्यूँ हो माँ की पनाहों में.


अरविंद  पाण्डेय  
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उदय-अस्त दोनों ही स्थिति में प्रणय-पूर्ण जो होता है.

· अरविन्द पाण्डेय



तरणि  , उदित हो, रंग देते हैं प्रणय-वर्ण में नीलाकाश.
और अस्त होने पर भी वितरित करते अरुणाभ प्रकाश.
उदय-अस्त दोनों ही स्थिति में प्रणय-पूर्ण जो होता है.
कृष्णचन्द्र  को वही भक्त सबमें ,सबसे प्रिय होता है.

The Sun rises. adorned with candid color of Love,
And, sets with the grand  glow of  fragrant rose.
While  being crushed down or being placed above,
Who puts on the same color, God embraces those.


-- अरविंद पाण्डेय  

प्रणय-वर्ण = लाल  रंग 

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ईश्वर ऩे है दिया सभी को,दिव्य गगन का राज्य प्रशस्त.

· अरविन्द पाण्डेय


ईश्वर ऩे है दिया सभी को,
दिव्य गगन का  राज्य प्रशस्त.
किन्तु,लोग कलुषित,क्षण-भंगुर
क्षुद्र  वस्तु  में  हैं  आसक्त. 

प्रतिदिन सविता सस्मित,सादर 
जिसे  बुलाता  अम्बर में 
वही मनुज है अविश्वस्त में 
व्यस्त, न्यस्त  आडम्बर में.

-- अरविंद पाण्डेय 

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श्री राधाष्टमी:तुम अगर साथ देने का वादा करो : मेरे स्वर में

· अरविन्द पाण्डेय



जय जय श्री राधे : श्री  राधाष्टमी  :

तुम अपनी बांसुरी के सुर मुझे जब जब सुनाते हो .
कोई  नगमा  अनूठा दिल से मेरे बह निकलता है.
मेरी हस्ती नहीं कुछ, पर,मुझे मालूम है इतना -
मेरे नगमों से भी कुछ पल,तुम्हारा दिल बहलता है. 

I feel fortunate to learn and sing this song from the Music Director of this song , Shri Ravi .. I was posted as City S.P. Ranchi , Jharkhand..(1994 ) He visited my house , stayed with us, told so many unheard stories about Rafi sahab , Lata ji , Mukesh ji , Kishor Da and other legends of Hindi Film Music Industry .. 



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हरतालिका तृतीया के महापर्व पर : मैं तो बनूगी शिव की पुजारन:नंदिता पाण्डेय के स्वर में.

· अरविन्द पाण्डेय



हरतालिका तृतीया :

सकल विश्व की माताओं को सतत प्रणाम !!!

कालिदास का यह छंद मुझे अत्यंत प्रिय है और मेरे द्वारा किया गया  इसका अनुवाद भी  मुझे अतिशय प्रिय है..आप सभी इसे ज़रूर पढ़ें और अपने विचार लिखें .

कुमार संभव में कालिदास :

तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसांगयष्टिः
निक्षेपणाय पदमुद्ध्रितमुद्वहन्ती
मार्गाचलव्यतिकराकुलितेवसिन्धु:
शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ.

मेरा अनुवाद:

उन्हें देखकर पुलक-सुगन्धित,कम्पितदेह शिवानी.
तत्पर जो अन्यत्र गमन को,शिव-सरसांग भवानी.
पथ-स्थित-अचलारुद्ध नदी सी आकुल,पर,आनंदित.
न तो स्थित रहीं न तो कहीं अन्यत्र हो सकीं प्रस्थित.

यह दृश्य उस समय का है जब शिव-प्राप्ति हेतु किया जा रहा जगन्माता पार्वती का तप पूर्णप्राय हो चुका होता है.भगवान शिव, वटु-वेश में वहां आते हैं और शिव-निंदा करते हुए पार्वती को तप से निवारित करने का प्रयास करते हैं..पहले तो माता उन्हें तर्क से परास्त करने का प्रयास करतीं हैं.किन्तु, वे रुकते नहीं..पुनः कुछ कहना चाह रहे होते हैं..माता अपनी सखियों से कहती हैं-

निवार्यतामालि किमप्ययं वटु: 
पुनः विवक्षु: स्फुरितोत्ताराधर:
न केवलं यो महतोSपभाशते
शृणोति तस्मादपि यः स पापभाक.

इतना कह कर वे अपना पैर वहां से हट जाने के लिए उठाती ही हैं कि वटु-वेशधारी सदाशिव उनके सामने प्रकट हो जाते हैं..उस समय माता की जो स्थिति होती है उसी का वर्णन कालिदास ने उक्त छंद मे किया है जो सम्पूर्ण विश्व-साहित्य के सर्वोत्तम काव्य में माना जाता है.भारतीयों द्वारा ही नहीं , भारतविद्या के जर्मन, अंग्रेज,आदि विद्वानों द्वारा भी.

कुमारसंभवं का यह प्रसंग मेरे पिता जी बचपन से ही मुझे सुनाया करते थे.

इतना सरस प्रसंग -- वह भी अपनी माता और पिता का प्रेम प्रसंग ..कितना समाधिकारक है यह..

आज माता के पर्व पर यह प्रस्तुत करने की इच्छा हुई






अरविंद पाण्डेय 
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अल्लाह की नेमत से हर इक सांस मेरी ईद.

· अरविन्द पाण्डेय

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन .
ॐ .
अलिफ़ लाम मीम 

सर्वेश्वर, बस तुम्हीं प्रणम्य.
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हर शब ही शब-ए-कद्र सी आती है मेरे पास.
अल्लाह की नेमत से हर इक सांस मेरी ईद.

हिन्दू  हो, मुसल्मां  हो, ईसाई  या   यहूदी .
हर  शख्स  को  ईमान  सिखाती है मेरी ईद.

शुभ शुक्र हो, होली हो , दिवाली हो या पोंगल,
इंसान की खुशियों में ही मनती है मेरी ईद.

मज़हब मेरा इस्लाम , मुसल्मां है मेरा नाम.
हंसते हुए बच्चे में, पर,  हंसती है  मेरी  ईद.

जब दिल में दूरियां हों, मज़हबों में दुश्मनी .
फिर, अम्न का इक चाँद ले आती है मेरी ईद

तुमको भी अगर इश्क की ख्वाहिश हो मेरे दोस्त.
आना  मेरे  घर ,  तुमको  बुलाती  है मेरी ईद.

-- अरविंद पाण्डेय 
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आदमी बस चल रहा है.

· अरविन्द पाण्डेय


आदमी बस चल रहा है.

यह बिना जाने
 कि जाना है कहाँ , कैसे , किधर,

वक़्त उसका बेवजह ही ढल रहा है.

आदमी बस चल रहा है.

खुद उसी की आरजू ने 
आग दिल में जो लगाईं,

वह उसी दोज़ख में बेबस ,
रात दिन बस जल रहा है.

आदमी बस चल रहा है.

-- अरविंद पाण्डेय 

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दोज़ख = नरक  
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मुझे तो चाहिए बस आज वही हिन्दुस्तां.

· अरविन्द पाण्डेय


जो लाखों लोग हिफाज़त तुम्हारी करते हैं.
कड़कती धूप, ठण्ड, शीतलहर सहते हैं.
तुम जिनके दम पे अब लेते हो दम आज़ादी का.
उन्हें भी देखना किस हाल में वो रहते हैं.

अगर अवाम के तन पर नहीं कपडे होंगे,
अगर गरीब हिन्दुस्तान के भूखे होंगे.
समझ लो फिर ये आज़ादी अभी अधूरी है.
अभी मंजिल में और हममे बहुत दूरी है.

अगर बारिश हो तो हर शख्स नाच नाच उठे .
अगर जो शाम ढले, सबके दिल में गीत उठे.
सभी बेख़ौफ़ घूमते हों रात , राहों में.
हर एक दिल हो यहाँ इश्क की पनाहों में.

हर एक दिल में ही जब ताजमहल सजता हो.
हर एक शख्स ही जब शाहजहां लगता हो.
हर एक दिल में हो खुदा-ओ-कृष्ण का ईमां.
मुझे तो चाहिए बस आज वही हिन्दुस्तां.

हर एक शख्स में जब शायराना मस्ती हो.
हर एक शय खुद अपने आपमें जब हस्ती हो.
तभी आज़ादी का सपना मेरा पूरा होगा.
ज़रा भी कम जो मिले, लक्ष्य अधूरा होगा.

अरविंद पाण्डेय 
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एक हुए भाई बहन , धन्य धन्य यह प्रीत.

· अरविन्द पाण्डेय

 
रक्षाबंधन विजयते

स्वारथ के संसार में , देखी अद्भुत रीत.
एक हुए भाई बहन , धन्य धन्य यह प्रीत.

कृष्ण सुभद्रा राम का, आज करूं अभिषेक .
ब्रज की प्रेमकथा सुनी, हुए पिघल कर एक.


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मगर,मै रुक नहीं सकता, मुझे मंजिल बुलाती है.

· अरविन्द पाण्डेय



ॐ आमीन :

नशीली सी फिजाएं देख  मुझको ,मुस्कुराती  हैं.
बहुत मीठे सुरों में  मस्त  कोयल  गीत गाती है.
बड़ा  ही  खूबसूरत  है  मेरी राहो का हर गुलशन.
मगर,मै रुक नहीं सकता, मुझे मंजिल  बुलाती है.

अरविंद पाण्डेय
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मगर, मेरी तो बस इतनी सी एक ख्वाहिश है.

· अरविन्द पाण्डेय

(26 जनवरी २००५ . समादेष्टा .बिहार सैन्य पुलिस .पटना )


वन्दे मातरं ..

किसी में आरजू होगी कि चाँद पर जाए.
किसी में जुस्तजू होगी कि चाँद खुद आए.
मगर, मेरी तो बस इतनी सी एक ख्वाहिश है.
कि जान जाय तो बस मुल्क के लिए जाए..




अरविंद पाण्डेय 
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धन्य राम चरित्र का यह प्रबल पूत प्रताप..

· अरविन्द पाण्डेय


श्री मैथिलीशरण गुप्त.
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3 अगस्त :

धन्य राम चरित्र का यह प्रबल पूत प्रताप.
कवि बने अल्पग्य कोई आप से ही आप.


कक्षा ८ में अध्ययन के समय ही मैंने श्री मैथिलीशरण गुप्त में महाकाव्य '' साकेत '; ''पंचवटी'' चिरगांव, झांसी से मंगाया था.साकेत के प्रथम पृष्ठ पर एक प्रसिद्द छंद अंकित था-

राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है.
कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है.

उसी छंद के नीचे ही मैंने अपनी उपर्युक्त दो पंक्तियाँ अंकित कर दी थीं.मेरे पास उपलब्ध साकेत की प्रति आज मेरे सामने है और आज पुनः वह छंद मेरे समक्ष समुज्ज्वल है


अरविंद पाण्डेय
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काश, रफ़ी साहब इन पंक्तियों को गाते :

· अरविन्द पाण्डेय


काश, रफ़ी साहब इन पंक्तियों को गाते :

तेरे रुखसार के दोनों तरफ बिखरें हैं जो गेसू.
हैं कुछ उलझे हुए,फिर भी ज़रा मदहोश से भी हैं.
तेरी इन अधखुली आँखों की मस्ती घुल गई इनमे 
या तेरे दिल की उलझन ही कहीं उलझा रही इनको.


रफ़ी साहब को ये पंक्तियाँ समर्पित.आज उनकी पुण्यतिथि है.इस देश के लोगों को उन्हें इसलिए भी याद करना चाहिए क्योकि वे पाकिस्तान गए.वहाँ उन्होंने प्रसिद्द भजन - ओ दुनिया के रखवाले-- गाया.और कुछ इस तरह से गाया कि हमारे पाकिस्तानी भाइयों ऩे मज़हब का भेद भूलकर, Once More - का नारा लगाया .और रफ़ी साहब को वो गीत दुबारा गाना पडा. जो हमारे पुरोधा आज तक नहीं कर सके और शायद न कर पाएगें, उसे रफ़ी के दिव्य स्वर ऩे सहजता से कर दिया था..वे होते और मैं इन चार पंक्तियों को गीत का रूप देता और वे गाते इसे..ये स्वप्न धरती पर कभी यथार्थ बन पाए तो .....










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किया संतरण सतत शून्य में,मिला न यात्रा-पथ का छोर.

· अरविन्द पाण्डेय


भासस्तस्य महात्मनः 

दुनिया के युद्धों से थक कर, कल मैं उड़ा गगन की ओर.
किया संतरण सतत शून्य में,मिला न यात्रा-पथ का छोर.
महासूर्य का लोक दिखा फिर, देश-काल था जहाँ अनंत.
बस,प्रकाश का एकमेव अस्तित्व,तमस का अविकल अंत.

स्वप्रकाशमानंदं ब्रह्म .. 

कुरुक्षेत्र में विराटरूप दर्शन में अर्जुन ऩे श्री कृष्ण को देखा था - मानों आकाश में करोड़ों सूर्य एक साथ उदित हो उठे हों..जय श्री कृष्ण..वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में एक ऐसे प्रकाश-पुंज का संकेत मिला है जो हमारे सूर्य से १४० अरब गुना बड़ा हैं एवं जिसका प्रकाश, हम तक आने में, १४० अरब प्रकाश वर्ष का समय लगता है..


अरविंद पाण्डेय
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लोध्र पुष्प-रज से राधा का करते केशव श्रृंगार.

· अरविन्द पाण्डेय


वृन्दावन के निभृत कुञ्ज में श्री राधा-वनमाली .
स्वच्छ शिला पर बैठे थे , छाया करती थी डाली.
लोध्र पुष्प-रज से राधा का करते केशव श्रृंगार.
योगी थे साश्चर्य , देख , योगेश्वर का व्यापार .


प्राचीन काल में लाल रंग के लोध्र पुष्प के पराग के लेप से मुख का श्रृंगार किया जाता था.
कालिदास ऩे मेघदूत में लिखा है:

नीता लोध्रप्रसवरजसा पांडुतामानने श्री: 


निभृत = एकांत.
साश्चर्य = आश्चर्य से युक्त. 







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मैं देव और पशु साथ साथ, मैं हूँ मनुष्य .

· अरविन्द पाण्डेय


ॐ.आमीन .
मै  अणु बनता हूँ कभी ,कभी  बनता विराट .
अनुभव करता परतंत्र कभी,  बनता  स्वराट.
मैं कभी क्रोध-प्रज्वाल, कभी श्रृंगार शिखर ,
मैं नियति-स्वामिनी का बस हूँ सेवक,अनुचर.

 मैं देव और पशु साथ साथ, मैं  हूँ  मनुष्य .

अरविंद पाण्डेय
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संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ ...

· अरविन्द पाण्डेय



संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ 
यं यं व्यतीयाय पतिंवरा  सा.
नरेंद्र मार्गाट्ट इव प्रपेदे 
विवर्णभावं स स भूमिपालः

 
राजमार्ग-संचरण  कर  रही  दीप शिखा सी, इंदुमती.
वरण हेतु आए जिस वर को छोड़,बढ़ चली, मानवती.
उस नरेंद्र का हुआ मुदित मुखमंडल,सद्यः कांति-विहीन.
दीपशिखा-रथ बढ़ जाने से पथ-प्रासाद हुआ ज्यों दीन.

कालिदास की सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वरमणीय उपमा का उदाहरण- 
यह देवी इंदुमती के स्वयंवर का वर्णन है रघुवंश का. 
वे वरमाला लेकर वर के वरण हेतु संचरण कर रही हैं..............................शेष आप दृश्य को अपनी चेतना में रूपायित करें और  सहृदय-हृदय-संवेद्य रस-स्वरुप होकर , अलौकिक आनंद का भोग करे..


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धीरसमीरे....

· अरविन्द पाण्डेय



धीरसमीरे....
धीर-समीर-प्रकम्पित वन-कुंजो में श्री घनश्याम.
निरख रहे थे श्री राधा का स्वर्ण-वर्ण मुख, वाम.
अकस्मात् हो गया लाल, उनके कपोल का मूल.
खींच लिया था प्रिय मृग-शावक ऩे कौशेय दुकूल.


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धीर-समीर-प्रकम्पित - धीमी हवा के कारण हिलता हुआ..
कौशेय दुकूल = रेशमी दुपट्टा
मृग-शावक = हिरन का बच्चा 
स्वर्ण-वर्ण मुख = सुनहरी आभा वाला चेहरा .

श्री राधा जी का दर्शन करने वाले भक्तो ऩे अपने अनुभव बताते हुए, उनके दृश्य - अंगो का रंग,चमकते हुए सोने जैसा बताया है.


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बहने न दो सड़को की तपिश में मेरा लहू.

· अरविन्द पाण्डेय


बहने न दो सड़को की तपिश में मेरा लहू.
ग़र ये गरम हुआ तो फिर तुम भी न जिओगे.
हम दिख रहे अभी तुम्हे बेबस, गिरे हुए.
ग़र उठ गए,फिर,भाग के भी बच न सकोगे.

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.कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् :ज्ञान-सिन्धु सी आज चंद्रिका नभ में लहराएगी.

· अरविन्द पाण्डेय



स्वयं पूर्ण जो,करूणा से जिनकी, हो पूर्ण. अपूर्ण,
मात्र स्पर्श से जिनके, तम का , पर्वत होता चूर्ण.
जिनकी ज्ञान-अग्नि से भस्मीभूत अविद्या जीर्ण.
उन गुरु के प्रकाश की सत्ता कण कण में परिकीर्ण.

उन्हीं परम गुरु का प्रकाश सविता में होता व्यक्त.
वही सजल, शीतल, शशांक किरणों में हुए विभक्त.
उन्ही परम गुरु की करूणा बहती है जह्नु-सुता में.
उनके चरणों की कोमलता हंसती पुष्प , लता में.


अम्बर की निर्मेय नीलिमा सदृश वर्ण है  उनका.
परम शान्ति के सदृश कांति-दीपित शरीर है उनका.
राग-द्वेष या अभिनिवेश का भय सत्वर मिटता है.
जो उन पर-गुरु का श्रद्धा से स्मरण आज करता है.


ज्ञान-सिन्धु सी आज चंद्रिका नभ में लहराएगी.
सकल धरा पर अक्षर किरणे, अविरल बरसाएगी.
आज परम गुरु की है आज्ञा द्विधा-ग्रस्त मानव को-
चन्द्र-किरण को बना शस्त्र, करदो समाप्त दानव को.



अरविंद पाण्डेय


अभिनिवेश=मृत्यु से भय

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एक जाति हो, एक धर्म हो , एक हमारा वेश

· अरविन्द पाण्डेय




तब तक ये फटेगें हमारे सीनों पे बारूद.
जब तक न फट पड़ेगें हम शैतान के सर पर.
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करते जो हिफाज़त हैं असल,उन सभी को तुम.
करते हो परेशान मुकदमे चला, चला.
रहवर जो बने हो तो फिर अब करो हिफाज़त .
वर्ना, कहो अवाम से '' नाकाम हम हुए ''
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पूर्व-सूचना देकर दिल्ली में होता विस्फोट
पहुंचाई जा रही देश को अमिट, अकल्पित चोट 


किसी धर्म ने,किसी जाति ने, किया न कभी विरोध ।
फ़िर, अफ़ज़ल के मृत्यु-दंड में है किसका अवरोध ।


भारत के जिस राज चिह्न में लिखा -"सत्य अविजेय"।
उसे पहन भी कई लोग क्यों भूल चुके हैं ध्येय ।


अबल हो रही दंड-नीति का नही जिन्हें है ध्यान ।
काल-पुरूष का न्यायालय लेगा उनका संज्ञान ।


जिसे आज वे समझ रहे हैं इस जीवन का लक्ष्य ।
नही, नही, वह लक्ष्य नही, वह तो है घृणित, अभक्ष्य ।


तुच्छ-स्वार्थ के लिए आज रख रहे परस्पर द्वेष ।
नही ध्यान है कहा जा रहा अपना भारत देश ।


शपथ लिया था देशभक्ति का, गए उसे क्यों भूल ।
क्या सोचा था, जीवन पथ में सदा मिलेंगे फूल ।


कांटो पर चलकर ही करना था पूरा कर्तव्य ।
राष्ट्र-पुरूष के मस्तक पर टीका करना था भव्य ।


करना था उन षड्यंत्रों को पल ही पल में नष्ट।
बना रहीं हैं जो युवजन को अपराधी अतिभ्रष्ट ।


किंतु आज हम सब क्यों है बस अपने में मशगूल ।
कांटो से भयभीत, सिर्फ़ क्यों खोज रहे हैं फूल ।


आज समय है- बने संगठित अपना सारा देश ।
एक जाति हो, एक धर्म हो , एक हमारा वेश ।


---अरविंद पाण्डेय

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कल चन्द्र-निमंत्रण पर पहुंचा मैं चन्द्र-लोक.

· अरविन्द पाण्डेय



कल  चन्द्र-निमंत्रण  पर पहुंचा मैं चन्द्र-लोक.
कण कण आनंदित वहां,किसी में नहीं शोक.
फिर रात हुई ,  देखा नभ में थी उदित धरा.
हलके नीले आलोक-सलिल से गगन भरा.

प्रातः जब पृथ्वी पर आनंदित मैं उतरा.
मानव के नीले कर्मो से थी भरी धरा.



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मुक्त आज मैं, जीवन की प्रतिकूल वेदनाओं से,

· अरविन्द पाण्डेय


हृदय बना है सेतु आज जिस पर अम्बर से आकर.
चन्द्र, सूर्य, तारक आनंदित, धरा-भ्रमण करते हैं.
मुक्त आज मैं, जीवन की प्रतिकूल वेदनाओं से,
संसीमित यह तन,असीम का अमृत-भोग करता है.

अरविंद पाण्डेय

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परम पुरुष है एक परम नारी भी है बस एक.

· अरविन्द पाण्डेय


शिवः शक्त्या युक्तो.


परम पुरुष है एक परम नारी भी है बस एक.
नर-नारी में प्रकट हुए हैं बनकर यही अनेक.
इसीलिये,करती अभिलाषा,परम पुरुष की नारी.
नर भी उसी  परम नारी का है प्रतिपल अनुसारी.

Aravind Pandey 
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ये सेहर थम जाय,इसकी शब न आए अब कभी..

· अरविन्द पाण्डेय



====================

तुझे सुना तो बहुत दूर से, मगर ये लगा.
बहुत करीब से आवाज़ कोई आई है.
किसी बिहिश्त की बहकी हुई फिजा जैसे,
या कि खिलते हुए चमन की तू रानाई है.


मैं जानता हूँ तुम नहीं हो , मगर फिर भी मैं.
तुम्हें तलाश किया करता हूँ यहाँ से वहां .
वो तुम नहीं हो जो तुम दीख रहे,फिर भी मैं, 
तुम्हें , तुम्हीं सा देखने को ढूढता हूँ यहाँ .


दश्क़ सेहरा में कभी,खो सी गयी थी जो सेहर .
मुद्दतों के बाद फ़ैलाने लगी है रोशनी. 
आओ, हम इसको भिगो दें आब-ए-उल्फत से अभी,
ये सेहर थम जाय, इसकी शब न आए अब कभी..

-- अरविंद पाण्डेय  

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नयन पी रहे श्री राधा जी के होठों की लाली

· अरविन्द पाण्डेय


मंद पवन है,यमुना तट है,पुलकित हैं वनमाली.
नयन  पी रहे श्री राधा जी के होठों की लाली.
देख,देख कर उन्हें, पुलक में, वंशी मधुर बजाते.
उनको छू, जो धूल उड़ रही, माथे उसे लगाते.



गीतगोविन्दं : जयदेव 
नामसमेतं कृतसंकेतं वादयते मृदुवेणुं.
बहु मनुतेsतनु ते तनुसंगतपवनचलितमपि रेणुं ....

-- अरविंद  पाण्डेय



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Here, suddenly, silent sun disappeared..

· अरविन्द पाण्डेय


Here, suddenly, silent sun disappeared,
Chirping birds astonished abruptly and feared.

Wild winds came to welcome weary woods.
And, returned to me with dusty goods.

Roaring clusters of clouds are dropping,
Dashing pellets of rain with a sound of throbbing. 

I witness, how darkness draggles and leaves the light behind,
If clumsy clusters of clouds, cover the human mind.

Aravind Pandey


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त्याग गुरुत्वाकर्षण,मन,अम्बर में तैर रहा है.

· अरविन्द पाण्डेय


१ 
पूर्ण चन्द्र हैं , शुभ्र चंद्रिका नृत्य-निरत अविराम.
अम्बर में अशेष तारक-गण हैं विकसित अभिराम.
त्याग गुरुत्वाकर्षण , मन, अम्बर में तैर रहा है .
धरती और गगन में कोई अंतर नहीं रहा है.

२ 
घन-प्रकाश अब ,पिघल,ज्योति-सरिता बन,बह निकला है.
कल कल करती कला चन्द्र की , परमानंद-फला है.
दृश्य, श्रव्य, संस्पर्श-योग्य, सब एक तत्त्व में परिणत.
शुद्ध,  एकरस सत्ता दीपित,  है  अभेद अव्याहत.

३ 
टूट गया देहाभिमान, अब द्वैत मिटा माया का.
शुष्क-पत्र सा गिरा,उड़ गया भान,मृषा छाया का.
सत्य,सत्त्व-घन ब्रह्म शेष,चिन्मय,चिद्घन,निष्कल है 
एकमेव है, अद्वितीय है , अप्रमेय , अविकल है.





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तोड़ेगा,अब,इस बार, लाजपत राय, तुम्हारी लाठी को.

· अरविन्द पाण्डेय


स्वामी  जी  के  साथ अरविंद पाण्डेय .
मुजफ्फरपुर.बिहार.२००८
------------------- 
 

१ 
तोड़ेगा अब, इस बार, लाजपत राय, तुम्हारी लाठी को .
इस बार हिरन का बच्चा भी पटकेगा पागल हाथी को.
तुम मत समझो जनता अब आंसू-गैस देखकर रो देगी .
इस बार तिरंगा लेकर फिरते नौजवान की जय होगी.

2
अब और न होगा फिर शहीद अनशन से यहाँ जतीन्द्र नाथ.
हम तुम्हे करायेगें अनशन,रिश्वत को,गर,फिर बढे हाँथ. 
है समय अभी,अब बदलो तुम, अपने अपवित्र विचारों को.
अब सहन नहीं कर पाओगे, अपनी कृपाण की धारों को.

3
हम जिएं गरीबी रेखा के नीचे , तुम पांच सितारा में,
हर रोज़ शाम को नहलाते खुद को, मदिरा की धारा में.
हमको अपना चेहरा धोने को स्वच्छ-सलिल के लाले हैं.
तुम अपने चेहरों को रंगते जो भ्रष्ट-कर्म से काले हैं.

४ 
हम पैदल चलते जब सडकों में, दुर्घटना में मरते हैं.
तुम उड़कर जाते हो विदेश,स्विस-बैंक तुम्हीं से भरते हैं.
चीनी,जापानी मालों से भरता बाज़ार हमारा है.
काला-सफ़ेद जो भी धन है , वह बाहर जाता सारा है.

५ 
अब परदे के पीछे से शासन नहीं चलेगा भारत का. 
यह है अशोक-अक़बर की धरती,छोडो शौक़ तिजारत का.
तुमने,भारत में ही रहकर,गांधी का है अपमान किया.
अब छोड़ चले जाओ खुद, रहना है तो सीखो नौलि-क्रिया.

६ 
ईमान सहित जीने की खातिर सीखो प्राणायाम यहाँ.
तुम सांस ले रहे यहाँ,किन्तु ,क्यूँ भेज रहे संपत्ति वहां.
कुछ डरो क़यामत के दिन से,जब न्याय करेगा परमेश्वर.
उस वक़्त तुम्हारे साथ न  होगी. साथ यहाँ  है जो लश्क़र.

७.
हर प्रश्न वहां  बेरोक-टोक, तुमसे ही  पूछा जाएगा .
उत्तर देने को कोई प्रवक्ता, वहां नहीं फिर आयेगा.
बेलौस कुफ्र करने वाले पहले से दोज़ख में होगें.
जो यहाँ नेक-नीयत हैं वे जन्नत में घूम रहे होंगे. 
  

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''सेना'' की आवश्यता क्या ,सेनाएं सभी हमारी हैं.

· अरविन्द पाण्डेय


''सेना'' की आवश्यता क्या  ,सेनाएं सभी हमारी हैं.
जल,थल,अम्बर में शान्ति हेतु अपनी पूरी  तैयारी है.
ये पुलिस,अर्ध-सैनिक बल भी अपनी रक्षा के लिए बने  .
तुम बढ़ो अहिंसा के पथ पर , नेतृत्व इसे अपना देने .

निज संविधान में,हम भारत के लोगों ने उपबंध किए.
जो विधि-विधान का अनुसारी,वह जन,बिलकुल स्वच्छंद जिए.
निर्वाचन अपना कुरुक्षेत्र, मतदान शस्त्र अपना घातक . 
फिर, करो प्रतीक्षा धीर,बढ़ो पथ पर,विवेक के साथ,अथक.

यह  देश, कृष्ण के कर्मयोग की श्वास लिए जीवन जीता .
अमिताभ बुद्ध के आर्य-सत्य का जल,प्रतिदिन सुख से पीता.
इस्लाम हमारा है शरीर ,  वेदान्त हमारी आत्मा है.
इस  दुनिया में हमने देखा जन-जन में बस,परमात्मा है.

हमलोग मनुज में प्रकट हुए परमात्मा का पूजन करते .
अस्तेय,अहिंसा ,सत्य ,शौच ,अपरिग्रह को धारण करते.
कण-कण,जन-जन हो भय-विमुक्त,बस यही हमारी  निष्ठा है.
बस, इन्हीं गुणों से विश्व-मंच पर अपनी दीप्त प्रतिष्ठा है.


-- अरविंद   पाण्डेय     
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हर लाठी जो सत्याग्रह पर चलती,गांधी को लगती है.

· अरविन्द पाण्डेय


फिर भी, तुमने हमसे डर कर ,
हिंसा का कहर उतारा है.
===================



इतिहास साक्षी है इसका ,
सत्ता की लाठी से अक्सर, 
जागा करता है शेष-नाग,
होकर, पहले से और प्रखर .


पर, हर भ्रष्टाचारी खुद को,
बस अपराजेय समझता है.
लाठी-बंदूकों के बल पर 
उठ कर, मिट्टी में मिलता है.


जो संविधान स्वीकार किया 
था हम भारत के लोगो ऩे.
उसको ही लाठी से घायल 
है किया,निडर,फिर से,तुमने.


हर लाठी जो सत्याग्रह पर 
चलती ,गांधी को लगती है.
गांधी जब घायल होता है,
भारत की आत्मा जगती है.


तुमने तो अब अनजाने ही ,
सोए भारत को जगा दिया.
अब तुम्हें भगा, दम लेगें हम,
अंग्रेजो को ज्यूँ भगा दिया.


भारत के पैसों को जब तुम,
स्विस बैंकों में रख आते हो.
हम उसे माँगने निकले हैं,
तो हमको ही धमकाते हो  .


हमने तुमसे अनुमति लेकर ,
सत्याग्रह था प्रारम्भ किया.
जब तुम इतना डरते थे,फिर,
दिल्ली क्यूँ आने हमें दिया.


जब शस्त्र-हीन सम्मलेन का  ,
मौलिक अधिकार हमारा है.
फिर भी, तुमने हमसे डर कर ,
हिंसा का कहर उतारा है.

दुनिया के देशो से भारत
 जो  कर्ज़ मांगता फिरता है .
तब , तुम जैसे गद्दारों के ,
चेहरों  पर फूल महकता है.


तुम लाठी गोली रखते हो ,
हम अपना सीना रखते है.
रौंदों जितना तुम रौंद सको,
है शपथ तुम्हें, हम कहते हैं.

सीने पर गोली अगर चली ,
वह लौट तुम्हीं को छेदेगी
अपना सीना लोहे का है,
गोली अपना क्या कर लेगी.

अब देख, भयंकर शेषनाग 
से भारत ने  ललकारा  है -
जो धन रक्खा स्विस बैंकों में,
वह सारा, सिर्फ हमारा है.


-- अरविंद पाण्डेय 

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हरिक लड़की,अगर ताकत है,फिर देवी सी दिखती है.

· अरविन्द पाण्डेय



अकेले वो पडा करता है जो कमज़ोर होता है.
ये जो कमज़ोर,वो लड़की या फिर लड़का नहीं होता.
हमारे मुल्क में ही हैं करोड़ों लडकियां ऐसी .
कि जिनके सामने ''लड़का'' हो पर,''लड़का'' नहीं होता.

हरिक लड़की, अगर ताकत है, फिर देवी सी दिखती है.
अगर ''औरत'' का हो कुछ फख्र,फिर,तकदीर लिखती है.
हरिक चौराह पर लडके उसी का ज़िक्र करते हैं.
हरिक महफ़िल में बस उसकी हसीं  तस्वीर सजती है.

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सावरकर को शत बार नमन.

· अरविन्द पाण्डेय




अंग्रेजों के वक्षस्थल पर जो गरज उठा - हम हैं स्वतंत्र .
''अत्याचारों के नाश हेतु अब क्रांति उचित''-का दिया मन्त्र.
अपनी बन्दूको से फिर तो थी बरस  उठी गोली घन घन.
उस अमर विनायक दामोदर सावरकर को शत बार नमन.

-- अरविंद पाण्डेय 

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I honored them with my lips.

· अरविन्द पाण्डेय



Today, in the warm noon,
You touched me with powerful innocence.
I feel embraced by summer flowers ,
 full of sweet essence.

I looked at your sandal colored feet,
enriched by rosy strips.
And, in my fancy, 
I honored them with my lips. 

-- Aravind Pandey 

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जब विनष्ट हो जाएगी यह छाया...

· अरविन्द पाण्डेय


पृष्ठ - दो 

५ 
धीरे धीरे श्रान्त सोम ने ढीला किया करों को.
करके समुपभोग सरिता का, वह चल पड़ा क्षितिज को.
तभी, उषा-मुख दर्शन को रवि ने अवगुंठ उठाया.
वह आरक्त हो उठी पाकर , मधु-स्पर्श प्रियतम का.

६ 
चारु-चन्द्र प्रतिबिम्ब मात्र अब पड़ता था सरिता में.
किन्तु,चित्र ही पाकर, वह,उसको शशि समझ रही थी.
होता है प्रतिबिम्ब  मृषा ही,पर , विपरीत यहाँ है.
प्रतिबिम्बों को सत्य मान सब, अनुधावन करते हैं.

७
काम-विमोहित सरिता प्रतिपल तन को तनिक उठाकर.
रजनीपति-प्रतिबिम्ब पकड़ कर,आलिंगन करती थी.
मानों,कामासक्त कामिनी, मात्र चित्र लिपटाए.
प्रिय की मधुर याद में सुध-बुध खोए,शांत  पडी हो.

८ 
स्वाभाविक गति भूल, आज प्रतिबिम्बों के ही पीछे.
किंकर्तव्य-विमूढ़, विश्व का नर भागा जाता है.
किन्तु,अंत में जब विनष्ट हो जाएगी यह छाया.
पश्चात्ताप मात्र रह जाएगा मनुष्य के कर में.

(यह कविता मैंने सत्रह वर्ष की आयु में लिखी थी..अब , इसे पढ़कर , साश्चर्य मंद-स्मित, मुझे विमुग्ध सा करता है..)

-- अरविंद पाण्डेय .

शब्दार्थ:

मृषा = मिथ्या 
अवगुंठ=घूँघट
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मंद मंद बह चला समीरण..

· अरविन्द पाण्डेय


(यह कविता १४/०७/१९८० को लिखी गई थी जो आठ छंदों में है और मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ'' में प्रकाशित है..)
----------------------------------------
पृष्ठ - एक
१ 

सरिता का आलिंगन करने नील, सुदूर गगन से.
उस प्रशांत रजनी में शशि, धरती पर उतर पडा था.
अतुलनीय,अमिताभ देह की शुभ्र कांति बरसाकर.
उसने गतिमय सरिता को भी शाशिमय बना दिया था.

२ 

मुक्ति प्राप्त कर रवि की शोषक,संतापक किरणों से.
विहँस रही थी मंद मंद वह अपनी प्राकृत विजय में.
वर्तमान-सुख के सागर में डूबी - उतराई सी.
विगत दुखों को भूल, एक विस्मय सी बनी हुई थी.

३ 

अहं भूलकर, प्रिय के आलिंगन के सुख में डूबी.
उसके चंचल मृदुल करों से मस्त केलि करती थी.
कुमुद-वृन्द के वस्त्र हो रहे अस्त-व्यस्त प्रतिपल थे.
सकल सलिल अनुरागानिल से उर्मिल , अनुकंपित था.

४

मंद मंद बह चला समीरण उनको कम्पित करता .
लगा गान करने सरिता का रोम-रोम कल स्वर में .
शुभ्र कौमुदी के प्रकाश में उस रसमय रमणी का  .
अंग अंग परिरम्भ-राग से अनुरंजित दिखता था.


( क्रमशः )


--अरविंद पाण्डेय 




सलिल = पानी 
 अनुरागानिल = प्रेम की हवा 
 उर्मिल = लहराता हुआ 
परिरम्भ-राग = आलिंगन का रंग 

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मात्र मैं ही हूँ जग की शक्ति..

· अरविन्द पाण्डेय


स्वप्न :पृष्ठ ९ 
=======

४५ 
''पूर्ण वसुधा में है परिकीर्ण,
दुःख-सम्मिश्रित सुख का जाल.
अतः,इनमे रहता जो तुल्य,
लांघता वह संसृति का जाल.''

४६ 
''सतत निस्पृहता से जो व्यक्ति,
नित्य करता रहता सत्कर्म.
वही है योगी की प्रतिमूर्ति,
उसी में बसा वास्तविक धर्म.''

४७ 
''हलाहल पीने के भी बाद,
बना रहता है जिसका स्वत्व.
महायोगी पशुपति के तुल्य,
प्राप्त करता है वही शिवत्व.''


४८ 
''कामना का आच्छादन भेद,
प्राप्त करता है नर,सत्त्व.
शीघ्र ही ताज माया निर्मोक,
जान लेता वह मेरा तत्त्व.''

४९  
''चतुर्दश विद्याओं के बीच,
एक मेरा स्वरुप है व्याप्त.
सतत विद्यार्जन में संलग्न,
मनुज मुझको करता है प्राप्त.''

५० 
''मात्र मैं ही हूँ जग की शक्ति,
शक्त जो होता है निष्काम.
सूर्य-मंडल को भी वह भेद,
देख लेता मत्पथ उद्दाम .''

५१ 
''याद रखना ये मेरे शब्द,
वत्स, हे मेरे प्रियतम शिष्य.
देख मचला जाता प्रत्यक्ष,
मोदमय तेरा कान्त भविष्य.''

५२ 
तभी वह मृदुला वत्सल मूर्ति,
हो गई सहसा अंतर्धान.
दानकर मुझे प्रेम-संलिप्त,
एक पावक समदृश  शुचि ज्ञान.

--------------------------

स्वप्न शीर्षक  ५२ छंदों की इस काव्यमाला का यह अंतिम पुष्प था..

-- अरविंद पाण्डेय 

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पान करता था, रूप-मरंद .

· अरविन्द पाण्डेय


मुख-कमल का बस, मैं, बन, भृंग ,
पान करता था, रूप-मरंद .
========

स्वप्न :पृष्ठ ८ 
=======


३७
खडा था मैं आनंद-विभोर,
चपल मन के सब पट थे बंद.
मुख-कमल का बस, मैं, बन, भृंग ,
पान करता था, रूप-मरंद .

३८
 तभी, माँ,मधुराधर को खोल,
मृदु वचन बोलीं, मुझे निहार.
बह उठी थी मानों सर्वत्र,
सुधाकर से अमृत की धार--

३९  
'' क्रांत-दर्शी कवि-दृष्टि समान,
नहीं है मेरा कोई अंत.
व्यापता है बस जग में नित्य,
एक मेरा ही रूप अनंत.

४० 
''गगन के ये सुन्दर श्रृंगार,
सूर्य,तारक,एवं शशकांत.
प्राप्त कर, मेरी एक मरीचि,
सदा हंसते हैं, होकर कान्त.''

४१ 
''मधुर मेरे विहसन के संग,
मुदित हँसने लगती है सृष्टि.
तनिक, यदि',  मुझको आता क्रोध,
प्रलय की होने लगती वृष्टि .''

४२
''देखकर मेरा दिव्य-स्वरुप,
भक्ति में परिणत होता ज्ञान.
सिद्ध योगी में भी तत्काल,
सृष्ट होता मेरा संधान .''

४३
''बुद्धि-अनुशासित-मानस बीच,
सतत, मैं करती मोहक लास्य.
क्रोध-विरहित-मानव ही मात्र,
देख सकता है मेरा हास्य.''

४४
''काम-आसक्त मनुज को शीघ्र,
नष्ट करता है उसका क्रोध.
काम से मानव का राहित्य,
दान करता है उसे सुबोध .''

क्रमशः 

-- अरविंद पाण्डेय 

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स्नेह-रस-पूर्ण सिन्धु से नेत्र..

· अरविन्द पाण्डेय


''तभी,सस्मित हो, मेरी ओर,
मुझे, देखा   माँ ने सस्नेह.'''
============

स्वप्न :पृष्ठ ७  
=======
३१ 
नासिका पर शोभित छवि-धाम.
एक लोहित मणि की नव-कील.
राग-रंजित संध्या के संग,
रमण करता ज्यों सूर्य सलील.

३२ 
स्नेह-रस-पूर्ण सिन्धु से नेत्र,
फेकते थे अनुराग-तरंग.
निरंतर, मातृ-विरह से शुष्क,
भीगते थे मेरे सब अंग.

३३.
विश्व में विस्तृत सब सौन्दर्य,
हो गया था मानों साकार.
गात के रोम रोम से नित्य,
बह रही थी करुना की धार.

३४ 
सौम्य करता था मुख का क्षेत्र,
मूर्त होकर चिन्मय वेदान्त.
त्याग देते योगी भी योग,
देख पाते यदि वह मुख, कान्त.


३५ 
शांत देवी की स्नेहिल दृष्टि,
घूम जाती थी जब,जिस और.
बिखरता था प्रसाद सर्वत्र ,
सृष्टि में हो जाती थी भोर.

३६ 
तभी,सस्मित हो, मेरी ओर,
मुझे, देखा   माँ ने सस्नेह.
एक स्वर्गीय शक्ति से पूर्ण,
हो गई मेरी सारी देह.


क्रमशः 

-- अरविंद पाण्डेय 

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एक मंजुल नारी की मूर्ति,

· अरविन्द पाण्डेय

भगवती राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी   
------------------------------
स्वप्न :पृष्ठ ६ 
=======
२६ 
तभी गैरिक प्रकाश का पुंज,
लगा घनता को होने प्राप्त.
एक मनमोहक मधुर सुगंध,
लगी अंतर  में होने व्याप्त.

२७ 
एक मंजुल नारी की मूर्ति,
 दिखाई पडी मुझे तत्काल.
चरण-चुम्बन से परम प्रसन्न,
विहँसता था गुलाब  का जाल.

२८ 
गात पर था पुष्कल परिधान,
आ रहा था अरुणाभ प्रकाश.
उषा-कर में मानो रवि,बंद,
कर रहा था आनंदित हास.

२९ 
सुलाक्षा-ललित चरण-नख-वृन्द,
कर रहे थे यह सुन्दर व्यंग-
रागमय होने के पश्चात ,
प्राप्त होता है उनका संग.

३०
कोकनद-कान्त अधर के बीच,
झांकती थी रदालि मुक्ताभ.
यथा, अनुराग-सरोवर मध्य, 
खिले हों शेत कमल, अमिताभ.

क्रमशः

---अरविंद पाण्डेय 
============

गैरिक = गेरुआ रंग का.
पुष्कल = अत्यंत श्रेष्ठ .सुन्दर.
उषा-कर = उषा की किरणे 
सुलाक्षा-ललित नख-वृन्द = नाखून में लगाने वाले रंग से सुन्दर बनाए गए नाखून .
कोकनद = लाल कमल 
रदालि = दांतों की पंक्ति .
मुक्ताभ = मोती जैसी आभा वाली.

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श्रीराम-कार्य-कौशल-प्रवीण हनुमान ..

· अरविन्द पाण्डेय



श्री श्री हनुमज्जयंती :
=============

श्रीराम-कार्य-कौशल-प्रवीण,हनुमान, स्वर्ण-पर्वताकार.
 पुरुषार्थ-विजित-सागर विशाल,विदलित-रावण मुष्टिक-प्रहार.
हुंकार-मात्र-रण-विजय-दक्ष,दानव-दल-विदलक प्रतीकार.
प्रज्ञान-सिन्धु, अज्ञान-तिमिर-नाशक,अखण्ड-मंडलाकार .

-- अरविंद पाण्डेय 


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पुष्प से कंटक का संयोग..

· अरविन्द पाण्डेय

पुष्प से कंटक का संयोग
===========

स्वप्न :पृष्ठ ५  
---------------------
२१ 
मनुज का सत्त्व-संवलित कर्म
सतत करता है आत्म-विकास.
तथा गंतव्य दिशा की और 
दिखाता है वह अमल प्रकाश.

२२ 
प्रभा से पा विकास का लाभ,
कर्म होता है परम अमंद.
कर्म-पूर्णत्व-प्राप्ति पश्चात,
मनुज पाता है परमानंद.

२३ 
पुष्प से कंटक का संयोग,
कर रहा था यह वाणी सिद्ध-
'''मनुज का जीवन यह सुकुमार,
विपुल विघ्नों से है आविद्ध.''

२४ 
''सभी कंटक का जब कर नाश,
वीर सा करता है सत्कर्म,
प्रकृति करती है तब साहाय्य,
साथ देता है उसका धर्म.''

२५ 
वहीं पर एक वृक्ष के पास,
रुदन करता था अफल अनंग.
सत्त्व-गुण मध्य गमन से आज,
हो गया था उसका मद-भंग.

--- अरविंद पाण्डेय 

क्रमशः 
=================
शब्दार्थ 
अनंग=कामदेव.
आविद्ध=घिरा हुआ.
अमंद= बाधा से मुक्त 
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पुष्प-परिमल-सुरभित पवमान

· अरविन्द पाण्डेय


स्वप्न :पृष्ठ ४ 
---------------------
१६ 
पुष्प-परिमल-सुरभित पवमान ,
ह्रदय में करता था मद-सृष्टि.
अहा , वह मादकता भी आज,
सत्त्व-गुण की करती थी वृष्टि.

१७ 
एक शुचि-सलिला सरिता शांत,
बही जाती थी वहां सवेग.
हमें देती थी मानो सीख-
कभी मत रोको जीवन-वेग.

१८ 
फलाशा ईश्वर पर ही छोड़,
सदा हो स्वस्य-कृत्य में लीन.
प्रकृति फल देगी तुम्हें अवश्य,
वह सदा है अन्याय विहीन.

१९ 
एक धवलाम्बु-सरोवर मध्य,
खिले थे रक्त-सरोज सहस्र.
भक्त के उर में ज्यों प्रभु हेतु,
बह रहा हो अनुराग अजस्र .

२० 
पूर्ण- विकसित गुलाब के पुष्प,
प्रकट करते थे यही रहस्य.
''मनुज के जीवन का आनंद ,
नहीं रखता है केवल कश्य.

 क्रमशः 

-- अरविंद पाण्डेय 

=======================
कश्य = शराब.
धवलाम्बु-सरोवर = स्वच्छ जल वाला तालाब.
अजस्र = निरन्तर
पुष्प-परिमल = फूलों की सुगंध.

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मन रे जपो जय राम

· अरविन्द पाण्डेय




श्री रामनवमी के महापर्व पर
प्रभु श्री राम की उन्हीं के पुत्र द्वारा
स्वर-सेवा.
===========
मन रे जपो जय राम.
जय जय राम.
मन रे जपो जय राम.

राम नाम है पाप-विनाशक
देता हरि का धाम
मन रे जपो जय राम
१ .
विमलबुद्धिदायक सुखदायक रघुनायक प्रभु राम.
जय जय राम .
नीलकमल-सम-नयन-समुज्ज्वल .
ध्यान करो शुभ-धाम.

मन रे जपो जय राम.
२
सजल-जलद-सुन्दर-तनु-शोभित, सकल-भुवन-आधार .
शंख-चक्र-वर-अभय लिए जो पालें सब संसार.
मन रे जपो जय राम .
जय जय राम.
मन रे जपो जय राम.
३
नाम लिया तो गया अजामिल भव-सागर के पार .
कलि में राम भजन की साधो .
महिमा अमित अपार.

मन रे जपो जय राम .
जय जय राम.
मन रे जपो जय राम.
===========

Worship by Voice to My Lord
Shri Ramchandra
on His Birthday :
Ram Navami .

अरविंद पाण्डेय 

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स्वप्न-चलचित्र चला तब चारु.

· अरविन्द पाण्डेय

स्वप्न :पृष्ठ 3
११ 
विश्व-विजयी निद्रा से ग्रस्त,
सो रहे थे कुछ नर, जग भूल.
प्रिया-विरहित कुछ दुखित मनुष्य,
सहन करते थे उर में शूल.

१२ 
कल्पना का यह सुन्दर लोक,
देखकर मन था अति सानन्द.
कि सहसा, निद्रा-सुख अनुरक्त.
हो गईं मेरी आँखें बंद.

१३ 
स्वप्न-चलचित्र चला तब चारु,
झर रहा था प्रमोद-पानीय.
दृश्य जो देखा रुचिर नितांत,
नहीं है वह वाणी कथनीय.

१४ 
एक विस्तीर्ण क्षेत्र के मध्य ,
खडा मैं किंकर्तव्य विमूढ़.
देखता था होकर साश्चर्य,
प्रकृति का वह परिवर्तन गूढ़.

१५ 
वहां के कण कण में थी व्याप्त,
सत्त्व-गुण सर्जक गैरिक कान्ति.
शून्य में अतुल शून्यता तुल्य,
चतुर्दिक फ़ैली थी शुभ शान्ति.

क्रमशः 

-- अरविंद पाण्डेय 



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सप्तऋषि का प्रशांत आलोक.

· अरविन्द पाण्डेय

स्वप्न :पृष्ठ २ 
६ 
धरा का करता था श्रृंगार,
चंद्रिका का सुन्दर विक्षेप.
यथा ,करती है इश्वर-भक्ति,
बुद्धि पर सत्त्व-वृत्ति का लेप.
७ 
निशा-मंडित अनंत-श्रृंगार 
कर रहे थे तारक के पुंज.
वासनामय अंतर के बीच,
खिल रहा हो ज्यों प्रभु-रति-कुञ्ज.
८ 
कर रहा था विलसित ईशान,
सप्तऋषि  का प्रशांत आलोक.
सप्त-सुर ज्यों हों तप में मग्न,
छोड़, सुख का दुरंत निर्मोक.

९ 
शांत रजनी में सभी मनुष्य ,
चाहते थे सुख का संयोग.
रसिक, रति में थे अति सलग्न ,
सिद्ध करते थे योगी, योग.

१० 
जागरण-रत कविवृन्द  अजस्र ,
काव्य-रस पीने में थे मस्त.
काममय मर्त्य प्रिया-परिधान,
कर रहे थे नित अस्तव्यस्त .

क्रमशः 

यह  पांच छंद-समूह, कल से प्रारंभित, मेरी स्वप्न शीर्षक  लंबी कविता का द्वितीय प्रक्रम है ..एक बार , स्वामी विवेकानन्द और अपने संबंधो के विषय में चर्चा करते हुए  भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस ने बताया था कि स्वामी विवेकानन्द सप्तर्षियों में से एक ऋषि थे जिन्होंने श्री भगवान के आदेश पर, मानव रूप में जन्म लिया  था.एवं स्वयं श्री रामकृष्ण परमहंस ईश्वरावतार थे..आज की कविता में सप्तर्षि का उल्लेख था और इससे सम्बंधित छंद लिखते समय स्वामी जी का स्मरण हुआ तो उन्ही का चित्र इस कविता के साथ संसक्त कर दिया है..

-- अरविंद पाण्डेय 


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निशा का मनमोहक सौन्दर्य

· अरविन्द पाण्डेय


स्वप्न :पृष्ठ १  


१ 
ललित रजनी का मृदु परिरंभ, 
ले रहे थे समोद शशकांत .
यथा नारी को भोग्या मान,
रमण करता है मानव, भ्रान्त.
२ 
कुमुद के विकसित सुन्दर पुष्प,
कौमुदी का पाकर संयोग,
मधुर यौवन रस का साह्लाद, 
कर रहे थे अशंक उपभोग.
३
भूलकर अपना निकट भविष्य,
वासना के सागर में मग्न.
शीघ्र ही तल-स्पर्श के हेतु,
कुमुद, शशि थे प्रयत्न-संलग्न.
४ 
निशा का मनमोहक सौन्दर्य,
पी रहे थे रसमय रजनीश .
यथा माया आकर्ष देख,
भूल जाता है नर को ईश.
५ 
प्रकृति को पाणि-पाश में बाँध ,
चपल शीतल सुरभित पवमान .
प्रणय में अन्य कर्म को भूल,
सतत करता था सुमधुर गान.

क्रमशः 



५२ छंदों  में लिखी गई '' स्वप्न '' शीर्षक यह  कविता मैंने २/४/१९७९ से प्रारम्भ कर ८/४/१९७९ को पूर्ण की थी.यह मेरे एक स्वप्न-दर्शन पर आधारित है..जिसको मैंने अक्षरशः सत्य घटित होते हुए पाया है.उस समय मै , कालिदास , भारवि, दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त,पन्त, निराला , महादेवी आदि कवियों का साहित्य नियमित पढ़ रहा था..और मेरे मन में, कविता को उसी रूप में सृजित करने की प्रेरणा होती थी जो संकृत की गंगोत्री से प्रवाहित शास्त्रीय हिन्दी के रूप में  अभिरूप पदों से सुमधुर हो ..
इसमे मेरी शैली, मुझे  हिन्दी-कविता के उस स्वर्णयुग का स्मरण कराती  है जब हम यह  कह सकते थे कि हिन्दी कविता भी विश्व-कविता की पंक्ति में , समान स्थिति में, ,स्वाभिमान के साथ, अपनी उपस्थिति का बोध करा सकती है.

यह कविता , प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ '' में सम्मिलित है..

-- अरविंद पाण्डेय 
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गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़,मधु यावत् पिवाम्यहं.

· अरविन्द पाण्डेय


गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ , मधु यावत् पिवाम्यहं.
मया त्वयि हतेsत्रैव गर्जिश्यन्त्याशु  देवताः 

(श्री दुर्गासप्तशती में  जगन्माता का वचन )
====================
=============
जब ऋत का सुरभित स्वर्ण कमल खिलता है.
जब अजा और अनजा का ध्रुव मिलता है.
जब भेद, ज्ञान-अज्ञान बीच मिटता है.
तब महाकालिका का नर्तन दिखता है.


जब प्रभा पिघलकर, धरा सिक्त करती है.
जब धरा , वाष्प बन शून्य-गगन भरती है.
जब पुष्प-गन्ध, बादल बनकर झरती है.
तब कृष्णा , चिन्मय नृत्य मधुर करती हैं.

जब प्रकृति-पुरुषमय जगत शून्य होता है.
जब निरानन्द , आनन्द-रूप होता है.
जब , अविज्ञान , विज्ञान-तुल्य होता है.
तब. जगदम्बा का कमल-नयन खिलता है.

जब वेद-अवेद-भेद का भ्रम कट जाता 
जब महासिन्धु , बस एक विन्दु बन जाता 
जब एक विन्दु , बन महासिन्धु लहराता.
तब ब्रह्मचारिणी का प्रकाश-घन छाता.


--- अरविंद पाण्डेय 


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शिव सुन्दर सहस्र - दल पद्म.

· अरविन्द पाण्डेय


द्वितीयं ब्रह्मचारिणी 
=============
करोतु श्रीविन्ध्यनिवासिनी शुभं 
===========

कनक-कमल-किसलय के पुट में,
माँ ! रख,  रवि का अरुणिम रंग.
ह्रदय-पटल पर मैं खीचूँगा ,
तेरा करुणामय मुख - अंग .

विश्व कहेगा तब विस्मय से ,
अहा प्राणमय यह नव-चित्र .
कब, कैसे तुमने खींचा है ,
कहो , कहो,  हे मेरे मित्र.

तब तो अपने विश्व-रूप का
कथन,  सत्य करने के हेतु.
निज-मंदिर से मेरे उर तक.
माँ , तुम रचित करोगी सेतु.

मेरा, चिर- सुषुप्ति से विजड़ित,
शिव सुन्दर सहस्र - दल पद्म.
माँ, तेरे चिन्मय विलास का,
बन जाएगा शाश्वत सद्म.




  स्वर्णिम-स्वप्न-मयी कल्पना से सुगन्धित माँ की यह स्तुति मैंने १०/०६/१९८३ को जगन्माता को अर्पित की थी जो मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ '' में प्रकाशित है..आज नवरात्र महापर्व की द्वितीया को पुनः माँ के चरणों में समर्पित करता हूँ..

-- अरविंद पाण्डेय.
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काली के तब, मृदु-अधर गुनगुनाते हैं.

· अरविन्द पाण्डेय


प्रथम-दिवस नवरात्र का.

ॐ 

विन्ध्यस्थां विन्ध्यनिलयां विन्ध्यपर्वतवासिनीं.
योगिनीं योगजननीं  चंडिकां प्रणमाम्यहं .

==============
जब  कण  कण अपने  कारण  में  मिलता  है .
अस्तित्व,  काल का भी,  जिस  क्षण हिलता है.
जब खंड खंड हो , देश, शेष  हो  जाता .
तब, जगदम्बा का मुक्त केश लहराता.

जब सूर्य, शून्य बनकर सत्ता-च्युत होता.
जब महाप्रलय-जल, कृष्ण-चरण को धोता.
जब द्वैत, दृश्य-द्रष्टा का  मिट जाता है.
तब, माँ के मुख पर मधुर हास्य  छाता है.

जब घन-प्रकाश, तम में परिणत होता है.
जब तम भी अपनी सत्ता खो देता है.
जब महाविष्णु भी निद्रित हो जाते हैं.
काली के तब, मृदु-अधर गुनगुनाते हैं.

जब, सारी पृथ्वी,  जल में घुल जाती है.
जब , जल-सत्ता, पावक में मिल जाती है.
जब, पावक भी, पवमान स्वयं बनता है .
तब, महाप्रकृति का कमल-नयन खिलता है.

--  अरविंद पाण्डेय 

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..अफज़ल का विकेट जब गिरे फांसी के तख़्त पर.

· अरविन्द पाण्डेय



इस विश्व-कप का जश्न तब मनेगा मेरे घर.
अफज़ल का विकेट जब गिरे फांसी के तख़्त पर.
अफ़ज़ल,कसाब हैं असल जांबाज़ बल्लेबाज़.
जो, कर सको, करो ज़रा इनको भी कुछ नासाज़ .

===============

एक ''मैच'' था हुआ कारगिल में, पहले कुछ साल.
गिरे पांच सौ ''विकेट'' हमारे, धरती पूरी लाल.
''मैच'' हुआ फिर ''फिक्स'',और दोनों दल थे खुशबख्त .
दिया बहत्तर घंटे तक वापस होने का वक्त.


अफ़ज़ल और कसाब उन्हीं के ऐसे ''बल्लेबाज़''.
''विकेट'',जिन्हें दो सौ तक का,लेने का अब भी नाज़.
मगर उन्हें '' बाहर '' करने के खतरे का जो मोल,
कैसे, कौन चुकाए, हैं खामोश सभी के बोल.


इसी तरह, अक्साईचिन का ''क्रिकेट मैच'' हम हारे.
बासठ में चीनी सेना के हाथों बने बेचारे.
सैन्य-कारखाने में बनना बंद हुआ हथियार .
युद्धाभ्यास छोड़, हमने था किया शांति-व्यापार.


पञ्चशील के भ्रम में, जब हम शान्ति सहित सोते थे.
उसी समय, उनके सैनिक , हथियारों को ढोते थे.
तभी, अचानक ''मैच'' हुआ घोषित चीनी सेना का .
 क्रीडा-दक्ष सजग हो खेला करता सदा शलाका.

हम तो  खुदमुख्तार और आज़ाद वतन कहलाते.
पर, अपनी ही सीमा पर, जब जब भी, हम हैं जाते.
पूछा करते हैं अधिकारी अपने दोस्त वतन के.  
''अरुणाचल में क्यों प्रधानमंत्री आये भारत के .''


यहाँ सभी हैं विकेट,क्रिकेट, बल्लेबाजी में अटके.
ताकतवर बनने का रास्ता छोड़, नौजवां भटके.
और,श्रेष्ठ रहनुमा यहाँ छल-छद्मों में मशगूल.
ताज,मुंबई,कन्दहार,संसद हमले को भूल.
==================

जिस मुल्क में गेंदों से  जीतने पे जश्न हो.
कंधार-कारगिल पे, पर, कोई न प्रश्न हो.
उस मुल्क की मासूमियत को देख, देख कर .
दहशत-पसंद दिल को भला, क्यूँ न तश्न हो.


- अरविंद पाण्डेय        
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इसी के नूर में श्री कृष्ण ने गीता थी कही..

· अरविन्द पाण्डेय



मिटेगी सल्तनत, फटेगा आसमां इक दिन .
ये  शम्स ,चाँद सितारे बुझे बुझे होंगें. 
अगर बचेगा तो ईमान , आखिरत के दिन.
अगर  बचा सके उसे, तो, बच सकोगे तुम.

इसी के नूर में  श्री कृष्ण ने गीता थी कही.
इसी की रोशनी में आयतें उतरीं थीं कभी.
कुरआन , बाइबिल भी बस इसी से रोशन है.
इसी दरिया से कभी वेद  की ऋचा थी बही 


- अरविंद पाण्डेय
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तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.

· अरविन्द पाण्डेय




तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.

मृदु वसंत की शांत,सुशीतल पवन का मिले अभिनन्दन.
व्याकुलता-परिपूर्ण हृदय में अब हो ईश्वर का वंदन.
भेद, भीति ,भ्रम से विमुक्त हो सबका शिव-संकल्पित मन.
दिव्य-दीप्ति से दीपित देखे प्रतिजन, प्रतिपल ही प्रतिकण .

- अरविंद पाण्डेय
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रहता ज़मीं पे, दास्ताँ, आस्मां की लिखता हूँ.

· अरविन्द पाण्डेय



शायर हूँ मैं , गुज़रे बिना भी देख सकता हूँ.
रहता ज़मीं  पे, दास्ताँ, आस्मां की  लिखता हूँ.
चलते हैं सूरज ,चाँद भी मेरे इशारों पर.
तुमको  मगर इंसान का हमशक्ल दिखता हूँ.


- अरविंद पाण्डेय
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इस खेल से हर खेल का खिलना है रुक गया.

· अरविन्द पाण्डेय



वंदे मातरं !

इस खेल से हर खेल का खिलना है रुक गया.
एशियाड,ओलैम्पिक्स में ये सर है झुक गया .
जापान, कोरिया को जब मिलता है सौ खिताब.
दो-चार ले, किसी तरह बचता है अपना आब.



- अरविंद पाण्डेय
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फंदे को कब चूमा था भगत ने , न उन्हें याद.

· अरविन्द पाण्डेय



23 मार्च . 

जिस कौम की खातिर हुए शहीद, भगत सिंह.
उस कौम के बच्चे ही हैं तारीख से अनजान.
अभिषेक, शाहरुख का जनम दिन है जुबां पे .
फंदे को कब चूमा था भगत ने , न उन्हें याद.
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तू भी न ले इंसान की अब जान ऐ खुदा ..

· अरविन्द पाण्डेय



प्रकृति की विजिगीषा में आज,
है रमा नव-मानव का लक्ष्य .
मर्त्य-अमरत्व-भवन का एक,
 विलक्षण लगता है यह कक्ष .

प्रकृति का यह प्रदृश्य ब्रह्माण्ड.
कहाँ रखता है अपना अंत.
अल्प प्रश्नोत्तर - अज्ञ मनुष्य ,
प्रकृति-जय में है आशावंत !

उफनते सागर की उत्ताल 
तरंगों का यह भीषण खेल.
रोक सकता है क्या यह मूढ़ 
मनुज अपनी सब शक्ति उड़ेल.

सतत विपरीत क्रिया से त्रस्त
प्रकृति जब होती है अति-क्रुद्ध.
आज की प्रकृति-विजयिनी शक्ति 
भूल जाता है नर-उद्द्बुध.
=============

यह कविता मैंने २/७/१९७९ को लिखी थी..
जब मैं हाई स्कूल का विद्यार्थी था ..
एवं यह मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ ''में प्रकाशित है तथा मुझे अत्यंत प्रिय भी है.
==============
आज जापान, मानवता की वैज्ञानिक-प्रज्ञा के  सर्वश्रेष्ठ शिखर के रूप में सार्वभौम स्वीकृति प्राप्त कर चुका है..किन्तु वही  जापान, पृथ्वी  के चित्त में पल रहे भीषण क्रोध , महासागर की शीतल तरंगो के संभावित तप्त कोप  का पूर्वानुमान नहीं कर पाया और क्रुद्ध धरती एवं कुपित महासागर के समक्ष उन नगरों और नगरवासियों को दया की भिक्षा माँगने का अवसर भी नहीं मिल पाया जो उस क्रोध के प्रत्यक्ष कारण नहीं थे.
यह परिणाम हमें दुःख के  महासागर में डुबोता ही है मगर डुबोते हुए भी हमें '' सार्वभौम समानुभूति ''  एवं '' सार्वभौम संवेदनशीलता ''   ( Empathy ) का उपदेश भी दे रहा है .. 
समानुभूति सिर्फ मनुष्य या अन्य जीवित प्राणियों से ही नहीं अपितु समस्त प्रकृति से भी ..
 प्रकृति के उन क्षुद्र अवयवों से भी   जिनकी हम  अपने कथित विकास की प्रक्रिया को पूरा करने में उपेक्षा करते रहे है..
प्रकृति को भी कष्ट होता है जब हम उससे दान न मांग कर बलपूर्वक कुछ लेना चाहते हैं..
जिस महासागर ने अपनी प्रकुपित तरंगों से जापान को आहत किया है उसी  महासागर ने देह धारणकर, श्री राम के समक्ष प्रकट होकर , अपने वक्ष पर सेतु - निर्माण की स्वीकृति दी थी..
हम भारत के लोग सम्पूर्ण प्रकृति को चेतन देखते रहें हैं..ये दृष्टि अगर लुप्त होगी तो इसी दृष्टि को पुनः प्राप्त करने के लिए मानवता को भीषण त्रासदी से गुज़रना ना होगा..
मनुष्य के प्रति मनुष्य का संवेदनहीन होकर व्यवहार करना , कर्ता के लिए  संभव है, देर से प्रतिकूल परिणाम उत्पन्न करे परन्तु महाप्रकृति,अपने  विरूद्ध प्रकट संवेदनहीनता के परिणाम को विलंबित नहीं करेगी..
यह दुखद परिणाम, हमें इसी  संवेदनहीनता के कारण देखना पडा है जिससे बचने का  व्यपदेश उन तथागत बुद्ध ने किया था जिनकी अहिंसा की प्रबल तरंगों के सामने तथा जिनके विकसित कमल सदृश नेत्रों से निकलती हुई करुणा-सलिल-धारा में अभिषेक कर , खद्गोत्थित-हस्त अंगुलिमाल उनके चरणों पर गिर पडा था ..

नास्त्रादेमस ने कहा था जापान के बारे में कुछ .. 
उसका उल्लेख न करते हुए हम सभी परमात्मा से प्रार्थना करे उस सुन्दर, सुरभित, सुललित, सुपुष्पित , सुसलिल पृथ्वी की रक्षा के लिए जो अनंत श्री भगवान् के अवतार के समय उनके श्री चरणों के स्पर्श से  धन्य हुआ करती है ..
===================

प्रार्थना 
========  

तेरे लिए तो मौत-जिंदगी है बराबर.
इंसान के लिए मगर है ज़िन्दगी हसीन.
वैसे भी, जान ले रहा इंसान की इंसान.
तू भी न ले इंसान की अब जान ऐ खुदा

   ----अरविंद पाण्डेय
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पितामह भीष्म द्वारा शर शैय्या पर की गई श्री कृष्ण की स्तुति : मेरे स्वर में.

· अरविन्द पाण्डेय




ॐ कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं

स्वर भी तुम हो शब्द भी.
ध्वनि भी तुम आकाश.
दृश्य तुम्हीं ,दर्शक तुम्हीं,
तम भी तुम्हीं प्रकाश ..

शर शैय्या पर भीष्म द्वारा श्री कृष्ण की स्तुति :
अपनी प्रतिज्ञा भंग करके, भक्त भीष्म की प्रतिज्ञा की रक्षा करने के लिए भीष्म की ओर रथ का पहिया लेकर दौड़ते हुए भी भीष्म पर परम कृपा पूर्ण नेत्रों से करुणा की वर्षा करनेवाले श्री कृष्णचंद्र के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ ..
मुझे श्रीमद भागवत में, शर-शैय्या पर लेटे हुए पितामह भीष्म द्वारा ,श्री कृष्ण का दर्शन करते हुए,अपनी मृत्यु के समय की गयी श्रीकृष्ण की स्तुति अत्यंत प्रिय है जिसे पढ़कर रोमांच होने लगता है और आंसू बहने लगते है ..भीष्म के सम्मुख स्वस्थ.प्रसन्न श्री कृष्ण, पांडवों और अन्य ऋषियों के साथ खड़े थे ..अपने समक्ष उन्हें देखकर भी,भीष्म का मन. श्रीकृष्ण के उस रूप के चिंतन में तन्मय हो गया जो उन्हें अत्यंत प्रिय था ..

भीष्म की प्रेमपूर्ण वाणी भगवान की स्तुति करने लगी --
'' भगवान, त्रिभुवन-सुन्दर , तमाल-नीलवर्ण,रवि-रश्मि- उज्जवल,ज्योतिर्मय-पीताम्बर-परिधान,घुंघराली अलकों से सुशोभित मुखमंडल से सारी सृष्टि को आनंदित करनेवाले आप अर्जुन के सखा में मेरी प्रीती बनी रहे .युद्धभूमि में अश्वों के खुरों से उड़ती हुई धूलि से सनी हुई अलकें जिनके श्रीमुख के चारों  ओर छाई हुई है, मेरे तीक्ष्ण बाणों से जिनका कवच और जिनकी त्वचा छिन्न भिन्न हो गई है, वे श्री कृष्ण मेरे परम आराध्य हैं ..अपने सखा अर्जुन की बात सुनकर,अपने और शत्रुपक्ष की सेना के मध्य रथ लाकर खडा करके जो अपनी आँखों से ही शत्रुपक्ष की आयु का हरण कर रहे है --ऐसे पार्थसखा श्रीकृष्ण में मेरी प्रीति अविचल हो . .

सम्मुख उपस्थित सेना को देखकर,स्वजनों के संहार की आशंका से धर्मयुद्ध में दोषदृष्टि करते हुए युद्ध से विमुख होनेवाले अर्जुन की कुबुद्धि को जिन्होंने गीता के उपदेश द्वारा शुद्ध किया - वे महायोगी श्री कृष्ण मुझपर करुणा करते रहें ..

अपनी मर्यादा मिटाकर,मेरी प्रतिज्ञा सत्य करने के लिए रथ से कूदकर, हाथी का वध करने के लिए दौड़ते सिंह की तरह मेरी ओर दौड़ते हुए श्रीकृष्ण के कोमल चरण मेरे चित्त में स्थिर बने रहें ..

मुझ आततायी के तीक्ष्ण बाणों से जिनका कवच फट गया था, जिनकी पूरी देह क्षत विक्षत हो गयी थी, जो मुझे मार देने का अभिनय करते हुए मेरी ओर दौड़े आ रहे थे ऐसे भगवान मुकुंद में मेरी शुद्धा भक्ति अविचल हो..

जिनकी ललित -गति, मंद-मुसकान,प्रेमपूर्ण दृष्टि से अत्यंत समानिता गोपियाँ उन्मत्त के समान उनकी लीलाओं का अनुकरण करती हुई उनमे तन्मय हो गई उन रसेश्वर श्री कृष्ण में मेरी परम प्रीति हो ..

----अरविंद पाण्डेय
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जिसका हाथ थाम मैं पीता..

· अरविन्द पाण्डेय



जिसको  मेरे  होठ  पिएँ,
वह ही कहलाती  है हाला.

जिसका हाथ थाम मैं पीता.
वह बनती साकी बाला.

खुद  को  ही, खुद से ही पीकर, 
जिस दर मैं, मदहोश, फिरूं.

दुनिया वाले उस दर को ही 
कहते हैं यह मधुशाला.
=============
ईश्वर को परम रमणीय रमणी की रूप में देखना और स्वयं को उनका प्रेमी मानते हुए मस्त रहना--यह , विश्व के समस्त दार्शनिक प्रस्थानो को फारसी शायर संतो की  विलक्षण देन है..जिसे हृदयंगम करना, अमृत बन जाने के समान  है..एवं, जिस पर ईश्वर की प्रेमपूर्ण कृपा होती है वही इसे हृदयंगम कर पायेगा.. 


----अरविंद पाण्डेय
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Come,Be My Witness and Me, entwine

· अरविन्द पाण्डेय


It is impossible to negate the sun in his youth.
It is impossible to suppress even tranquilled truth.
None can stand in sonorous  storm.
If a man is of integrity, None can harm.

I am Enormous Energy of the Sun,
I am the Serene Sweetness of the Moon.
All Stars Shine with the Glow of Mine.
Come, Be My Witness and Me, entwine .

-- Aravind Pandey 
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''अस्त'' ''व्यस्त' ''आसक्त''

· अरविन्द पाण्डेय



''अस्त'' किसी के लिए  वहीं  पर, 
किसी के लिए अतिशय ''व्यस्त''
है ''सन्यस्त'' किसी के प्रति,पर, 
किसी के लिए अति  ''आसक्त'' 

एक व्यक्ति में व्यक्त हो रहे,
एक समय ही कितने रूप.
सतत परिणमन-शील जगत में 
माया की है शक्ति अनूप. 



----अरविंद पाण्डेय
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जम्हूरियत में ताज को समझो न तुम जागीर

· अरविन्द पाण्डेय


ये सच है कि ये ताज तुम्हें दे रहा ठंडक.
सेहरा के सहर सा मगर होगा ये जल्द गर्म.

सब कुछ भुला दिया करो ,पर याद ये रखो.
देना पडेगा हर जवाब आखिरत के दिन.


अपने ही फैसले से क्यों खुरच रहे हो तुम.
चहरे पे चढ़ा है जो सफेदी का मुलम्मा.

ताकत है बेशुमार दिया जिस अवाम ने.
उसके ही बर-खिलाफ लिख रहे हो फैसले..

जम्हूरियत में ताज को समझो न तुम जागीर.
इस मुल्क में अवाम का नौकर है हर वजीर.

करते हुए भी जुर्म जब कांपें न तेरे हाथ.
बस जान लो अल्लाह का अज़ाब आ गया.

अजाज़ को माथे पे भी रखा करो कभी.
आखिर,तुम्हारा ताज भी होगा सुपुर्द-ए-खाक.
=======================

अजाज़=मिट्टी.
अज़ाब= ईश्वरीय दंड 

----अरविंद पाण्डेय
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O Sleep ! Come not to lotus eyes of my Queen.

· अरविन्द पाण्डेय


O Sleep ! Come not to lotus eyes of my Queen.
I have to see in her smiling eyes, a sweet dream.

She has promised to keep you away in the Sun.
Go somewhere else, for you, here is none.

----अरविंद पाण्डेय
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हे समस्त स्वर की साम्राज्ञी !

· अरविन्द पाण्डेय


हे समस्त स्वर की साम्राज्ञी !
हे चिन्मय श्रुति - सिन्धु. .
देवि, तुम्हारी , सजल शुभ्रता 
निर्मित करती इंदु.

शुभ्र तुम्हारा वर्ण, शुभ्र हैं 
वस्त्र , शुभ्र है हास्य.
शुभ्र हंस की शुभ्र काकली,
शुभ्र स्वरों का लास्य .

शुभ्र तुम्हारा दर्शन,भर दे 
मन में शुभ्र विचार.
शीतल हो संतप्त हृदय भी,
जैसे शुभ्र तुषार.

शुभ्र तार-सप्तक वीणा के,
शुभ्र ,स्वादु झंकार.
शुभ्र स्वरों के अभिषिन्चन से,
शुभ्र बने संसार.

शुभ्र चेतना, सुरभित चिंतन
का हो अब विस्तार .
तन-मन-धन की सब अशुभ्रता 
की हो अब से हार.

वस्त्र-मात्र ही नहीं शुभ्र हो,
अन्तर भी हो शुभ्र.
मानव की चेतना शुभ्र  हो,
ज्यों नभ नित्य निरभ्र.

शुभ्र दृष्टि हो, शुभ्र सृष्टि का 
 शुभ्र दिखे हर दृश्य.
शुभ्र सभी के अंग अंग हों,
शुभ्र सभी के स्पृश्य.

शुभ्र कर्म हों , शुभ्र चर्म  हो,
शुभ्र हमारा धर्म.
अब सबका सर्वस्व शुभ्र हो,
शुभ्र सौम्य हो मर्म.

शुभ्र काम हो, शुभ्र धाम  हो,
शुभ्र वासना, भोग..
शुभ्र प्रेयसी , प्रेयस , प्रिय  हों ,
शुभ्र रहे संयोग . 

----अरविंद पाण्डेय
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ऐ माँ ! हैं मुझे याद वो बचपन के मेरे दिन

· अरविन्द पाण्डेय



ऐ माँ ! हैं मुझे याद वो बचपन के मेरे दिन.
चलने की कोशिशों में जब गिरने  लगा था मैं.
नन्हें से मेरे हाथ को हर बार पकड़ कर .
गिरते हुए बचने का हुनर तूने सिखाया .



----अरविंद पाण्डेय
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You are my lost but regained delight

· अरविन्द पाण्डेय



When I say- I love you , it is not love, ephemeral.
It comes from inner heart , not oral.

I see you with my inward eyes ,
My wanton fancy, then with you, flies.

I love you as moon loves blushing lily.
Be it bubbling summer or winter chilly.

I fall in love innately with you.
Like the rosy sun falls and kisses a lotus , new.

I feel you in the fresh airy affairs of the spring,
when flowers feel empowered and cuckoos sing.

I feel you in the smiling starry sky , above,
And, in the melting moon, fallen in love.

Thus , I feel You , day and night,
You are my lost but regained delight


----अरविंद पाण्डेय
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मैं रौनके-जहां हूँ, भारत है नाम मेरा

· अरविन्द पाण्डेय


मैं रौनके-जहां हूँ, भारत है नाम मेरा.
मेरे ही दर से होता है इल्म का सवेरा.

जब जब जहां पे छाया था तीरगी का साया.
ज़ालिम ने तशद्दुद से इन्सां को था जलाया.

तब मैं ही कभी गांधी या बुद्ध, बन के  आया.
रहमो-करम से रोशन रस्ता नया  दिखाया.

पर,जब कोई सिकंदर था लूटने को आया.
मैंने ज़हर भरा, तब, था तीर भी चलाया.

गिरते हुए जहां को मैंने ही है संभाला.
हर मुल्क, हर वतन है, हमराह, हमपियाला.

दुनिया में बिक रहा था, सामान ,बस हमारा.
बह कर यहीं आता था, दुनिया का सोना सारा .

अब फिर से उस मुकामे-तारीख पर है आना.
इक बार फिर से बोले,  मेरी जुबां, ज़माना.

बस मुल्क ही नहीं मैं, मैं मुल्के-मुहज्ज़ब हूँ.
इंसानियत की अब तक की अज्बीयत,अदब हूँ.

इतिहास की किताबें हैं दे रही गवाही .
इंसानियत के दिल से, मिटाता हूँ मैं सियाही.

मुझसे ही हैं मुसलमां, मुझसे ही हैं ईसाई .
दुनिया के मज़हबों में, है मेरी रौशनाई.

भारत है नाम मेरा, फिरदौस मेरी सूरत.
इक बार, फिर से दुनिया को है मेरी  ज़रुरत.

आओ शुरू करें अब, फिर से नयी इबारत .
दुनिया के कोने कोने में लिख दें - मैं हूँ  भारत.

================================
तीरगी=अन्धकार
मुहज्ज़ब=शिष्टाचार
अज्बीयत = सभ्यता
तशद्दुद = हिंसा
रौशनाई = प्रकाश

----अरविंद पाण्डेय
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तुझ सा नहीं कोई है माँ ! दोनों जहान में.

· अरविन्द पाण्डेय

1 

जगती हूँ अंधेरों में सुलाने को तुझे मैं.
खूँ से बनाती दूध, पिलाने को तुझे मैं.
घुल घुल के खुद,तुझे जो बड़ा कर रही,बेटे !
रोते हुए हर शय को हंसाने के लिए मैं..
2
तेरे पहलू में जो आंसू हैं बहाए मैंने.
उसी से पोछता औरों की आँख के आंसू.
तेरे पहलू में , काश, फिर मेरे बहते आंसू .
ऐ मेरी माँ ! तू बस इतनी सी इनायत करना .
3
दुनिया तो मिल गई है, मगर तू चली गई.
ऐ माँ ! ये ज़िंदगी तो मेरी यूँही ढल गई.
इक बार जो मालिक से मैं, ऐ काश,मिल सकूं.
बदले में ज़माने के, मेरी माँ, तुझी को लूं.
4
मुझ सा तो करोडो मिलेगे इस जहान में.
तुझ सा नहीं कोई है माँ ! दोनों जहान में.
5
एक ओर है दिनभर की मजदूरी औ' चेहरे पर धूल.
और दूसरी ओर खिला रहा मुख पर ज्यो गुलाब का फूल.
मिटे फर्क यह, और सभी स्त्री का जब हो रूप समान.
तब चमकेगा दुनिया में अपना महान यह हिन्दुस्तान.
6
पति-पत्नी हों उमा-महेश्वर सदृश अर्धनारीश्वर.
यही चतुर्थी-व्रत का फल है,बने प्रेम अविनश्वर.
प्रेम, चतुर्थी-चन्द्र सदृश कुछ क्षीण भले दिखता है.
किन्तु,अंत में पूर्ण-चन्द्र सा शीतल बन खिलता है.
=============
ये कविताएं फेसबुक में मेरे द्वारा सृजित पेज --
I am Woman-I Created Man:मैं नारी हूँ नर को मैनें ही जन्म दिया
में समय समय पर लिखी गईं थीं.इन्हें एक साथ ब्लॉग पर प्रस्तुत करने की इच्छा हुई क्योंकि आज दिव्य-मातृत्व के भाव-बोध में रहा मैं..
पेज का लिंक नीचे है..
-- अरविंद पाण्डेय 
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आत्मनः प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत

· अरविन्द पाण्डेय


जो है व्यवहार तुम्हें अप्रिय ,
वह नहीं किसी के साथ करो.
नैतिकता का बस यही सूत्र ,
प्रिय-कर्म में कभी नहीं डरो.

स्मृति में धर्म और नैतिकता की एक सार्वभौम परिभाषा दी गई है--
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं, श्रुत्वा चैवावाधार्यताम.
आत्मनः प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत .
अर्थात-
जो है अपने प्रतिकूल करो मत वह व्यवहार किसी से.
प्रसिद्द जर्मन दार्शनिक इमानुअल कांट ने भारत द्वारा नैतिकता की उपर्युक्त परिभाषा को यथावत स्वीकार करते हुए अपना प्रथम नैतिक नियम प्रतिपादित किया था-
''उसी नियम के अनुसार चलो जिसे तुम सार्वभौम बनाने का संकल्प कर सको.''
उसने उदाहरण दिया कि तुम चोरी अपने यहाँ नहीं होने देना चाहते इसलिए दूसरे के यहाँ तुम्हारे  द्वारा चोरी किया  जाना  तुम्हारे  लिए  अनैतिक  है..और चूंकि,यह स्वस्थ बुद्धि के मनुष्यों की सार्वभौम इच्छा होती है इसलिए चोरी किया जाना सार्वभौम रूप से अनैतिक है.. समाज द्वारा सार्वभौम रूप से स्वीकृत नैतिक-आचरणों के सम्बन्ध में भाषण देने वाले इस नियम के अनुसार स्वयं अनैतिक आचरण कर रहे होते हैं..रजनीश से लेकर अन्य सभी स्वघोषित वैचारिक क्रांति-कारियों की यही स्थिति है.. 



----अरविंद पाण्डेय
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जब जब शासक,खल के समक्ष झुकता है --

· अरविन्द पाण्डेय


सत्ता के पौरुष का पर्याय पुलिस है.
पर,कौन घोलता इस अमृत में विष है.
यह शक्ति-पुंज कैसे असहाय हुआ है.
यह एवरेस्ट क्यों झुक सा अभी गया है.

षड्यंत्र घृणित दिखता जो,वह किसका है.
है सूत्रधार वह कौन, सूत्र किसका है.
विधि के शासन की गरिमा कौन लुटाता.
मर्यादा की रेखा है कौन मिटाता.

दावा करता है कौन न्याय का,नय का.
सारे समाज के शुभ का और अभय का.
वह कौन कि जिसने स्वर्णिम स्वप्न दिखाया.
पर,कर्म किया प्रतिकूल,मात्र भरमाया.

जब जब शासक,खल के समक्ष झुकता है.
तब तब ललनाओं का सुहाग लुटता है.
जब कर्म-कुंड की अग्नि शांत होती है.
तब दुष्टों से धरती अशांत होती है.

जब उच्छृंखल,अपवाचक लोग अभय हों.
जब सत्यनिष्ठ जन को सत्ता का भय हो.
जब श्रेष्ठ,श्रेष्ठता से मदांध सोता है.
वर्चस्व तब अनाचारी का होता है.

विधि के शासन की गरिमा तब लुटती है.
मर्यादा की सब रेखाएं मिटती हैं.
पौरुष का पर्वत भी झुक सा जाता है.
सारा समाज आतंक तले आता है.

इसलिए,अगर सम्मान सहित है जीना 
आतंक का न अब और गरल है पीना .
तब नपुंसकों का बहिष्कार करना है.
क्यों बार बार, बस,एक बार मरना है.

छः दिसंबर कल था और वाराणसी के पवित्रतम प्रसिद्द घाटों - दशाश्वमेध घाट शीतला घाट पर श्री गंगा जी की आरती के समय बम विस्फोट किया गया जिसमें श्री गंगा-भक्त हताहत हुए.. इस देश के एक अरब से अधिक लोग उन कर्णधारों से सलीके से, सही तरीके से यह नहीं पूछ रहे कि तुमने इस बम विस्फोट से पहले जो विस्फोट हुए थे उनके अपराधियों को सज़ा दिलाने कि ज़िम्मेदारी क्यों नहीं निभाई.. कंदहार जाकर उन राक्षसों को क्यों मुक्त किया जो भारत पर हमले के अपराधी थे..?? और , जब तक उनसे सही तरीके से यह नहीं पूछा जाएगा तब तक आतंक का यह सिलसिला शायद निश्चिन्त होकर चलाया जाता रहेगा.. !! 

----अरविंद पाण्डेय
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Aravind Pandey Speaks Benefits of not Taking Bribe .wmv

· अरविन्द पाण्डेय

यह वीडिओ पटना के रैदिएन्त  स्कूल के एक वार्षिकोत्सव में मेरे द्वारा बच्चों के बीच दिए गए व्याख्यान से सम्बंधित है.
इसका सारतत्त्व यह है कि भारत को महाशक्ति बनने में सबसे भयानक बाधा है - यहाँ के राजनीतिज्ञों और सरकारी अधिकारियों के एक समूह द्वारा योजनाबद्ध रूप से भ्रष्टाचार करना और भारतीय जनता के धन को विदेशी बैंकों में जमा करना.. अगर हम यह रोक दे तो हमारा देश १० वर्षों में ही विश्व की ऐसी महाशक्ति बन जाएगा जो अमेरिका की तरह हिंसा के प्रसार और समर्थन के लिए नहीं जाना जाएगा बल्कि जो विश्वशांति को चिरस्थायी बनाने के लिए विश्व इतिहास में एक बार पुनः सम्मानित होगा..
----अरविंद पाण्डेय
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यहाँ भी रात, सितारों से इश्क करती है.

· अरविन्द पाण्डेय

शेक्सपीयर की मिरांडा 

तुम्हें  निहारने को खिल के हंस रहे हैं गुल .
गुलों के दिल का  कुछ ख़याल तो करना होगा.
मेरे लिए न सही, मैं तो यूँ ही कहता हूँ.
तुम्हें इनके ही लिए अब यहाँ आना होगा.

सुबह यहाँ भी तो मदहोश हवा बहती है.
सुबह यहाँ भी शम्स आसमां पे खिलता है.
यहाँ भी रात, सितारों से इश्क करती है.
यहाँ भी शाम से शर्मा के चाँद मिलता है.

तुम्हारे दिल सा  समंदर यहाँ लहराता है.
तुम्हारे हुस्न सी हसीं यहाँ  फिजाएं हैं.
तुम्हारी ज़ुल्फ़ सा महका हुआ चमन भी है.
तुम्हीं सी शोख यहाँ रुत की कुछ अदाएं हैं.

--- अरविंद पाण्डेय 
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अक्षर-रमणी के साथ हुआ मेरा विवाह

· अरविन्द पाण्डेय



१ 
मैं महामृत्यु का मित्र, गगन है मेरा पथ.
इस संसृति का मिथ्यात्वज्ञान है मेरा रथ
मैं महाकाल की गति से सत्ता में विचरूं
मैं महाशून्य में सृष्टि-कर्म की प्यास भरूँ.

मैं शुद्ध बुद्धि, मैं शुद्ध सत्य, मैं शुद्ध काम.
मैं नामरूप का सृजन करूं ,रहकर अनाम.
२
मैं नभ से भू पर उतर रही  गंगा का जल.
प्रक्षालित कर भूतेश-जटा को करूं सरल.
आकाश-चारिणी गंगा सा मेरा प्रवाह.
अक्षर-रमणी के साथ  हुआ मेरा विवाह.

मैं हूँ अनंत का चुम्बन करती अग्निशिखा.
मैंने समस्त संसृति का भावी भाग्य लिखा.
३
मैं जीव जीव में जीवन भरता सविता हूँ.
मैं महाप्रकृति की सबसे सुन्दर कविता हूँ.
मेरा ही रस पीकर होती संसृति, रसाल.
मेरा दर्शन कर परम क्षुद्र होता विशाल.

मैं प्राण भरूँ तो जीवन पाता पंचभूत.
मेरी सत्ता ही जड़-चेतन में अनुस्यूत .
४
शत-कोटि सूर्य सा फैल रहा मेरा प्रकाश.
जो पलक गिरे मेरी तो होता सृष्टि-नाश.
इस दृश्य-विश्व की सत्ता का मैं हूँ कारण.
मैं जगद्योनि का सृष्टि-कर्म में करूं वरण.

मैं महापुरातन,चिर-नूतन,प्रतिपल अभिनव.
मैं परम-स्फोट,मैं परम शांत मैं महा-प्रणव. 

यह कविता , वेदान्त-साधना के  सर्वोच्च शिखर  निर्विकल्प समाधि  के ठीक पहले की अवस्था - अखंड ब्रह्माकाराकारित चित्तवृत्ति --  को शब्दांकित करने का प्रयास करती है..
जो इसे मनन कर समझ पाए वे स्वयं भी उस अनुभूति के परमानंद का कण रसास्वादित कर धन्य होगें..

-अरविंद पाण्डेय
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धन्य व्रज-भूमि..धन्य गोपिकाएं ..

· अरविन्द पाण्डेय


तत्सुखे सुखित्वं स्यात: उसके सुख में ही सुख हो : नारद भक्ति सूत्र;

तुमने लिया किसी से और उसको कुछ दिया.
फिर इश्क तो नहीं किया, सौदा किया तुमने.
पाए बिना ही दे गए ग़र इश्क किसी को,
समझो, तुम्हें बस इश्क ही बस इश्क हुआ है..


माता रुक्मिणी श्री कृष्ण से अक्सर ये कहतीं थीं कि हम भी तो आपको असीम प्रेम करती हैं फिर प्रेम का प्रसंग आते ही आप श्री राधा और गोपियों की याद करके आखें सजल कर लेते हैं.. ऐसा क्यों ..हर बार श्री कृष्ण चुप हो जाते.. कुछ कह न पाते..अकथनीय को कहें भी कैसे.. जो समस्त सृष्टि के जीवों को वाणी का दान करते हैं, उनकी वाणी अवरुद्ध सी हो जाती..एक बार देवर्षि नारद, श्री द्वारिकाधीश के अतिथि बने..उनकी उपस्थिति में ही श्री कृष्ण को अचानक भयानक शिरोवेदना हुई.. मस्तक, पीड़ा से फटा सा जा रहा था..राजवैद्य आए..औषधि दी.. कोई लाभ नहीं ..श्री नारद ध्यानस्थ हुए ..फिर माता रुक्मिणी से कहा कि अगर श्री कृष्ण के किसी प्रेम करने वाले या भक्त के पैरों की धूल मिल जाए और उसे इन द्वारिकाधीश के मस्तक पर मल दिया जाय तो ये पीड़ा शांत होगी अन्यथा नहीं.ये पीड़ा किसी अनन्य प्रेमी की उपेक्षा के कारण हुई है श्री कृष्ण को .. सभी  पटरानियाँ और वहां उपस्थित सभी लोग स्तब्ध थे..देवर्षि ने रुक्मिणी  जी से कहा , आप तो इन्हें अनन्य प्रेम करतीं हैं..आपकी भक्ति तो विश्व-विख्यात है..आप अपने चरणों की धूल दीजिये तो इन्हें शान्ति मिले..रुक्मिणी जी ने कहा, मैं , प्रेयसी, भक्त, समर्पित, अपने पैरों की धूल दू तो सीधा नरक का द्वार दिख रहा मुझे..मुझसे ये महापाप न होगा...इसी तरह सभी ने वह ''महापाप'' करने से इनकार कर दिया..नारद ने कहा , अब एक ही  मार्ग दिख रहा...व्रज का मार्ग.. वे व्रज गए और यही प्रस्ताव राधा रानी और गोपियों के सामने रखा..राधा जी और गोपियों को तो लगा कि प्राण ही निकल जायेगे. उन्हें शिरो-वेदना..अभी तक शांत नहीं...कहा , देवर्षि , आपने इतनी देर क्यो की ? तुरंत आते..राधा जी ने गोपियों के पैरों धूल इकट्ठी करनी शुरू की.सभी गोपियों ने अपने पैरों की धूल दी.. उनके चरण-रज से नारद की झोली  भर गई..फिर सभी ने कहा , नारद जी, आप ले जाइए .फिर कभी उन्हें वेदना हो तो उसकी चिकित्सा के लिए भी हम अभी से दे रही हैं..हम जानती हैं कि उनके मस्तक पर हमारे पैरो धूल लगेगी तो हमें महापातक होगा..वे तो अनंत , सनातन,परमात्मा हैं..किन्तु हम नरक का कष्ट भोगने के लिए तैयार हैं अनंत काल तक.. उन्हें वेदना हो एक क्षण भी, ये तो हमें उस नरक से भी अधिक वेदानादायी है..नारद आए.. वह धूल की झोली लिए..आंसू बहाते..प्रेम-पारावार में अभिषिक्त हो रोमांचित..द्वारिकाधीश ने उस धूल का एक कण मस्तक पर लगाया ..उनकी देह  प्रेम-पुलकित हो रही थी .. प्रेमाश्रुओं से वक्षस्थल का अभिषेक हो रहा था..बार बार उस धूल का स्पर्श कर वे परमानन्दस्वरूप अनंत , स्वयं आनंदित हो रहे थे.. रुक्मिणी और अन्य सभी उस दृश्य को देख अपूर्व आनंद में मग्न थे .. रुक्मिणी को उनके प्रश्न का उत्तर देने के लिए उन व्रजराजकिशोर,  द्वारिकाधीश ने जो स्वयं को पीड़ित किया, उसका स्मरण कर वे लज्जित हो रहीं थीं..धन्य व्रज-भूमि..धन्य गोपिकाएं .. धन्य श्री शुकदेव जिन्होंने इस भागवत रूपी अमृत से संसार को शाश्वत काल के लिए भिगो दिया..
----अरविंद पाण्डेय
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I often Fall on thorns of desires and I bleed

· अरविन्द पाण्डेय


O Light of My Soul ! Come and See My Mind.
It is Shining ever with Love to You,Blind.
My Heart Keeps and Kisses You , Wild.
I Pine for Your Lovely Looks as A Weeping Child.

Come and Brush away my Despair,
Touch Me without making me aware,like gentle air.
I am Just  in Your Need, Indeed.
Look at Me,I often Fall on thorns of desires and I bleed.


----अरविंद पाण्डेय
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मेरी बहन ! मैं बहुत दूर हूँ मगर, फिर भी ..

· अरविन्द पाण्डेय

भैया दूज : भ्रातृ-द्वितीया:

मेरी बहन ! मैं बहुत दूर हूँ मगर, फिर भी,
तेरे करीब मेरी रूह पहुँच जाती है.
किसी को याद करूं या न कर सकूं लेकिन,
हरेक पल तेरी दुआ की  याद आती है.

तेरे रुखसार से रुखसार मेरा मिलता है,
तेरे रुख़ से ही मेरा रुख़ भी बदल जाता है.
तेरी नज़र ही मेरी बद-नज़र मिटाती है,
मेरा दिल भी तेरे ही दिल की तरह गाता है.
-------------------------------

I Bow to My Sisters today and Dedicate these lines in their honor who prayed at the time when I was being Interviewed in a Room of UPSC , Delhi.. and , Their pure prayers were accepted .. 

I came out of the Interview room as an IPS officer in first Attempt.!!


-- अरविंद पाण्डेय 
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तुझे मेरे लिए ज़मीन पे आना होगा .!

· अरविन्द पाण्डेय


हे अबोध ! अगम्य ! प्रियवर ! 

मुझे मालूम  के तू आसमां पे रहता है.
तुझे ज़मीन पे आने की ज़रुरत भी नहीं.
मगर,कुछ इस तरह से मैं तुझे पुकारूंगा.
तुझे मेरे लिए ज़मीन पे आना होगा .. 

I know You are in distant sky of universal mind !
I know you need not to descend here.
Yet, I will call you in such a way,
You have to come to Earth only for me, I swear !! 

----अरविंद पाण्डेय
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A sweet sound came to me,''Are you alright !''

· अरविन्द पाण्डेय


I came late tonight and was feeling tired,
I saw You standing before Mirror,
 Setting Bindi on Forehead,
And, I, an effortless kiss, aspired .

I came closer to You slowly,
Put my Chin on your right shoulder.
Your breath, I heard, got  faster ,
And, drew away all my melancholy.

I said to you ,'' Look at me , My Princess !
And, You turned your head towards me,abruptly.  
Oh! My dream,came true,of effortless and innocent kiss,
And, so, you filled in me infinite ecstasy, My Empress !

 A sweet sound came to me  ,''Are you alright !''
I  whispered warbling  ,'' yes , wonderful tonight ! ''.

----अरविंद पाण्डेय
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पहले मंदिर नहीं, करें पहले भारत-निर्माण.

· अरविन्द पाण्डेय



श्रीरामभद्रः विजयते:


मिले  तर्क  से  परे ,तुम्हारे  होनें  की अनुभूति.
प्रतिपल,प्रतिपदार्थ में तुम हो-बस हो यही प्रतीति .
समय नहीं,अब कृपा करो अभिराम-रूप हे राम.
हर ध्वनि जो मैं सुनूं गूंजता हो उसमे बस ''राम''. 



राम तुम्हारा नाम लिए फिरते हैं जो बाज़ार..

मंदिर जिनकी राजनीति है, रामभक्ति व्यापार.
उन्हें कहो अब तुम्हीं, किसी की बात रहे ना मान.
मंदिर का करें पहले  भारत-निर्माण.

शिला-शिला थी पावन जिसकी,जो आपका निवास.
खंड खंड कर उसे , दिया लाखों जन को संत्रास.
सत्ता में रह किया जिन्होंने पौरुष का  अपमान.
कंदहार में बेचा सारे भारत का अभिमान.

जिन्हें न चिंता राम-रूप मानव का हो उत्कर्ष.
कहीं,किसी को कष्ट नहीं हो, सब में हो बस हर्ष.
दैहिक,दैविक भौतिक तापों से समाज हो मुक्त.
राजनीति में वही तुम्हारा,करते, नाम,प्रयुक्त.

कह दो उनसे कण कण में तुम दीप रहे हो, राम !
कह दो उनसे हर मानव का हृदय तुम्हारा धाम .
कह दो-''मुस्लिम भी, ईसाई भी हैं मेरे पुत्र.
मंदिर जैसा मस्जिद भी है सबके लिए पवित्र.''

----अरविंद पाण्डेय
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पहले मंदिर नहीं, करें पहले भारत-निर्माण.

· अरविन्द पाण्डेय



श्रीरामभद्रः विजयते:


मिले  तर्क  से  परे ,तुम्हारे  होनें  की अनुभूति.
प्रतिपल,प्रतिपदार्थ में तुम हो-बस हो यही प्रतीति .
समय नहीं,अब कृपा करो अभिराम-रूप हे राम.
हर ध्वनि जो मैं सुनूं गूंजता हो उसमे बस ''राम''. 



राम तुम्हारा नाम लिए फिरते हैं जो बाज़ार..

मंदिर जिनकी राजनीति है,रामभक्ति व्यापार.
उन्हें कहो अब तुम्हीं,किसी की बात रहे ना मान.
पहले मंदिर नहीं  करें पहले  भारत-निर्माण.

शिला-शिला थी पावन जिसकी,जो आपका निवास.
खंड खंड कर उसे , दिया लाखों जन को संत्रास.
सत्ता में रह किया जिन्होंने पौरुष का  अपमान.
कंदहार में बेचा सारे भारत का अभिमान.

जिन्हें न चिंता राम-रूप मानव का हो उत्कर्ष.
कहीं,किसी को कष्ट नहीं हो, सब में हो बस हर्ष.
दैहिक,दैविक भौतिक तापों से समाज हो मुक्त.
राजनीति में वही तुम्हारा,करते, नाम,प्रयुक्त.

कह दो उनसे कण कण में तुम दीप रहे हो, राम !
कह दो उनसे हर मानव का हृदय तुम्हारा धाम .
कह दो-''मुस्लिम भी, ईसाई भी हैं मेरे पुत्र.
मंदिर जैसा मस्जिद भी है सबके लिए पवित्र.''

----अरविंद पाण्डेय
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Come into Me and be A Serene Slumber !

· अरविन्द पाण्डेय


The Deadly Dim Dusk Roars and no Stars Shine.
The Sky is darkening slowly with despondency of Mine.

The Nasty Night is Coming Again.
Pouring down the Pulsating Pain.

Alas ! You are away and away, why ?
None will Live you as will , I .

My Heart aches when Yours, aches.
My Heart Leaps up when,Yours, Jump,Takes.

Come into Me and be A Serene Slumber.
Past Pained You but, Perished , don't Remember !


----अरविंद पाण्डेय
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वास्तव में,मैंने साम्राज्ञी-पद त्यागा था:माता मैथिली:मैं नारी हूँ :3

· अरविन्द पाण्डेय


श्री दुर्गा पूजा के महापर्व पर विश्व की सभी शक्ति-स्वरूपिणी नारियों को समर्पित.3
६ .
मैंने अपनी निजता का निर्भय किया दान.
प्रज्ज्वलित-अग्नि में कर प्रवेश, मैं थी अम्लान.

मैं नहीं चाहती थी निन्दित रघुनन्दन हों.
था स्वप्न - राम का सार्वभौम अभिनन्दन हो.

इसलिए, सहज निर्वासन था स्वीकार मुझे.
अन्यथा, राम क्या करते अस्वीकार मुझे?
७.
मैंने तमसा-तट पर लक्ष्मण से कहा -तात !
श्री राम बनें आदर्श चक्रवर्ती सम्राट .

वे करें प्रजा-पोषण सोदर भाई समान.
जीवन उनका, यश,धर्म,कीर्ति का हो निधान.

कहना उनसे- मैथिली नहीं हैं  व्यथा-विद्ध.
बस एक कामना, राघव हों अतुलित प्रसिद्द.
७.
श्री राम-राज्य की  नारी भी थी मैं, प्रबुद्ध.
मैंने चाहा था- रावण से हो महायुद्ध.

राक्षसी हिंस्र-संस्कृति का जिससे हो विनाश.
बंधुता तथा समता,स्वतन्त्रता का प्रकाश-

प्रत्येक मनुज के अंतर में उद्भासित हो.
वसुधा, करूणा से कुसुमित और सुवासित हो..
८.
यदि राम-सभा में जा,मैं करती अभिवेदन.
तब निश्चित ही  निरस्त हो जाता निर्वासन.
श्री राम और मैं करते वैयक्तिक-विलास.
पर उस आदर्श-परिस्थिति का रुकता विकास.

जिसमें शासक त्यागा करते हैं पद अपना .
पर,जो आसक्त पदों में,उनसे क्या कहना !
९.

वास्तव में, मैंने साम्राज्ञी-पद त्यागा था.
क्या कहूं ,राज्य का जन-समुदाय अभागा था.

पुट-पाक सदृश वेदना राम को बींध गई.
जीवन भर मैं श्री राम-विरह में दग्ध हुई.

इस अग्नि-सिधु मंथन से बस यह अमृत मिला.
राघव के अक्षर यश का सुरभित पुष्प खिला.
१०.
मैं वही जबाला, जिसने नहीं विवाह किया. 
पर, सत्यकाम जाबाल-पुत्र को जन्म दिया.

प्रारंभ किया जिसने परम्परा गुरुकुल में
है पिता-नाम अनिवार्य नहीं नामांकन में 

गरिमामय नारी -स्वतन्त्रता का प्रथम घोष
था समय एक , मैं मानी जाती थी अदोष
८ . 
मैं वही अपाला , कुष्ठ -रोग से जो पीड़ित.
थी देह नही रमणीय , पुरूष सब थे परिचित.

सौन्दर्य नहीं था छलक रहा मुझसे बाहर
पर, प्रज्ञा का सागर लहराता था अन्दर

मेरे मंत्रों से प्रथम वेद है आलोकित
मेधा-बल से मैनें समाज को किया विजित..
==============================
स्त्री के प्रति भारत की विलक्षण, शाश्वत और यथार्थवादी दृष्टि के विरोध में, बुद्धि-दरिद्रों द्वारा, माता मैथिली के निर्वासन का उदाहरण दिया जाता है..किन्तु यह उदाहरण उनके द्वारा ही दिया जाता है  जिन्होंने एक बार भी वाल्मीकीय रामायण का पारायण नहीं किया.वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड के पैंतालीसवें सर्ग के सत्रहवें श्लोक में श्री राम का लक्ष्मण को दिया गया आदेश अंकित है--
गंगायास्तु परे पारे वाल्मीकेस्तु महात्मनः .
आश्रमो दिव्यसंकाशः तमसातीरमाश्रितः 
श्री राम ने लक्ष्मण से कहा था -'' गंगा के पार स्थित तमसा नदी के तट पर, महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है..लक्ष्मण ! तुम कल प्रातः सीता को उसी आश्रम के निकट पहुचाकर वापस आना.''
 अर्थात श्री सीता को निर्जन वन में छोड़ने का आदेश श्री राम का नहीं था.
इसी तरह,जब श्री मैथिली को वाल्मीकि आश्रम के निकट ले जाकर निर्वासन की राजाज्ञा लक्ष्मण द्वारा सुनाई गई तो उन्होंने लक्ष्मण से कहा-
यच्च ते वचनीयम स्यादपवादः समुत्थितः 
मया च परिहर्तव्यम त्वम्  हि मे परमा गतिः
अर्थात श्री मैथिली ने लक्ष्मण से श्री राम के लिए अपना सन्देश भेजा था- ''जनसमुदाय के बीच जो आपकी निंदा कुछ घटनाओं के कारण हो रही है उसे समाप्त करना मेरा भी कर्तव्य है..आप धर्मपूर्वक जनसमुदाय का पालन वैसे ही कीजिये जैसे अपने सगे भाइयों का करते हैं.मुझे आपके धर्मानुकूल शासन की चिंता है , अपने शरीर की नहीं. ''
इस प्रकार श्री मैथिली ने निर्वासन स्वीकार करके, वास्तव में, राज्य-हित में अपना साम्राज्ञी का पद त्यागा था.
मानव-मन की इस सर्वोत्कृष्ट अवस्था को हृदयंगम कर पाना लोभ,मोह,मद से कलुषित चित्त के लिए संभव नहीं.
श्री मैथिली द्वारा साम्राज्ञी-पद का स्वेच्छया किये गए त्याग की परम्परा का ही निर्वाह आज भी तब होता है जब कोई लाल बहादुर शास्त्री या कोई नीतीश कुमार  किसी रेल दुर्घटना के बाद नैतिकता के वशीभूत, निजी रूप से दोषी न होते हुए भी, पद से त्यागपत्र देता है.

 ..पश्चिम में , महान नारीवादी चिन्तिका - सिमोन द बउआर एवं अन्यों द्वारा प्रारंभ किया गया नारी मुक्ति आन्दोलन , पश्चिमी समाज के लिए पूर्णतः हानिकारक रहा। .क्योंकि यह प्रतिक्रया में, पुरूष - द्वेष के साथ , प्रारंभ किया गया था ..
प्रतिक्रया या द्वेष में प्रारंभ किया गया कोई भी कार्य अपने परिणाम के साथ अप्रिय अंश भी लेकर आता है .. 
वही हुआ..
पश्चिमी समाज में , नारी-वादी स्त्रियों ने, पुरूष द्वेष में ,पुरुषों से बचने के लिए, ऐसी विकृतियों को आत्मसात् किया जिसनें वहाँ की परिवार -प्रणाली का सर्वनाश कर दिया ।
माता , पिताके प्रारम्भिक प्रेम और वात्सल्य से वंचित युवा ,
सहजात मनोवृत्तियों के वशीभूत और मनोविकृतियों से पीड़ित स्त्री -पुरूष,
और खंडित परिवारों का विशाल खँडहर ॥
परिणाम यह भी हुआ कि भारत का कोई संत वहाँ जाए तो लाखों की संख्या में स्त्री -पुरूष उसके अनुयायी बनने के लिए तैयार , समर्पित ॥
आज सारा पश्चिम भारत की ओर आशा के साथ देख रहा कि भारत, उसके सामाजिक -अस्तित्व की रक्षा, अपने पुरातन किंतु चिर-नवीन संस्कारों के साथ कर पायेगा !
हम भारत के लोगों ने कभी किसी विषय पर खंडित अथवा अपूर्ण दृष्टि के साथ विचार नहीं किया ।
स्त्री - स्वतन्त्रता हमारे यहाँ जितनी वैज्ञानिकता के साथ उपलब्ध थी , वैसी कहीं नही थी, न है ।
इन कविताओं में मैंने भारत की उन  महान स्त्रियों की स्तुति की है जिन्होनें अपनी प्रज्ञा के बल से स्त्री - मूलक सामाजिक क्रान्ति का नेतृत्व किया था जो आज की स्त्रियों के लिए भी अति कठिन है ।
आज ऋग्वेद के आकार लेने के हजारों साल बाद , भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि किसी बच्चे का विद्यालय में नामांकन कराते समय , यह अनिवार्य नही होगा कि उसके पिता का नाम बताया जाय ।
विद्यालय में यदि सिर्फ़ माता अपना ही नाम बताती है तो भी नामांकन किया जाएगा।
इस निर्णय को हम ऋग्वेद में वर्णित माता जबाला की कथा के प्रकाश में देखें तो लगेगा कि माता जबाला नें अपने आत्मबल से जो कार्य उस समय अकेले किया था उस कार्य को कराने के लिए आज सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पडा ।
माता जबाला नें अपने पुत्र जाबाल को को गुरुकुल में नामांकन के लिए भेजा ।
वहा कुलपति ने जाबाल से पिता का नाम पूछा और कहा कि पिता के नाम के साथ ही नामांकन होगा ।
जाबाल को पिता का नाम माँ ने कभी बताया नही था न ही वह अपने पिता से कभी मिला था .
उदास जाबाल माँ के पास आया और सारी बातें बताईं ..
माँ ने कहा कि तेरे पिता का नाम मैं भी नहीं जानती । मैं आश्रम में रहती थी । विवाह नही किया ।
किंतु प्रेम - पूर्ण स्थिति में किस ऋषि से तेरा जन्म हुआ , नही मालूम ।
तू जा गुरुकुल और आचार्य से कह दे कि मेरी माता का नाम जबाला है और मेरा नाम सत्यकाम जाबाल है .वे मंत्रद्रष्टा ऋषि हैं । किस ऋषि से मेरा जन्म हुआ , यह उन्हें भी नही मालूम .
बालक जाबाल जाता है गुरुकुल माँ के वचन दुहराता है वहाँ आचार्य से।
कुलपति, सत्यकाम जाबाल और माता जबाला की सत्यनिष्ठा का सम्मान करते हैं और जाबाल का नामांकन गुरुकुल में हो जाता है ।
इसी प्रकार माता अपाला कुष्ठ -रोग से पीड़ित थीं । किंतु, उन्होंने अपने प्रग्याबल से उस रोग को समाप्त किया । और मन्त्र-द्रष्टा ऋषि बनीं ।
समस्त पुरुषों के लिए सम्माननीय ।
भारतीय - संस्कृति में स्त्री-स्वातंत्र्य सार्वभौम रूप से उपलब्ध किए जाने का संकल्प है ।
किंतु यह स्वातंत्र्य अपने इन्द्रिय सुखों की प्राप्ति के लिए नही अपितु सत्यकाम जाबाल जैसा महान पुत्र उत्पन्न कराने के उद्देश्य से संकल्पित है ।
स्त्री अपने प्रग्याबल से समाज को सशक्त, सुबुद्ध , सुंदर , सुनम्र बना सकती हैं ।
स्त्री की सृष्टि ही इस हेतु हुई ।
किंतु ऐसा करने के लिए स्त्री को स्वयं प्रग्यावती , सशक्त , सुबुद्ध और अंतःकरण से सुंदर बनना होगा ।
सौन्दर्य स्त्री की नियति है --
पुरूष को वश में करने के लिए और उससे समाज की सार्वभौम सेवा कराने के लिए ।
पुरूष के समस्त कर्मों की प्रेरक स्त्री है --
स्त्री है तो पुरूष है --
स्त्री - पुरूष हैं तो समाज और प्रकृति सुरक्षित हैं ।
समस्त प्रकृति की रक्षा के लिए स्त्री का सुन्दरीकरण ,सशक्तीकरण और समरस स्त्री-पुरूष संबंधों का विकास आवश्यक है.

----अरविंद पाण्डेय
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मैं चाहूँ तो कामुक नर को निष्काम करूं : मैं नारी हूँ :2

· अरविन्द पाण्डेय

... मैं नारी हूँ : 2 


 श्री दुर्गा पूजा के महापर्व पर विश्व की सभी शक्ति-स्वरूपिणी नारियों को समर्पित. 
३ 
मुझसे   ही   है अस्तित्ववान कण कण पदार्थ.
मुझसे ही है प्रज्ज्वलित मनुज में सकल स्वार्थ.

मैं सिद्ध पुरुष का अंतर भी कामुक कर दूं.
मैं चाहूँ तो कामुक नर को निष्काम करूं.

प्रत्येक पुरुष का चित्त,बस मुझी में विहरे.
है शांत वही जो माँ कहकर आराधना करे.
४ 

जब पुरुष बुभुक्षित तब मैं उसकी हूँ माता.
मैं भव-सागर में डूब रहे नर की त्राता.

मैं  रमण-भाव पीड़ित पुरुषों की हूँ रमणी. 
मैं प्रणत पुरुष की इच्छाओं की हूँ भरणी.

मेरे मंद-स्मित से मृत उपवन महक  उठे .
मेरे प्रमत्त नयनो से योगी बहक उठे .
५  
मैं आदि-पुरुष की कामत्रिषा की मधुशाला.
मैं बनी मोहिनी,शिव के मन को मथ डाला.

जो पुरुष-सिंह हुंकार भर रहा हो, अविजित.
वह मृग सा मेरे पास रहेगा, सम्मोहित.

मैं क्रुद्ध अगर तो हो जाएगा विश्वयुद्ध .
मैं प्रेमपूर्ण तो शान्ति रहेगी अनवरुद्ध 


----अरविंद पाण्डेय
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मैं स्रष्टा की सर्वोत्तम मति की प्रथम-सृष्टि:मैं नारी हूँ:.1

· अरविन्द पाण्डेय

नवरात्र के इस महापर्व पर विश्व की समस्त शक्तिस्वरूपा स्त्रियों को समर्पित :
१
मैं नारी हूँ , नर को मैनें ही जन्म दिया
मेरे ही वक्ष-स्थल से उसने अमृत पिया
मैं स्रष्टा की सर्वोत्तम मति की प्रथम-सृष्टि
मेरे पिघले अन्तर से होती प्रेम-वृष्टि ।

जिस नर को किया सशक्त कि वह पाले समाज
मैं, उसके अकरुण अनाचार से त्रस्त आज ।

२
मैं वही शक्ति, जिसने शैशव में शपथ लिया
नारी-गरिमा का प्रतिनिधि बन, हुंकार किया --
'' जो करे दर्प-भंजन, जो मुझसे बलवत्तर
जो रण में करे परास्त मुझे, जो अविजित नर ।


वह पुरूष-श्रेष्ठ ही कर सकता मुझसे विवाह
अन्यथा, मुझे पाने की, नर मत करे चाह ।''

क्रमशः

-----------------------------------------------------------
यह लम्बी कविता मेरे अब तक के जीवनानुभवों के आधार पर प्रस्तुत है । यह क्रमशः प्रस्तुत की जायेगी ब्लॉग में ।

नारी के विषय में भारतीय दृष्टि , अतिशय वैज्ञानिक, मानव-मनोविज्ञान के गूढ़ नियमों से नियंत्रित , सामाजिक-विकास को निरंतर पुष्ट करने वाली तथा स्त्री - पुरूष संबंधों को श्रेष्ठतम शिखर तक ले जाने की गारंटी देती है ।

भारत ने सदा स्त्री -पुरूष संबंधों में स्त्री को प्रधानता दी और स्त्री को यह बताया कि कैसे वह पुरूष को अपने अधीन रख सकती है । कैसे वह पुरूष के व्यक्तित्व में निहित सर्वोत्तम संभावनाओं को प्रकृति और मानव-समाज के कल्याण में नियोजित करा सकती है ।

मैं इन कविताओं में , स्त्री के अनेक स्वरूपों को प्रस्तुत करते हुए यह कहना चाहता हूँ कि यदि समाज को अपराधमुक्त , अनाचार-मुक्त बनाना है तो स्त्री-पुरूष संबंधों को भारतीय-प्रज्ञा के आलोक में परिभाषित करना अनिवार्य है अन्यथा समाज को सुव्यवस्थित रूप से चलाना कठिन से कठिनतर होता जाएगा ।



----अरविंद पाण्डेय
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निष्काम-कर्म की मधुशाला .

· अरविन्द पाण्डेय


वृन्दावन में जिन चरणों से,
लहराई रस की हाला.

जिनका चिंतन,स्मरण कर रहा,
प्रतिपल मुझको मतवाला.

गया धाम के उन्हीं विष्णुपद
को मैं अर्पित करता हूँ.

अपने निस्पृह,नित्यशुद्ध
निष्काम-कर्म की मधुशाला.
=============
श्री गया धाम का श्री विष्णुपद मंदिर.. 
सजल इन्दीवर सदृश  सुकोमल एवं पुष्कल, त्रिविक्रम श्री भगवान वामन के सर्व-काम-प्रद श्री चरण का प्रतिमान इस मंदिर में सुशोभित है.. इस विशाल मंदिर में ही श्री कृष्ण का एक छोटा सा मंदिर है जिसमें उनकी अतिशय सम्मोहक कृष्णवर्णा प्रतिमा विराजमान है.
मैं, गया में २००६ के प्रारंभ में, डी आई जी मगध क्षेत्र के रूप में  पदस्थापित हुआ.बिहार में कार्यरत होने के बाद, वासना थी मन में कि गया में  रहूँ कुछ दिनों तक और श्री महाविष्णु के श्री चरणों का और श्री महाबुद्ध के मनोहर मुख  का बारम्बार दर्शन कर सकूं..तो यह वासना पूर्ण हुई बिहार में २००५ से प्रारम्भ हुए सुशासन मे .. 
गया-पदस्थापन का एक ईश्वरीय लक्ष्य भी था कि मेरे माध्यम से २००२ में औरंगाबाद जिले के धावा रेलवे पुल पर अपराधियों द्वारा गिराई गई राजधानी एक्सप्रेस के अपराधियों को सामने लाया जा सके..
इस मानव-कारित दुर्घटना जैसे महा-अपराध में लगभग १५० निर्दोष रेल-यात्री मृत्यु को प्राप्त हुए थे और इस अपराध में अंतर्लिप्त अपराधियों को तत्कालीन पुलिस ने बचा लिया  था ..चूकि दूसरा कोई यह कार्य कर नहीं सकता था इसलिए नियति-प्रेरित कार्यकारी प्रधान के माध्यम से, ईश्वर द्वारा, मेरे गया-पदस्थापन की योजना क्रियान्वित कराई गई..इस प्रकरण को विराम..लंबा है ..कभी विस्तार से कहना ही है ब्लॉग में.
श्री विष्णुपद मंदिर का ऐतिहासिक माहात्म्य भी विलक्षण है.. भगवान चैतन्य को प्रथम बार भाव-समाधि इसी मंदिर में हुई थी..वे श्री चरणों का दर्शन करते खड़े थे मंदिर में..श्री चरणों की आरती की जा रही थी और उनके माहात्म्य से सम्बंधित संस्कृत के छंद उच्चारित किये जा रहे थे वहां के पुरोहित द्वारा..
उस स्तुति को सुनते सुनते निमाई तन्मय होने लगे और समाधिस्थ होकर गिर गए.. कुछ देर तक उस परम दुर्लभ ब्रह्मानंद में मग्न रहे ..
ज्ञाता , ज्ञेय, ज्ञान की त्रिपुटी विलुप्त थी..शेष  था मात्र परम चिन्मय आनंद..
इस घटना के बाद ही वह भाव-समाधि उन्हें बारम्बार होने लगी और परम नैय्यायिक  निमाई, दिव्य-रस-धारा प्रवाह के प्रवर्तक बने.. 
भक्ति-भागीरथी के इन  भगीरथ भगवान चैतन्य का जन्म-स्थल यही विष्णुपद मंदिर है ..और मेरा सौभाग्य कि मुझे और मेरी पुत्रियों और पत्नी को, प्रतिदिन तक  भी , श्री चरणों के दर्शन का अवसर मिल पाया..
इस मंदिर में श्री कृष्ण के लघु मंदिर के निकट भगवान् श्री रामकृष्ण परमहंस के पिताश्री एवं माताश्री, गया तीर्थयात्रा के क्रम में , सो रहे थे..यहीं उन्हें स्वप्न-सन्देश प्राप्त हुआ था कि श्री भगवान् उनके पुत्र के रूप में आगमन कर रहे हैं..यहाँ से जाने के बाद गदाधर का  जन्म हुआ जो बाद में भगवान् रामकृष्ण परमहंस के रूप में   रूपांतरित हुए.
इस प्रकार इस मंदिर से ही भारत की उन  दो दिव्य ज्योतियों का प्रज्ज्वलन हुआ जिन्होंने अपने हृदय और मस्तिष्क  की शक्तियों से पूरे विश्व को प्रभावित कर रखा है और आगामी सहस्राब्दियों तक प्रभावित रखेगीं .
गया की और संस्मृतियाँ हैं जो बाद में..
श्री कृष्णार्पणमस्तु 

----अरविंद पाण्डेय
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तुम सो जाओ ...

· अरविन्द पाण्डेय


तुम सो जाओ

कि वक्त की सर्दी में
सिकुड़ती हुई मेरी किस्मत भी
अब सोने को है ।

तुम सो जाओ

कि कुहासे के धुंध से ढके हुए
तुम्हारी यादों के फूल
तुषार के आंसुओं में
अब रोने को हैं ।

तुम सो जाओ

कि ख़ुद की ही खूबसूरती से
बेपनाह माहताब
स्याह बादलों की परछाईं में
ख़ुद से ही ख़ुद को डुबोने को है ।

तुम सो जाओ

कि कहकशा की खामोश गहराई में
पिघलकर बेजार बहती हुई
सितारों की मायूस रोशनी भी
अब अपना नूरानी वजूद
खोने को है ।

तुम सो जाओ

कि तुम्हारी साँसों से सरककर बिखरी हुई
महक से प्रफुल्लित
दिलकश सवेरा
अभी बहुत देर से होने को है ।

तुम सो जाओ ...

तुम सो जाओ .....



----अरविंद पाण्डेय
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It is My Destiny to be Ached, not it is of Thee.

· अरविन्द पाण्डेय


I know not how are You, My Empress ! in this Midnight,
No More this Moon Seems to Me Lovely and bright.

The Magic of  Magnificent  Moon is about to Vanish,
I Sit beneath  the Dome of this Black Night,with Waning Wish.


Melancholy Pervades the Sky, where ever I See,
My Bleeding Head,with Stabbed Dreams,Bow to Thee.

I Beg for Your Perpetuating Pain , Give it to me,
It is My Destiny to be Ached, not it is of Thee.

--  Aravind Pandey

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मैं भगत सिंह हूँ, भारत माता का बालक.

· अरविन्द पाण्डेय


१.
 मैं अंग्रेजो  के दीप्त-दर्प का संहारक .
मैं भगत सिंह हूँ, भारत माता का बालक.

यदि कायरता , हिंसा दोनों ही हों समक्ष.
तब, गांधी  जी ने हिंसा का था लिया पक्ष.

मैंने तो उनके ही मत का अनुसरण किया.
कायरता का कर त्याग, शौर्य का वरण किया.
२.
नेहरू जी ने रावी - तट से सन्देश दिया--
''अंग्रेजों को भारत ने अब तक सहन किया.

अब मौन ,सिर्फ मानवता का अपराध नहीं.
ईश्वर के प्रति भी है भीषण अपराध यही.''

इस तरह, सभी थे चाह रहे- वे  क्रान्ति करें.
पर, नहीं चाह थी वे  शहीद की तरह मरें.
३.
हमने शहीद होने का था संकल्प लिया.
मन में गोरों के अन्यायों को याद किया.

जालियांवाला का रक्त-कुंड, लाजपत राय.
शोषित भारत के घर घर की जो साँय साँय .

हांथों में हानि-रहित बम,पर,दुश्मन दुर्मद.
बहरों से करने बहस , गए  हम सब संसद .
४.
प्रज्ञा थी सबकी  ''दास कैपिटल''  से समृद्ध.
था हृदय तथागत के वचनों से स्वयं-सिद्ध.

सुखदेव,राजगुरु मैंने स्वयं लिया निर्णय.
हम एक बार कर चुके शत्रुओं का संक्षय.

अब दुनिया से कहना है-''देख लिया तुमने.
अपराध किया अंग्रेजों ने या फिर हमने.''
क्रमशः....

आज अमर शहीद भगत सिंह की जन्म तिथि २७ सितम्बर है..वे होते तो क्या कहते , मैं वही कहने की कोशिश कर रहा इस कविता में..आगे भी इसका अंश प्रस्तुत  होगा.
आज इतना ही..
----अरविंद पाण्डेय
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O Empress of Infinity !

· अरविन्द पाण्डेय


O Empress of Infinity,
Lovely and Luminous are Your Hairs,


Lips are Luscious, but,Eyes are in Despairs.

See,the Sky is Waiting for You to Smile,
Open Your Lips in Joy for a While.

Let the Full Moon Shine More Bright.
And,Let the Stars Surround the Moon in Sweet Delight


Aravind Pandey
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MY HEART IS BEATING. by ARAVIND PANDEY.wmv

· अरविन्द पाण्डेय


----अरविंद पाण्डेय
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..I will take You to the City of Stars,above.

· अरविन्द पाण्डेय


Come with me and
Be My Love.
I will take You to the
City of Stars, above.

God has sent You to me
As a Bliss.
Walk with Me and Let
His desire, accomplish.

There will be 
Melted Moon's Pool.
Sun will be bright, 
But,Lovely and cool.

I will make a Garland 
of Roses for You.
It will not wither away,
Will smile ever A New.

I will make a dish 
of Jupiter's fruits.
It tastes as Nectar,
and,to Angels, Suits.

Come with me and
Be My Love.
I will take You to the
City of Stars, above.

--- अरविंद पाण्डेय
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तुम भी तो भारत माता हो..

· अरविन्द पाण्डेय


         तुम भी तो भारत माता हो.

अर्धरात्रि में जब सारी दुनिया सोई थी,
स्वतन्त्रता के नव-प्रकाश में,
भारतमाता जाग उठी थीं.

प्रतिदिन ही नव-रोज़गार के लिए तरसते भ्रमण कर रहे नर की नारी ! 

तुम भी तो प्रति अर्धरात्रि में,
जब सारी दुनिया सोती है,
भूखे शिशु को दूध पिलाने की कोशिश में,
अक्सर ही जागा करती हो..!

तुम भी तो भारत माता हो..


----अरविंद पाण्डेय
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जिसके सौ करोड़ मस्तक हैं और भुजाएं द्विशत करोड़...

· अरविन्द पाण्डेय

महाशक्ति भारत और चीन 
-------------------------
जिसके सौ करोड़ मस्तक हैं और भुजाएं द्विशत करोड़.
उस भारत को नहीं समझना जन-धन-हीन और कमज़ोर.

महाशक्ति  तुम अगर बन रहे, फिर इतना तो रख लो याद.
अगर ''एशिया के सिंहों'' में स्थापित नहीं हुआ संवाद.

नियति-नटी फिर शक्ति-केंद्र अन्यत्र करेगी विस्थापित.
काल-पुरुष तब  ''तुम्हें''  करेंगे सदा सदा को अभिशापित.
----------------------------------
नीचे मैंने भारत के प्रथम और अद्वितीय प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू तथा हिंदी फिल्मोद्योग के  भारत-भक्त, धीरोदात्त नायक  श्री मनोज कुमार को याद करते हुए उनकी फिल्म ''पूरब और पश्चिम'' का गीत-''भारत का रहने वाला हूँ , भारत की बात सुनाता हूँ''--अपनी आवाज़ में प्रस्तुत किया है .
यह गीत आज भारत की स्वतन्त्रता की आलोकित रात्रि मे, उन सभी भारत-भक्तों को समर्पित करता हूँ जो भारत के  स्वर्णिम अतीत पर गर्व करते हुए उसे स्वर्णिम वर्तमान मे रूपांतरित करने हेतु निरंतर प्रयासरत हैं.
BHARAT KA RAHNE WA...


































----अरविंद पाण्डेय
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सिंध ही तो है हमारी सभ्यता की दास्तान....

· अरविन्द पाण्डेय


Aazadi Mubarak to All Brothers in Pakistan !!

सिंध ही तो है हमारी सभ्यता की दास्तान.
बँट गयी ज़मीन,पर तारीख तो अपनी ही है.
है किसी में हैसियत जो कह सके ये बात अब-
सिन्धु-घाटी है अलग तारीखे-हिन्दुस्तान से.

Pakistan will never be Problem for Us.
If will be, Only Bihar&Panjab will Solve it.
We have to switch over to Think about China-How to '' BEFRIEND ''

----अरविंद पाण्डेय
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श्रावण के इस प्रथम दिवस पर , आओ शिव को नमन करें

· अरविन्द पाण्डेय


सुख हो दुःख हो,यश अपयश हो ,मान हो या अपमान .
झूठा सारा खेल है जग का करले शिव का ध्यान.
सब कुछ करदे शिव को अर्पण ,माया मोह बिसार.
मेरे शिव हैं दीनदयाल.

नीचे प्रस्तुत शिव-भजन मैंने आज से ५ वर्ष पहले लिखकर साम्ब सदाशिव को अर्पित किया था..यह हिन्दी फिल्म --१. प्रेमरोग के गीत -- सुख दुःख आये , जाए, २.काजल के गीत के तोरा मन दर्पन कहलाये ,३.संत ज्ञानेश्वर के गीत जोत से जोत -- की धुनों पर संगीतबद्ध किया गया था..
किन्तु इसकी रिकार्डिंग का अवसर २०१० मे तब मिला जब तनुसागर ने अपना एक रिकार्डिंग स्टूडियो अंतरा -- पटना मे बनाया..इस भजन की रिकार्डिंग और मिक्सिंग उन्होंने की है और मेरा विश्वास है यह भजन साम्ब-सदाशिव को प्रिय है ..
आज श्रावण के प्रथम दिवस पर यह पुनः शिवार्पित -- लोकार्पित है.. 
नीचे का लिंक क्लिक करें --


---अरविंद पाण्डेय
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कीट्स हों दिल में तो फिर इस ज़िंदगी में क्या कमी.

· अरविन्द पाण्डेय

जॉन कीट्स 
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हों अगर ग़ालिब जेहन में , हों जुबां पर कालिदास  .
कीट्स हों दिल में तो फिर इस ज़िंदगी में क्या कमी.
----अरविंद पाण्डेय
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मुझे, रह रह के मेरी माँ की याद आती है..

· अरविन्द पाण्डेय


सुखन, जुबान से निकले तो भला क्यूँ निकले .
मेरे इक दोस्त के यहाँ साया-ए-मातम है.
दगा-गरों के सितम का है वो शिकार हुआ.
भरोसा कौन करे, किसपे , बस यही गम है.

बहुत उदास हो गयीं हैं वादियाँ , ये चमन .
नई बारिश भी जाने क्यूँ मुझे रुलाती है.
कोई पनाह, सहारा न अब तो दिखता है .
मुझे, रह रह के मेरी माँ की याद आती है.


मैंने रफ़ी साहब द्वारा गया हुआ गीत '' जब भी ये दिल उदास होता है..जाने कौन आसपास होता है..'' अपनी आवाज़ मे रिकॉर्ड कराया है..आप इसे ज़रूर सुनें और बाताये कि क्या मैं इस गीत में अपना दर्द भर पाया..


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----अरविंद पाण्डेय


( सुखन = कविता . दगा-गर = विश्वासघाती )
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तुम स्वप्न-शान्ति मे मिले मुझे-गुरुदेव रवींद्रनाथ के प्रति

· अरविन्द पाण्डेय


तुम प्रकृति-कांति में मिले मुझे ,
जब नहीं हुआ प्रत्यक्ष मिलन.

रश्मिल-शैय्या पर शयन-निरत,
चंचल-विहसन-रत अप्रतिहत,
परिमल आलय वपु,मलायागत,

तुम अरुण-कांति में मिले मुझे,
जब नहीं हुआ प्रत्यक्ष मिलन.

जब विहंस उठा अरविंद-अंक,
अरुणिम-रवि-मुख था निष्कलंक,
पतनोन्मुख  था पांडुर मयंक,

तुम काल-क्रांति में मिले मुझे ,
जब नहीं हुआ प्रत्यक्ष मिलन .

जब ज्वलित हो उठा दिव्य-हंस,
सम्पूर्ण हो गया ध्वांत-ध्वंस,
गतिशील हो उठा मनुज-वंश,

तुम कर्म-क्लान्ति मे मिले मुझे,
जब नहीं हुआ प्रत्यक्ष मिलन.

आभा ले मुख पर पीतारुण,
धारणकर, कर में कुमुद तरुण,
जब संध्या होने लगी करुण,

तुम निशा-भ्रान्ति में मिले मुझे,
जब नहीं हुआ प्रत्यक्ष मिलन.

जब निशा हुई परिधान-हीन,
शशकांत हो गया प्रणय-लीन,
चेतनता  जब हो गई दीन,

तुम स्वप्न-शान्ति मे मिले मुझे,
जब नहीं हुआ प्रत्यक्ष मिलन.

तुम प्रकृति-कांति मे मिले मुझे,
जब नहीं हुआ प्रत्यक्ष मिलन..

--------------------

यह गीत मैंने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रति हुई अपनी वास्तविक अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए लिखा था दिनांक ०८.१०.१९८३ को .. रवीन्द्रनाथ का जीवन मुझे अपना सा लगता है..मुझे लगता है मैं उनके साथ रहा हूँ.या मैं वही था ..बड़ी गहन अनुभूतियाँ हैं ..कभी विस्तृत रूप मे व्यक्त होंगी ही..
यह गीत मैंने ७ मई के अवसर पर आपके लिए प्रस्तुत किया  है..
ब्लॉग में अपनी टिप्पणी अवश्य लिखे आप..

----अरविंद पाण्डेय
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मैं हूँ अनंत,अविकल,अपराजित,अखिल,शेष

· अरविन्द पाण्डेय


भगवान  अनंत   शेष के इन पार्थिव प्रतीक के चित्र का दर्शन करने का सौभाग्य मुझे इंटरनेट  पर प्राप्त हुआ..
भगवान शेष , महाविष्णु को अपनी कुण्डली पर एवं  समस्त पञ्चभूतात्मक सृष्टि को अपने सहस्र फणो पर धारण करते हुए अपने परमानंदस्वरुप मे स्थित रहते हैं..
इस चित्र के दर्शन से उनकी स्तुति करने की इच्छा हुई इसलिए ये पंक्तियाँ प्रस्तुत हुईं..
आप इसे पढ़ने के बाद , ब्लॉग मे अपनी टिप्पणी लिखने की कृपा करें..
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सम्पूर्ण सृष्टि   की सत्ता  का   मैं  अधिष्ठान 
मैं  पंचभूत  के विस्तृत वैभव का वितान.

मेरे सहस्रफण की मणि का प्रज्ज्वल प्रकाश.
संसृति को देता जन्म,पुनः करता विनाश.


मुझमें  ही  भास   रही  देखो   संसृति अशेष.
मैं हूँ अनंत,अविकल,अपराजित,अखिल,शेष 

-----अरविंद पाण्डेय
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आज शाम वक्त मेरे साथ था . ..

· अरविन्द पाण्डेय





आज शाम वक्त मेरे साथ था . 

मैं अपने मित्र तनुसागर के स्टूडियो ''अंतरा '' गया और एक गीत अपनी आवाज़ मे रिकार्ड कराया जिसकी इच्छा मुझे वर्षों से थी..
मेरे साथ मेरे मित्र आमोद जी भी थे जिन्होंने रिकार्डिंग मे सहयोग किया..
तनुसागर ने अपनी रिकार्डिंग और मिक्सिंग प्रतिभा का ऐसा प्रयोग इस गीत मे किया कि मुझे अब इसे सुनते हुए लग रहा है कि मैंने इस गीत को गाकर अपने आतंरिक सौन्दर्य से इसे कुछ और भी मोहक बनाया है..
यह मेरा अनुभव है आप का अनुभव क्या होगा - मुझे नहीं पता ..
यह गीत शर्मीली फिल्म का है .
शशि कपूर ने इस गीत को गाते हुए जितने सुन्दर सम्मोहक दृश्यों का सृजन अपने अभिनय से किया था वैसे सुन्दर सम्मोहक दृश्य का सृजन आज का कोई भी अभिनेता नहीं कर सकता ..
'' कल रहे ना रहे मौसम ये प्यार का.
कल रुके ना रुके डोला बहार का.
चार पल मिले जो आज,प्यार मे गुजार दे.
खिलते हैं गुल यहाँ ,खिल के बिखरने को..........''
आप इसे ज़रूर सुने.. और बताये कैसा लगा आपको ..






----अरविंद पाण्डेय
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ये जिस्म है लिबास,इस लिबास से क्या इश्क

· अरविन्द पाण्डेय


ये  जिस्म  है लिबास , इस लिबास से क्या इश्क .
ये आज साफ़ है तो कल हो जाएगा खराब.
जो इसको पहनता है वो है रूहे   - कायनात ,
मुझको तो मुहब्बत , बस उसी रूह से हुई.. 


----अरविंद पाण्डेय
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कृष्ण हाथ उसके बिकते,संसार गया जो हार .

· अरविन्द पाण्डेय



कामशून्य ही पा सकता है परमात्मा का प्यार.
कृष्ण हाथ उसके बिकते संसार गया जो हार 
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समः शत्रौ च मित्रे च ,तथा मानापमानयो:
शीतोष्णसुखदु:खेषु, समः संगविवर्जितः 

गीता के द्वादश अध्याय मे श्री भगवान ने उन गुणों का व्याख्यान किया है जिन गुणों के कारण वे स्वयं किसी मनुष्य से प्रेम करने लगते हैं..हम सभी श्री भगवान से प्रेम करने की चेष्टा करते हैं किन्तु इस बात पर बहुत कम लोगो का ध्यान जाता है कि वे कौन से गुण हैं जिनके कारण श्री भगवान् किसी से प्रेम करते हैं.

इस श्लोक मे श्री भगवान कहते कि जो व्यक्ति शत्रु और मित्र - दोनों मे समान दृष्टि रखता है ..जो मान और अपमान - दोनों स्थितियों मे समान रहता है अर्थात चित्त के स्तर पर अविचल रहता है .. सुख और दुःख तथा प्रतिकूल और अनुकूल - दोनों परिस्थितियों मे मन की तटस्थता बनाए रखते हुए भौतिक अर्थात विनाशवान पदार्थों के प्रति राग-मुक्त रहता है वह उन्हें प्रिय है.. 

इस अध्याय मे श्री भगवान द्वारा वर्णित गुणों से संपन्न व्यक्ति का एक विशिष्ट नामकरण श्री भगवान ने स्वयं द्वितीय अध्याय मे किया है .. वह नाम है - स्थितप्रग्य.. जिसका मूल लक्षण है काम शून्यता की स्थिति ..

----अरविंद पाण्डेय
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श्री कृष्ण को सर्वव्यापी अक्षरतत्त्व के रूप मे जानना ही ज्ञान है

· अरविन्द पाण्डेय


इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम ..
विवस्वान मनवे प्राह मनुरिक्श्वाकवेsब्रवीत 

इस श्लोक के बारे मे मेरे एक मित्र ने प्रश्न किया कि जब श्री कृष्ण का प्राकट्य सूर्य के बाद हुआ था तब उन्होंने गीता मे कैसे कहा कि कर्मयोग का उपदेश उनके द्वारा सर्व प्रथम विवस्वान अर्थात सूर्य को दिया गया था..

गीता में श्री कृष्ण जब 'मैं' ' मेरा' आदि शब्दों का प्रयोग अपने लिए करते हैं तब उस शब्द का वही अर्थ नहीं होता जो सामान्य स्थितियों मे होता है ..

श्री भगवान् ने जब कहा कि इस '' कर्म योग '' का उपदेश मैंने सर्व प्रथम विवस्वान को किया तब वे यह नहीं कह रहे कि वह उपदेश उन्होंने '' कृष्ण नामधारी '' अवतार के रूप मे ही किया था..
इस प्रश्न के दो स्वरुप हैं .
प्रथम --
जब श्री कृष्ण का जन्म सूर्य अर्थात विवस्वान के जन्म के बाद हुआ तब उन्होंने सूर्य को कर्मयोग का उपदेश कैसे किया ?
द्वितीय 
यदि श्री कृष्ण के रूप मे उन्होंने यह उपदेश नहीं किया तब किसने विवस्वान को यह उपदेश किया ??
श्री ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र महर्षि मरीचि थे .. मरीचि से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ .. कश्यप जी और उनकी पत्नी अदिति से विवस्वान का जन्म हुआ था. 
विवस्वान से वैवस्वत मनु हुए ..
विवस्वान अर्थात सूर्य का भौतिक शरीर वही है जो हमें आकाश मे निरंतर दिखाई देता है..
इन्ही की परम्परा में इक्ष्वाकु का भी जन्म हुआ था जो श्री राम के पूर्व पुरुष थे..
श्री राम को भी सूर्यवंशी इसीलिये कहा जाता है..
श्री भगवान ने गीता के तृतीय अध्याय मे प्रथम बार ''मै''शब्द का प्रयोग इस श्लोक में किया है --
'' न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन .''
पुनः,इसी अध्याय मे श्री भगवान कहते है -- 
'' उत्सीदेयुरिमे लोकाः न कुर्याम कर्म चेदहम .
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्याम इमाम प्रजाः...''
इस श्लोक मे प्रथम बार श्री कृष्ण अपने सर्वव्यापी स्वरुप का उल्लेख करते हैं.. इसमे वे स्पष्ट कहते है कि यदि मै कर्म न करू तो सारी सृष्टि नष्ट हो जायेगी ..
यदि श्री कृष्ण को वासुदेव पुत्र के रूप मे मात्र वर्तमान मे अस्तित्वशाली माना जाय और तब यह श्लोक पढ़ा जाय तो यह कैसे कहा जा सकलता है कि यदि वे कर्म न करें तो सारी सृष्टि नष्ट हो जायेगी.. 
यह तभी कहा जा सकता जब यह पूर्वधारणा की जाय कि श्री कृष्ण सर्वव्यापी सर्वप्राण परमात्मा है और यदि वे निष्क्रिय हो जायेगे तो सृष्टि भी निष्क्रिय हो जायेगी .
श्री कृष्ण ने ब्रह्मा जी के रूप मे सूर्य को इसी अखंड कर्म योग का उपदेश किया था और यही कारण है कि सूर्य भी सारी सृष्टि के प्राण है..
विज्ञान के अनुसार भी यदि सूर्य रूक जाय , सूर्य बुझ जाय तो सौरमंडल के सभी गृह जीवन विहीन हो जायेगे..
अतः श्री कृष्ण द्वारा महाविष्णु नाभिकमल से उत्पन्न श्री ब्रह्मा के रूप मे , सूर्य को गीता मे उल्लिखित '' कर्मयोग '' की दीक्षा दी गयी थी.. 
और इसी तथ्य का उल्लेख उन्होंने गीता के चतुर्थ अध्याय के प्रथम श्लोक मे किया है ..
श्री कृष्ण के '' मै '' को जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता..
उन्होंने स्पष्ट कहा है ..
यो माम् पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति.
तस्याहं न प्रणश्यामि, स च मे न प्रणश्यति ..
श्री कृष्ण को सर्वव्यापी अक्षर तत्त्व के रूप मे जानना ही शुद्ध ज्ञान है और यही जीवन का परम लक्ष्य है..

----अरविंद पाण्डेय
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जब जब असभ्य इरविन कोई इतराएगा..तब तब यह भारत,भगतसिंह बन जाएगा

· अरविन्द पाण्डेय




१ 
जब कायरता को लोग अहिंसा मानेगे.
जब जब असत्य को सत्य मान, अपना लेगे.

जब जब धरती अपनो से ही आकुल होगी.
जब हुक्मरान होगे निर्दयी,मनोरोगी.

तब तब भारत अपना पौरुष छलकायेगा.
सुखदेव, राजगुरु,भगत सिंह बन जाएगा.

२  

जब जब समता का फूल कहीं कुम्हलाएगा.
जब आज़ादी का दीप बुझाया जाएगा.

जब जब  इंसानी इज्ज़त खतरे में होगी.
जब सत्ता पर काबिज़ होगा कोई भोगी 

जब जब असभ्य इरविन कोई इतराएगा .
तब तब यह भारत,भगत सिंह बन जाएगा.

----अरविंद पाण्डेय
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रंगों से जो महरूम हैं,उनका भी कर ख़याल

· अरविन्द पाण्डेय

रंगों से भरी है सुबह,है शाम भी रंगीन .
दोपहर में भी शम्स की है रोशनी हसीन.

फूलों के हुस्न की महक लिए हवा चले.
होली में ही सही ज़रा हम भी गले मिलें .

पुरहुस्न है फिजां ,है मज़े में खिला चमन .
मदहोशियाँ कुदरत की पी रहा है मेरा मन .

बदमस्त मेरे दिल से मगर कह रहा गुलाल -
''रंगों से जो महरूम हैं,उनका भी कर ख़याल ''
----अरविंद पाण्डेय
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कब तलक जीतोगे तुम , हारेगा जब हिन्दोस्तां

· अरविन्द पाण्डेय





कब तलक जीतोगे तुम , हारेगा जब हिन्दोस्तां,
अब वतन की जीत की भी फ़िक्र होनी चाहिए .

दिव्य भारत भूमि की जिस कोख ने हमको जना,
कुछ करो - उस कोख की तो लाज बचनी चाहिए ।

जिस ज़मीं का जल, रगों में खून बन कर बह रहा ,
उस ज़मी की, खाक में, इज्ज़त न मिलनी चाहिए ।

जो वतन की रहजनी के ख़ुद ही जिम्मेदार हैं ,
उनके ऊपर सुर्ख आँखें, अब तो, तननी चाहिए ।

जो शहीदों की शहादत का करें सौदा कभी,
उनके आगे अब कभी आँखें न झुकनी चाहिए ।

आज जो खामोश हैं वो कल भरेंगें सिसकियाँ ,
इसलिए, हर शख्स की बाहें फडकनी चाहिए।

बात जो हिंदुत्व की , इस्लाम की , करते बड़ी 
उनके पाखंडी जेहन की पोल खुलनी चाहिए ।

शक्ल इंसानी , मगर दिल है किसी शैतान का 
उन रुखों की असलियत, दुनिया को दिखनी चाहिए ।

बह गया पौरुष सभी देवों का फ़िर से एक बार ,
अब , ज़मीं पर फ़िर कोई दुर्गा उतरनी चाहिए ।
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मुझे याद आ रहा है कारगिल युद्ध --जब कारगिल
के कातिलों को , देशभक्त होने का दावा करने वालों 
ने , बहत्तर घंटे तक , भाग जाने का खुला
रास्ता देकर , कारगिल के पाँच सौ से अधिक
शहीदों की शहादत का अपमान किया था --

मुझे याद आ रहा है वह दिन, जब एक
अरब की जनसंख्या वाल्रे इस देश के
रहनुमाओं ने कंधार , जाकर देश पर हमला
कराने और करने वालो को मुक्त किया था ।

वही लोग दाउद को सौपने की मांग कर रहे हैं ।
मगर , क्याये नेता इस बात की गारंटी देंगें
कि ये फ़िर दाउद को लाहौर या कंदहार
जाकर नही छोड़ आयेंगे ? 

ये लोग शायद ख़ुद के बारे में ज़्यादा
सोच रहे है कि कौन सी राजनीति करे
कि हम भारत के लोग , इनसे वह सवाल
करना भूल जाय
जो अभी एकस्वर से कर रहे हैं ।

इसलिए शायद इन्हें यह सद्बुद्धि आए कि ये लोग
वह सब करने से बचेंगें जो करने की
इनकी आदत रही है ।
शहीद हेमंत करकरे की पत्नी और शहीद संदीप
उन्नीकृष्णन के पिताने देश से कहा था 
कि अपनी कुर्सी के लिए देश के मूल्यों 
की ह्त्या करने वालों को अगर दंड नही दे सकते
तो उनसे न मिलकर, ये बता सकते हैं कि आप
किसी शहीद को सम्मानित करने के योग्य नही ।
 तो आइये एक नए भारत
निर्माणके लिए कुछ नया चिंतन करे ।
नया सृजन करें ।
शुद्ध और सशक्त विचारों से एक नया रास्ता बनाए ।

---- अरविंद पाण्डेय


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अतः , आज शिव-शक्ति समन्वय, मानव को करना है..

· अरविन्द पाण्डेय




यह संसृति, सुव्यक्त  रूप है उस निगूढ़ सत्ता    का 
जो प्रत्येक परमाणु -खंड में प्रतिपल व्याप  रही  है 
करना  है नर  को अन्वेषण , दर्शन  उस सत्ता  का.
इसी हेतु, प्रति व्यक्ति विश्व के तल पर व्यक्त हुआ है 

निखिल जगत के सूक्ष्म-तत्व का पर्यालोकन करके
मानव को निज का विशुद्ध शिव-रूप प्राप्त करना है  
है विज्ञान सहायक इसमें ,पर  उसमें भी त्रुटि है.
नव विज्ञान शिवत्व-रहित है, ईर्ष्या-द्वेष सहित है 

शिव के अपमानित होने पर शक्ति नष्ट करती है .
निज शरीर को तथा अनादर-कर्ता निज स्रष्टा को.
शक्ति-नाश से शंकर भी प्रलयंकर बन जाता है .
अतः आज शिव-शक्ति समन्वय, मानव को करना है .


शक्ति प्राप्तकर नर यदि उसको शिव-मंडित करता है 
तभी बन सकेगा वह सबसे श्रेष्ठ बुद्धि के बल से.
पुरुष-कामना पूर्ण करेगी प्रकृति सदा स्वेच्छा से.
अखिल विश्व में मानवता का जय- निनाद बिखरेगा ..
==============================


यह स्तुति मैंने १९८० में लिखी थी किशोरावस्था में ..
शिव का अर्थ कल्याण और शक्ति का अर्थ ऊर्जा..
भारत, ऊर्जा और आत्मा - दोनों को सत्य और चेतन मानता है ..
और इसीलिये शिव-शक्ति के समन्वय और उनके विवाह का पर्व मनाते हैं हम ..
विज्ञान द्वारा ऊर्जा अर्थात शक्ति का विवाह शिव अर्थात कल्याण के साथ न किये जाने के कारण परमाणु बम का जन्म हुआ ..
परमाणु में  निहित अनंत ऊर्जा मानव कल्याण के लिए प्रयुक्त होनी थी परन्तु विज्ञान ने उसका प्रयोग मानव नरसंहार के लिए किया ..
यह विज्ञान के इतिहास का सर्वाधिक कलुषित अध्याय है ..

जगत्पिता  शिव और जगन्माता पार्वती के विवाह - दिवस महाशिवरात्रि  का संकल्प -- 
 '' अतः , आज शिव शक्ति समन्वय मानव को करना है '' 



ब्लॉग में पूरी कविता पढ़ें और ब्लॉग में अपनी टिप्पणी भी लिखने का कष्ट करें .
----अरविंद पाण्डेय
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मैं भारत हूँ, मैं भा - रत हूँ , मैं प्रतिभा - रत ...

· अरविन्द पाण्डेय



 १.
 मैं भारत हूँ, वसुधा   की प्रज्ञा का प्रकाश .
मैं ज्ञान-यज्ञ  की भूमि,प्रणव का पुरोडाश .

परमर्षि भरत ,राजर्षि  भरत  मेरे सुपुत्र .
जिनके चरित्र का स्मरण,चित्त करता पवित्र .

मैं  भरत  नाम के  दो  पुत्रों से, हूँ भारत .
मैं भारत हूँ, मैं  भा- रत  हूँ , मैं प्रतिभा - रत


2
मैं युद्धभूमि के मध्य,  ज्ञान का दाता हूँ .
मैं महानाश के क्षण का सृजन-विधाता हूँ.

मैं अग्निकुंड से शशिमुख - रमणी प्रकट करूं
मैं शशि-शीतल भ्रूमध्य-विन्दु से अग्नि झरूँ .

मैं घटाकाश का महाकाश में विलय करू..
मैं भारत हूँ , नव-सृजन हेतु मैं  प्रलय करूं...

क्रमशः 
=================

आप सभी को गणतंत्र दिवस की शुभ कामनाएं..
आपके लिए मैंने ये कविता लिखी है
..
महाशक्ति बन रहे अपने पड़ोसी
के साथ नियति द्वारा ली जाने वाली परीक्षा निकट भविष्य में ही होनी है..

आइए हम सभी उसकी भी तैयारी करें.

कल मेरे प्रिय मित्र आमोद  जी ने मुझे मेरे जन्म दिन के अवसर पर
एक सुन्दर सुनहरी कलम का दान किया..

वैसे मैं जन्म दिन पर ईश्वर का विशेष ध्यान  करता हूँ  ..
कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं करता..
और  मैं उपहार के रूप में या अन्य किसी भी रूप में कभी कोई वस्तु स्वीकार नहीं करता क्योकि
मुझे अखंड विश्वास है कि ली हुई वस्तु अनिवार्य रूप से दाता को देनी पड़ती है..

किन्तु कलम और वह भी भारत-भक्त आमोद जी के द्वारा प्राप्त -- मैं अस्वीकार न कर सका ..
ये ऋण चुकाने का भावी दायित्व मैंने स्वीकार किया ..

उसी कलम से यह कविता मैंने लिखी..
''मैं भारत हूँ, मैं  भा- रत  हूँ , मैं प्रतिभा - रत''

मुझे यह संक्षिप्त लेखन अति प्रिय लगा ..
आपको कैसा लगा --कृपया ब्लॉग पर टिप्पणी लिखना न भूलियेगा ..

----अरविंद पाण्डेय
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रामायण ,गीता का नियमित पारायण

· अरविन्द पाण्डेय




एक शोध के अनुसार, कविता का नियमित अध्ययन और  संभव  हो  तो काव्य - रचना  , मस्तिष्क की स्मृति संबंधी कोशिकाओं को सशक्त करता है.. और ऐसा करने से वृद्धावस्था तक स्मृति शक्ति तीव्र बनी रहती है ..इसीलिये भारतीय संस्कृति में रामायण , गीता आदि के नियमित पारायण की व्यवस्था की गई है.. ..यह पारायण, अर्थ ज्ञान के साथ करने का विधान है ..सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रसूलल्लाह ने भी फरमाया है कि चाहे एक ही आयत पढ़ने में रातभर का वक्त लग जाय पर मतलब समझते हुए कुरआन शरीफ की तिलावत करनी चाहिए ..

----अरविंद पाण्डेय
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ख़ाक न हो खाकी की इज्ज़त पियो न खादी की हाला .

· अरविन्द पाण्डेय




ख़ाक न हो खाकी की इज्ज़त
पियो न खादी की हाला .

मित्र न समझो पद,कुर्सी को..
मनमोहक साकी-बाला..

देश-भक्ति जब बने सुरा ,औ '
देश बने जब मदिरालय ..

खाकी ,खादी को तब मधु से ..
तृप्त करेगी मधुशाला

----अरविंद पाण्डेय
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कुछ करो, आखिर तो तुम भी इस ज़मीं के हो सपूत

· अरविन्द पाण्डेय


कुछ करो, आखिर तो तुम भी इस ज़मीं के हो सपूत ..
अब तो भारत-वर्ष की किस्मत संवरनी चाहिए ..


----अरविंद पाण्डेय
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मूलतः कुरान भी सभी धर्मों को ईश्वर-कृत ही मानता है...

· अरविन्द पाण्डेय


विश्व के समस्त धर्म, हिन्दू धर्म -- सनातन धर्म की शाखाएँ हैं.
विश्व के सभी लोग मानते है कि ऋग्वेद दुनिया का प्रथम लिखित ग्रन्थ है ..
कुरान में ईश्वर कहते है कि मोहम्मद के पहले जितने देवदूत आये वे सब ईश्वर का ही कार्य करके गए ..

मूलतः कुरान भी सभी धर्मों को ईश्वर-कृत ही मानता है .....
कुरान , सभी धर्मों के देवदूतों को सम्मान देने का आदेश मुसलमानों को देता है ...
किन्तु इस्लाम के नाम पर राजनीति और शासन करने वालों ने इस्लाम का प्रयोग अपने तरीके से किया...

इस्लाम , मूलतः विश्व शान्ति की रक्षा का धर्म है...
आज ईसाई माना जाने वाला अमरीका सारी दुनिया को नष्ट करने लायक हथियार बना चुका है ...
मगर इसका सम्बन्ध ,उसके राष्ट्रपतियों के ईसाई होने से बिलकुल नहीं है है

----अरविंद पाण्डेय
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आओ कुछ दीप-पुंज , ऐसा प्रज्ज्वलित करें ,

· अरविन्द पाण्डेय

ऋषियों के ज्ञान के प्रकाश में ,

आओ कुछ दीप-पुंज ,

ऐसा प्रज्ज्वलित करें ,

जो इस धरती माँ का ,

घना अन्धकार हरे ...



----अरविंद पाण्डेय
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मैं नहीं चाहती थी निन्दित रघुनन्दन हों..मैं नारी हूँ...3

· अरविन्द पाण्डेय







श्री दुर्गा पूजा के महापर्व पर विश्व की सभी शक्ति-स्वरूपिणी नारियों को समर्पित.3
६ .
मैंने अपनी निजता का निर्भय किया दान.
प्रज्ज्वलित-अग्नि में कर प्रवेश, मैं थी अम्लान.

मैं नहीं चाहती थी निन्दित रघुनन्दन हों.
था स्वप्न - राम का सार्वभौम अभिनन्दन हो.

इसलिए, सहज निर्वासन था स्वीकार मुझे.
अन्यथा, राम क्या करते अस्वीकार मुझे?
७.
मैंने तमसा-तट पर लक्ष्मण से कहा -तात !
श्री राम बनें आदर्श चक्रवर्ती सम्राट .

वे करें प्रजा-पोषण सोदर भाई समान.
जीवन उनका, यश,धर्म,कीर्ति का हो निधान.

कहना उनसे- मैथिली नहीं हैं व्यथा-विद्ध.
बस एक कामना, राघव हों अतुलित प्रसिद्द.
७.
श्री राम-राज्य की नारी भी थी मैं, प्रबुद्ध.
मैंने चाहा था- रावण से हो महायुद्ध.

राक्षसी हिंस्र-संस्कृति का जिससे हो विनाश.
बंधुता तथा समता,स्वतन्त्रता का प्रकाश-

प्रत्येक मनुज के अंतर में उद्भासित हो.
वसुधा, करूणा से कुसुमित और सुवासित हो..
८.
यदि राम-सभा में जा,मैं करती अभिवेदन.
तब निश्चित ही निरस्त हो जाता निर्वासन.

श्री राम और मैं करते वैयक्तिक-विलास.
पर उस आदर्श-परिस्थिति का रुकता विकास.

जिसमें शासक त्यागा करते हैं पद अपना .
पर,जो आसक्त पदों में,उनसे क्या कहना !
९.

वास्तव में, मैंने साम्राज्ञी-पद त्यागा था.
क्या कहूं ,राज्य का जन-समुदाय अभागा था.

पुट-पाक सदृश वेदना राम को बींध गई.
जीवन भर मैं श्री राम-विरह में दग्ध हुई.

इस अग्नि-सिधु मंथन से बस यह अमृत मिला.
राघव के अक्षर यश का सुरभित पुष्प खिला.
१०.
मैं वही जबाला, जिसने नहीं विवाह किया.
पर, सत्यकाम जाबाल-पुत्र को जन्म दिया.

प्रारंभ किया जिसने परम्परा गुरुकुल में
है पिता-नाम अनिवार्य नहीं नामांकन में

गरिमामय नारी -स्वतन्त्रता का प्रथम घोष
था समय एक , मैं मानी जाती थी अदोष
८ .
मैं वही अपाला , कुष्ठ -रोग से जो पीड़ित.
थी देह नही रमणीय , पुरूष सब थे परिचित.

सौन्दर्य नहीं था छलक रहा मुझसे बाहर
पर, प्रज्ञा का सागर लहराता था अन्दर

मेरे मंत्रों से प्रथम वेद है आलोकित
मेधा-बल से मैनें समाज को किया विजित..
==============================
स्त्री के प्रति भारत की विलक्षण, शाश्वत और यथार्थवादी दृष्टि के विरोध में, बुद्धि-दरिद्रों द्वारा, माता मैथिली के निर्वासन का उदाहरण दिया जाता है..किन्तु यह उदाहरण उनके द्वारा ही दिया जाता है जिन्होंने एक बार भी वाल्मीकीय रामायण का पारायण नहीं किया.वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड के पैंतालीसवें सर्ग के सत्रहवें श्लोक में श्री राम का लक्ष्मण को दिया गया आदेश अंकित है--
गंगायास्तु परे पारे वाल्मीकेस्तु महात्मनः .
आश्रमो दिव्यसंकाशः तमसातीरमाश्रितः
श्री राम ने लक्ष्मण से कहा था -'' गंगा के पार स्थित तमसा नदी के तट पर, महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है..लक्ष्मण ! तुम कल प्रातः सीता को उसी आश्रम के निकट पहुचाकर वापस आना.''
अर्थात श्री सीता को निर्जन वन में छोड़ने का आदेश श्री राम का नहीं था.
इसी तरह,जब श्री मैथिली को वाल्मीकि आश्रम के निकट ले जाकर निर्वासन की राजाज्ञा लक्ष्मण द्वारा सुनाई गई तो उन्होंने लक्ष्मण से कहा-
यच्च ते वचनीयम स्यादपवादः समुत्थितः
मया च परिहर्तव्यम त्वम् हि मे परमा गतिः
अर्थात श्री मैथिली ने लक्ष्मण से श्री राम के लिए अपना सन्देश भेजा था- ''जनसमुदाय के बीच जो आपकी निंदा कुछ घटनाओं के कारण हो रही है उसे समाप्त करना मेरा भी कर्तव्य है..आप धर्मपूर्वक जनसमुदाय का पालन वैसे ही कीजिये जैसे अपने सगे भाइयों का करते हैं.मुझे आपके धर्मानुकूल शासन की चिंता है , अपने शरीर की नहीं. ''
इस प्रकार श्री मैथिली ने निर्वासन स्वीकार करके, वास्तव में, राज्य-हित में अपना साम्राज्ञी का पद त्यागा था.
मानव-मन की इस सर्वोत्कृष्ट अवस्था को हृदयंगम कर पाना लोभ,मोह,मद से कलुषित चित्त के लिए संभव नहीं.
श्री मैथिली द्वारा साम्राज्ञी-पद का स्वेच्छया किये गए त्याग की परम्परा का ही निर्वाह आज भी तब होता है जब कोई लाल बहादुर शास्त्री या कोई नीतीश कुमार किसी रेल दुर्घटना के बाद नैतिकता के वशीभूत, निजी रूप से दोषी न होते हुए भी, पद से त्यागपत्र देता है.

..पश्चिम में , महान नारीवादी चिन्तिका - सिमोन द बउआर एवं अन्यों द्वारा प्रारंभ किया गया नारी मुक्ति आन्दोलन , पश्चिमी समाज के लिए पूर्णतः हानिकारक रहा। .क्योंकि यह प्रतिक्रया में, पुरूष - द्वेष के साथ , प्रारंभ किया गया था ..
प्रतिक्रया या द्वेष में प्रारंभ किया गया कोई भी कार्य अपने परिणाम के साथ अप्रिय अंश भी लेकर आता है ..
वही हुआ..
पश्चिमी समाज में , नारी-वादी स्त्रियों ने, पुरूष द्वेष में ,पुरुषों से बचने के लिए, ऐसी विकृतियों को आत्मसात् किया जिसनें वहाँ की परिवार -प्रणाली का सर्वनाश कर दिया ।
माता , पिताके प्रारम्भिक प्रेम और वात्सल्य से वंचित युवा ,
सहजात मनोवृत्तियों के वशीभूत और मनोविकृतियों से पीड़ित स्त्री -पुरूष,
और खंडित परिवारों का विशाल खँडहर ॥
परिणाम यह भी हुआ कि भारत का कोई संत वहाँ जाए तो लाखों की संख्या में स्त्री -पुरूष उसके अनुयायी बनने के लिए तैयार , समर्पित ॥
आज सारा पश्चिम भारत की ओर आशा के साथ देख रहा कि भारत, उसके सामाजिक -अस्तित्व की रक्षा, अपने पुरातन किंतु चिर-नवीन संस्कारों के साथ कर पायेगा !
हम भारत के लोगों ने कभी किसी विषय पर खंडित अथवा अपूर्ण दृष्टि के साथ विचार नहीं किया ।
स्त्री - स्वतन्त्रता हमारे यहाँ जितनी वैज्ञानिकता के साथ उपलब्ध थी , वैसी कहीं नही थी, न है ।
इन कविताओं में मैंने भारत की उन महान स्त्रियों की स्तुति की है जिन्होनें अपनी प्रज्ञा के बल से स्त्री - मूलक सामाजिक क्रान्ति का नेतृत्व किया था जो आज की स्त्रियों के लिए भी अति कठिन है ।
आज ऋग्वेद के आकार लेने के हजारों साल बाद , भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि किसी बच्चे का विद्यालय में नामांकन कराते समय , यह अनिवार्य नही होगा कि उसके पिता का नाम बताया जाय ।
विद्यालय में यदि सिर्फ़ माता अपना ही नाम बताती है तो भी नामांकन किया जाएगा।
इस निर्णय को हम ऋग्वेद में वर्णित माता जबाला की कथा के प्रकाश में देखें तो लगेगा कि माता जबाला नें अपने आत्मबल से जो कार्य उस समय अकेले किया था उस कार्य को कराने के लिए आज सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पडा ।
माता जबाला नें अपने पुत्र जाबाल को को गुरुकुल में नामांकन के लिए भेजा ।
वहा कुलपति ने जाबाल से पिता का नाम पूछा और कहा कि पिता के नाम के साथ ही नामांकन होगा ।
जाबाल को पिता का नाम माँ ने कभी बताया नही था न ही वह अपने पिता से कभी मिला था .
उदास जाबाल माँ के पास आया और सारी बातें बताईं ..
माँ ने कहा कि तेरे पिता का नाम मैं भी नहीं जानती । मैं आश्रम में रहती थी । विवाह नही किया ।
किंतु प्रेम - पूर्ण स्थिति में किस ऋषि से तेरा जन्म हुआ , नही मालूम ।
तू जा गुरुकुल और आचार्य से कह दे कि मेरी माता का नाम जबाला है और मेरा नाम सत्यकाम जाबाल है .वे मंत्रद्रष्टा ऋषि हैं । किस ऋषि से मेरा जन्म हुआ , यह उन्हें भी नही मालूम .
बालक जाबाल जाता है गुरुकुल माँ के वचन दुहराता है वहाँ आचार्य से।
कुलपति, सत्यकाम जाबाल और माता जबाला की सत्यनिष्ठा का सम्मान करते हैं और जाबाल का नामांकन गुरुकुल में हो जाता है ।
इसी प्रकार माता अपाला कुष्ठ -रोग से पीड़ित थीं । किंतु, उन्होंने अपने प्रग्याबल से उस रोग को समाप्त किया । और मन्त्र-द्रष्टा ऋषि बनीं ।
समस्त पुरुषों के लिए सम्माननीय ।
भारतीय - संस्कृति में स्त्री-स्वातंत्र्य सार्वभौम रूप से उपलब्ध किए जाने का संकल्प है ।
किंतु यह स्वातंत्र्य अपने इन्द्रिय सुखों की प्राप्ति के लिए नही अपितु सत्यकाम जाबाल जैसा महान पुत्र उत्पन्न कराने के उद्देश्य से संकल्पित है ।
स्त्री अपने प्रग्याबल से समाज को सशक्त, सुबुद्ध , सुंदर , सुनम्र बना सकती हैं ।
स्त्री की सृष्टि ही इस हेतु हुई ।
किंतु ऐसा करने के लिए स्त्री को स्वयं प्रग्यावती , सशक्त , सुबुद्ध और अंतःकरण से सुंदर बनना होगा ।
सौन्दर्य स्त्री की नियति है --
पुरूष को वश में करने के लिए और उससे समाज की सार्वभौम सेवा कराने के लिए ।
पुरूष के समस्त कर्मों की प्रेरक स्त्री है --
स्त्री है तो पुरूष है --
स्त्री - पुरूष हैं तो समाज और प्रकृति सुरक्षित हैं ।
समस्त प्रकृति की रक्षा के लिए स्त्री का सुन्दरीकरण ,सशक्तीकरण और समरस स्त्री-पुरूष संबंधों का विकास आवश्यक है.

----अरविंद पाण्डे
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तुम मेरे सपनों की सीमा ...

· अरविन्द पाण्डेय



मैं तुम्हारी देह को , खुशबू बनूँ , फ़िर छू के महकूँ ,
मैं तुम्हारे ह्रदय को, संगीत बन , , छूकर के बहकूँ ,

अब यही सपना मेरी आंखों में
हर पल तैरता है ,


तुम मेरे सपनों की सीमा
पर तुम्हें क्या ये पता है


----अरविंद पाण्डेय
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आज करेंगीं मां जगदम्बा महिषासुर संहार

· अरविन्द पाण्डेय



आज करेंगीं मां जगदम्बा महिषासुर-संहार
सुनकर ब्रह्मा ,विष्णु, रुद्र से अपनी जयजयकार

१
जीत लिया है स्वर्ग इन्द्र से, स्वयं इन्द्र है बना हुआ
सूर्य, अग्नि ,यम, वरुण ,रुद्र से उनके हक को छीन लिया
सारे जग में फैल रहा महिषासुर का आतंक घना
धरती क्या , आकाश और पाताल तलक परतंत्र बना

ब्रह्मा को ले साथ गए सब देव, विष्णु, शिव के आगे
पूछा कैसे महिष मरे , कैसे अपनी किस्मत जागे

आज करेंगीं मां जगदम्बा महिषासुर-संहार ...

२

सब देवों से प्रकट हुआ तब , उस पल भारी तेज वहाँ
कुछ पल में ही गरज उठीं जगदम्ब भवानी तभी वहाँ
दिया विष्णु ने चक्र , रुद्र ने शूल किया अर्पण उनको
शंख वरुण ने ,वज्र इन्द्र ने , ब्रह्मा ने माला उनको
क्षीर-सिन्धु ने पायल ,कुंडल , चूडामणि है दान किया
सिंह हिमालय ने सागर ने कमल फूल से मां किया

आज करेंगीं मां जगदम्बा महिषासुर संहार ....

३
अट्टहास जब किया अम्ब ने दैत्यों की सेना भागी
जीवन-दीप बुझे दैत्यों के , देवों की किस्मत जागी
चंडी नें चक्षुर , चामर असिलोमा का वध किया वहीं
सारे देव और ऋषि-गण भी करते थे स्तुति खड़े वहीं
देख गरजता महिषासुर को,बोलीं मां जगदम्बा यूँ :
बस कुछ पल तू और गरज ले, तब तक मैं मधु पीती हूँ

इतना कह कर , भगवती जगदम्बा , अपनें वाहन सिंह के स्कंध से उछल पड़ीं और उस महिष-रूपधारी महादैत्य के ऊपर चढ़ गयीं । इसके बाद , उन्होंने उसके कंठ पर अपने शूल से प्रहार किया । तब महिष का मस्तक कट गया और उस कटी हुई गर्दन से वह महादैत्य बाहर निकालने लगा । तब देवी ने विशाल कृपाण निकाली और उसका मस्तक काट गिराया । इसके बाद दैत्यों की विशाल सेना हाहाकार करती हुई भाग गयी । सभी देवता अति प्रसन्न हुए और श्री जगदम्बा की स्तुति करने लगे ।

आज करेंगीं मां जगदम्बा महिषासुर-संहार ....
सुनकर ब्रह्मा ,विष्णु, रुद्र से अपनी जयजयकार ..
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
यह गीत मेरे द्वारा २००३ में लिखा और संगीतबद्ध किया गया था और वीनस म्यूजिक कंपनी द्वारा इसे रिकॉर्ड कराकर बाज़ार में प्रस्तुत किया गया था । यह गीत नंदिता के स्वर में है जिसका साथ मैंने भी दिया है । ESNIPS
पर यह गीत उपलब्ध है जिसे डाउन लोड किया जा सकता है । जिसका लिंक नीचे दिया गया है ।
पवित्र नवरात्र के अवसर पर यह भक्ति - गीत सभी मित्रों को सादर समर्पित है ॥

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----अरविंद पाण्डेय
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हम शरणागत है माँ विंध्याचल -रानी

· अरविन्द पाण्डेय




तुम कर दो अब कल्याण,सुनो कल्याणी
हम शरणागत है माँ विंध्याचल -रानी

१
तुमने ही तो कृष्ण -रूप में ब्रज में रास रचाया
युगों युगों तक भक्त जनों के मन की प्यास बुझाया
शिव ही तो राधा बनकर ब्रज की धरती पर आए
इस प्यासी धरती पर मीठी रसधारा बरसाए

हम रस के प्यासे लोग, न चाहे भोग, सुनो कल्याणी
हम शरणागत है माँ विंध्याचल -रानी

२
सारे ज्ञानी-जन कहते हैं तुम करुणा की सागर
फ़िर कैसे संसार बना है दुःख की जलती गागर
तुम हो स्वयं शक्ति जगजननी फ़िर ये कैसी माया
इस धरती पर पाप कहाँ से किसने है फैलाया

हे माता हर लो पीर, बंधाओ धीर ,सुनो कल्याणी
हम शरणागत है माँ विंध्याचल -रानी

३

बिना तुम्हारे शिव शंकर भी शव जैसे हो जाते
तुमसे मिलकर शिव इस जग को पल भर में उपजाते
तुमने स्वयं कालिका बनाकर मधु-कैटभ को मारा
दुःख में डूबे ब्रह्मा जी को तुमनें स्वयं उबारा

हम आए तेरे द्वार, छोड़ संसार, सुनो कल्याणी
हम शरणागत है माँ विंध्याचल -रानी
==============================
यह गीत मेरे द्वारा लिखा गया और इसकी धुन तैयार की गयी । वीनस म्यूजिक कंपनी द्वारा इसे अन्य भक्ति गीतों के साथ २००३ में एक एलबम के रूप में रिलीज़ किया गया ।
इस गीत में शिव के श्री राधा रानी के रूप में अवतार लेने तथा महाकालिका के श्री कृष्ण के रूप में अवतार लेने के रहस्य का वर्णन है ।



----अरविंद पाण्डेय
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बहके हुए इस दिल को तुम चुनो या ना चुनो ..

· अरविन्द पाण्डेय





कुछ तो कहेगा दिल ये ,गर तलब इसे हुई
ये बात और है कि तुम सुनो या ना सुनो
मस्ती फिजां की देख के बहकेगा दिल ज़ुरूर
बहके हुए इस दिल को तुम चुनो या ना चुनो
=========================
कुछ मित्रों ने मेरे इस विचार पर प्रतिकूल मत दिया है कि कविता को छंद-मुक्त होना चाहिए । वे तर्क संगत एवं संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुसरण में ही यह कह रहे --ऐसा मेरा मानना है। यहाँ उल्लेखनीय है कि संस्कृत-काव्यशास्त्र में छंदोबद्ध लेखन मात्र को काव्य नही कहा गया अपितु कहा गया कि -रमणीय अर्थ का प्रतिपादक शब्द काव्य है (पंडित राज जगन्नाथ ) अथवा -काव्यं रसात्मकं वाक्यम् अर्थात् रस युक्त वाक्य ही काव्य है। परन्तु संस्कृत-काव्यशास्त्रीय सिद्धांत के आलोक में यदि शब्द और वाक्य रमणीयार्थ प्रतिपादक या रसात्मक हों तब तो ठीक किंतु इसका सहारा लेकर कुछ भी लिखे जाने और उसे काव्य कहे जाने के प्रवाह को रोकना होगा-ऐसा मेरा मानना है --यदि हिन्दी साहित्य को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाने का संकल्प हो।



----अरविंद पाण्डेय
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तुझसे ही बनेगी मेरी किस्मत तू जान ले

· अरविन्द पाण्डेय

तुझसे ही बनेगी मेरी किस्मत तू जान ले
तुझको ही चुनेगी मेरी किस्मत तू मान ले
अब तू न यूँ खामोश रह कुछ बोल तो ज़रा
गर मान नही दे तो अब मेरी ये जान ले


=============================
आजकल कविता के लोकतांत्रिकीकरण के कारण ,
श्री मैथिली शरण गुप्त के शब्दों में -
''कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है ''
की स्थिति बन गयी है ..
उर्दू साहित्य ने अपनी गरिमा
को सुरक्षित रखा है ॥
उर्दू के एक शेर पर करतल-ध्वनि से
आकाश गुंजित हो उठता है ॥Align Left
यह इसलिए क्योंकि वहाँ छंदमुक्त कविता
को प्रश्रय नहीं मिला ..
...जिससे हर किसी का कवि बनना
सहज संभाव्य नहीं हो पाया ..

----अरविंद पाण्डेय
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कृष्ण-प्रेम ही शाश्वत सुमधुर

· अरविन्द पाण्डेय




कृष्ण-प्रेम ही शाश्वत सुमधुर
क्षण-जीवी है लौकिक प्रेम
प्रेम धरा पर कैसे सम्भव
है जिसका क्षण-भंगुर क्षेम

श्री राधा के चरण-चिह्न पर
नतमस्तक हूँ मै - अरविंद
होली पर्व सजा लाया है
मेरे लिए अतुल - आनंद

नीलकमल-श्रीकृष्ण-चरण में
अर्पित किया ह्रदय का फूल
केसरिया हो गया चित्त जब
दिखा कृष्ण का पीत-दुकूल


रंग नहीं , सत्कर्म, शक्ति वह
जो जीवन में रंग भरे
जीवन बहुरंगी करना यदि
आओ हम सत्कर्म करें ..

द्वेष , क्रोध का कलुष नहीं यदि ,
ह्रदय प्रेम से हो परिपूर्ण ..
फिर होली के लिए नहीं
आवश्यक किसी रंग का चूर्ण ..

स्नेह-सलिल में घुला हुआ हो
लाल रंग बन पावन प्रेम
जिह्वा , नयन बनें पिचकारी
बरसे सतत चतुर्दिक प्रेम ..


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----अरविंद पाण्डेय


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महाशिवरात्रि : उमा-महेश्वर का विवाह-दिवस ..

· अरविन्द पाण्डेय


===========================================

शंकर अपने सज धज करके आज चले ससुराल
भूत- प्रेत सब बने बराती, लगते हैं विकराल
१

सब देवों के बीच विष्णु , ब्रह्मा की शोभा कौन कहे
पीछे इन्द्र , कुबेर , वरुण से देव खुशी में झूम रहे


उनके पीछे भूत - प्रेत - वेताल मंडली नाच रही
किसी का डमरू डिम डिम करता, किसी की भेरी गूँज रही


किसी प्रेत को आँख नही कोई दस दस आंखों वाला
हर कोई बस झूम रहा है मस्ती में हो मतवाला


शंकर अपने सज धज करके आज चले ससुराल .

२

पञ्च-मुखी की पन्द्रह आँखों में काजल काल का

दस हांथों में अभय , शूल औ' भिक्षा-पात्र कपाल का


चंदन के बदले शरीर पर चिता-भस्म है लगी हुई

गले में है रुद्राक्ष और सर्पों की माला सजी हुई


माथे पर है चन्द्र , तिलक सी लगे तीसरी आँख है
कमर में बाघम्भर ,हाथों में डमरू और पिनाक है


शंकर अपने सज धज करके आज चले ससुराल .....

३

कानो में कुंडल के बदले सर्प लटकते हैं जिनके

सिर पर काली जटा जूट में गंगा बहती हैं जिसके


गले में नरमुंडों की माला गंगा-जल से भीग रही

नंदी जी पर हैं सवार अद्भुत शोभा ना जाय कही



भक्तों को वर अभय दे रहे आशुतोष भगवान हैं

शिव-बरात की कथा सुने, उसका होता कल्याण है



शंकर अपने सज धज करके आज चले ससुराल ...

=================================================


यह भक्ति-गीत मेरे द्वारा २००३ में लिखा गया था ।

यह शिव-पुराण पर आधारित है । शिव-पुराण के अध्याय

में ४० जगन्माता पार्वती और

जगत्पिता शिव के विवाह का वर्णन है । यह गीत , बरात

के समय शिव-पुराण के शिव-स्वरुप-वर्णन की शाब्दिक-छाया है ।

सभी शिव-भक्त जानते हैं कि माता पार्वती ने अति-कठोर तप किया था अपने

परम-प्रिय शिव को प्राप्त करने के लिए ।

इसी क्रम में ६ महीने तक उन्होंने शाक-पत्र खाना भी

छोड़ दिया था . इसीलिये माता पार्वती का नाम "अपर्णा " भी विख्यात हुआ ।

कालिदास ने शिव-तपस्या भंग करने का प्रयास करने वाले

कामदेव के भस्म होने और उस समय माता पार्वती का अपने

अद्वितीय सौन्दर्य के निष्फल हो जाने पर उसकी निंदा करने का विलक्षण वर्णन

"कुमार संभवं " में किया है । सौन्दर्य की जो परिभाषा कालिदास

ने इस श्लोक में की , उसे ही दूसरे शब्दों में , अंगरेजी के महान कवियों

-पी .बी.शेली , जान कीट्स आदि ने बाद में प्रस्तुत किया -

"तथा समक्षं दहता मनोभवं

पिनाकिना भग्नमनोरथा सती

निनिन्द रूपं हृदयेन पार्वती

प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता "


उमा-महेश्वर विवाह प्रकरण का स्वाध्याय करने से किसी प्रेयसी-कन्या

को उसके प्रिय से विवाह का निर्विघ्न अवसर प्राप्त होता है । यह फल-श्रुति

शिव-पुराण में वर्णित है । अविवाहिता यदि इसका स्वाध्याय करे

तो उसे शिव-कृपा-प्राप्त सुंदर और योग्य वर प्राप्त होता है -यह

प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है ।

वीनस म्यूजिक कंपनी द्वारा

इसे नंदिता के एल्बम 'शिव जी हो गए दयालु 'में सम्मिलित करते हुए २००३ में

रिलीज़ किया गया था ।

इस गीत को मेरी पुत्री नंदिता ने गाया था और मैंने भी इसमें अपना स्वर

दिया था।

----अरविंद पाण्डेय

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इश्क था, बस इश्क था, बस इश्क था उस पल वहाँ..

· अरविन्द पाण्डेय


आज मैनें ख्वाब में देखा तुझे
फूल सी पलकें तेरी भीगी हुई

मैं तेरी जानिब ये घुटने टेक कर
हाथ को कदमों पे तेरे रख दिया

फ़िर करम तूने किया कुछ इस तरह
हाथ में अपने , मेरे हाथों को ले

खींच कर हलके से, मुझको प्यार में
बाजुओं में इस तरह कुछ, भर लिया

मैं तेरे रुखसार के नज़दीक था
देखता पलकें तेरी भीगी हुई

तेज़ साँसों से तेरी खुशबू निकल
मेरे तनमन में समाई जा रही

सुर्ख गालों पर तेरे ढलते हुए
शबनमी उन आंसुओं को पी गया

क्या कहूं उस एक पल के दौर में
इश्क की लाखों सदी मैं जी गया

फ़िर तेरा आगोश, बस, कसता गया
और कुछ बाकी न था उस पल वहाँ

मैं नही था, तू न थी , ना ये ज़मीन , ना आसमां
इश्क था, बस इश्क था, बस इश्क था उस पल वहाँ

----अरविंद पाण्डेय
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स्वर्णिम भारत निर्माण करें ..

· अरविन्द पाण्डेय


२६ जनवरी २००९
-------------------------
१
संयम का अविजित खड्ग लिए
विधि , संविधान का अमृत पिए

प्रज्वलित अग्नि सी प्रज्ञा हो
मणि सी संदीप्त प्रतिज्ञा हो

ऐसा भारत निर्माण करें
आओ जग में आलोक भरें
२

वसुधा का वैभव क्षीण न हो
मानवता शक्ति-विहीन न हो

कुसुमों में वर्ण सुगंध बढे
वृक्षों पर विकसित बेल चढ़े

शीतल सुरभित पवमान बहे
अब प्राणि -मात्र में प्रेम रहे
३
गौरव से मस्तक उन्नत हो
श्रद्धा से , किंतु , सदा, नत हो

करुणा से ह्रदय प्रकाशित हो
शुभ,शील,सत्य से प्रमुदित हो

जन-गण में नव-उत्साह भरे
गण-तंत्र सदा ही विजय करे
४
हम भारत की संतान धन्य
मानवता की महिमा अनन्य

जब भी संसार हुआ व्याकुल
जब बढ़ा धरा पर कंटक-कुल

हमने रक्षित की विश्व-शाँति
प्रज्ञा बल से की दिव्य-क्रांति


----अरविंद पाण्डेय
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विश्वास सर्व-व्यापक है, विभु..

· अरविन्द पाण्डेय


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विश्वास , श्वास का प्रकृत-रूप ,
यह अन्तरतम की लय-झंकृति
स्रष्टा से इसका साम्य और
स्रष्टा की यह सुन्दरतम कृति

विश्वास, विभाजक-रेखा ,वह
जो पशु - मनुष्य में करे भेद
विश्वास-युक्त जो ,वह मनुष्य
विश्वास- हीन, पशु में अभेद

विश्वास अगर, तो अन्धकार
भी बन जाता उज्जवल प्रकाश
विश्वास अगर तो तीक्ष्ण वेदना
बन जाती उन्मुक्त हास

विश्वास अगर तो पुष्प कंटकित,
दिखता है सुरभित , सुंदर
विश्वास अगर, श्री कृष्ण-सदृश
दिखता है यह नीला अम्बर

विश्वास अगर तो केशराशि
प्रिय की प्रतीत होती सुरभित
विश्वास अगर तो क्षुद्र-देह
में भी अनंतता की प्रतीति

विश्वास
वही जब श्वास श्वास में
छलक उठे प्रिय की सुगंध
आकर्षण इतना प्रबल कि
सारे,छिन्न भिन्न हो जांय, बंध

विश्वास वही जब लैला भी
बस दिखे अप्सरा सी सुंदर
क्षण-जीवी पुरूष दिखे नारी को
कालजयी एवं ईश्वर

विश्वास वही जो धरती पर ही
रच दे स्वर्णिम स्वर्ग - सरणि
विश्वास वही जब धूमकेतु भी
हो प्रतीत ज्यों तरुण तरणि

विश्वास शक्ति, विश्वास भक्ति
विश्वास ,सर्व-सत्तामय प्रभु
विश्वास एक आराध्य देव
विश्वास सर्व-व्यापक है ,विभु


----अरविंद पाण्डेय
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अब तो सुबह होने को है ..

· अरविन्द पाण्डेय



वक्त की गहरी परतों में दबे हुए हमारे अतीत
और वक्त की एक एक कर उतरती परतों के बीच से
हसीन सुबह की मानिंद हमें निहारता
और अपने पुरइश्क रुखसार की झलक देने को बेताब
हमारा भविष्य
कह रहा हमसे --

कि वक्त बेपरवाह न था कभी तुमसे
तो तुम भी वक्त से न रहो बेपरवाह

कि इश्क - ए - मिजाजी में डूब कर तो देख लिया
न कुछ ले पाये किसी से, न किसी को कुछ दिया

तो अब इश्क - ए- वक्त में भी तो डूब कर देखो--
फ़िर , अपने ही किए कराए पर,
लब पर तुम्हारे, न होगी कभी आह

दिल को इतना रोशन रखो
कि तुम्हारे होते किसी ज़िंदगी की सुबह ,
न हो कभी स्याह

कि हो कोई बेसहारा
पर तुम्हारी नज़रों के सामने
न हो कभी बेराह

कि गुलशन में खिले हुए गुल
ख़ुद को न समझे कभी बेपनाह

क्योकि,
ये वक्त है हर फूल के खिलने का
ये वक्त है हर बेराह को राह मिलने का
ये वक्त है हर स्याह दिल में रोशनी दिखने का

क्योकि

अब तो सुबह होने को है
अँधेरा ख़ुद ब ख़ुद खोने को है



----अरविंद पाण्डेय
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सारा कश्मीर हमारा है--कारगिल-युद्ध के समय लिखित

· अरविन्द पाण्डेय





हमने समझा दोस्त उन्हें
वे दुश्मन हमें समझते हैं
नही फिक्र है उन्हें अमन की
बारम्बार उलझते हैं ।


जब जब हमने हाथ मिलाया
उनसे सरल दोस्त बनकर
तब तब उनने घात किया है
सदा पीठ पीछे हम पर ।

नही याद है उन्हें इखत्तर
का वह अमर युद्ध - संदेश
जो टकराएगा हमसे
हो जायेगा वह खंडित देश ।


क्षमा किया था हमने उनको
धूल चटाने के ही बाद
यही सोच कर कि अब उन्हें
आयेगी बुद्धि , न हों बरबाद ।


पर उनकी तो बुद्धि भ्रष्ट है
चढ़ आए फ़िर सीमा पर
फ़िर ललकार रहे हैं हमको
विगत पराजय विस्मृत कर ।


विश्व-शाँति अब रहे सुरक्षित -
यही सोच कर हम सबने
संयम से संघर्ष किया है
बलि दी हैं कितनी जानें।

न लो परीक्षा अब वर्ना,
इच्छा सुन लो यह जन जन की
मिट जाए वह झूठी रेखा
वर्षों पूर्व विभाजन की ।




सौ करोड़ कंठों ने अब यह 
घोर नाद हुंकारा है

कारगिल से गिलगित तक
सारा कश्मीर हमारा है । 

----अरविंद पाण्डेय
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आइए , करें आराधन हम नव -वर्ष में...

· अरविन्द पाण्डेय

१ जनवरी २००९
------------------------------

आइए करें आराधन हम नव -वर्ष में ,
हिमगिरि की अखंड - गरिमा का ,
अम्बर की अनंत - महिमा
का ,
पक्षी के कलरव से गुंजित
स्वर्णप्रभा - मंडित प्रभात का ,

किन्तु रहे यह ध्यान हमें ---

इस जीवन का एक वर्ष फिर फिसल गया ।

क्या बीते वर्षों में हमने वही किया जो करना था ?
क्या हमने जो
लिए फैसले ,
वे उतरेंगे खरे , समय की
शाश्वत कठिन कसौटी पर .?

क्या हमने जो रचे जाल शब्दों , वाक्यों के ,
वे थे दीपित सतत - सत्य से , महिमा से , ऊर्जा से ?

यदि हाँ , तो फिर एक वर्ष ही नहीं ,
इस जीवन का प्रतिपल होगा सुरभित , सुन्दर ,
उत्सव से , ऊर्जा से ..


----
अरविंद पाण्डेय
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यदि तुम मेरे आलिंगन में मुग्ध नही हो..

· अरविन्द पाण्डेय

तटिनी के तरंग - मंडल में
परम - तृप्ति पाता है निर्झर
सिन्धु - समालिंगन से पुलकित
आप्त - काम होती पयस्विनी

सहज मृदुल अन्योन्य - घात से
स्वर्पवने परिनंदित होतीं
संसृति के समस्त बिम्बों का
जीवन ही सापेक्ष - सत्य है

संसृति में प्रतिपल संगम से
सकल वस्तुए मत्त हो रहीं
ईश्वरीय यह विधि, शाश्वत ,
पर विप्रयुक्त , हा, हंत हमीं हैं

देख , स्वर्ग के आलिंगन से
परिशिखरी -पशु -दल पुलकित है
आनंदित ये जलधि -वीचियाँ
आलिंगन कर रहीं परस्पर

कलिकाओं का ह्रदय प्रफुल्लित
पुष्पों का सम्मान कर रहा
अवनि - वक्ष का परिस्पर्श कर
सूर्य - रश्मियाँ नृत्य - निरत हैं

शशि - मयूख सहसा ही आकर
जलधि - चुम्ब कर रही निरंतर
किंतु , निरर्थक , यदि तुम मेरे
आलिंगन में मुग्ध नही हो ।
-------------------------------
यह कविता महान अंगरेजी कवि
पी बी शेली की कविता " LOVE'S PHILOSOPHY "
पर आधारित है । यह मैंने वर्ष १९८८५ में
लिखी थी जब मैं B.A. का विद्यार्थी था ।

हिन्दी कविता की जो दुर्दशा इस समय हो रही
वह अत्यन्त कारुणिक है । छंद - मुक्त कविता
का प्रारंभ श्री सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने किया था
तो उनकी लेखनी में ऐसी शक्ति थी कि वह छंद - मुक्त
होते हुए भी कविता में रस - पूर्ण सौन्दर्य और गेयता बनाए
रखती थी । परन्तु आज हिदी कविता को उस स्तर पर
ला दिया गया है कि इस समय रामधारी सिंह दिनकर ,
महादेवी वर्मा , सुमित्रानंदन पन्त, हरिवंश राय बच्चन जैसे
कवि अनुपलब्ध हो चुके हैं ।
उर्वशी की सौन्दर्य - धारा और कुरुक्षेत्र के प्रचंड - पौरुष से
परिपूर्ण कविता की गंगा प्रवाहित करने वाले दिनकर
आज स्मृति - शेष हैं ।
इस स्थिति में मेरा प्रयास है की हिन्दी कविता प्रेमी
उस स्वर्ण युग की स्मृतियों से आनंदित हों जब हिदी
कविता विश्व की समस्त भाषाओं और साहित्य की गंगोत्री -
संस्कृत - कविता से अनुप्राणित और अनुसिंचित होती
अपने स्वर्ण - शिखर पर विराजमान होकर रस - धारा प्रवाहित
कर रही थी ।




---अरविंद पाण्डेय
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तू समझना मैंने तुझे चुपके से छुआ है..

· अरविन्द पाण्डेय

ये कुरबतें ये दूरियां तो दिल की जानिब हैं
दिल है करीब तो करीब , दूर है तो दूर ,

दिल में तेरे जो बात मेरी याद से उठे
तू समझना मैंने करीब होके कुछ कहा

गर ,सामने महका हुआ इक गुल दिखाई दे
तू समझना वो महक मेरे दिल से उठी है

गर , मनचला सा कोई झकोरा हवा का हो
तू समझना बेताब मेरा दिल मचल उठा

गर, आसमां में चाँद , कुछ शर्मा के खिला हो ,
तू समझना मैंने तुझे चुपके से छुआ है

जब तू नही हो पास तो कुछ और पास से ,
दिल , दिल से मरासिम हो -यही मेरी दुआ है



----अरविंद पाण्डेय
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तुम मेरे दिल से गुजरना ..

· अरविन्द पाण्डेय



तुम मेरे दिल से गुजरना
जब कभी मायूस होना
ये तुम्हारे पाँव का
मुझ पर बड़ा एहसान होगा ।

ये मेरी साँसे अभी, अक्सर
बड़ी बोझिल सी लगतीं
इनका आना और जाना
कुछ ज़रा आसान होगा ।

----अरविंद पाण्डेय
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अब वतन में ये तमाशा बंद होना चाहिए ..

· अरविन्द पाण्डेय




तुम रखा करते हो अक्सर,जिनके सर सोने का ताज
कह रहा है मुल्क उनका सर कुचलना चाहिए ।

हो जिन्हें अब फिक्र अपनी औ ' वतन के शान की
सोनेवाले उन सभी को जाग उठाना चाहिए ।

दिल में हो ईमान ,बाजू में हो लोहे की खनक
ऐसे ही रहवर के सर पर ताज रखना चाहिए ।

जिनके आगे तुम खड़े हो सर झुकाए , कांपते
उनका सर , फांसी के फंदे पर लटकाना चाहिए ।

आज जिनके सर की कीमत सिर्फ़ कौडी भर बची
उनके आगे अब कभी ये सर न झुकना चाहिए ।

इक तरफ़ हो घुप अँधेरा इक तरफ़ दरिया- ए- नूर
अब वतन में ये तमाशा बंद होना चाहिए ।


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अरविंद पाण्डेय
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तू प्रणय की रागिनी बन बस गयी मेरे हृदय में....

· अरविन्द पाण्डेय




तू नही वह देह जिसको खोजता मै
 देह हैं बिखरी हुई संसार में

तू महक मदमस्त फूलों की , जिसे पाना कठिन है
 तू चमक उस दामिनी की जिसका बुझ पाना कठिन है

तू वसंती वायु जिसका असर अब जाना कठिन है
 तू ग़ज़ल कोयल की जिसके सुर भुला पाना कठिन है

तू प्रणय की रागिनी बन बस गयी मेरे हृदय में ,
 बंद है अब द्वार सारे , अब तेरा जाना कठिन है ..


----अरविंद पाण्डेय
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कब तलक जीतोगे तुम,हारेगा जब हिन्दोस्तां--

· अरविन्द पाण्डेय






कब तलक जीतोगे तुम , हारेगा जब हिन्दोस्तां,
अब तो पौरुष की प्रबल ज्वाला भडकनी चाहिए।

कल तलक जो भीड़ के सिरमौर बनकर थे खड़े ,
अब भी अखबारों में वो तस्वीर दिखनी चाहिए ।

दिव्य भारत भूमि की जिस कोख ने हमको जना,
कुछ करो - उस कोख की तो लाज बचनी चाहिए ।

जिस ज़मीं का जल, रगों में खून बन कर बह रहा ,
उस ज़मी की, खाक में, इज्ज़त न मिलनी चाहिए ।

जो वतन की रहजनी के ख़ुद ही जिम्मेदार हैं ,
उनके ऊपर सुर्ख आँखें, अब तो, तननी चाहिए ।

जो शहीदों की शहादत का करें सौदा कभी,
उनके आगे अब कभी आँखें न झुकनी चाहिए ।

आज जो खामोश हैं वो कल भरेंगें सिसकियाँ ,
इसलिए, हर शख्स की बाहें फडकनी चाहिए।

बात जो हिंदुत्व की , इस्लाम की , करते बड़ी
उनके पाखंडी जेहन की पोल खुलनी चाहिए ।

शक्ल इंसानी , मगर दिल है किसी शैतान का
उन रुखों की असलियत, दुनिया को दिखनी चाहिए ।

बह गया पौरुष सभी देवों का फ़िर से एक बार ,
अब , ज़मीं पर फ़िर कोई दुर्गा उतरनी चाहिए ।
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मुझे याद आ रहा है कारगिल युद्ध --जब कारगिल
के कातिलोंको , देशभक्त होने का दावा करने वालों
ने , बहत्तर घंटे तक , भाग जाने का खुला
रास्ता देकर , कारगिल के पाँच सौ से अधिक
शहीदों की शहादत का अपमान किया था --
मुझे याद आ रहा है वह दिन, जब एक
अरब की जनसंख्या वाल्रे इस देश के
रहनुमाओं ने कंधार , जाकर देश पर हमला
कराने और करने वालो को मुक्त किया था ।
वही लोग दाउद को सौपने की मांग कर रहे हैं ।
मगर , क्याये नेता इस बात की गारंटी देंगें
कि ये फ़िर दाउद को लाहौर या कंदहार
जाकर नही छोड़ आयेंगे ? भारत के वे
सभी वाक्पटु और टी.वी. स्टार के रूप में
पहचाने जाने नेता
टी.वी. के परदे से गायब हैं ।
आतंकवादियों के साहस और शौर्य से हतप्रभ
ये लोग शायद ख़ुद के बारे में ज़्यादा
सोच रहे है कि कौन सी राजनीति करे
कि हम भारत के लोग , इनसे वह सवाल
करना भूल जाय
जो अभी एकस्वर से कर रहे हैं ।
पर ये सभी जान रहें हैं कि युद्ध अभी कुछ
देर के लिए ही
रुका या रोका गया है ।
इसलिए शायद इन्हें यह सद्बुद्धि आए कि ये लोग
वह सब करने से बचेंगें जो करने की
इनकी आदत रही है ।
शहीद हेमंत करकरे की पत्नी और शहीद संदीप
उन्नीकृष्णन के पिताने देश को बताया है
कि अपनी कुर्सी के लिए देश के मूल्यों
की ह्त्या करने वालों को अगर दंड नही दे सकते
तो उनसे न मिलकर, ये बता सकते हैं कि आप
किसी शहीद को सम्मानित करने के योग्य नही ।
हिंदुत्व का पुरोधा होने का दावा , दिखावा करने
वाले नरेंद्र मोदी को यह भी नही मालूम
कि किसी हिंदू के घर , अकाल मृत्यु
होने पर , उस दुर्घटना में विधवा हुई स्त्री के
पास एक करोड़ रूपया लेकर जाना और तब
उसे सांत्वना देना शास्त्र-विरुद्ध
आचरण है ।
मगर यह सब हो रहा है । तो आइये एक नए भारत
निर्माणके लिए कुछ नया चिंतन करे ।
नया सृजन करें ।
शुद्ध और सशक्त विचारों से एक नया रास्ता बनाए ।



---- अरविंद पाण्डेय
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व्यर्थ के आकर्षणों से मुक्त जो राही ..

· अरविन्द पाण्डेय



योजना ही मार्ग निष्कंटक बनाती है . 
लक्ष्य - केन्द्रित दृष्टि ही मंजिल दिलाती है ॥

व्यर्थ के आकर्षणों से मुक्त जो राही ..
विजय का आनंद पाता है सदा वह ही

---अरविंद पाण्डेय
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खाक न हो खाकी की इज्ज़त..

· अरविन्द पाण्डेय


खाक न हो खाकी की इज्ज़त
पियो न खादी की हाला

मित्र , न समझो पद कुर्सी को
मनमोहक साकी - बाला

देशभक्ति जब बने सुरा औ '
देश बने जब मदिरालय

तब, खाकी खादी को मधु से
तृप्त करेगी मधुशाला


---अरविंद पाण्डेय
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जियो तो ऐसे जियो कि जिससे लोग तुम्हारा मान करें..

· अरविन्द पाण्डेय

हम बिहार के नौजवान हैं
हम भारत की आन बान हैं

बारूदों से भरी राह पर
हम बेफिक्र बढे जाएँ

हम कांटो का हार बनाकर
इक दूजे को पहनाएं

जन जन की रक्षा को हम सब
अपना तन मन धन खोये

हम जगते रातों को जिससे
सुख की नींद सभी सोयें

हम मिट जाँय मगर विजयी हो
अमर बिहार महान

आज हम सभी तुम्हे दे रहे
अपना यह पैगाम

जियो तो ऐसे जियो कि जिससे
लोग तुम्हारा मान करें

मरो तो ऐसे मरो , तुम्हारे लिए
ये दुनिया आह भरे

जिस मिट्टी में जनम लिया है
जिस माता का दूध पिया है
जिस कूएं ने प्यास बुझाई
क्या , कुछ तुमने उसे दिया है

हम बिहार के नौजवान हैं
हम भारत की आन बान हैं

---अरविंद पाण्डेय
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सत्य -दीप जन जन में, प्रतिपल जला करे.

· अरविन्द पाण्डेय


ज्ञान का प्रकाश हो,
चित्त का विकास हो ।


दैवी- संपत्ति का
मानव में वास हो ।


स्वाभिमान से सबका
मस्तक उन्नत रहे ।


मन में सात्विक सुख की
धारा बहती रहे ।


द्वेष ना किसी में हो,
प्रेमपूर्ण जन जन हो


मानवता-सेवा में,
अर्पित यह तन- मन हो ।


सत्य -दीप जन जन में,
प्रतिपल जला करे


ईश्वर, मानवता का
सदा ही भला करे।


----अरविंद पाण्डेय


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मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ..

· अरविन्द पाण्डेय



जिसके दम पर दमकती रही मुंबई
जिसके बल पर बहकती रही मुंबई
जिसके जज्बे से जीती रही मुंबई
मुंबई की सड़क पर वो मैं तो हूँ ।


जिसके सुर से संवरती रही मुंबई
जिसकी धुन पर थिरकती रही मुंबई
जिसके सपनों में सजती रही मुंबई
मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ।


जिसके पैसे पे पलती रही मुंबई
जिसके चलने से चलती रही मुंबई
जिसके ढलने से ढल जायगी मुंबई
मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ।

जिससे वादा हुआ- काम देंगे तुम्हे
गिरने जब भी लगो - थाम लेंगे तुम्हे
शान बढ़ जाय - वो नाम देंगे तुम्हें
मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ।

जिससे वादा हुआ - काम आयेंगे हम
इक बरक्कत का गुलशन खिलाएंगे हम
अपने लोगो की गुरबत मिटायेंगे हम
मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ।

जिससे वादा हुआ, फ़िर से तोडा गया
लाके मंझधार में फ़िर से छोडा गया
जिसके टूटे दिलों को न जोड़ा गया
मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ।


जिसको अपनों ने फ़िर से है धोखा दिया
मज़हब-ओ-जात में बाँट के रख दिया
कुछ करेंगे - कहा था , मगर ना किया
मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ।


कितने अरमां से रहवर बनाया उसे
कितनी हसरत से कुर्सी दिलाया उसे
जीत की फूल - माला पिन्हाया उसे
मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ।

जिसकी लाशों की सौगात भेजी गयी
जिसके अपनों की औकात परखी गयी
गैरत-ओ-शान,पर,जिसकी यूँ मिट गयी
मुंबई की सड़क पर वो मैं ही तो हूँ ।

जिसकी बोली पे सारा ज़माना फ़िदा
बिकती बाज़ार में, जिसकी नाज़-ओ-अदा
अब तो दुनिया बुलाती जिसे दे सदा
मुंबई की सड़क पर वो ही तो हूँ ।

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सृजनात्मक अहिंसक प्रतिरोध 
एकमात्र उपाय :
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मुंबई में राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को गंभीर
क्षति पहुचाने वाले राष्ट्रीय अपराध के प्रति पूरे देश में
व्यापक प्रतिक्रया और अनुक्रिया हुई है ।
सारा देश, इन घटनाओं से हतप्रभ और मर्माहत है ।
किंतु प्रतिक्रियाओं को व्यक्त करने में जिस
सतर्कता की आवश्यकता है -कभी कभी उसका ध्यान
नही रखा जा रहा है ।
हम राहुल राज का उदाहरण लें ।किस विधि से हमें
मुंबई की घटनाओं पर प्रतिक्रिया करनी है - यदि यह
उस बहादुर राहुल को पता रहता तो शायद वह मुंबई
पुलिस की गोलियों से स्वर्गवासी नही होता ।
पुलिस को भी इस मामले में जिस सतर्कता से काम करना
चाहिए था , उसने नही किया -- ऐसा लोग मान 
रहे हैं । यह मामला सीधे 
तौर पर उत्तर भारतीयों और मराठी - भाइयो के बीच 
तनाव के लिए राज ठाकरे द्वारा चलाये जा रहे अभियान 
से जुडा हुआ होने के कारण और अधिक ध्यान
से देखे जाने योग्य था । मुंबई -पुलिस उसे 
पकड़ने का प्रयास कर सकती थी । 
धर्म -स्थलों में छुपे आतंक वादियों के मामलों,
स्थिति
की संवेदनशीलता की दृष्टि से ,
पुलिस अक्सर, हमले की बजाय पकड़ने का 
प्रयास करती देखी जाती रही है । 
इस समय अवैध तरीकों से व्यक्त प्रतिक्रया शायद
कोई अनुमोदित नही करेगा । क्योंकि इससे मुंबई में
रह रहे उत्तर भारतीयों पर क्षेत्रवाद पर आधारित 
हिंसा का खतरा बढ़ सकता है । 
मुंबई के माफिया गिरोह के लोग, उत्तर भारतीय
नौजवानों का दुरुपयोग अव्यवस्था फैला कर
अपने हित-साधन के लिए भी कर सकते हैं । 
सम्पूर्ण देश जानता है कि जब राष्ट्रीय - स्वाभिमान के
प्रतीकों को नमन करने का अवसर आता है तब छत्रपति
महाराज शिवा जी का नाम सर्वप्रथम लेने की इच्छा
होती है । हमारे देश में हर माता, प्रातः स्मरणीया माता 
जीजा बाई बनने की महत्वाकांक्षा रखती है ।
जब गीता के रहस्यों का बोध प्राप्त करना होता
है तब हम भारत के लोग, संत ज्ञानेश्वर और लोकमान्य
बाल गंगाधर तिलक की ज्ञानेश्वरी और गीता- रहस्य
की शरण लेते हैं ।
और इसीलिये हम , मराठा प्रदेश को राष्ट्र ही नही
महाराष्ट्र कहते रहे हैं । आज भी सारा देश और विश्व भी ,
जब शाँति-कामी होता है तब वह श्री कृष्ण की वंशी
की अवतार लता मंगेशकर के स्वर की शरण लेता है ।
इसलिए , राज ठाकरे और उनके राक्षसत्व का उत्तर
हमें स्थिर बुद्धि से देना होगा अन्यथा हम इनलोगों के
बिछाए जाल में फंस जायेंगे ।
इन घटनाओं के " निष्क्रिय उत्तरदायी " वे भी हैं जिनकी
अकर्मण्यता के कारण , हम बिहार के लोग, कारखानों में काम
करने , ड्राइवर, सुरक्षा - गार्ड , चपरासी , आदि की नौकरी
करने मुंबई और दूसरे राज्यों शहरों में जाने को
विवश होते हैं।
हम जानते हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण
रोज़गार गारंटी अधिनियम अगर शतप्रतिशत ईमानदारी
के साथ बिहार में लागू करा दिया जाय तब मुम्बई सहित
देश के अन्य औद्योगिक राज्यों में मेहनतकशों की कमी
हो जायेगी और वे हमारे लोगों को को अधिक पैसा
और सम्मान के साथ काम के लिए आमंत्रित करेंगे ।
आज भी भोजपुरी फ़िल्म उद्योग पटना में स्थानांतरित
नही हो पाया । प्रकाश झा , मनोज तिवारी आदि ने
बिहारी- भाषा , विषयवस्तु , संस्कृति , संगीत से किन
उपलब्धियों को हासिल किया - यह सब जानते हैं ।
किंतु , इनमे से किसी ने बिहार में शूटिंग स्टूडियो
बनाने की कोई पहल नही की । 
यह भी सभी जानते
हैं कि इस समय कौन कितना ताकतवर है ।
ताकत का प्रयोग अपने निजी फायदे के लिए करने की 
होड़ है लोगों में ।
इसलिए हम इन अपराधों के " सृजनात्मक अहिंसक 
प्रतिरोध "
का आहवान करते हैं जिसके लिए 
प्रकाश झा मनोज तिवारी
जैसे लोगो से अपील की जाती है कि वे एक वर्ष के
के लिए मुंबई छोडें और फ़िल्म शूटिंग कि सारी कारर्वाई
बिहार में करे ।

हम नरेगा के क्रियान्वयन के लिए
जिम्मेदार लोगो से अपील करते हैं कि वे कम से कम
बिहारी मेहनतकशों को बिहार में ही रोज़गार की गारंटी
दे जिससे राज ठाकरो को पता लग सके कि बिहार
तैयार है उन्हें गांधीवादी तरीके से जवाब देने के लिए ।

यदि ये लोग ऐसा नही करे तो हमें समझना होगा
कि हम अपनो के कारण हारते रहे हैं . 

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प्यारे पैगम्बर मोहम्मद मुस्कुराए हैं ..

· अरविन्द पाण्डेय


चांदनी ने हर तरफ़ चादर बिछाए हैं
अब मोहम्मद मुस्तफा तशरीफ लाये हैं




नूर का दरिया बहा चारो तरफ़ देखो
प्यारे पैगम्बर मोहम्मद मुस्कुराए हैं




चौदवीं के चाँद सा जो मुस्कुराते हैं
वो हमारे दिल पे छाने आज आए हैं




हर तरफ़ छाई अमन-ओ-सुकून की खुशबू
प्यारे मोहम्मद करम बरसाने आए हैं

---------------------------------------------
यह कविता मैंने मुज़फ्फरपुर के एक
मुशायरे में शिरक़त के लिए सल्लल्लाहु
अलैहि वसल्लम रसूलल्लाह की खिदमत
में पेश करने के लिए लिखी थी ...कार में

बैठे हुए मुशायरे में जाते समय ।
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टिप्पणियों का उत्तर
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इस कविता के बारे में चंदन और अन्य मित्रों ने
टिप्पणी की है -कविता अच्छी है । पर इसको मानने वाले
जब शान्ति की बात करे तब तो ।
मैं कहना चाहूगा -
याद करे -जब कर्णाटक और केन्द्र की सरकारों
ने फ़िल्म अभिनेता राजकुमार के अपहरण के बाद
वीरप्पन के ५० गुंडों को जेल से रिहा करने का
निर्णय लिया था तब अब्दुल करीम नाम के ८० वर्षीय
वृद्ध ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर के
इसका विरोध किया था और उनकी याचिका
पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था -
अपराधी नही रिहा होंगें ।
जो सरकार विधिव्यवस्था नही संभाल सकती
वह हटे , वह गद्दी छोड़ दे और जो संभाल सकता
हो वह गद्दी संभाले ।
और तब, बिना अपराधियों की रिहाई के ही
राजकुमार भी छूटे और विधिव्यवस्था भी बनी
रही ।
भारतीय मुस्लिम देशभक्त हैं और जब राजनीतिज्ञ
देशहित को गिरवी रख रहे होते हैं तब कोई वृद्ध
अब्दुल करीम खडा होकर इस महान देश के
गौरव की रक्षा करता है ।

---अरविंद पाण्डेय
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इक नूर का दरिया बहाने आई है ये ईद.

· अरविन्द पाण्डेय



हर दिल का अँधेरा मिटाने आई है ये ईद
इक नूर का दरिया बहाने आई है ईद

अफ़ज़ल दुआ मानिंद खुदा को है ये कबूल
कुरआन की अजमत बताने आई है ये ईद

इंसान की शैतानियत में बह गया इंसान
बहते हुए आंसू को पीने आई है ये ईद

वहशत की आग, ज़ुल्म की लपटों में जो जले
दिल पर उन्हें मरहम लगाने आई है ये ईद


----अरविंद पाण्डेय
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जब लोकतंत्र गल जाता है..

· अरविन्द पाण्डेय

यह लम्बी कविता उन शहीदों
के सम्मान हेतु प्रस्तुत है जो नही
जानते थे की क्रुद्घ कोशीका क्रंदन
उन पर मृत्यु संकट उत्पन्न करने
वाला है। जो अनजाने में ही एक
भयावह रात में, मुझ जैसे सरकारी
सेवकों के अपराध के कारण, कोशी
के आंसुओं के समुद्र में, सदा के लिए
सो गए।
यह काव्य उन देश-भक्तों के सम्मान में भी
प्रस्तुत है जो बिहार में नहीं है पर
हमारे संकट मेंहमारे साथ खड़े है ---
मैं ऐसे सभी बिहार भक्तो को सैल्यूट
करता हूँ जो समूह बना कर, बचे हुए
के लिए दिन रात काम कर रहे है
==================
बिखरी कोशी बिखरा बिहार
फिर भी, मन में सपने हजार
१-
हो नदी या कि नारी, उर्मिल
चाहेगी बिखरे नहीं सलिल
कोई तटबन्ध उसे रोकें
हो अनियंत्रित , कोई टोके
कोशी तो करती थी पुकार
बांधे कोई, दे उसे प्यार
२-
पर कही, किसी ने नहीं गुना
कोशी का क्रन्दन नहीं सुना
नौकरशाहों का था निर्णय
हो शान्ति या कि फिर मचे प्रलय
मजदूरी नहीं बढ़ाएगे
जन में जल-प्रलय मचाएगें
३-
खण्डित कुशहा तटबन्ध हुआ
कोशी को क्रोध प्रचड हुआ
आंसू, लहरों में बदल गए
जलमग्न ग्राम, वन, नगर हुए
जब नारी, नदी कुपित होती
सारे समाज की क्षति होती
४-
मन में दानव सा लोभ लिए
मानव ने कैसे पाप किए
पानी बनकर ईमान बहा
कहने को ना कुछ शेष रहा
उन्मत हंसी नौकरशाही
गलकर बह गई लोकशाही
५-
कहने को है मजबूत तन्त्र
कोई कुछ करने को स्वतन्त्र
बाहर से हस्तक्षेप नहीं
कर्तव्य-कर्म में क्षेप नहीं
पर जनगण का टूटा सपना
कानून हुआ अपना अपना
६-
व्याकुल कोशी है दौड़ रही
रुकने का ठौर तलाश रही
जब नई न कोई राह मिली
तो गांव, नगर की ओर चली
भटके लाखों जन द्वार द्वार
सपने बिखरे है तार तार
७-
घर द्वार बहा, परिवार बहा
सपनों का भी संसार बहा
कोई अनाथ शिशु बिलख रहा
बूढा भी कोई फफक रहा
माताएं पुत्र-विहीन हुई
वत्सलता ममता दीन हुई
८-
फिर भी लहरों को चीर चीर
जीने की चाह लिए , अधीर
पल पल बरसाते नयन-नीर
अन्तर में धारे गहनपीर
बचकर आया जो बिलख रहा
खुद बचा, मगर परिवार बहा
९-
कंधे पर बकरी को डाले
बच्चे को लटका लिया गले
पानी में पौरुष-अग्नि जला
जलमग्न भूमि पर बढ़ा चला
मानव का जय-अभियान धन्य
मानव, स्रष्टा का सुत अनन्य
१०
गिरते को फिर से लिया थाम
पूछा ना मजहब, जाति, नाम
सोदर तो नहीं, मगर, बढकर
रोते भाई का हाथ पकड़
गदगद हो गले लगाते है
हम उनको शीश नवाते है
११
तटबन्ध नहीं टूटा था यह
भगवान् नहीं रुठा था यह
कोशी का दोष नहीं कोई
किस्मत थी कहीं नहीं सोई
उनका ही है यह घोर पाप
जो करते अब मिथ्या-विलाप
१२
अच्छा ! न अभी कुछ बोलेंगे
पर, कभी तो मुह को खोलेंगे
जो शत्रु बना मानव का, जल
किसके पापों का था प्रतिफल
देना होगा उत्तर इसका
वह कौन ? पाप था यह किसका
१३
जब बधने को व्याकुल कोशी
बजती थी तब उनकी वंशी
मन बहलाते थे चाटुकार
कहते थे- है शुभ समाचार
एहसास हो रहा था सुखप्रद
मौसम लगता सब ओर सुखद
१४-
जब जन-सेवा का ध्यान न हो,
कर्तव्यों का खुद भान न हो,
नौकर, मालिक की चाल चले
नौकरशाही फूले व फले
तब लोकतंत्र गल जाता है
नौकर, मालिक बन जाता है
१५.
है धर्म-प्रवर्तक लोकतंत्र
सत्कर्म-प्रवर्तक लोकतंत्र
बन्धुता- प्रवर्तक लोकतंत्र
समता का रक्षक लोकतंत्र
जब लोकतंत्र गल जाता है
नौकर, मालिक बन जाता है
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मकतब में रोशन है मेरा इश्क...

· अरविन्द पाण्डेय


मुमकिन और मुनासिब मेरा इश्क
मयकश की मस्ती सा मेरा इश्क

मकतब में रोशन है मेरा इश्क
मंजिल का रहबर है मेरा इश्क


----- अरविंद पाण्डेय

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