प्रतिमाओं की स्थापना के संबंध में सनातन धर्म में एक विशेष प्रक्रिया विहित की गई है. सभी जानते हैं कि जब हम किसी देवता या देवी की प्रतिमा स्थापित करते हैं तो उसमें शास्त्रीय विधि के अनुसार प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. उसके लिए गर्भगृह का निर्माण होता है.प्राण प्रतिष्ठा के बाद उसे जीवंत माना जाता है. सजीव माना जाता है.
देव प्रतिमा के सम्मान की दृष्टि से उन्हें स्नान कराने के लिए, उन्हें भोग लगाने के लिए, उनकी आरती के लिए एक पुजारी की विधिवत नियुक्ति की जाती रही है.
भारत, यूनान, रोम और मिश्र तथा यूरोप के अन्य देशों की तरह नहीं है जहां किसी भी देवता या महापुरुष की प्रतिमा चौराहों पर या अन्य पार्को में स्थापित कर दी जाए.
यूरोप और अन्य देशों के अनुकरण में भारत में भी महापुरुषों की प्रतिमाएं चौराहों पर और अन्य स्थलों पर स्थापित करने की एक परंपरा तो प्रारंभ हुई किंतु उन प्रतिमाओं की दैनिक देखभाल, स्वच्छता आदि कार्य के लिए अथवा उनकी सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं बनाया गया.
अब आवश्यकता है कि इस तरह का कानून बनाया जाए कि यदि कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी सार्वजनिक स्थल पर किसी महापुरुष की प्रतिमा स्थापित करे तो उस प्रतिमा की देखभाल के लिए, उस प्रतिमा को निरंतर स्वच्छ बनाए रखने के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति भी करे और प्रतिमा की सुरक्षा का भी उपाय करे तभी ऐसी प्रतिमाएं स्थापित किए जाने की अनुमति सरकार द्वारा दी जानी चाहिए.
यदि कोई इन शर्तों को पूरा नहीं करता है कोई तो उसे प्रतिमा स्थापित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए
बिहार के चंपारण जिले में जहां बैरिस्टर गांधी 1917 में आए थे और अपने अद्भुत, अप्रतिम, अभूतपूर्व सत्याग्रह के प्रयोग का प्रारंभ किया था और उसके सफल प्रयोग के बाद बैरिस्टर गांधी संपूर्ण विश्व में महात्मा गांधी कहे जाने लगे थे, उसी चंपारण के मोतिहारी जिले में दो जगहों पर स्थापित महात्मा गांधी की प्रतिमा के साथ अपमानजनक व्यवहार कुछ अपराधियों द्वारा किया गया.
यह एक प्रस्तर मूर्ति को अपमानित करने की घटना नहीं है बल्कि अत्यंत गंभीर आपराधिक घटना है.
पुलिस तत्परता पूर्वक इन मामलों में अनुसंधान भी कर रही है किंतु अब महापुरुषों की प्रतिमाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए कानून बनाया जाना आवश्यक हो गया है क्योंकि महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, डॉ आंबेडकर आदि की प्रतिमाएं सार्वजनिक स्थलों पर लगाई जाती हैं और इन प्रतिमाओं के अपमान के बाद लोक व्यवस्था तथा विधि व्यवस्था भंग होने की संभावना भी बलवती होती है. इस अप्रिय स्थिति से मुक्ति के लिए कानून बनाया जाना आवश्यक है.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तक "राष्ट्र चिंतन" और "राष्ट्र जीवन की दिशा" मैंने हाई स्कूल के विद्यार्थी के रूप में पढी थी...
अनेक विस्मयकारी और मौलिक चिंतन से समृद्ध इन पुस्तकों में "मैं और हम" शीर्षक लेख मुझे आजतक हर सामाजिक या राष्ट्रीय समस्या और उनके समाधान के अन्वेषण के समय एक सम्पूर्ण समाधान के रूप में दिखाई देता है..यह लेख शाश्वत और सार्वभौम चिंतन का एक उच्छल सागर है..इस लेख को आधार बनाकर अनेक ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं...
1967 के संसदीय निर्वाचन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पवित्र नेतृत्व में भारतीय जनसंघ को 35 संसदीय क्षेत्रों में विजय प्राप्त हुई थी जो अभूतपूर्व और अप्रत्याशित मानी गयी थी किन्तु इससे यह सिद्ध हो गया था कि भारतीय जनमानस राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति से अनुप्राणित है और यदि उसकी इस प्रसुप्त राष्ट्रवादी चेतना को जागृत किया जाय तो भारतीय राष्ट्रीय चेतना का महजागरण सम्भव है..
1967 में उनके प्रखर नेतृत्व को यह सफलता प्राप्त होती है और 1968 की फरवरी में ही उनकी अतिरहस्यमय रूप से हत्या कर दी जाती है..
उनकी हत्या के बाद उनका शव तत्समय मुगलसराय सराय नामक रेलवे स्टेशन की रेल पटरियों पर पाया गया था जब वे पटना के लिए रेलयात्रा पर थे..
इस प्रकरण में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उन्हें उस दिन लखनऊ से दिल्ली जाना था किंतु पटना से एक महत्वपूर्ण व्यक्ति ने फोन कर उन्हें पटना के किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया और उन्होंने लखनऊ से दिल्ली की यात्रा की जगह लखनऊ से पटना के लिए प्रस्थान किया और उनकी हत्या कर दी गयी..
इस रहस्यमयी हत्या का अनुसंधान सीबीआई ने किया और आश्चर्यजनक रूप से सीबीआई, इस अतिमहत्वपूर्ण हत्या के षड्यंत्र पक्ष पर कोई साक्ष्य संकलित नहीं कर सकी..
"एकात्म मानववाद" उनका एक अभूतपूर्व चिंतनपरक ग्रंथ है जिसमें उनकी एक और सार्वभौम शाश्वत चिंतन की मंदाकिनी है जिसमे स्नान करके कोई भी व्यक्ति अपने सामाजिक व्यक्तित्व को शुद्ध और पवित्र कर सकता है..
बाद में उन्हीं के अनुयायियों द्वारा "गांधीवादी समाजवाद" शब्द द्वारा कुछ नया करने की वासना में इस एकात्म मानववाद के विचार को प्रतिस्थापित कर दिया गया.
दीनदयाल जी की अनेक पुस्तकों में से एक अतिशय रोचक और प्रेरक पुस्तक "सम्राट चंद्रगुप्त" भी है जो उन्होंने चुनार के किले में प्रवास करते हुए 24 घण्टे के अंदर ही लिखकर पूर्ण की थी..
दीनदयाल जी यद्यपि भारतीय जनसंघ नामक राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष थे किन्तु उनकी पुस्तकों और उनके दर्शन का अवगाहन प्रत्येक भारतीय को स्वयं को बौद्धिक रूप से समृद्ध करने हेतु किया जा सकता है...
आज ऐसे तपस्वी को उनके महाप्रयाण दिवस पर विनत श्रद्धांजलि 🌹
सभ्यता की विचित्र कालावधि है यह .. कोरोना के लॉक डाउन में हज़ार किलोमीटर दूर अपने गांव देस की ओर पैदल चलता हुआ राष्ट्रनिर्माता, अन्नप्रदाता श्रमिक थककर अचेतन होकर गिर जाता और अपने प्राण त्यागता है...वह अपने गांव इसलिए जाना चाहता था कि अगर कोरोना से ही मरेंगे तो अपने गांव में ही मरेंगे ...उसकी ये छोटी सी इच्छा भी यह विराट शक्तिसम्पन्न समाज पूरी नहीं करता ...
....उसकी मृत्यु इस सभ्यता के लिए कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं बनती...इस सभ्यता की वाहक सोशल मीडिया में उसे कोई श्रद्धांजलि नहीं देता...ये विचित्र सभ्यता है जहां के अधिकांश सभ्य लोग, किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसके चर्चित होने की शक्ति के आधार पर श्रद्धांजलि देते हैं..सभ्यता का विचित्र काल-खण्ड है यह !
.... तो मेरी ओर से उन सभी अन्नप्रदाता , राष्ट्रनिर्माता श्रमिकों को सादर विनम्र क्षमायुक्त श्रद्धांजलि जिन्होंने इस कोरोना-काल में अपनी जन्मभूमि के प्रति असीम प्रेम के कारण उसी की ओर चलते चलते मार्ग में ही अपने प्राण त्याग दिए !
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस्लाम के अनेक विद्वानों के अनुसार कुरआन में वर्णित हज़रत आदम स्वर्ग से धरती पर भेजे जाने के बाद पर भारतभूमि पर ही अवतरित हुए थे.उनके स्वर्ग से अवतरण की कथा को इस तरह से समझा जा सकता है.खुदा सभी को बेरोक-टोक खाने पीने की इजाज़त तो देता है मगर उस पेड़ के पास जाने की इजाज़त नहीं देता जिसके पास जाने से इंसान क्या आदम को भी खुदा के गुस्से को झेलना पडा था.
ये पेड़ क्या है ? ये पेड़ उन हसरतों के गुच्छे का नाम है जिन्हें पूरी करने की इजाज़त नहीं है.ऐसी हसरतें जो इंसान को इंसानियत से नीचे गिरा देती हैं.जो एक इंसान को दूसरे इंसान का हक छीन लेने के लिए उकसाती हैं .. जो इंसान को अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी करने की वजह बनती हैं.
..जब खुदा ने ज़मीन में आपना नायब बनाने की बात फरिश्तों को बताई और उन्हें और शैतान को आदम को सजदा करने का हुक्म दिया....तब फरिश्तों ने तो आदम को सजदा किया मगर शैतान ने नहीं किया.इस पर , अल्लाह ने आदम से कहा कि तुम अपनी बीबी के साथ जन्नत में रहो..बेरोक-टोक खाओ पिओ मगर उस पेड़ के पास न जाना.मगर, शैतान के असर की वजह से आदम फिसल गए और उन्हें ज़मीन में आना पडा ...जन्नत से ज़मीन पर आने की नौबत सिर्फ इसलिए आई क्योकि आदम ने अल्लाह की नेमतों को तो अपना लिया मगर उसकी पाबंदियों को नहीं माना.
इसलिए हर मुसलमान को इस बात पर गौर करना चाहिए कि जब अल्लाह हमको बेरोक-टोक खाने पीने की इजाज़त देता है और हम खुदा की इनायत से खुशहाल ज़िंदगी जी रहे होते हैं तब, अल्लाह की पाबंदियों पर भी हमें गौर रखे रहना चाहिए.और जो पाबंदिया हमारे लिए लगाईं गईं हों उस ओर रुख नहीं करना चाहिए.क्योकि,अल्लाह,बेशक,रहम करनेवाला और माफ़ करने वाला है मगर वह जानबूझ कर कुफ्र और शिर्क करने वालों को सज़ा भी देता है.
#Esther_Duflo और #अभिजीत_बनर्जी ने विश्व के 7 महाद्वीपों में से 5 महाद्वीपों ( कितने देशों में - यह पता चलते ही लिखूंगा ) में उन उन देशों के राजनीतिज्ञों+ शासकों द्वारा गरीबी उन्मूलन हेतु किए गए उपायों का अध्ययन किया और उन उपायों का गरीबों पर क्या असर हुआ - यह भी लिखा !
इन दोनों लेखकों के महाप्रयास के बाद लिखी गई महापुस्तक है #Poor_Economics जिसकी समीक्षाएं लंदन, अमेरिका के बड़े बड़े अखबारों में प्रकाशित कराईं गयीं.....
... पुस्तक को प्रसिद्धि दी गयी और अंततः नोबेल समिति द्वारा पुरस्कार दिलाया गया !
... हाँ, गरीबी ऐसा विषय है जो बीसवीं शताब्दी में लोकतांत्रिक देशों में चुनाव जीतने का मुख्य शस्त्र और शास्त्र बन चुकी है ...मैंने सुना है कि इसी गरीबी-शास्त्र के एक सूत्र का उपदेश श्री बनर्जी ने 2019 के प्रारम्भ में भारत के कुछ लोगों को दिया था जिसके अनुसार 25 करोड़ परिवारों को 72 हज़ार रुपए वार्षिक दान दिया जाना था जो भारत सरकार के कुल बजट का 13% होता !
.... इस दान की महाघोषणा करने वाले महानुभाव से जब लोगों ने पूछा कि ये पैसा आप लाएगें कहां से ?
तो उन्होंने ने बड़ा आसान सा उत्तर दिया था कि अम्बानी और अडानी से पैसे लेकर यह दान-योजना पूरी की जाएगी ! श्री बनर्जी ने शायद उन्हें इस योजना के लिए पैसे जुटाने की तकनीक नहीं बताई होगी तो उन्हें जो समझ में आया, बोल गए !
... मगर, इतना सुनते ही भारत के गरीब, जो पैसे से गरीब हैं किंतु बुद्धि विवेक में Esther Duflo से भी अमीर हैं, ने इस पूरी योजना को नकार दिया ... क्योंकि उनके सामने 16 करोड़ शौचालय निर्माण,
6 करोड़ गैस सिलिंडर का वितरण,
15 करोड़ से अधिक प्रधानमंत्री आवास और
आयुष्मान योजना में 5लाख तक का इलाज खर्च दिए जाने और इन जैसी 80% सफल अनेक योजनाएं मुस्कुराती हुई दीख रही थीं जिनका उन्हें 5 सालों से प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा था..
.....मैं मानता हूँ कि इन योजनाओं का भी 20% हिस्सा भ्रष्टाचार का शिकार हुआ होगा किन्तु जितना हिस्सा क्रियान्वित हुआ वह भारत के गरीबों के इस विश्वास को प्रबलता के साथ सशक्त कर गया था कि भविष्य में ये योजनाएं 100%सफल होगीं क्योंकि इन योजनाओं के साथ साथ ताकतवर भ्रष्टों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की योजना भी चलाई जा रही थी ..
.... भारत और दूसरे महाद्वीपों की गरीबी और उन गरीबों के साथ निम्नमध्यवर्ग, मध्यवर्ग का व्यवहार भिन्न है ....यहां भूखा व्यक्ति भी यदि #श्रीहनुमान जी के मंदिर के पास बैठा रहे तो उसे कोई न कोई भोजन कराएगा ही और देने के भाव के साथ नहीं पुण्य लेने के भाव से भोजन कराएगा... #गुरुद्वारा में जाकर कोई भी भूखा व्यक्ति लंगर में सम्मानसाहित पूर्ण भोजन प्राप्त कर सकता है...#मस्जिद के पास कोई भी किसी भी निष्ठावान मुस्लिम द्वारा इज़्ज़त के साथ #जकात पा सकता है ! यह अफ्रीका में, अमरीका में, यूरोप में नहीं है जहां भोजन, शिक्षा , स्वास्थ्य की भूख से तड़पते हुए व्यक्ति को मारकर दूसरा भूखा व्यक्ति अपनी सत्ता, संपत्ति, समृद्धि की भूख मिटाता है...
... बनर्जी और Esther Duflo के चिंतन और क्रियान्वयन का अंतर्विरोध भी समझना जरूरी है... बनर्जी यह मानते हैं कि किसी गरीब को शतप्रतिशत दवा या कोई अन्य सहायता देना ठीक नहीं क्योंकि तब उस सहायता का मूल्य उसे नहीं समझ में नहीं आएगा और इस तरह वे अनुदान=सब्सिडी को बेहतर मानते हैं किन्तु भारत में उनकी प्रस्तावित न्याय योजना में सरकार के लिए बिना कुछ काम किए ही वार्षिक रूप से 72 हज़ार रुपए, 25करोड़ लोगों को देने की चर्चा कैसे की गई - यह आश्चर्यजनक है... ख़ैर, यह सब तो सिद्धांतों की बात है .... इन दोनों लेखकों को नोबेल मिला जिसमें पैसे के अलावा आभासी यश भी भरपूर मिलता ही है ... इन दोनों लेखकों को संयुक्त बधाई 👍💐💐
अलीगढ़ कांड और निर्भया फण्ड
निर्भया कांड के बाद भारत सरकार ने निर्भया कोष बनाया जिसके लिए आवंटित राशि से महिलाओं के विरुद्ध अपराध के निवारण-निरोध के लिए काम किया जाना था... क्या आपको पता है कि आपके अपने अपने राज्यों में उस कोष का कहां किस तरह का प्रयोग किया गया ?? नहीं ! तो उसे जानने की कोशिश कीजिए !
....उस कोष के प्रयोग के लिए मैंने IG कमज़ोर वर्ग के रूप में एक प्रस्ताव भारत सरकार के गृह मंत्रालय को 2013 में ही भेजा और वीडियो कॉन्फ्रेंस में भी उस प्रस्ताव की उपयोगिता पर विस्तृत रूप से बताया था !
... वह प्रस्ताव था -
1. महिला अपराधों से प्रभावित प्रत्येक थाना में एक अलग "महिला एवं बच्चों के लिए कक्ष" संस्थापित हो जो महिला अपराधों के संबंध में त्वरित कार्रवाई केंद्र
और
परामर्श केंद्र
के रूप में कार्य करेगा !
2. उस कक्ष में केवल महिला अधिकारी और महिला सिपाही प्रतिनियुक्त रहेगीं जिन्हें बच्चों और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के संबंध में नियमित रूप से विशेष प्रशिक्षण दिया जाता रहेगा !
3. थाना में इस कक्ष के लिए एक अलग वाहन रहेगा जिसका प्रयोग उस कक्ष में पदस्थापित प्रभारी महिला अधिकारी द्वारा महिला या बच्चों के विरुद्ध अपराध के संबंध में ही किया जाएगा !
.... उनकी योजना क्या थी ?
जिले में एक one stop centre स्थापित किया जाएगा जहां पुलिस अधिकारी, डॉक्टर, मनोचिकित्सक आदि रहेगे जो किसी भी महिला के विरुद्ध अपराध के बाद कानूनी कार्रवाई आदि करेगें !
... मैंने विमर्श में कहा कि यदि पटना के मोकामा के किसी गांव में 12 बजे रात कोई इस तरह का अपराध होता है तो वह पीड़ित महिला पटना ज़िला मुख्यालय में स्थापित centre में कैसे आ पाएगी ?? उसे तुरंत सहायता चाहिए तो रात में उसे 30 किलोमीटर दूर आने के लिए विवश करना उचित है कि 2 किलोमीटर दूर उसके अपने थाना में लाकर महिला कक्ष के माध्यम से उसकी सहायता करनी उचित है ??
... मैंने कहा कि पीड़ित के रूप में सोचते हुए ही हमें कोई योजना क्रियान्वित करनी होगी...
... तो निर्भया फण्ड को गूगल में सर्च कीजिए पता कीजिए कि आपके अपने अपने राज्यों में उसका क्या उपयोग हुआ और कृपया टिप्पणी में लिखिए भी !
... 21 सदी में 18 वीं सदी की सोच रखने वाले नौकरों के कारण ही इस तरह की समस्याओं का वास्तविक समाधान नहीं हो पा रहा !
- अरविंद पांडेय
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गांधी जी की हत्या के उपेक्षित पहलू :
महात्मा गांधी ने भारत विभाजन के प्रकरण पर कहा था कि बटवारा मेरी लाश पर होगा..
.... 14 अगस्त 1947 के बाद वे अपने इस संकल्प और अभीप्सा के साथ ही श्वास ले रहे थे...विभाजन की असह्य वेदना उन्हें पल पल मार रही थी...उनका सारा राजनीतिक दर्शन उन्हें स्वयं इस रक्तरंजित विभाजन के साथ ही झूठा लग रहा था .....
.......वे भारत_पाकिस्तान के विभाजन और इस क्रम में जिन्ना और उसके गिरोह द्वारा किये गए नरसंहारों से मर्माहत थे और अपनी जिजीविषा को वे स्वेच्छया तिलांजलि दे चुके थे.....
...… और इसलिए जब मदनलाल पहवा ने 20 जनवरी 1948 को दिल्ली में गांधी निवास बन चुके बिरला हाउस पर बम चलाया और गांधी जी की सुरक्षा बढ़ा दी गयी तो उन्होंने गृहमंत्री सरदार पटेल को बुलाकर कहा कि उन्हें सुरक्षा नहीं चाहिए और अगर सुरक्षा हटाई नहीं गयी तो वे अनशन करेगें..... सरदार पटेल गांधी जी को जानते थे कि वे सुरक्षा नही हटाने पर आमरण अनशन करेगें... उन्हें दो स्थिति बनती दिख रही थी उन्हें -
1. सुरक्षा नही हटी तो गांधी जी अनशन करेगें और उनका वह अनशन उनकी मृत्यु का कारण बन सकता था .
2. सुरक्षा हटाने पर पाकिस्तान से दिल्ली में आये शरणार्थियों से गांधी जी पर आसन्न प्राण संकट था क्योंकि मदनलाल पहवा 20 जनवरी को गांधी जी पर असफल हमला कर चुका था...
..... गृहमंत्री सरदार पटेल ने दूसरा विकल्प चुना और गांधी जी को अनशन से बचाने के लिए उनकी सुरक्षा को हटा देने का आदेश दिया...
..... मैं पुलिस अधिकारी के रूप में हमेशा से सोचता रहा हूँ कि गृहमंत्री के उस अनुचित आदेश को दिल्ली पुलिस प्रमुख ने क्यों मान लिया ? दिल्ली पुलिस प्रमुख कह सकते थे कि ---
"जबतक मैं पुलिस प्रमुख हूँ सुरक्षा नहीं हटाई जाएगी क्योंकि गांधी जी पर हमले की संभावना है..आप चाहें तो मुझे हटा दें.."
.... किन्तु दिल्ली पुलिस प्रमुख ने गृहमंत्री सरदार पटेल के अनुचित आदेश का पालन किया और गांधी जी की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी सभी लोगों द्वारा गांधी जी को असुरक्षित छोड़ दिया गया...
....30 जनवरी 1948 को सरदार पटेल गांधी जी की हत्या के 15 मिनट पहले तक उनके साथ बिरला हाउस में थे......वे बिरला हाउस से निकलते हैं और गांधी जी प्रार्थना सभा की ओर बढ़ते हैं.... नाथूराम ने स्वयं भी देखा कि भारत के गृहमंत्री यहां हैं.... और प्रार्थना स्थल पर गांधी जी के पहुँचने के पहले ही नाथूराम ने बड़ी आसानी से गांधी की हत्या कर दी...
.... गांधी जी वास्तव में अपने "ईश्वर अल्ला तेरो नाम" के राजनीतिक दर्शन के साथ जिन्ना और उसके नरसंहारी गिरोह द्वारा किए गए विश्वासघात के बाद जीवित रहना ही नहीं चाहते थे...उन्होंने कहा था कि विभाजन मेरी लाश पर होगा और इस वचन पर अडिग रहते हुए उन्होंने स्वयं को इतना असुरक्षित हो जाने दिया कि उनकी जीवित देह को लाश में बदल देने में पागल हत्यारे को कोई अवरोध या असुविधा नहीं हुई....
..... स्वतंत्र भारत में पुलिस कर्तव्यों में यह पहला राजनीतिक हस्तक्षेप था जिस कारण महात्मा गांधी जी की हत्या संभव हो पाई....
.... नाथूराम ने कोर्ट के सामने दिए गए अपने बयान में यह कहा था कि गांधी जी की सुरक्षा हटाकर वास्तव में उन्हें हमले का शिकार बन जाने के लिए छोड़ दिया गया था... और अगर सुरक्षा बनी रहती तो उन्हें मारना संभव नहीं था...
..... महात्मा गांधी के प्रति और इस देश के प्रति भक्ति रखने वालों को उनकी हत्या के इन उपेक्षित पहलुओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए...
वाल्मीकीय रामायण में वर्णित है कि जब श्री भरत जी, श्री शत्रुघ्न जी के साथ ननिहाल से वापस आते हैं
और
उन्हें ज्ञात होता है कि उनकी माता कैकेयी को दो वर देकर महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो चुके हैं तथा
सीता जी के साथ श्रीराम और श्री लक्ष्मण वनगमन कर चुके हैं
तब वे स्वयं को इन दुर्घटनाओं का कारण मानते हुए ग्लानिग्रस्त होते हैं तथा माता कौसल्या के भवन में प्रवेश करते हैं...
....माता कौसल्या अति शोकार्त थीं और श्री भरत को देखकर उन्होंने कहा कि "अब तुम निष्कंटक राज्य भोग करो ..."
...... माता का यह वचन श्री भरत को असीम पीड़ा देते हुए आहत करता है और वे रघुवंश की इस महादुर्घटना में अपनी सहमति न बताते हुए माता के समक्ष अनेक शपथ लेते हैं... उन शपथों में से एक शपथ थी -
अर्थात
यदि श्रीराम के वनवास में मेरी किसी भी प्रकार से सहमति रही हो तो मुझे भी वही पाप लगे जो किसी सेवक से कार्य कराने के बाद उसे उचित पारिश्रमिक न देने वाले स्वामी को लगता है..
.... न्यूनतम मजदूरी न देना वाल्मीकीय रामायण में महापाप माना गया है... रामायण में धर्मधुरीण श्री भरत का वचन है यह... वाल्मीकीय रामायण को पूर्णतः हृदयंगम करने से ही शुद्ध मनुष्य का निर्माण सम्भव होगा ... आज के नीतिनियन्ता यदि माता कौसल्या के समक्ष श्री भरत द्वारा ली गयी शपथों का ज्ञान एवं सम्मान करें तो वे आम जनता को मिथ्या वचन देने के महापाप से बच सकते हैं !
.......... और जो लोग 1 मई-मजदूर दिवस पर कम्युनिस्ट शब्दावली में कुछ लिखने की औपचारिकता निभा रहे हों उन्हें वाल्मीकीय रामायण वे वर्णित श्रमिक के अधिकार का सिद्धांत पहले पढ़ना चाहिए !
संपत्ति की सार्वजनिक-घोषणा :
लोकसेवा के सभी महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत सभी सेवकों को सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार के संदर्भ में जनता के टूटते हुए विश्वास को बचाने के लिए अब सोशल मीडिया पर भी अपनी चल-अचल संपत्ति की घोषणा करनी चाहिए !
.... उसका परिणाम क्या होगा ?
... यदि ऐसे अधिकारी या नेता का #फ्लैट, भूखंड, भवन आदि होगा तो लोग उसकी सूचना विजिलेंस या सरकार को देगें !
.... जैसे - मेरी चल-अचल संपत्ति निम्नवत है :
1. अचल संपत्ति : उत्तरप्रदेश के मिर्ज़ापुर ज़िले के प्रसिद्ध महाशक्तिपीठ विंध्याचल में मेरे पास एक पुराना मकान और 12 बिस्वा (कट्ठा) कृषिभूमि है.
....... बिहार झारखंड के 6 जिलों में मैं SP रहा. 3 रेंज में DIG रहा और 1 ज़ोन में IG के रूप में कार्यरत रहा... इसके अतिरिक्त CID में IG और ADG के रूप में भी कार्यरत रहा....
..... बिहार या झारखंड या देश-विदेश में किसी जगह मेरी कोई अचल संपत्ति - फ्लैट, भूखंड, भवन आदि नहीं है !
2. चल संपत्ति : मेरे पास लगभग 7-8 लाख रुपए की चल संपत्ति है..
..... अब यदि मेरी कोई अचल संपत्ति कहीं हो तो उसकी सूचना सरकार को अवश्य दीजिए !
..... मैंने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हूँ कि CBI के आलोक वर्मा, राकेश अस्थाना सहित देश के महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत सारे अधिकारियों को सोशल मीडिया पर अपनी संपत्ति की घोषणा करनी चाहिए जिससे CBI की और उन उन पदों और संस्थाओं की विश्वसनीयता अखंड और अक्षुण्ण रह सके !
.... इसीतरह सभी महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक लोक सेवकों को सोशल मीडिया पर अपनी संपत्तियों को घोषणा करनी चाहिए !
कल देश के अधिकांश हिस्सों में 125 करोड़ लोगों में से सिर्फ 1-2 लाख लोग सड़कों पर बैनर तख्ती लेकर निकलेंगे और बाकी करोड़ों लोगों का चलना,फिरना, स्कूल जाना, अस्पताल जाना, सब्ज़ी-सामान बेचना-खरीदना मुहाल कर देगें .....
उच्च न्यायालयों के अनेक न्याय निर्णयों द्वारा अवैध घोषित बंद कल फिर होगा !!
.... इन बंद-बाज़ लोगों के पास पेट्रोल डीज़ल पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा वसूले गए टैक्स को किस किस काम में खर्च किया गया - , इसका विवरण नहीं होगा , बस कुछ नारे होंगे, कुछ स्टेटमेंट्स होंगे और कुर्सी पर बैठने की ललक होगी.....
.... पेटोल डीज़ल 50 रुपये में बिक सकता है अगर पूरा देश यह निर्णय करे कि अगले 10 सालों तक कोई ताजमहली बिल्डिंग नहीं बनेगी, 5 स्टार होटलों में कोई सरकारी सेमिनार नहीं होगा, और दूसरे गैरज़रूरी खर्चे नहीं किए जाएंगे ! लाखों करोड़ रुपए किसानों की कर्जमाफी के नाम पर खर्च किये जाते हैं -- ये पैसा भी पेट्रोल डीज़ल पर टैक्स लगाकर ही इकट्ठा किया जाता है....
..... आइए मैदान में मगर समाधान के साथ आइए ...
.... क्योंकि आपकी इस बंदबाज़ी से जिस दिन 125 करोड़ लोग नाराज़गी व्यक्त करने के लिए आमने सामने होंगे तो क्या होगा ।
हमारा संविधान ईश्वरवादी_है :
कृपया इसे पढ़ें और इच्छा हो तो शेयर कॉपी पेस्ट भी करें :
..... संविधान की तीसरी अनुसूची में
संघ और राज्यों के मंत्रियों के शपथ का प्रारूप दिया गया है जिसका प्रारम्भ होता है --
" मैं , अमुक, ईश्वर की शपथ लेता हूँ / सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ " -- इसका अर्थ क्या हुआ ?
.... इसका स्पष्ट अर्थ है कि हमारी संविधान सभा
तथा
संविधान निर्मात्री समिति को
ईश्वर के अस्तित्व में अखण्डविश्वास था
क्योंकि संविधान निर्माता किसी ऐसी सत्ता के नाम पर मंत्रियों को शपथ लेने का प्रावधान नहीं कर सकते थे जिसका अस्तित्व ही न हो या जिसके अस्तित्व पर उन्हें अखंड विश्वास न हो...
..... इसलिए भारत में ईश्वर एक आध्यात्मिक सत्य तो है ही, संवैधानिक सत्य भी है जिसके नाम पर शपथ लेकर केंद्र और राज्य के मंत्रिमंडल के सदस्य कर्तव्य निर्वहन करते हैं और करते रहेगें....
..... और इसलिए, भारत में कोई भी स्वयं को सहस्रबाहु ईश्वर के समकक्ष न समझे क्योंकि ईश्वर एक संवैधानिक सत्ता है जिसके नाम पर शपथ लेकर देश का राजकार्य संचालित होता है...
शाहे-इंक़लाब अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान साहब को
जन्मदिन मुबारक़ 💐💐💐
गद्दार के धोखे से गिरफ्तार जब हुए.
मज़हब के बहाने से पुलिस ने थे यूँ कहे-
"दोगे जो गवाही तुम साथियों के बर खिलाफ.
सरकार से कहेंगे कि वो कर दे तुम्हें माफ़."
अशफ़ाक़ ने कहा-सुनो अंग्रेज़ के कप्तान.
मेरी तो है सरकार ये अज़ीज़ हिंदुस्तान.
तख्ते पे फांसियों के हम चढ़ेंगे यूँ पुरजोश.
अंग्रेज़ सल्तनत के उड़ाएंगे वहीं होश.
कह कर यूँ तुम चले गए ऐ शाहे-इंक़लाब.
तुम मादरे वतन के लाडले थे लाजवाब.
तुमसे ही तो रहेगी हिंदुस्तान की पहचान .
लाखों सलाम तुमको ऐ अशफ़ाक़ुल्ला खान.
-- अरविन्द पांडेय .
अपने ही शस्त्रों से आहत, रुधिर-विरूपित वेष.
विवश हुआ पश्चिम भी, अब दे रहा शान्ति-उपदेश.
जब तक था आतंकित पूरब, तब तक थे निश्चिन्त.
अब यूरोप और अमरीका भी हैं परम सचिन्त.
जिन देशों के हथियारों से भरा विश्व - बाज़ार .
अचरज,वे ही आज कर रहे व्याकुल शांति-प्रचार.
आज बनी रणभूमि हमारी धरा धन्य रमणीय.
नहीं मार्ग अब शेष, युद्ध लघु ही अब है वरणीय.
युद्ध आज आवश्यक है अपने ही कुविचारों से .
बच सकते हो बचो चित्त में फैले अंगारों से .
धधकेगी युद्धाग्नि निकट,फिर होगा कौन तटस्थ.
पूर्व और पश्चिम दोनों होंगे आहत , अस्वस्थ .
-- अरविन्द पांडेय
#मनुवाद और #ब्राह्मणवाद
यदि आपके मन में सनातन धर्म और महाराज मनु के प्रति ज़रा भी सम्मान हो तो आपको मनुवाद और ब्राह्मणवाद जैसे शब्दों को अपने स्वार्थवश अनावश्यक लांछित करने वाले लोगों का पूरा बहिष्कार करना चाहिए और देश के किसी भी राज्य में अथवा दुनियां के किसी भी देश में उन्हें किसी भी तरह का समर्थन नहीं देना चाहिए चाहे ऐसे लोग आपके द्वार पर करबद्ध भिक्षुक-विशेष के रूप में नतशिर होकर ही क्यों न खड़े हों......
...... यहाँ फिर दावा किया जाता है कि जिन दो चार श्लोकों के आधार पर महाराज मनु को स्त्री और शूद्र विरोधी घोषित किया जाता है वे उनके द्वारा नहीं लिखे गए अपितु अंग्रेजों द्वारा मनुस्मृति के सम्पादन के समय षड्यंत्रपूर्वक डाल दिए गए ....
.... वास्तव में महाराज मनु ने मानव धर्म सूत्र लिखा था जो सैकड़ों वर्ष पहले से अनुपलब्ध है ....
श्री हनुमान जी महाराज को गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में स्तुति करते हुए लिखा है :
दनुजवनकृषानुं ज्ञानिनामग्रगण्यं
श्री हनुमान् जी महाराज को ज्ञानिनामग्रगण्यं क्यों कहा गया - यह जानने के लिए प्रत्येक श्रद्धालु को श्री वाल्मीकि कृत रामायण का सुन्दरकाण्ड अवश्य पढ़ना चाहिए ।
आज श्री हनुमान् जयन्ती है । श्री हनुमान् जी महाराज को प्रणमन
और आप सभी को
#श्रीहनुमान्-जयन्ती की #मंगलकामनाएं
ईश्वर सदा अपने ऊपर अखंड विश्वास रखने वाले की इच्छा पर ही प्रकट होते हैं............ प्रहलाद जी ने कह दिया खम्भे में भी हैं, तो वे खम्भे से ही प्रकट हो गए.....
.............. जिसे ईश्वर पर विश्वास नहीं है या जो ईश्वर की सत्ता का निषेध करता है उसे विश्वास दिलाने के लिए ईश्वर प्रकट नहीं होने वाले.............
अपना जीवन कितना मूल्यवान लगता है ,,,,,,,,,,,,,,,,, अपना जीवन बचाने के लिए एक ही पल में कुर्सी छोड़-छोड़ कर बड़े लोग उसी तरह खुले आसमान के नीचे आ गए जैसे राजकुमार सिद्धार्थ एक ही पल में अपना साम्राज्य छोड़ कर खुले आकाश के नीचे चले गए थे......................
..................... अगर इसी तरह आम नागरिकों के जीवन को बचाने के लिए भी लोग एक पल में ही कुर्सी छोड़ने को तैयार रहें तो भूदेवी भूकंप से पीड़ित ही नहीं होगीं.............
.................. मगर लोगों द्वारा, कुर्सी को पाने और उस पर बैठे रहने के लिए के लिए कुर्सी के लिए बनायी गयी सारी आचार-संहिताएँ अपने लोभ-कंप और अहंकार-कंप से उसी रहा ध्वस्त कर दी जाती हैं जैसे भूकम्पों से भूदेवी के वक्ष पर निर्मित अट्टालिकाएं ध्वस्त हो जाती हैं .............
...................... हज़ारों युवा वृक्षों को यही कुर्सी छोड़ कर भागनेवाले लोग अपने पर्यावरण-विरोधी चित्त-दोष के कारण क़त्ल कर देने का हुक्म देते है............. सारे देश में वृक्षों का क्रूर कत्ले-आम देखा जा सकता है..........
................ तो अब कुर्सी छोड़ के भागते क्यों हैं साहब ,, इसलिए कि आपका जीवन खतरे में दिख रहा था.............
...................आप ईश्वर को नहीं मानते हैं न,,, ठीक है,,,, तो ये समझिये कि प्रकृति के समक्ष आम लोगो के जीवन का भी वही मूल्य है जो आपके जीवन का है....... आम लोगो के लिए अस्पताल, स्कूल , और रहने का घर, सांस लेने के लिए शुद्ध हवा तो दीजिये ............
........................अपने और आम लोगों के जीवन में इतना बड़ा फर्क न कीजिये साहब.............
............. अभी भी समय है............ वृक्षों का क्रूर कत्लेआम रोकने, पारिस्थितिकी और पर्यावरण की रक्षा आम लोगो को स्वास्थ्य, शिक्षा और सुजीवन देने के लिए कुर्सी की ताकत का प्रयोग कीजिये.............
''साहब'' लोग थोड़ा ''सहज'' हो जाइए ,,, सब ठीक हो जाएगा........
भूकंप सदृश संकट में निर्भय-चित्त और अक्षत-विवेक बने रहने से आप उस संकट से बचने में और दूसरों को बचाने में सफल होंगें .......
.............. इसलिए चित्त और अभिव्यक्ति के स्तर पर निर्भय बनें रहें और स्वयं को तथा अन्य संकटग्रस्त लोगों को बचाने हेतु भौतिक, संकल्पात्मक,बौद्धिक, मानसिक, आध्यात्मिक प्रयास करते रहें ............
............. अपने निजी स्वार्थ में पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय असंतुलन पैदा करने वाले लोगों पर इस संकट का सीधा प्रभाव नहीं पड़ रहा है वे बचकर भी निश्चिन्त न रहें............
............... उन्हें भी उनकी नियति ले जायेगी उस गर्त में जहां गिर कर वे अपने द्वारा किये गए प्राकृतिक अपराधों के प्रति पश्चात्ताप करेंगें .........
बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर यदि आज अपने द्वारा लिपिबद्ध भारत के संविधान का अवलोकन करें तो वे आश्चर्यान्वित रह जायेगे क्योकिं उनके द्वारा लिपिबद्ध संविधान में इतने परिवर्तन हो चुके हैं जितने परिवर्तनों की उन्होंने कभी कल्पना भी न की थी ! उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यदि इस संविधान से देश की सभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो यह संविधान के कारण नहीं बल्कि संविधान को लागू कराने के लिए उत्तरदायी लोगों के कारण होगा
................................उसी तरह ,महाराज मनु ने जिस संहिता का निर्माण किया था उसे मानव धर्मसूत्र के रूप में वर्तमान मनुस्मृति के लिपिबद्ध होने के हज़ारों साल पहले से जाना जाता रहा है..........किन्तु, मानव धर्मसूत्र का लिपिबद्ध संस्करण अब अप्राप्त है............
.............. वर्तमान मनुस्मृति में लिपिबद्ध अनेक प्रावधान और नियम, परवर्ती राजनीतिक-सत्ताओं द्वारा अपनी विशिष्ट शासन-नीतियों को संपोषित करने के लिए महाराज मनु के नाम पर अंतःस्थापित कर दिए गए...........
.............. जैसे डॉ. अम्बेडकर, भारत के संविधान के लिपिकार के रूप में सर्वज्ञात होने के बावजूद उन सारे संशोधनों के लिपिकार नहीं हैं जो उनके समय में संविधान में अंतर्विष्ट नहीं थे किन्तु आज हैं, इसीतरह महाराज मनु वर्तमान मनुस्मृति के उन नियमों और प्रावधानों के लिपिकार नहीं हैं जो मानव-धर्म अर्थात मानवता के विरुद्ध हैं...
..................... अपने मानव अधिकारों की रक्षा के लिए मानव-अधिकार आयोग की शरण लेने वाले भी आज महाराज मनु के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर अपने द्विधाग्रस्त चित्त का प्रमाण देते हैं........... जिन मानव अधिकारों की बात लोग करते हैं वे मानव अधिकार भी महाराज मनु ने ही दिए हैं.......मनु समाप्त होंगें तो मानवता कहाँ बचेगी ..............
............... मनु हैं तो मानवता है....
अफ़ज़ल को भारत की न्याय-प्रक्रिया और अन्य संवैधानिक प्रावधानों का पूर्ण और विलंबित पालन करते हुए फांसी दी गयी थी , और इसलिए,
जो लोग उसकी फांसी को अन्याय-पूर्ण या अनुचित कह रहें हैं वे वास्तव में भारत के संविधान और तदनुसार-सृजित भारत की न्याय-पालिका को अपमानित कर रहे हैं......
आज वैशाली का प्रथम दिन था मानव व्यापार विरोधी दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का...........अब नौ जिले और बाकी है...जिसके बाद राज्य के सभी जिलों में यह कार्यशाला होगी......
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दूसरी बात :
1. बिहार में मानव व्यापार के विरुद्ध पुलिस द्वारा की जा रही कार्रवाई, देश के अन्य राज्यों से अधिक प्रभावी है और मुक्ति-अभियान पूरी तरह से क़ानून-सम्मत तरीके से संचालित और संपन्न होता है,,
2. बिहार में अन्य राज्यों की पुलिस की तुलना में पुलिस द्वारा मानव अधिकारों के उल्लंघन की घटनाएँ बहुत ही कम होती हैं.....कोई भी व्यक्ति मानव अधिकार आयोग की वेब साइट में यह तथ्य देख सकता है ,,,
3. देश का प्रथम राज्य है बिहार जहां पाक्सो अधिनियम में न्यायालय द्वारा अपराधी को दण्डित किया जा चुका है.
आज इस सभा का आयोजन अब पुलिस का एक आन्दोलन बन चुका है....... बिहार के चालीस जिलों में सभी महिला थानाध्यक्षों द्वारा महाविद्यालयों में जाकर यह सभा आयोजित की जा रही है जिसमें '' छात्राओं को आत्म-सुरक्षा के प्रति स्व-संवेदनशील '' बनाने के लिए संवाद किया जाता है...... आई जी,कमजोर वर्ग के रूप में मैंने महिला थानाध्यक्षों के नेतृत्त्व में यह सभा बिहार के सभी जिलों में महिला महाविद्यालयों - कन्या विद्यालयों में आयोजित किये जाने का निर्देश दिया था .........................जो अब बिहार पुलिस का एक आन्दोलन बन चुका है............
............छात्राओं का आत्म-विश्वास बढ़ रहा है और उनमें एक सशक्त महिला बनाने के बीज का अंकुरण देखा जा रहा है ..
पुस्तक का नाम '' सशक्तीकरण '' : लेखक : अरविन्द पाण्डेय !!
बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी जी द्वारा 23 अगस्त 2014 को संवाद भवन,पटना में ''सशक्तीकरण'' का लोकार्पण किया गया..
इस पुस्तक में 9 खंड हैं...... इसमें मेरे द्वारा सृजनात्मक पुलिसिंग के लिए किये गए कुछ प्रयोगों से सम्बंधित अध्याय भी हैं ...... 1.सशक्तीकरण सभा..2. किशोर्न्याय सभा. 3. परामर्श सभा -- ये तीन अध्याय अतिशय फलप्रद और जनोन्मुख पुलिसिंग के आधार-स्तम्भ बन सकते हैं....
...................अनेक वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में बिहार के आदरणीय पुलिस महानिदेशक और समाज कल्याण विभाग के प्रधान सचिव श्री अमरजीत सिन्हा, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के सचिव श्री हुकुम सिंह मीणा द्वारा भी अपने विचार व्यक्त किये गए.......
......................... यह पुस्तक मानव-व्यापार निरोध, अत्याचार निवारण और निरोध, किशोर न्याय और स्त्री के विरुद्ध अपराध के विभिन्न पक्षों पर विधिक हस्तक्षेप की प्रविधियां प्रस्तुत करती है..........इसे बिहार के सभी पुलिस अधिकारियों को निःशुल्क उपलब्ध कराया जाएगा ..........
बिहार के 20 जिलों में कमजोर-वर्ग द्वारा चलाई जा रही ग्यारहवीं कार्यशाला का समापन आज पटना के एस.के.मेमोरियल सभागार में हुआ .....................
..................इस दो दिवसीय ' मानव व्यापार निरोध ' विषयक कार्यशाला में पटना के सभी थानाध्यक्षों सहित अन्य पुलिस अधिकारियों ने समर्पण की स्वतः प्रसूत पवित्र भावना के साथ भाग लिया ....
................उदघाटन-समापन के अवसरों पर कार्यशाला में पटना के सभी वरीय अधिकारियों - आई.जी. डी.आई.जी. एस एस पी , डी . एम. ने अपने अनुभवों से प्रतिभागियों को लाभान्वित किया....
.................... कार्यशाला में मैंने सभी को मानव-व्यापार निरोध की तकनीकों को अपने निजी अनुप्रयोगों के माध्यम से बताया..... कार्यशाला का एक दृश्य.......
भारत के 100 अरब से अधिक जीवित और स्वर्गवासी लोगों के जीवन को अपने स्वर-सौरभ से रफ़ी साहब और मुकेश जी ने सानंद बनाया ............ मेरे विचार से सबसे पहले इन दो महान भारतीयों को '' भारत रत्न '' मिलना चाहिए.....
.............. सुभाष बाबू तो रत्न नहीं रत्नागार थे.........
उनके प्रेरक व्यक्तित्व से तो रत्नों का निरंतर जन्म होता रहता है......
On July 31 ,, Immortal Rafi !!Dedicated to all lovers of Md.Rafi Sahab ! In my voice --- Wadiya Mera Daaman , Raaste Meri Bahen, Jaao Mere Siwa Tum Kaha Jaaoge .......
गांधी जी कहते थे कि हिंसा वही करता है जो भयभीत होता है.....
............... अनेक अपराधों विशेषतः डकैती के अपराध की पूरी घटना के विश्लेषण में मैंने यह पाया है कि लूटते समय अपराधी पकडे जाने के भय से अत्यंत काँप रहा होता है और उस वक्त यदि किसी ने ज़रा भी प्रतिरोध किया तो उसका भय और बढ़ जाता है और वह तुरंत अपने सामने वाले पर प्राणघातक हमला कर बैठता है....
............ महात्मा गांधी की अहिंसा का दर्शन मूलतः भगवान पतंजलि के योगसूत्र की अहिंसा के संप्रत्यय से निःसृत था..... और उनका प्रत्येक कथन शुद्ध मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोगों पर आधारित होता था....
............ कल,अपने विरुद्ध दर्ज अनेक मामलों से भयाक्रांत रामदेव नें एक व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी वाचिक-हिंसा कर दी है जो मूलतः मानवता के विरुद्ध अपराधों की श्रेणी में परिगणित किया जाना चाहिए और जो भारत के महान संविधान के मूलाधारों के विपरीत है.....
मेरे स्वर में- Ek Tha Gul aur Ek Thi Bulbul- Aravind Pandey
· अरविन्द पाण्डेय
Dedicated to Respected Nanda Ji ,
The Famous '' Bulbul " of Hindi Film - Jab Jab Phool Khile....
In My Voice - Ek Tha Gul aur Ek Thi Bulbul ....
Singing is the best way to worship God...
My voice follows Mukesh ji, Rafi Sahab , Kishor KUmar Ji and other legends of Hindi and other Indian Music World... So, I sing my favorite singers and pay my salute to them,,,,,,,
............ प्रत्येक मनुष्य का हृदय स्वर्णमयी लंका है जिस पर अशुद्ध-राग, निजी-द्वेष, विश्वासघात, छल-छद्म, धर्म-विरुद्ध वासनाओं जैसे विकृत दश-मुख रावण का नियंत्रण बहुधा पाया जाता है...
............. स्वर्णिम लंका पर वास्तव में धर्म-सम्मत राग, अखंड विश्वास, धर्म-सम्मत कामना रूपी विभीषण का राज्याभिषेक किया जाना ही महाप्रकृति की इच्छा होती है....
...... श्री रामभद्र का धरा-अवतरण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ ..........
............. कलिकाल में अमिताभ बुद्ध, ईश्वर-पुत्र जीसस और पैगम्बर मुहम्मद के माध्यम से उनकी वाणी पुनः अवतरित हुई और संसार को मार्ग-दर्शित किया ..........
श्री रामनवमी इसी ऋत के स्मरण का महापर्व और शुभ अवसर है.....
आप सभी मित्रों को श्री राम नवमी की शुभ कामनाएं .........
ईश्वर , सभी को अशुद्ध-राग, निजी-द्वेष, विश्वासघात, छल-छद्म, धर्म-विरुद्ध वासनाओं से मुक्त करें और
कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो गेंद की तरह उछाले जाते हुए
और अस्पताल में पड़े हुए उस इंसान को मुद्दा बनाते हैं.
कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो इन दोनों तरह के इंसानों पर
फ़िल्में बनाकर पुरस्कार लेते हैं और करोड़ों कमाते हैं.
कोई मैदान में गेंद से खेलकर इन्सान को नचाता है .
कोई मैदान में अपनी जान पे खेलकर इंसान को बचाता है.
किसी के हाँथ में बैट और तमगे हैं,
किसी की जुबान पे सिसकती हुई शपथ है.
मगर, वो इंसान आज भी अस्पताल में है
और वो कंधा आज भी खून से लथपथ है.
..............पटना के एस एस पी श्री मनु महाराज के उन अंगरक्षकों में से एक है मृत्युंजय यादव जो गांधी मैदान में हुए विस्फोट के उन साक्षियों में से हैं जिनके सामने तीन इंसान बम-विस्फोट के बाद ज़मीन से ऊपर की और उड़ गए जैसे फिल्मों में दिखाया जाता है.... और उस वक्त भी पटना के पुलिस प्रमुख के साथ साथ उनके सारे अंगरक्षक वहां से हिले तक नहीं......वहां उपस्थित जन-समुदाय पुलिस वर्दी देखकर आक्रोशित हो उठा था किन्तु एस एस पी मनु महाराज और उन चार पुलिस के जवानों को अपनी चिंता नहीं थी ....वे चिंतित थे कि विस्फोट में घायल लोगों को तुरंत अस्पताल कैसे पहुचाया जाय ....ऐसे वक्त जब भीड़ उनके ऊपर घातक हिंसक हमला कर सकती थी तब भी उन्होंने घायलों को अपने कंधे पर उठाया और अस्पताल पहुचाया....
इन्हें किस पुरस्कार से पुरस्कृत किया जाय..........ये जन-समुदाय निर्णय करे .......
.........इस फोटो में मृत्युंजय यादव गांधी मैदान के एक घायल को कंधे पे उठाये हुए अस्पताल की और बढ़ रहे हैं..........वहां उपस्थित बिहार के लोगों ने अद्भुत संयम दिखाया...घटना के बाद पुलिस के प्रति आक्रोश स्वाभाविक था फिर भी वहा शान्ति सुरक्षित रही.. धन्य है बिहार-भूमि और यहाँ के निवासी .......
भविष्य में चीन द्वारा भारत में अवैध रूप से घुसकर बनाए गए और न हटाए गए तम्बुओं को ये लोग अकेले अकेले हटा पायेगे..???
...........आजकल फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स पर अनेक प्रोफाइल , पेज या ग्रुप में अपनी अपनी जाति की उत्कृष्टता , सर्वोच्चता आदि की बाते प्रस्तुत की जा रही हैं............. यह सत्य भी है कि प्रत्येक जाति या वर्ण की अपनी विशिष्टताएं होती हैं और समाज के सर्वांगीण विकास में उनका विशिष्ट उपयोग भी है ............. किन्तु, इस देश को अगर महाशक्ति बनाना है तब जाति-वाद, वर्ण-वाद समाप्त करना होगा................
...........अगर हम इतिहास और अन्य प्रमाणों के आधार पर देखें तो पायेगे कि ब्राह्मण , ब्रह्मर्षि. कायस्थ या क्षत्रिय -------- ये चार नहीं बल्कि केवल २ वर्ण हैं ........ और इसीतरह पिछड़े-वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजातियों में परिगणित लगभग २०० जातियां वास्तव में २०० नहीं अपितु केवल २ वर्ण हैं.................इसलिए अब, हम भारत के लोग ३०० जातियों में विभाजित न होकर, अगर सिर्फ एक ''वर्ण'' बन जायं -- तो देश का हित होगा.........
..........ब्राह्मण , ब्रह्मर्षि या कायस्थ, क्षत्रिय आदि के विशिष्ट पेज और ग्रुप फेसबुक पर उपलब्ध हैं ............. जिनके अवलोकन से स्पष्ट होता है कि उसके लिखने वाले व्यक्तियों के अपने कुछ सामूहिक लक्ष्य हैं....
............मगर क्या वे लक्ष्य , अकेले प्राप्त हो सकेगे.....??? यदि लोकतंत्र में संख्या का अपना विशिष्ट व्यावहारिक महत्त्व रखती है तब क्या अकेले - अकेले ये तीनो स्वघोषित लक्ष्य प्राप्त कर पायेगे...??? ............ और क्या इन वर्गों के के नौजवानों की रोज़गार की समस्या का समाधान अकेले चलने से हो पायेगा...??
............. क्या इन लेखों को लिखने वालों को पता है कि उनकी अलग-अलग जनसंख्या क्या है ????
.............. और अगर एक काफिले में आ जांय तब उनकी जनसंख्या क्या होगी ...??
.......और अगर आज की व्यवस्था में जनसंख्या का कोई विशिष्ट महत्त्व है तब क्या एक काफिले में चलना श्रेयस्कर नहीं है .???
यह गीत मेरे द्वारा लिखा गया और इसकी धुन तैयार की गयी । वीनस म्यूजिक कंपनी द्वारा इसे अन्य भक्ति गीतों के साथ २००३ में एक एलबम के रूप में रिलीज़ किया गया ।
इस गीत में शिव के श्री राधा रानी के रूप में अवतार लेने तथा महाकालिका के श्री कृष्ण के रूप में अवतार लेने के रहस्य का वर्णन है ।
ये पुस्तक बिहार के स्कूलों में बच्चों के बीच बिहार भक्ति आंदोलन ट्रस्ट द्वारा निःशुल्क बाटी जायेगी .... To Get this BOOK Free on internet, kindly click and download : नीचे लिंक क्लिक कीजिये....
अजीब बात है ...... बंगाल में रहकर भी रवीन्द्रनाथ से अपरिचय .... कैसी विडम्बना है यह .......... अभिजित दा ने शायद गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर को ठीक से नहीं पढ़ा ..... अन्यथा
वे ये बात समझ पाते कि वे जिस डेंट-पेंट की बात कर रहे थे वह स्त्री ही नहीं पुरुष के लिए भी ,, प्रत्येक व्यक्ति के लिए ,, क्यों और कितना आवश्यक है ...........
............एक बार महात्मा गांधी , गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से मिलने गए थे .... साथ साथ शान्तिनिकेतन-भ्रमण के लिए निकलने के पूर्व, गुरुदेव ने दर्पण के सामने खड़े होकर, अपने श्वेत कुन्तलों ,, श्वेत श्मश्रु को सौम्यता के साथ संवारा और मुखमंडल को और अधिक दीप्तिमान और निर्दोष बनाने के लिए उसके एक एक अंश को ध्यान से देखा और त्वचा को अपने कोमल कर-स्पर्श और अङ्गुलि-संचालन से और अधिक स्फूर्तिमय बनाते हुए अपने वार्धक्य की भव्यता पर स्वयं ही मुग्ध से होकर, दर्पण के सामने संस्थित से हो रहे थे ..... जब उन्हें लगा कि अब वे भव्य और आकर्षक दिख रहे हैं तब महात्मा की ओर स्मित-मत्त सा होकर देखा ... महात्मा कुछ पल स्तब्ध सा उन्हें देखते रहे और फिर बोले - इस वृद्धावस्था में इतना श्रृंगार !
....... गुरुदेव तो अपने वार्धक्य की भव्य रम्यता की मस्ती में थे ... मुस्कुरा कर देखा महात्मा की ओर फिर कहा -- यौवन होता तब श्रृंगार की इतनी आवश्यकता न थी ... .. किन्तु , वार्धक्य में इतना श्रृंगार न करें तो मेरा अल्प भी असौंदर्य, मुझे देखने वाले को व्यथित कर सकता है ,, सुंदर वस्तु या सुंदर व्यक्ति को देखकर दर्शक प्रसन्न होता है ,, इसलिए ,, अब और अधिक सुन्दर दिखने का प्रयास करता हूँ ,,, असुंदर दिखकर , किसी दर्शक को निराश कैसे करून,, किसी को निराश करना भी तो हिंसा करना ही है ... अहिंसा के लिए ही तो श्रृंगार करता हूँ मैं कि जो मुझे देखे वह प्रसन्न हो जाए ....
.............महात्मा , गुरुदेव की इस अहिंसा-वृत्ति को देख, पुनः स्तब्ध-प्रसन्नता से परिपूर्ण हो गए थे और शायद यही वह क्षण था जब महात्मा ने रवीन्द्रनाथ को गुरुदेव कहना प्रारम्भ किया था ............
अब अभिजित दा ने यह दृश्य देखा होता तो पता नहीं क्या टिप्पणी करते .............. !!
.............भारत में प्राचीन काल से ही शुद्ध और वास्तविक समाज-सेवा को प्रसन्नता-पूर्ण जीवन जीने के आवश्यक उपायों में बताया गया था .... पञ्च-ऋण से मुक्त होने और प्रतिदिन पञ्च-महायग्य करने का विधान प्रत्येक गृहस्थ के लिए किया गया है...किन्तु अज्ञानता के कारण आज अधिकाँश लोग इन उपायों का अवलंबन नहीं करते..... किन्तु सच ये है कि
हंसी हो लब पे तो दुनिया हसीन सजती है .
खिजां, बहार सी ताज़ातरीन लगती है.
मगर, जो दूसरों के लब पे तबस्सुम रख दे,
ज़मीं , फिरदौस से भी बेहतरीन लगती है.
........................अमरीका के मनोवैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में यह पाया है कि जो लोग शुद्ध और वास्तविक समाज-सेवा में स्वयं को व्यस्त रखते है वे अन्य समान-स्थिति वाले व्यक्तियों से अधिक प्रसन्न और तनावमुक्त जीवन जीते हैं......
........................अब पश्चिमी देशों में भी स्वयं को प्रसन्न रखने के लिए समाजसेवा को एक औषधि के रूप में प्रयोग किये जाने का प्रचलन प्रारम्भ हुआ है .....
प्रकाश-पुंज का न तो लिंग होता , न जाति होती है, न धर्म होता है..
· अरविन्द पाण्डेय
...... मलाला यूसुफजई एक ऐसे प्रकाश-पुंज का नाम है जो न स्त्री है न पुरुष ..क्योकिं प्रकाश-पुंज का न तो लिंग होता , न जाति होती है, न धर्म होता है..
और न ही वह पूर्वाग्रह के कारण प्रकाश का वितरण करता है..
...प्रकाश समानभाव से अपनी सीमा में आने वाली सभी वस्तुओं को मुक्त रूप से आलोकित करता है..
...........मलाला को लडकी के रूप में वर्गीकृत करके, उसे शिक्षा से वंचित करने के असफल प्रयास को नहीं देखा जा सकता .. जो अशक्त और असमर्थ होगा उसके साथ यह संभावित होगा...
..........आज भी भा
रत और विश्व के अनेक देशों में करोड़ों पुरुष ऐसे हैं जो शिक्षा से वंचित किये गए हैं,, जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिल रही .. जिन्हें मज़दूरी कराने के बाद न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं देकर क़ानून का खुला उल्लंघन किया जाता है..
..............इसलिए मलाला एक स्त्री नहीं है ... उसने शिक्षा-शत्रुओं के विरुद्ध कुछ किया नहीं ..बल्कि , शिक्षा-शत्रुओं ने उसके द्वारा वितरित हो रहे प्रकाश को उसी तरह धूल फेंक कर ढकने की कोशिश की जैसे कोई मूर्ख , सूर्य की ओर धूल फेंक कर उनके प्रकाश को अवरुद्ध करने का प्रयास करता है...
मल्टी मीडिया मोबाइल फोन आपका बहुत अच्छा दोस्त साबित हो सकता है मगर यह आपका खतरनाक दुश्मन भी बन सकता है... कुछ दिन पहले बिहार के सभी पुलिस अधीक्षकों को मैंने महिला महाविद्यालयों तथा विद्यालयों में कार्यशाला आयोजित करने को कहा था जिससे छात्र
छात्राओं में मल्टी मीडिया सेल फोन और इंटरनेट की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सके..
राज्य के दो जिलों -- सुपौल तथा शिवहर में छात्राओं के बीच यह कार्यशाला पुलिस द्वारा आयोजित की गई जिसके अत्यंत सकारात्मक प्रभाव देखे गए..आगामी कुछ दिनों में पटना सहित एनी जिलों में भी यह कार्यशाला आयोजित की जायेगी.. इस हेतु अपने सुझाव और सलाह यदि आप सभी मित्र देगे तो हमें खुशी होगी
हमारे लिए वैयक्तिक-उपनिवेशों के रूप में उपलब्ध ब्रिटेन और अमेरिका सहित अन्य यूरोपीय देशों में बेरोजगारी तथा उससे उत्पन्न अपराध आदि अन्य समस्याओं में निरंतर वृद्धि हो रही है इसलिए चीन, जापान , कोरिया आदि को छोड़कर अन्य एशियाई देशों को आगा
मी कुछ वर्षों में ही उस विकल्प के लिए तैयारी करनी होगी जिसमें कि हम अपने युवाओं को यथायोग्य काम दे सकें अन्यथा इन देशों में एक द्वेषाधारित राष्ट्रवाद का उदय होगा जिसकी तीव्र-तरंगों का आधात इतना भयावह होगा कि वहाँ काम करने वाले हमारे लोग सीधे अपने - अपने देशों में आकर गिरेंगें .
अपने देश में प्रौद्योगिकी और विज्ञान की शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम में होने के कारण हम एक वैज्ञानिक-समाज का निर्माण नहीं कर पाए..किन्तु चीन , जापान , कोरिया आदि एशियाई देशों में प्रद्योगिकी और विज्ञान की शिक्षा का माध्यम उनकी मातृभाषा होने के कारण वहाँ वैद्यानिक समाज का विकास हुआ और आज इन देशों के गावों में कुटीर-उद्योग में बनाए जा रहे इलेक्ट्रानिक सामानों से हमारा बाज़ार भरा पड़ा है..
खुली वैश्विक अर्थनीति जिस समय प्रवर्तित हुई उस समय हम प्रतियोगिता के मंच पर अपनी सशक्त भूमिका के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि यहाँ के योग्य युवा यूरोपीय देशों में ही अपना भविष्य देख रहे थे..किन्तु , चीन , जापान आदि ने उस भूमिका को बहुत पहले ही पहचान लिया था और उसके लिए तैयारी भी कर चुके थे.. वास्तव में भारत में खुली अर्थव्यवस्था का समय-पूर्व प्रसव हो गया और परिणाम था कि हम चीन आदि के पुष्ट अर्थ-शिशु के समक्ष कुपोषित शिशु जैसे रह गये और आज भी वह कुपोषण बना हुआ है.. कोरिया की सैमसंग कंपनी का गैलेक्सी अब इस समय अमेरिका के आई फोन से आगे बढ़ने का सफल प्रयास करता हुआ देख रहा और हम इस ऐतिहासिक अर्थ-युद्ध में बाज़ार बन कर मात्र युद्ध-भूमि ही उपलब्ध करा रहे हैं.
इस समाचार क्लिपिंग से स्पष्ट संकेत मिलता है कि भविष्य में आर्थिक-अतृप्ति के कारण उत्पन्न सामाजिक-संकट से ग्रस्त ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देश, हम भारत की युवा-प्रतिभाओं का उसी प्रकार स्वागत नहीं कर पायेगे जैसा वे पहले करते रहे हैं..
यह समय सुचिन्तन और सचिंत होने का है और शायद हमारे यहाँ अधिकांश लोगो का ध्यान इस ओर नहीं है ..
मेरे इस गाँव की मिट्टी की महक आती है. यहाँ रमजान की रानाइयां भी नाजिल हैं . यहाँ नवरात्र के मन्त्रों की सदा आती है. अहं ब्रह्मास्मि,अनलहक की गूँज रूह में है, न जाने फिर भी क्यूँ, ये रूह कसमसाती है. -- अरविंद पाण्डेय
यह वीडियो एक मई २००८ को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हुई कवि-गोष्ठी का है .. हिन्दी दैनिक समाचारपत्र दैनिक जागरण द्वारा आयोजित इस गोष्ठी में मैंने अपने सवक्तव्य काव्य-पाठ से श्रोताओं से संवाद किया ... श्री गोपालदास नीरज इस गोष्ठी के अध्यक्ष थे तथा उन्होंने भी अपनी कविताओं गीतों के सुरस से श्रोताओं को रस-सिक्त किया ... नीरज जी के साथ यह दूसरा मंच था जहाँ मैंने काव्य-पाठ किया ..इस हेतु मैं मुजफ्फरपुर के श्री अमरेंद्र तिवारी जी का आभारी हूँ कि उन्होंने मेरे अनुरोध पर यह वीडियो अथक-प्रयास के बाद पहले स्वयं प्राप्त किया फिर मुझे उपलब्ध कराया...
ये क्या रहस्य-उन्नीस नवम्बर को दोनों ऩे जन्म लिया.
ये क्या रहस्य है-दोनों की माँ ऩे बचपन में छोड़ दिया.
दोनों के नामों का मतलब है एक ,एक सा जीवन था.
वैधव्य, पुत्र की मृत्यु,देश के लिए समर्पित तन-मन था.
बचपन में एक छबीली , प्रियदर्शिनी दूसरी कहलाई.
फिर दोनों का था रखा नाम इंदिरा और लक्ष्मी बाई.
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध आधुनिक विश्व इतिहास की एक ऐसी सशक्त घटना है जिसमें भारत ने श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में यह दिखाया कि वह सामरिक स्तर भी विश्व की महाशक्ति अमेरिका से मोर्चा लेने का संकल्प ले सकता है और भारत के इस पौरुष के शंखनाद में अमेरिका की पाकितान के लिए निकल रही आह दब कर रह गई .. बस यही एक घटना श्रीमती इंदिरा गांधी को विश्व इतिहास की सबसे सशक्त महिलाओं में से एक रूप में स्थापित करती है..भारत का यह दुर्भाग्य रहा है कि हम ऐसे व्यक्तित्वों को भी दल-गत कुदृष्टि से देखते रहे हैं.. मैंने इस कविता में उन समानताओं का उल्लेख किया है जो श्रीमती इंदिरागांधी और महारानी लक्ष्मीबाई में थीं..यहाँ तुलना नहीं की जा रही ..बस उस संयोग को बताया गया है जो विलक्षण है और भारत की इन दो स्त्री रत्नों में पाया जाता है..
समस्या भ्रष्टाचार-मुक्त भारत के निर्माण की है: कुछ सूत्र हैं जो उन्हें आंदोलन के रूप में शुरू करना चाहिए जो भ्रष्टाचार-मुक्त भारत के निर्माण के पक्षधर हैं..
१.सभी नागरिक संकल्प लें कि वे हानि उठायेगे किन्तु अपना काम साधने के लिए रिश्वत नहीं देगे..
२.विद्यालयों में विशेषरूप से दून स्कूल और अन्य तथाकथित अच्छे विद्यालयों में '' रिश्वत न लेने के फायदे '' विषय पर पाठ्यक्रम शुरू किया जाय.
३.स्कूलों में डोनेशन देकर प्रवेश देने के कार्य को रिश्वत का अपराध घोषित करने के लिए क़ानून बनाया जाय.
४.स्कूलों में उपहार लेने और देने की सीमा भी निर्धारित की जाय जिससे उपहार आदि के आधार पर स्टेटस का मूल्यांकन होना बंद हो.
५.एक १० करोड या ऊपर के साबित भ्रष्टाचार के लिए मृत्यु दंड का प्रावधान हो..जिससे २००० रुपये की रिश्वत और २०० करोड की रिश्वत में फर्क हो सके...
आप सहमत हैं ..यदि हाँ तो अभी --- राजनीति के मोह से बचकर ये सब कीजिये ..
वरना जीतने के लिए '' व्यावहारिक '' Practical होना पडेगा फिर क्या होगा उन सपनों का जिन्हें बाँटते हुए यहाँ तक की मंजिल तय की है.
स्वर्णिम-पीताम्बर-श्रृंगारित था उच्च स्कंध .
चरणों में सजती थी पायल ज्यों वेद-छंद.
नयनों से थी बह रही प्रेम की दिव्य-धार.
साकार हो उठा था अब निर्गुण, निराकार.
अक्षर, अनंत श्री कृष्ण सांत में व्यक्त हुए.
वसुदेव, देवकी,देख उन्हें अनुरक्त हुए.
थी देह पुलक-परिपूर्ण,ह्रदय प्रार्थना-पूर्ण.
स्तुति, पूर्ण-तत्त्व की करती थी वाणी अपूर्ण.
करते थे जो शीश झुकाकर चरणों में अभिवादन. आज उन्हीं से मांग रहे तुम सत्ता हेतु समर्थन. अमृत-पंथ के पथिक ! तुम्हें जाना था अम्बर पार. किन्तु 'मार' से विजित देख तुमको हंसता संसार.
जिस निषिद्ध फल का प्रचार जब में तुमको करना था. किसे ज्ञात था स्वयं तुम्हें भी,खाकर फल, गिरना था.
ज्ञान-संपन्न ऋषियों के भी चित्त को भगवती बलात ही मोह की ओर प्रवृत्त करती हैं.. आश्चर्य नहीं हो रहा मुझे कि अभी कुछ ही समय पूर्व जिसके चरणों में शीश झुकाकर शक्तिशाली लोग शिक्षा ग्रहण करते थे , वही उनसे समर्थन के लिए भिक्षाटन कर रहा.
गुवाहाटी की घटना से यह संकेत मिलता है कि इस देश में प्रत्येक संस्था , प्रत्येक वर्ग यह मानता है कि अपने सामने घटित होते हुए अपराध में हस्तक्षेप करने या पुलिस को तत्काल सूचना देने या ऐसे अपराधी को गिरफ्तार करके पुलिस के हवाले करने की जिम्मेदारी आम नागरिको की नहीं है ..
मगर क़ानून ऐसा नहीं कहता..
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३७ : किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट की मांग पर, प्रत्येक नागरिक, किसी अपराधी की गिरफ्तारी में उसकी मदद करने के लिए कानूनन बाध्य है.
धारा ३९ : कुछ अपराधों के घटित होने या उस अपराध की योजना की जानकारी मिलने पर प्रत्येक नागरिक पुलिस या मजिस्ट्रेट को सूचना देने के लिए कानूनन बाध्य है..जिसमें लोक-प्रशांति भंग करने का अपराध भी आता है जो गुवाहाटी की घटना में हुआ...
४३ (१ ) कोई भी नागरिक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है जो उस नागरिक के सामने कोई गैर ज़मानातीय और संज्ञेय अपराध कर रहा हो और ऐसी गिरफ्तारी के बाद उसे पुलिस को सौंप सकता है..
गुवाहाटी की घटना के साक्षी और घटना का फिल्मांकन करते हुए वहा उपस्थित लोग, उपर्युक्त कानूनी प्रावधानों का पालन न करने के कारण स्वयं भी आरोपित की श्रेणी में आते हैं .
और पुलिस की भूमिका की जांच तो होनी ही चाहिए कि घटना के समय वहाँ के क्षेत्रीय पदाधिकारी कहाँ थे और क्या कर रहे थे..
जर्मनी सहित अनेक देशों में ऐसा क़ानून है जो आप नागरिक द्वारा सक्षम रहते हुए अपराध न रोकने के आचरण को गम्भीर अपराध की श्रेणी में परिगणित करता है..
भारत में भी ऐसा क़ानून बनाए जाने की आवश्यकता है ..
३ साल पहले पटना में एक लडकी के साथ दो लोगो ने सड़क पर इसी तरह का अपराध किया था और उसके बाद माननीय मुख्यमंत्री ने उस समय के आई जी , डी आई जी सहित पटना के एस पी का स्थान्तरण दूसरे दिन ही किया था..
मैंने एस पी , डी आई जी के रूप में रांची, चतरा , पलामू, खगडिया, गया, मोतिहारी , बेतिया , सहरसा ,मुजफ्फरपुर आदि जिलो में पैम्फलेट के माध्यम से जनता को प्रशिक्षित किया था कि वे भी आत्मरक्षा के अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपराधी के ऊपर हमला कर सकते हैं और ऐसा करने से उन्हें कानूनी सुरक्षा भी प्राप्त रहेगी..पुलिस द्वारा ऐसा किया जाना चाहिए जिससे आम नागरिक भी अपने कानूनी कर्तव्यों के प्रति सचेत रहें और पुलिस की सहायता निर्भय होकर कर सकें...
आँखे खुली रहना ही नहीं जागना हुआ, आँखें जो हकीकत से रूबरू, तो फिर क्या बात ! अक्सरहाँ खुली आँख से सोते हैं यहाँ लोग. उनके लिए तो दिन यूँ गुज़रता है जैसे रात.
The Brilliance of Indian Police Service : Shri Manoje Nath
· अरविन्द पाण्डेय
श्री मनोज नाथ , आई पी एस (१९७३ बैच .बिहार संवर्ग )
श्री मनोज नाथ : ३० जून को सेवा निवृत्त हुए और आई पी एस मेस में ३० जून को उनके सम्मान में आयोजित रात्रि-भोज में वे ऐसे लग रहे थे मानो राष्ट्रीय पुलिस अकादमी से बस अभी अभी निकला हुआ कोई आई पी एस प्रोबेशनर हो...एक निरंतर प्रज्ज्वलित बौद्धिक-प्रदीप जिसका आलोक उनके जाने के बाद भी बिहार पुलिस को ज्योतित करता रहेगा. मैं साक्षी हूँ इस सत्य का कि जिस पद पर आने के लिए प्रत्येक आई पी एस अधिकारी कामना करता है और उस कामना को पूर्ण करने लिए अक्सर उस पद की पवित्रता के पणन को अतिशय सहज भाव से स्वीकार कर लेता है उस पद की ओर उन्होंने उससे भी अधिक सहज होकर, देखा तक नहीं .. श्री मनोज नाथ का स्वागत करने को आतुर वह पद , उन्हें देखता ही रह गया और वे अपनी राह पर चलते गये..और , एक आई पी एस प्रोबेशनर की उन्मुक्त प्रफुल्लता के साथ आई पी एस मेस से ३० जून को अपनी चिरंतन स्वतन्त्रता का आलोक बिखेरते हुए विदा हुए .. सेवा-निवृत्ति के बाद अक्सर लोग कहते हैं कि वे स्वतंत्र नागरिक के अधिकारों का उपभोग करने के योग्य हो गये किन्तु श्री मनोज नाथ , सेवा-काल में भी उस स्वतन्त्रता का भोग-आस्वाद करते रहे जिसकी कल्पना तक करने में दूसरों को भय लगता है.. पटना में रहते हुए मैंने बिहार में अपराध-नियंत्रण के लिए उत्तरदायी माने जाने वाले पद पर विराजमान होते हुए और उस पद से मुक्त होते हुए अनेक लोगो को देखा है किन्तु उस पद पर पदासीन को भी मार्गदर्शन देने की क्षमता से संपन्न अधिकारी को पहली बार देखा था ,, अपनी अतुलनीय गरिमा की प्रभा से आलोकित ,, अपने प्रखर किन्तु फिर भी प्रफुल्लित भाव-प्रवाह के साथ.. मैंने उनके साथ एस पी के रूप में चार साल काम किया .. मेरे वे चार साल अगर मेरी सेवा में नहीं जुड़े होते तो शायद मुझे यह भान भी न होता कि मैंने अपने जीवन में क्या खो दिया .. एक वरीय अधिकारी अपने अधीनस्थ को क्या दे सकता है , उसे कितना मूल्यवान बना सकता है ,, उसमें मूल्यों के प्रति कितनी आसक्ति भर सकता है , यह उन्हें ही पता होगा जिन्होंने उनके साथ काम किया.. बिहार में २२ साल की सेवा-अवधि में डी जी पी के रूप में अगर किसी की याद करके मुझे रोमांच होता है तो वे थे श्री डी पी ओझा .. किन्तु, श्री डी पी ओझा ने डी जी पी के रूप में जो कुछ किया उससे कहीं अधिक गरिमा के साथ, वह सब कुछ और उससे भी अधिक, श्री मनोज नाथ ने बिना डी जी पी बने ही कर दिखाया .. और यह वे ही कर सकते थे.. सेवा नियमों के कारण , बिहार में ,भारतीय पुलिस सेवा के इस सूर्य का प्रकाश-संवरण हुआ है ..और, भारतीय पुलिस सेवा की वर्तमान और भावी पीढ़ी, भविष्य में शायद यह विश्वास भी न करे कि श्री मनोज नाथ जैसे अधिकारी भी हमारी सर्विस में हुआ करते थे .. जिन्होंने उन्हें पहचाना उनका सौभाग्य था और वे दुर्भाग्यशाली हैं जिन्होंने उन्हें पहचान कर भी नहीं पहचाना .. श्री मनोज नाथ पहचाने जाने की वासना से मुक्त थे ..
पुलिस की आलोचना के पहले क़ानून द्वारा पुलिस को दिये गए अधिकारों के बारे में भी सोचना चाहिए....
आरा के चर्चित ह्त्या-काण्ड के बाद पटना में घटित घटनाओं के बारे में अखबारों में तथा इंटरनेट पर अनेक विचार व्यक्त किये गए जिसमें पुलिस द्वारा आलोचकों की इच्छा के अनुरूप कार्रवाई न करने के लिए विशेष रूप से आलोचना की गई..इससे चिंतकों को समझना होगा कि -- पुलिस के बल प्रयोग के बाद सरकार , मानवाधिकार आयोग और अन्य मानवाधिकार एजेंसियों द्वारा यह देखा देखा जात है कि वह बल-प्रयोग उचित और क़ानून-सम्मत था या नहीं.?? और यदि वह कानून के अनुसार सही नहीं पाया जाता है पुलिस के लिए समस्या होती है.
इसलिए इस प्रकरण में कुछ बाते और समझनी होंगीं :
१- अभी जो व्यवस्था काम कर रही है उसमें जिला-मजिस्ट्रेट ही विधिव्यवस्था का प्रभारी होता है..पटना में शवयात्रा के समय उत्पन्न समस्या विधिव्यवस्था की थी और डी एम तथा एस एस पी पटना के संयुक्त आदेश से मजिस्ट्रेट और पुलिस की प्रतिनियुक्ति की गई थी..
क़ानून के अनुसार परिस्थिति का मूल्यांकन करके मजिस्ट्रेट को आदेश करना कि पुलिस गैरकानूनी भीड़ के विरुद्ध कैसा बल प्रयोग करे..
पटना में उस दिन लगाए गए मजिस्ट्रेटों ने बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं समझी होगी और पुलिस को बल प्रयोग का आदेश नहीं दिया..
यहाँ पुलिस की कोई निष्क्रियता नहीं थी..
इसलिए उस दिन के लिए पुलिस या पुलिस-प्रमुख के बारे में कही जाने वाली प्रतिकूल बातें अतर्कसंगत हैं और क़ानून के अनुसार सही नहीं हैं..
२.जो भी अप्रिय घटना की गई वह पटना शहर के सिर्फ २ किलोमीटर क्षेत्र में घटित हुई..जब कि शवयात्रा का जुलूस आरा से आ रहा था.. इसलिए यह कहा जा सकता है कि जुलूस मूलतः शांतिपूर्ण था ...बाद में पटना आने के बाद उसमें कुछ उपद्रवी लोग मोटरसाइकलों के साथ मिल गए और अकस्मात ये घटनाएँ की.
मामले दर्ज हैं और जांच के परिणाम सामने आयेगे किन्तु इतना कहा जा सकता है कि उस दिन पुलिस को उत्तेजित करके बल-प्रयोग कराने ( जिसमें पुलिस फायरिंग और नागरिकों की मृत्यु भी संभावित थी ) के षड्यंत्र को पुलिस ने धैर्य-पूर्वक असफल किया और इतने बड़े घटनाक्रम में एक भी गोले नहीं चली ..एक भी नागरिक आहत या मृत नहीं हुआ...
यह पूरे समुदाय खींचकर पीछे ले जाने का षड्यंत्र है ..
· अरविन्द पाण्डेय
बिहार के आरा में हुई ह्त्या की घटना एक सुचितित बहुआयामी लक्ष्य प्राप्त करने के लिए की गई और इसका मूल उद्देश्य था कि बिहार और बिहारियों की छवि और प्रतिष्ठा में हो रही विश्वस्तरीय उर्ध्वगति को रोका जा सके.
पूरी दुनिया देख रही है कि बिहार में क्या हो रहा है और हमें बताना होगा कि बिहार के नागरिक बड़े संकटों में भी संयम नहीं खोते ..
घटना के बाद ह्त्या के विरोध में आरा,पटना और दूसरे स्थानों पर जो हुआ , ह्त्या के षड्यंत्रकारी यही चाहते थे..लोग उनके बिछाए जाल में फंस गए..और इस बात को भावुकता में लोग समझ नहीं पाए कि वे जो कर रहे हैं वह उन्हीं के लिए नुकसानदेह है.... अभी भी समय है ..यह बात समझी जानी चाहिए और वैधानिक-सत्ता का प्रयोग करते हुए हत्यारों को शिकस्त देनी चाहिए..
निजी शक्ति का प्रयोग करना प्रतिगामी कदम होगा और अब बिहार के लोग वह कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं हैं..अभी बिहार में एक ऐसी व्यवस्था काम कर रही जो सर्ववर्ग-हितकारिणी है..इस व्यवस्था के प्रति विश्वास रखना होगा और ऐसे किसी भी कार्य से बचना होगा कि लोगों को यह प्रचार करने का मौक़ा मिले कि देखिये बिहार में यह सब हो रहा है..
इस बात को समझना होगा कि यह ह्त्या व्यक्तिगत और सामूहिक - दोनों प्रकार की असावधानी का परिणाम थी...खुद के महत्त्व को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए था..सुरक्षा के जो नियम हैं उनका पालन यदि नहीं होता है तो इतिहास साक्षी है कि अनेक ताकतवर और महत्त्वपूर्ण लोग भी इस षड्यंत्र के शिकार हुए हैं...
इसलिए शांत-बुद्धि से ह्त्या के पूरे षड्यंत्र समीक्षा करनी होगी क्योकि यह एक व्यक्ति ह्त्या नहीं की गई है .यह एक पूरे समुदाय खींचकर पीछे ले जाने का षड्यंत्र है और मैं जानता हूँ कि हम बिहार के लोग इतने प्रतिभाशाली हैं कि इस बात को समझ सकें..
An Appeal by Karl Marx : 1870 के पेरिस कम्यून से बाहर निकलो कामरेड्स
· अरविन्द पाण्डेय
छद्म-माओवाद को वास्तविक माओवाद ही खत्म कर सकता है क्योकि छद्म-माओवाद के विनाश के बीज स्वयं उसी के गर्भ में विद्यमान हैं.और चूँकि यह विषय आधुनिक विश्व का विशेषतः विगत शताब्दी का सर्वाधिक ज्वलंत विन्दु था इसलिए मार्क्स की बौद्धिक-सफलता और उनकी वैश्विक स्तर पर व्यावहारिक असफलता मेरे अध्ययन का विषय रही है.
वर्ष १९८७ में यू जी सी की जूनियर अध्येतावृत्ति के साथ ' द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और सांख्य' के साम्य पर शोध कर रहा था तभी भारतीय पुलिस सेवा के लिए मेरा चयन हो गया और बिहार मेरी सेवाभूमि निर्धारित हुई.चूँकि मार्क्स मुझे किशोरावस्था से ही प्रिय थे इसलिए पी एच डी के लिए मैंने स्वयं ही यह विषय निर्धारित कराया था.
मार्क्सवाद की प्रथम प्रयोगभूमि सोवियत संघ में मार्क्स और लेनिन की प्रतिमाओं और प्रतिमानों के खंडन एवं ध्वंस के बाद भी दुनिया में अगर कहीं कोई संगठन या व्यक्ति उसके पुनःप्रयोग की बात करता है तो यह स्वयं मार्क्स और लेनिन के साथ अन्याय होगा क्योकि पूंजीवाद के विनाश तथा जिस समाजवादी और साम्यवादी समाज के क्रमिक उदय की भविष्यवाणी की थी वह असत्य सिद्ध हुई है.इसलिए विश्व के लिए विचारणीय यह है कि अब कौन सी व्यवस्था निर्मित की जाय कि मानव द्वारा मानव के किसी भी प्रकार के शोषण की समस्त संभावनाएं समाप्त हो जाँय .
माओवाद के नाम पर जो संगठन सक्रिय हैं उनका इस विश्वदृष्टि बिल्कुल परिचय नहीं.जहाँ मार्क्स एक ऐसे स्थिति-विकास को एक ज्योतिषी के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो शताधिक वर्षों बाद क्रियान्वित हो सकता है वहीं ऐसे संगठन अपने 'सम्पूर्ण क्रान्तिक्षेत्र ' को जंगल तक सीमित रखे हुए हैं और ऐसा करने के लिए वे विवश भी हैं क्योकि विज्ञान के विकास और राज्यों की सैन्यशक्ति में असाधारण वृद्धि के कारण अब अंतर्राष्ट्रीय क़ानून या राष्ट्रों के क़ानून के अनुसार अवैध मानी जाने वाली रण-नीति के साथ कोई संगठन सत्ता नहीं पा सकता .वर्ष १९६१ में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा में हुई कथित क्रान्ति के बाद पूरी दुनिया में कहीं कोई क्रान्ति नहीं हुई क्योकि सशस्त्र क्रान्ति अब संभव ही नहीं है.
जैसे परमाणु बम के निर्माण ऩे परमाणु बम के प्रयोग की संभावना को ख़त्म कर दिया उसी तरह सशत्र-क्रान्ति के विचार ऩे ही सशत्र-क्रान्ति की संभावनाओं को ख़त्म कर दिया और चूँकि मार्क्स ऩे इस टेक्नीक के अलावा और किसी टेक्नीक का उपदेश अपने शिष्यों को नहीं किया था इसलिए ये धर्मांध लोग अब इससे आगे कुछ सोच ही नहीं सकते.समस्या यह है कि मार्क्स का पुनर्जन्म हो नहीं सकता और वे सशरीर आकर इन्हें उपदेश नहीं कर सकते कि अब १८७० के पेरिस कम्यून से बाहर भेई निअक्लो इसलिए अब इनका बौद्धिक विकास वहीं रुक गया है जहाँ १८७० में था जब १० दिनों के लिए पेरिस कम्यून बना था
तब प्रश्न है कि ऐसे संगठन क्यों सक्रिय हैं और वे लोगो को क्यों ऐसे स्वप्न दिखा रहे हैं कि वे बस क्रान्ति होने ही वाली है और २०२४-२५ तक माओवाद नामक व्यवस्था दिखाई देने लगेगी?
यह इसलिए कि ऐसे संगठनो ने जनता के शोषण की अपनी नयी तकनीक विकसित कर ली है जिसे लेकर वे जंगलों,गाँवों में जाते हैं जिन्हें वे आधार-क्षेत्र कहते हैं.इन आधार क्षेत्रों की खासियत यह होती है कि वहाँ न तो बिजली हो , न सड़क हो आधुनिक मनुष्य के लिए आवश्यक अन्य कोई सुविधा भी न हो..क्योकि यह सब रहने पर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के वहाँ पहुचने का खतरा होगा.तो इनका मूल आधार और मूल लक्ष्य ही है कि इनके समर्थक दरिद्रता का जीवन जी रहे हो.क्योकि यदि इनका समर्थक शिक्षित और ईमानदार हुआ तो इन्हें वह स्वयं खतम कर देगा जैसा कि बड़े स्तर पर सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के लोगो ने किया .
बिहार में आने के बाद रांची और खगडिया के बाद मेरी पदस्थापना चतरा जिले के पुलिस अधीक्षक के रूप में वर्ष १९९३ में हुई..चतरा जिला अत्यंत अविकसित होने के कारण इन लोगों के आधार क्षेत्र के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान था . १९९३ का पद्रह अगस्त मुझे याद है क्योकि इस दिन से मैंने वहाँ सक्रिय छद्म माओवादियों को मार्क्सवाद और माओवाद के मूल सिद्धांतों का प्रशिक्षण देना शुरू किया था.मैंने इन्हें पैम्फलेट्स और सार्वजनिक मंचों से यह बताया कि अगर तुम माओवादी हो तो मैं माओवाद की गंगोत्री मार्क्सवाद में पी एच डी हूँ.
मुझे सूचना मिली कि माओवादियों ने पन्द्रह अगस्त के दिन सुदूर क्षेत्रों के कुछ स्कूलों में बच्चों के माध्यम से काला झंडा लगाने तथा बच्चों का जुलूस थाना पर भेजने और उनके माध्यम से स्वतन्त्रता-दिवस मुर्दाबाद का नारा लगवाने की योजना बनाई है .मैंने जिला मजिस्ट्रेट से बात की और निर्णय किया कि परेड में सिपाहियों की संख्या कुछ कम भी करके ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में पुलिस बल भेजा जाय और वहाँ काला झंडा फहराने की इनकी योजना को विफल किया जाय.
मैंने चतरा में माओवादियों का मुख्यालय माने जानेवाले कुंदा थाना में एक इन्स्पेक्टर के नेतृत्व में पुलिस बल भेजा और उन्हें कहा कि जब बच्चों का जुलूस थाना पर आए तो सावधानी और धैर्य के साथ उनके नारों को सुनना है और जब वे थक जांय तब उन्हें टाफी और चाकलेट देना है और स्वतन्त्रता-दिवस का महत्त्व बताना है और उन्हीं बच्चों के द्वारा थाना में राष्ट्रीय ध्वजोत्तोलन कराना है.
पुलिस ने वही किया .उनके नारे शांतिपूर्वक सुने फिर उन्हें को टाफिया खिलाईं और थानाध्यक्ष के स्थान पर खडा करके उनके बाल-नेता द्वारा ध्वजोत्तोलन कराया और वे जो काले झंडे, बैनर ,तख्तियां लेकर वे आये थी उन्हें ले लिया .
दूसरे दिन ही जिला मजिस्ट्रेट ने मुझे फोन किया और कहा कि आपकी रणनीति के कारण समस्या हो गई है. कुंदा के सारे टीचर वहाँ से भाग आए हैं और यह बताया है कि माओवादियों ऩे मान लिया है कि उन्हीं के बुलाने पर पुलिस आई थी इसलिए उन्हें धमकी दी गई है कि जो झंडा बैनर पुलिस ऩे जब्त किया है वो वापस लेकर आओ वर्ना जन-अदालत में हाथ-पैर काट दिया जाएगा.यह धमकी माओवादियों द्वारा क्रांतिकारी किसान मोर्चा नामक संगठन के लेटर पैड पर लिखकर टीचरों को भेजी गई थी.
मैंने जिला मजिस्ट्रेट को कहा कि आप चिंता न कीजिये .ये तो एक बड़ा अवसर है इन पाखंडी माओवादियों के जन-विरोधी कार्यों को जनता के सामने लाने का.मैंने कुंदा में विराट जन-सभा बुलाई और वहाँ जिला-प्रशासन के सारे अधिकारियों को लेकर गया.लोगो के बीच दवाइयां और अन्य चीज़े बाटी गई.फिर मैंने कहा कि मध्य विद्यालय के सभी टीचरों को तब तक के लिए जिलामुख्यालयस्थानांतरित किया जाता है जब तक यहाँ के सभी अभिभावक जुलूस बनाकर माओवादियों के पास जाकर यह नहीं कहते कि -- हमारा टीचर हमें वापस दो .या हमारे बच्चों को तुम खुद पढाओ, परीक्षा दिलाओ और सर्टिफिकेट दो जिससे वे आगे की पढ़ाई कर सकें.. मैंने एक बड़ा सा बोर्ड बनवाया था जिसमें लिखा हुआ था -
एम् सी सी के जन-अत्याचार का प्रतीक
कुंदा मध्यविद्यालय
यहाँ के शिक्षकों को एम् सी सी के गुंडों ऩे धमकी देकर भगा दिया है जिससे यहाँ पढ़ने वाले २४३ बच्चों का भविष्य अन्धकार में है.
एम् सी सी के लोग नहीं चाहते कि यहाँ बच्चे पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करे.
पुलिस अधीक्षक
चतरा
और हम वापस आ गए .. दूसरे दिन माओवादियों की ओर से एक प्रेस विज्ञप्ति अखबारों में प्रकाशित हुई जिसमें कहा गया कि क्रांतिकारी किसान मोर्चा ऐसी कोई धमकी टीचरों को नहीं दी है बल्कि एस पी ऩे खुद वह लेटर पैड छपवाकर हमें बदनाम करने के लिए यह किया है..हम सभी टीचरों को चेतावनी देते हैं कि वे सही समय से स्कूल आए और बच्चो को पढाये वर्ना उन्हें जन अदालत में सज़ा दी जायेगी.
इस विज्ञप्ति के बाद उन्होंने टीचरों के घर जाकर उन्हें स्कूल जाकर पढ़ाने को कहा..
इस घटना का निहितार्थ यह है कि माओवादियों के खतरे को समाप्त करने के लिए यह साबित करना होगा कि वे माओवादी हैं ही नहीं बल्कि लेवी वसूलने वाले अवैध गिरोह के सदस्य हैं..पुलिस को आमलोगों को यह बताना होगा कि माओवाद और मार्क्सवाद के मूल सिद्धांतो पर पुलिस खुद चलती है और माओवादी उस सिद्धांत की ह्त्या कर रहे हैं.जो लोग इस विचार के हैं कि माओवादियों से वार्ता करके समाधान किया जा सकता है वे मार्क्सवाद और माओवाद की प्रकृति और चरित्र से अनभिग्य हैं . भारत में प्रतिवर्ष न्यूनतम दस हज़ार करोड़ रुपये इन लोगो द्वारा लेवी के रूप में वसूले जा रहे हैं.इतनी बड़ी राशि की आय वाला कोई संगठन खुद को समाप्त कर लेगा - यह एक अव्यावहारिक चिंतन है.
इनके एक रणनीति और है कि इनके विरुद्ध कोई ऐसा संगथान भी खडा हो जो कुछ ऐसे कार्य करे कि जिससे इन्हें अपने आपराधिक कार्यों को करने का नैतिक और व्यावहारिक आधार मिल सके . बिहार में माओवादियों और उनके प्रतिरोध में खड़े किये गए संगठन वास्तव में इन्हीं को मज़बूत करते रहे हैं.
माओवाद को मार्क्स के इस उपदेश का अनुसरण करते हुए ख़त्म किया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था - क्रान्ति के लिए आवश्यक है कि जनता अपनी स्थिति की वीभत्सता पर दहल उठे.
अगर हम इनके आधार क्षेत्र में इतना बता सकें कि इनलोगों ऩे आपकी स्थिति भयावह रूप में वीभत्स बना दी है तो हम इन्हें ख़त्म कर सकते है और इसके लिए स्वयं पुलिस और प्रशानिक अधिकारियों को यह घोषित करना होगा कि हम तुमसे श्रेष्ठ मार्क्सवादी हैं.
मैंने मगध रेंज के डी आई जी के रूप में एक पर्चा छपाकर पूरे रेंज में वितरित कराया था जिसकी अंतिम पंक्तियाँ थीं--
( बिहार शताब्दी वर्ष के बौद्धिक-समारोह हेतु बिहार राज्य अभिलेखागार,पटना द्वारा प्रकाशित '' बिहार गौरव '' नामक संग्रह-ग्रन्थ में प्रकाशनार्थ लिखित लेख )
जीवन और जगत के प्रति भारतीय-दृष्टि , विश्व की अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक और शान्ति-परक रही है .. हमने समाज को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाले व्यक्तित्वों के जीवन , जन्म एवं जैव-परम्परा के बारे तथ्य सुरक्षित रखने की आवश्यकता नहीं समझी क्योंकि इसी से मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद के प्रचार की संभावना पैदा होती है.प्राचीन भारत में गायों की सुरक्षा और विश्राम के लिए विभिन्न ऋषियों ऩे आश्रय स्थल बनाए थे जिन्हें गोत्र कहा जाता था..गां त्रायते इति गोत्रं .. अर्थात जहाँ गायों को त्राण मिलता हो उसे गोत्र कहा गया.सभी अवगत हैं कि भारद्वाज,शांडिल्य , वसिष्ठ आदि ऋषियों के नाम से गोत्र आज भी प्रवर्तित-प्रचलित हैं.और, गोत्र-स्थापना-काल से ही , एक गोत्र की कन्या या पुरुष का विवाह, उसी गोत्र के पुरुष या कन्या से नहीं करने का नियम था.यह नियम, बिना इसकी ऐतिहासिक-वैज्ञानिकता पर पुनर्विचार किये, आज भी उसी रूप में प्रवर्तित है.अर्थात गोत्र-स्थापक ऋषियों की जैव या सामाजिक परम्परा सुरक्षित बने रहने के कारण आज गोत्र के नाम पर लोगो के बीच एक अवैज्ञानिक भेद बना हुआ है.
व्यक्ति की अभिव्यक्ति मूलतः उसके विचारों और उसकी दार्शनिक-दृष्टि के माध्यम से होती है.. किसने, कहाँ जन्म लिया यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं जितना यह महत्त्वपूर्ण है कि जन्म के बाद के उसके अवदान क्या रहे.. उपनिषद में निर्दिष्ट -
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः
यह आत्मदर्शनवाद ही भारतीय संस्कृति का वह मूल प्रेरक तत्त्व है जिसके प्रभाव में हमारी सारी सभ्यता निर्बाध और अव्यवहितरूप से एकस्वर, एकगति से प्रवाहित होती रही है.. हमने शुद्ध मानव-हितकारी विचारों के विशाल सागर के सदृश , विश्व की समस्त सभ्यताओं की तृषित-भूमि को तृप्त करने हेतु, ऐसे बादलों को जल-परिपूर्ण किया जो गगन-संतरण करते हुए चिंतन-जल की वर्षा करते रहे और शाश्वत चिंतन-जल के अभाव में तृषित धरा, धन्य होती रही..
बीज के ज्ञान से उस बीज से निष्पन्न विशाल वृक्ष का पूर्ण ज्ञान हो जाता है..क्योकि बीज का बीजत्व ही वृक्ष के रूप में प्रकट करता है स्वयं को .. इसीप्रकार , किसी व्यक्ति की आत्मा के प्रकाश के बोध से उस प्रकाश को विकीर्ण करने वाले व्यक्ति का भी सम्पूर्ण ज्ञान हो जाता है.. अन्य भारतीय ऋषियों, महाकवियों आदि की तरह महासेनापति सम्राट पुष्यमित्र शुंग के महामात्य महर्षि पतंजलि के जीवन के वस्तुपरक तथ्य हमें उसी सुस्पष्ट रूप में उपलब्ध नहीं हैं जिस सुस्पष्ट रूप में उनकी दार्शनिक-दृष्टि उपलब्ध है ..और, इस लेख में , इसीलिये, हम , महर्षि पतंजलि के व्यक्तित्व के इस सर्वाधिक अमहत्वपूर्ण पक्ष पर विशेष चर्चा नहीं करेगे..
महर्षि पतंजलि द्वारा प्रणीत ग्रन्थ-त्रय -- १ . चरक-संहिता २. महाभाष्य ३. योगसूत्र के अध्ययन से कोई भी व्यक्ति यह मानने के लिए विवश होगा कि अब तक के सम्पूर्ण मानव इतिहास में श्री कृष्ण के बाद पतंजलि सर्वाधिक प्रतिभाशाली व्यक्ति हुए हैं.. यह कहना समीचीन है , प्रशंसित-प्राचीन नहीं कि चरक-संहिता आज तक के चिकित्साशास्त्र के समस्त शोधों को स्वयं में समाहित किये हुए है.. आगे भी जो शोध संभावित हैं उनके बीज और विस्तार भी उसमें प्राप्त हैं..
समाज की सुव्यस्थित प्रगति के लिए व्यक्ति की देह, मन और वाणी का शुद्धीकरण आवश्यक होता है..जिन महापुरुषों में लोकसंग्रह के महाभाव के कारण लोक-कल्याण की इच्छा हुई उन्होंने उपर्युक्त तीन पक्षों पर अपना चिंतन और दर्शन, समाज के समक्ष प्रस्तुत किया..
इन सभी महापुरुषों में महर्षि पतंजलि श्रेष्ठतम एवं अतिशय लोकोत्तर हैं क्योकि उनके द्वारा देह-चित्त शुद्धि के लिए चरक संहिता, मानस-शुद्धि के लिए योगसूत्र एवं वाक्-शुद्धि हेतु महाभाष्य का प्रणयन किया गया..महाभाष्य, यद्यपि महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी की व्याख्या है किन्तु यह एक आत्मपूर्ण दर्शन-ग्रन्थ भी है ..
भारतीय साम्राज्य के लोक-स्वास्थ्य के लक्ष्य से महर्षि द्वारा प्रणीत चरक संहिता में एक विशिष्ट ऐतिहासिक काल-खंड का वर्णन किया गया है जिसमें उस संहिता के प्रणयन की आवश्यकता और औचित्य की परिस्थितियां प्रस्तुत की गई है.. इतिहास के अनुसार, सत्य युग में प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के समस्त नियमों का पालन करते हुए, सर्वभूत-हित के सार्वभौम सिद्धांत के अनुसार जीवन यापन करता था..किसी भी व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति अथवा चराचर जगत के किसी भी अस्तित्व से कोई संघर्ष नहीं होता था..प्रत्येक व्यक्ति , प्रत्येक अन्य व्यक्ति के साथ समस्वर था..
'' न राज्यं न राजासीत, न दण्डो न च दाण्डिकः
धर्मेणैव प्रजाः सर्वाः रक्षन्ति स्म परस्परं .''
अर्थात , सत्ययुग में न राज्य था, न राजा था, न दंड था न दंड देने वाला था क्योकि सभी व्यक्ति सार्वभौम धर्म के अनुसार जीवन यापन करते हुए अन्य सभी सह-जीवियों के अधिकारों की रक्षा उसी रीति से करते थे मानों वे स्वयं के अधिकारों की रक्षा कर रहे हों..इसलिए, शत्रुता-विहीन समाज का अस्तित्व था सत्ययुग में.. किन्तु, जब सत्ययुग का अंतिम काल-खंड निकट आया तब लोगों में धर्म के उल्लंघन की प्रवृत्ति उत्पन्न हुई और लोगो का शरीर रुग्ण होने लगा..यह काल , सत्ययुग के द्वापर में संक्रमित होने का काल था..
इस स्थिति को देख कर , उस समय के लोक-सेवक , जिन्हें ब्राह्मण कहा जाता था, अतिशय चिंतन-शील हुए और हिमालय की तराई में इस गंभीर मानवीय समस्या के निराकरण के लिए एक महासम्मेलन आयोजित किया गया जिसमे उस समय के समस्त मन्त्र-द्रष्टा महर्षि गण , यथा वसिष्ठ,विश्वामित्र,गालव,कण्व,भारद्वाज आदि उपस्थित हुए और उन्होंने मनुष्य-शरीर को नीरोग रखने हेतु एक संहिता के निर्माण का संकल्प लिया .. उस संकल्प को क्रियान्वित करने का दायित्व महर्षि पतंजलि को दिया गया जिन्होंने चरक-संहिता नाम से विश्व का प्रथम चिकित्साशास्त्रीय ग्रन्थ प्रस्तुत किया..इसमें जैव-स्वास्थ्य के समस्त नियमों को संहिता-बद्ध किया..
चरक संहिता विश्व का प्रथम चिकित्साशास्त्रीय ग्रन्थ है जो मनुष्य के समग्र-स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के समस्त उपायों का वर्णन करता है..इसमें देह के साथ साथ मन और चित्त को भी स्वस्थ रखने के उपायों का वर्णन भी है .. आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र एवं सिगमंड फ्रायड ऩे भी बहुत बाद में, पतंजलि के सिद्धांत को अग्रसर करते हुए , यह स्वीकार किया कि देह में उत्पन्न होनेवाले अधिकांश रोग पहले मन में उत्पन्न होते हैं फिर वहाँ से उनका प्रतिबिम्ब देह में उतरता है जो रोग के रूप में दिखाई देने लगता है.. रोगों की मनोकायिकता के सिद्धांत के आलोक में, चरक-संहिता समग्र-चिकित्सा-प्रणाली का प्रवर्तन करती है..
चरकसंहिता के पुरुषविचयशारीरं , पंचम अध्याय में महर्षि ऩे आध्यात्मिक-शारीर के विज्ञाता महर्षि अग्निवेश, आत्रेय , पुनर्वसु आदि का प्रमाण के रूप में सन्दर्भ दिया है..अर्थात इस सन्दर्भ से भारत की वह एकात्मवादी चिंतन पद्धति भी व्यक्त होती है जिसमे कोई भी महर्षि यह दावा नहीं करते कि कोई विचार उनका निजी आविष्कार है अपितु प्रत्येक महर्षि उस शाश्वत , सार्वभौम , सर्व-जन-कल्याणकारी,प्राचीन होते हुए भी चिर-नवीन ब्रह्मवादी परम्परा के एक प्रतिनिधि के रूप में ही स्वयं को प्रस्तुत करते हैं..यहाँ उल्लेखनीय प्रतीत होता है कि अर्वाचीन ऋषियों में स्वामी विवेकानंद एकमात्र ऋषि हैं जिन्होंने शिकागो विश्व धर्म सम्मलेन के आयोजकों यह कहा था कि मैं भारत के सभी प्राचीन ऋषियों की ओर से आपको धन्यवाद देता हूँ कि आपने उन ऋषियों द्वारा प्रवर्तित ईश्वरीय दर्शन - एकं सद्विप्रा: बहुधा वदन्ति के दर्शन का अनुसरण करते हुए इस विश्व धर्म सम्मलेन का आयोजन किया है..
चरक संहिता में , प्रकृति में प्राप्त तत्त्वों के, मानव शरीर में व्यक्त स्वरूपों का अद्भुत निदर्शन किया गया है.. एक उदाहरण समीचीन और उपादेय होगा -- यथा खलु ब्राह्मी विभूतिः लोके तथा पुरुषेप्यान्तरात्मिकी विभूतिः ..यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषे अहंकारः .. तमो मोहः ज्योतिः ज्ञानम् .. यथा कृतयुगमेव बाल्यं , यथा त्रेता तथा यौवनं , यथा द्वापरं तथा स्थाविर्यं यथा कलिरेवमातुर्यम यथा युगान्तः तथा मरणं .. प्रकृति में प्राप्त तम पुरुष में मोह के रूप में व्यक्त होता ऐ तथा प्रकृति में प्राप्त प्रकाश , पुरुष में ज्ञान के रूप में व्यक्त होता है.. कलियुग को समाज की वृद्धावस्था के प्रतीक के रूप में प्रस्तुति शरीरविज्ञान की दृष्टि से पूर्ण सार्थक है अर्थात जिस प्रकार पुरुष की वृद्धावस्था में शरीर के अंग शिशील होने लगते हैं..इन्द्रियों की शक्ति क्षीण होती जाती है ..स्मृतिलोप आदि मस्तिष्क की अनेक समस्याएं जन्म लेती हैं उसी प्रकार कलियुग में विराट पुरुष के अंगो में शैथिल्य का संचार होता है... यहाँ यह ध्यातव्य है कि चरकसंहिता में जहान भी पुरुष शब्द का प्रयोग है व - स्त्री पुरुष दोनों के लिए है .. दिग्भ्रमित स्त्रीवादी इसे पतंजलि के पुरुष-प्रभुत्ववाद के रूप में देख कर द्रष्टि-भ्रम से ग्रस्त हो सकते हैं - इसलिए यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है..
संहिता के निदानस्थान के उन्माद-निदानाध्याय में उन्माद के कारण सहित स्वरूपों की जो प्रस्तुति है वह आज के उन्नत मानस रोग विज्ञान के लिए भी मार्ग दर्शक है.. आज के मनोरोग वैज्ञानिक, रोगों के लक्षणों और उनके समाधान की आपाततः क्षतिकारक पद्धति प्रस्तुत करते हैं किन्तु महर्षि पतंजलि ऩे उन्माद का वातोन्माद, पित्तोन्माद , श्लेश्मोन्माद और त्रिदोषोन्माद के रूप में वर्गीकरण करते हुए जो कारण-विश्लेषण और समाधान दिया है वह अधुनातन मनो चिकित्सकों के लिए लाभदायक और अनुकरणीय है..
वृहत्तर भारतीय साम्राज्य की लोक-शिक्षा के लक्ष्य से , पाणिनि की अष्टाध्यायी की व्याख्या करने वाला महाभाष्य, महर्षि पतंजलि द्वारा प्रणीत अध्यात्मिक स्फोटवाद की दृष्टि देने वाला विश्व का प्रथम व्यवस्थित ग्रन्थ है...महाभाष्य , पाणिनि के सूत्रों की व्याख्या तो करता ही है, उन सूत्रों में अन्तर्निहित राजनीति एवं देश , वहाँ के मौसम , संस्कृति और मानव-विज्ञान के आधार पर परिवर्तनशील भाषा , एक ही शब्द के परिवर्तनीय उच्चारण के साथ साथ अज्ञेय दार्शनिक तत्त्वों को भी स्पष्ट करता है....एक ही शब्द देवदत्त कैसे देश-भेद से देवदिन्न हो जाता है ..या नरेन्द्र कैसे बंगाल में नरेन् , पंजाब में नरिंदर हो जाता है -- इसकी समाज-राजनीतिक विवेचना की महाभाष्य ऩे..महाभाष्य में प्रस्तुत तथ्यों से ही यह ही इतिहासकारों ऩे यह निर्णीत किया कि जितनी व्यापक भौगोलिक वस्तु-स्थिति की प्रस्तुति महाभाष्य में की गई है उतनी व्यापकता के साथ लिखने वाला व्यक्ति राजनीति का भी महापंडित रहा होगा..
यहीं से इस ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि हुई कि महासेनापति पुष्यमित्र शुंग के महामात्य महर्षि पतंजलि ही हो सकते थे क्योकि जिस '' राजीतिक स्फोटवाद '' का प्रयोग करते हुए पुष्यमित्र शुंग ऩे महान मौर्य साम्राज्य के सम्राट वृहद्रथ का शिरच्छेद करते हुए वृहद्रथ के ही पूर्वज सम्राट चन्द्रगुप्त के राष्ट्रवादी शासन तंत्र को पुनर्स्थापित किया उसका अनुप्रेरण महर्षि पतंजलि जैसा आध्यात्मिक स्फोटवादी विराट और भगवत्ता के अंश से दीपित व्यक्तित्व ही कर सकता था..
महाभाष्य में मात्र एक बार -- एक व्याहारिक उदारण के रूप में - इह पुष्यमित्रं याजयामः - वाक्य का प्रयोग करते हुए महर्षि पतंजलि ऩे सम्राट को भी गौरवान्वित करने वाले अपने गुरु-सम्बन्ध का व्यपदेश किया .. सम्प्रति-प्राप्त अन्य किसी भी सन्दर्भ-ग्रन्थ में महर्षि और महासेनापति के संबंधों का उल्लेख दृश्य नहीं है.. संभव है ऐसे सन्दर्भ-ग्रन्थ रहे हों और नालंदा और विक्रमशिला में बुभुक्षित अग्नि-देव ऩे उन्हें उदरस्थ कर लिया हो..
पुष्यमित्र का राष्ट्रवादी-स्फोट या इस शब्द को और अधिक स्पष्ट करने लिए विस्फोट भी कह लें , एक सुचिंचित राजीतिक-दर्शन और जन-मनोविज्ञान पर आधारित था .. पुष्यमित्र ऩे महर्षि पतंजलि के आदेशानुसार तीन अश्वमेध यग्य किये -- अतएव उन्हें त्रिरश्वमेधयाजी कहा गया, किन्तु, स्वयं को उन्होंने कभी सम्राट विशेषण-युक्त नहीं कराया.. इस निर्णय में वास्तव में उनकी महामात्य चाणक्य के राजनीतिक दर्शन के प्रति गहन श्रद्धा , स्वयं को सम्राट चन्द्रगुप्त का वास्तविक उत्तराधिकारी मानते हुए कर्तव्य-पालन की अभीप्सा ही मुख्य कारण थी तथा , यदि, क्षुद्र राजनीतिक दृष्टि से भी देखें तो मौर्य-वंश के प्रति समर्पित राज्य-सेवकों और जन सामान्य के विद्रोह के बीज को समाप्त कर देने का एक व्यावहारिक लक्ष्य भी माना जा सकता है.. विश्व-इतिहास की सभी राज्य-कान्तियों के अध्ययन से सुस्पष्ट होगा कि क्रान्ति करने वाले प्रत्येक नए शासक ऩे पराजित शासक की पूरी परम्परा को प्रतिस्थापित कर दिया और पराजित व्यक्ति के किसी पूर्वज के उत्तराधिकारी के रूप में कार्य नहीं किया किन्तु पुष्यमित्र की क्रांति से स्वरुप और उसके अनुवर्ती इतिहास से प्रमाणित है कि उन्होंने वैयक्तिक भौतिक लिप्सा या यश के लक्ष्य से क्रान्ति नहीं की थी अन्यथा अखंड भारत के चक्रवर्ती सम्राट के रूप में नामांकित होने की यश-लिप्सा को कौन त्याग सकता है.. यह शेषावतार महर्षि पतंजलि के शिष्य और निदेशित-सम्राट पुष्यमित्र शुंग ही थे जिन्होंने स्थितप्रग्य के रूप में '' सम्राट '' के परम मूल्यवान विशेषण को, अनायास ही, स्पर्श भी नहीं किया...
यह कहा जाता है कि पतंजलि-निदेशित पुष्यमित्र शुंग ऩे बौद्ध-वर्ग के विरुद्ध एक जन-अभियान संचालित किया जिसमें बौद्ध होने मात्र के आधार प्रताड़ित करने की बात कुछ कथित इतिहास-लेखकों द्वारा कही जाती है वह इस पारंपरिक प्रवाद-अफवाह के आधार पर बिना शोध किये या साक्ष्य प्राप्त किये बिना ही कही गई कि बौद्ध जातकों में पुष्यमित्र की एक सार्वजनिक घोषणा का उल्लेख है जिसमें यह कहा गया था कि - '' जो मुझे श्रमण का एक सर काट कर देगा उसे मैं सौ दीनार दूंगा.. यो मे श्रमणशिरो दास्यति तस्याहं दीनारशतं दास्यामि .,किन्तु पश्चाद्वर्ती शोध से यह साबित हो चुका है कि किसी भी बौद्ध जातक में यह वाक्य प्रामाणिकतया प्राप्त नहीं था.. यह प्रवाद कथित वामपंथी इतिहास से अनभिग्य लेखकों ऩे प्रचारित किया..इन लोगो ऩे इन सारे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों पर विचार ज्ञानपूर्वक नहीं किया कि पुष्यमित्र शुंग पाटलिपुत्र में ही निवास करते थे.वह उनके विशाल साम्राज्य की राजधानी था और नालंदा तथा तक्षशिला विश्व विद्यालय पाटलिपुत्र के सर्वाधिक निकट एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बौद्ध-केंद्र थे किन्तु पुष्यमित्र के शासन-काल में इन विश्व विद्यालयों की महत्ता, प्रगतिशीलता और श्रेष्ठता अपने चरम उत्कर्ष पर थी.. इन दोनों विश्वविद्यालयों सरलता से नष्ट किया जा सकता था यदि शुंग-शासन सम्पूर्ण बौद्ध धर्म के विरुद्ध होता.किन्तु ऐसा था नहीं.. महासेनापति ऩे स्वयं को निरपेक्षभाव से पूर्ववर्ती राष्ट्रवादी सम्राट चन्द्रगुप्त के परमोअरा का वाहक ही समझा .. शुंग-युग ही वह युग है जो आगामी एक हज़ार वर्ष तक अपराजेय रूप से अव्याहत गति से चलने वाले भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग का सशक्त प्रारम्भिक चरण था जिसमें महामात्य चाणक्य के अर्थशास्त्र के सभी सिद्धांतों को क्रियान्वित करते हुए, गंभीर अनुशासन के साथ , अखंड वृहत्तर भारतीय साम्राज्य की अभिकल्पना, अभिरूपण , अभिव्यक्ति एवं अभिसुरक्षा के समग्र उपाय सुनिश्चित किये गए और यह सब कुछ एक सर्वत्यागी सन्यासी पतंजलि के मार्ग दर्शन में हुआ.
भारतीय साम्राज्य में लोक-मुक्ति के दिव्य लक्ष्य से महर्षि ऩे योग सूत्र की प्रस्तुति की जिसका प्रथम सूत्र है -- अथ योगानुशासनं.ब्रह्मसूत्र का प्रथम सूत्र है -- अथातो ब्रह्मजिज्ञासा.. योगसूत्र के प्रथम सूत्र से यह द्योतित संकेतित है कि महर्षि पतंजलि यद्यपि जागृत संत एवं मंत्रद्रष्टा ऋषि थे किन्तु उनका चिंतन , उस चिंतन की अभिव्यक्ति में शासन-सूत्र धार का का रंग और उसकी सुगंध सपष्ट व्यक्त होती थी..इसीलिये महर्षि के योगसूत्र का प्रारभ अनुशासन शब्द से होता है..
महर्षि ने , पुष्यमित्र को माध्यम बनाकर, जिस प्रकार, नागरिक-अधिकारों की सम्पूर्ण सुरक्षा के लक्ष्य से, एक सशक्त, सर्वतो-सुरक्षित एवं अनुशासित समाज को उसके परम वैभव की ओर अग्रसर करने के लिए एक राजनीतिक शासन प्रणाली को प्रवर्तित किया उसी प्रकार , व्यक्ति के चित्त को सम्पूर्ण रूप से अनुशासित करते हुए , उसकी परम मुक्ति हेतु , योग-साधना प्रणाली का प्रवर्तन भी किया ..
चरकसंहिता, महाभाष्य और योगसूत्र के अनुशीलन से उसमें प्राप्त उत्प्रेक्षाएं, उपमाएं, प्रतीक-प्रयोग इन तीनों महाग्रंथों के एक ही महर्षि द्वारा प्रणीत होने की प्रामाणिकता पुष्ट करते हैं..वास्तव में . योगसूत्र का द्वितीय सूत्र योग की परिभाषा है -- योगश्चित्तवृत्ति निरोधः एवं तृतीय -- तदा द्रष्टु : स्वरूपे अवस्थानं अर्थात चित्तवृत्तियों के निरुद्ध होने से द्रष्टा की स्वरुप-स्थिति हो जाती है..बिल्कुल यही अर्थ चरक संहिता के स्वस्थ शब्द का भी है..स्वस्थ अर्थात स्व में, स्वरुप में , आत्मा में स्थित .. यह आत्मा की ही आत्मा में अवस्थिति, बाधित होती है रोगों से. इसलिए , दोनों शास्त्रों में महर्षि ऩे बाधक-तत्त्वों को क्लेश का नाम दिया.
क्लेश को वर्गीकृत करते हुए महर्षि ऩे सूत्र दिया-अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ..
अविद्या , अस्मिता, राग, द्वेष अभिनिवेश --ये पांच क्लेश बताये गए . यही पाचों क्लेश आज भी नवीन चिकित्सा शास्त्र के अनुसार शरीर और मन के समस्त रोगों के कारण हैं..राग और द्वेष से ही तनाव उत्पन्न होता है जिससे हृदय-गति.रक्तसंचार आदि की प्राकृतिक प्रणाली अपने स्वरुप से च्युत हो जाती है जिससे शरीर के सारे घातक रोगों का जन्म होता है..यही स्वरुपच्युति ही , देह , मन , और आत्मा तीनों के लिए तीनो संहिताओं में व्याख्यायित की गई...
अविद्या की जो परिभाषा महर्षि ऩे दी उसके आगे का चिंतन मानव-मस्तिष्क के लिए संभव नहीं-- अनित्याशचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या अर्थात अनित्य , अपवित्र , दुःखकारी और अनात्म वस्तुओं में नित्य होने, पवित्र होने , सुखकारी होने तथा आत्मस्वरूप होने का भान ही अविद्या है.. यह सूत्र आज की सारी मनो-समस्याओं एवं तदनुसारी दैहिक-समस्याओं की सकारण व्याख्या करता है..आज भी भौतिक वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और चिकित्सावैज्ञानिक यह मान रहे , यह कह रहे कि प्रत्येक ऐसी वस्तु जो सुखकारी प्रतीत हो अंततः सुख या स्वास्थ्य दे ही - यह आवश्यक नहीं.आज की गत्वर जीवन पद्धति के प्रति सतर्क करते हुए स्वास्थ्य संबंधी अनेक मार्ग-दर्शन चिकित्साशास्त्रियों द्वारा दिए जा रहे जिनमें आपाततः , स्वादिष्ट , सुखकारी प्रतीत होने वाले फास्ट फ़ूड , तीक्ष्ण -ध्वनि वाले संगीत, एवं इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के द्वारा लिए जाने अन्य विषयों के स्वादों का सकारण वर्जन किया जाता है..यह वास्तव में , अविद्याग्रस्त व्यवहार एवं जीवन-यापन का ही निवारण है..
राग की परिभाषा महर्षि ऩे दी है - सुखानुशयी रागः ..आज Addiction अर्थात लत विवश आदतों के बारे में आधुनिक मनोविज्ञान ऩे जो बाते कही हैं वे इस सूत्र की ही व्याख्या या भाष्य हैं.. जिस कार्य में आपाततः सुख की अनुभूति होती है उसे मनुष्य ही नहीं प्रत्येक जीव बार बार करना चाहता है..और यहीं से उस कार्य-व्यापार के प्रति राग या उसकी लत या विवश-आदत जन्म लेती है.. महर्षि ऩे इसे भी क्लेश कहा अर्थात यह एक मनोरोग है..
यद्यपि इस लेख में यह कहना कुछ पाठकों को अस्वाभाविक प्रतीत हो सकता है किन्तु उपलब्ध वैयक्तिक साक्ष्यों तथा सामान्य साक्ष्यों से मेरा यह मानना है कि कि महर्षि पतंजलि भगवान बुद्ध के पूर्ववर्ती थे एवं क्योकि वे दीर्घजीवी थे और हैं , इसलिए ,पुष्यमित्र के काल में भी वे वर्तमान थे और उन्होंने लोक-संग्रह के लिए, वृहद्रथ की राष्ट्र-घातक नीतियों के कारण, राजनीतिक स्फोट वाद के माध्यम से उन्हें सत्ताच्युत कराया..
इस प्रकार , भारतीय साम्राज्य के महामात्य के रूप में महर्षि पतंजलि ऩे लोक-स्वास्थ्य, लोक-शिक्षा एवं लोक-मुक्ति के तीन आयामों पर जो व्यावहारिक चिंतन प्रस्तुत किया और जिस शत-प्रतिशत सफलता के साथ उसका क्रियान्वयन पुष्यमित्र शुंग के द्वारा कराया वह विश्व इतिहास में अन्यतम है और अन्यत्र अनुपलब्ध है.
अद्वैत भाव की उपलब्धि ही जीवन परम ध्येय है जिसका किंचित आभास न्यूटन , आइंस्टीन जैसे श्रेष्ठ वैज्ञानिकों को जीवन के अन्तिक चरण में मिल पाता है ....... So, Good Morning and Happy This Precious Day of our lives.
धर्म और विज्ञान-दोनों के प्रति ही अंध-विश्वास वर्जनीय
· अरविन्द पाण्डेय
धर्म और विज्ञान-दोनों के प्रति ही अंध-विश्वास वर्जनीय है. मैं बता दूं कि मैं आज तक किसी बाबा के पास समस्या लेकर नहीं गया..हाँ, कोई संत धर्म-विज्ञान के संसार में यात्रा कर चुके हैं या नहीं -- यह जिज्ञासा रहती है मुझे..
अगर निर्मल बाबा कृपा बरसाने में अक्षम हैं तो यह उनकी अक्षमता है..जीसस क्राइस्ट कृपा बरसाते थे..और , स्टीफन हाकिंग ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम में यह कहते हैं कि यदि कोई ऐसा यान बने जो प्रकाश की गति से भी अधिक गति से यात्रा कर सके तो उस बैठ कर यात्रा करने वाला व्यक्ति भविष्य में प्रवेश कर सकता है..किसी को अब हाकिंग कैसे समझाएं कि आज से २०० साल बाद जो दुनिया होगी उसे तुम देख सकते हो,, उसमे रह सकते हो , अगर ऐसा यान मिल जाय...उस दुनिया में क्या हो रहा होगा --यह अभी जान सकते हो..
विज्ञान का अंध - विश्वासी कहेगा कि '' जीसस क्राइस्ट किसी रोगी को स्पर्श द्वारा रोगमुक्त कर ही नहीं सकते थे क्योकि चिकित्सा विज्ञान ऐसा नहीं कहता.....''
धर्म का अंध-विश्वासी कहेगा कि '' हम घोड़े की नाल से अंगूठी बनाकर पहने तो संकट-मुक्त हो जायेगें..'' -- ये दोनों ही गलत और अवैज्ञानिक बात कह रहे होगें..
इस सम्बन्ध में मुझे एक आविष्कार की याद आ रही है..
वर्ष १९८८ की बात है..अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के एक वैज्ञानिक के अनुप्रयोग का विवरण मैंने वायस आफ अमेरिका से सुना था..नासा के एक वैज्ञानिक ने अपनी उंगली के इशारे से १२ फिट दूर तक के स्विच से विद्युत उपकरण को आन-आफ करने में सफलता प्राप्त की थी..
सिद्धांत यह था कि हमारे मस्तिष्क से किसी भी अंग के संचालन हेतु आदेश लेकर विद्युत चुम्बकीय तरंगें निकलतीं हैं जो न्यूरान - डेंड्रान-एक्जान से गुज़रती हुई उस अंग तक पहुँचती हैं..तो उंगली तक पहुचने वाली तरंगे उंगली के बाहर भी प्रवाहित की जा सकती हैं जो ईथर के माध्यम से स्विच तक पहुच सकती हैं..इस सिद्धांत के अनुसार उस वैज्ञानिक ने १२ फिट दूर के स्विच पर उंगली का इशारा करते हुए स्विच आन-आफ करके दिखाया था..अब ये बाते समझनी कठिन तो हैं ही , फिर भी पूर्वाग्रह और अंध-विश्वास से मुक्त मस्तिष्क इन्हें समझ सकता है....
अनेक मित्रों ने मुझे इश्क और मानवीय रिश्तों पर भी कवितायें लिखने को कहा है..
यहाँ मैं बता दूं कि एक पुलिस अधिकारी के रूप में मैंने सैकड़ों मामले ऐसे देखे हैं जिसमें शिकायत-कर्ता और आरोपित मामला पुलिस या अदालत में दर्ज होने के पहले प्रेमी-प्रेमिका थे.. और , बस. छोटे छोटे अहंकारों, छोटी जिद, छोटे स्वार्थों के कारण एक दूसरे के दुश्मन बन गए और अपनी सारी ताकत लगाकर, यहाँ तक कि खुद को नुक्सान पहुचाकर भी उसी कथित प्रेमी या कथित प्रेमिका के पीछे पद गए जिसे कभी प्रेम की कवितायें , प्रेम के गीत सुनाया करते / करती थीं..
वास्तव में प्रेम सिर्फ ईश्वर से हो सकता है या यूँ कहें कि प्रेम सिर्फ ईश्वर ही कर सकते हैं .. यह मनुष्य के वश का नहीं.. यदि कहीं कोई मनुष्य प्रेम में हो तो वह देवता बन चुका होता है..
प्रेम मनुष्य से देवता बनने की प्रक्रिया का दूसरा नाम है -- यूँ कहें इसे और समझें तो शायद बेहतर होगा,,
मैं प्रीस्ट वैलेंटाइन द्वारा क्लादिअस के मानवता-विरोधी क़ानून का छुप कर उल्लंघन किये जाने को नापसंद करता हूँ.. उन्हें गांधी जी की तरह खुल कर सिविल नाफरमानी -- सविनय अवज्ञा करनी चाहिए थी..
महात्मा गांधी के साथ श्री सुभाषचंद्र बोस तथा जवाहर लाल नेहरू
मैं गांधी, जिसको लोग महात्मा कहते हैं.
मैं रहा यूँ कि ज्यूँ आम नागरिक रहते हैं.
डरते थे मुझको देख, फिरंगी बेचारे.
जैसे बकरी का झुण्ड, शेर को देख डरे.
चंपारण मे है गाँव एक साठी नामक.
करते खेतों में वहां परिश्रम,लोग, अथक.
पर,अंग्रेजों के क्रूर लोभ का पार नहीं..
अपनी ज़मीन पर खेती का अधिकार नहीं.
मैंने बिहार के लोगो को संगठित किया.
पौरुष-परिपूर्ण अहिंसा का अभिमन्त्र दिया.
फिर, झारखंड के सिद्धो-कान्हो के जैसा.
था असहयोग सब ओर, कड़कती बिजली सा.
अंग्रेजों की दहशतगर्दी की नींव हिली.
चंपारण के तूफां से रानी भी दहली.
भितिहरवा में आश्रम लोगो ने बना दिया.
छः माह वहीं मैंने आन्दोलन-यज्ञ किया.
मैंने चैतन्य महाप्रभु जी के जीवन से.
सीखा था सविनय-अवज्ञान, अर्पित मन से.
नदिया में कोतवाल की आज्ञा को ठुकरा.
कीर्तन करता, प्रभु जी का था जुलूस निकला.
मैंने सीखा श्री रामायण - पारायण से.
सत्याग्रह का रणनीति-ज्ञान, रामायण से.
थे तीन दिनों तक राम स्वयं सत्याग्रह पर.
प्रार्थना-निरत सागर से, सागर के तट पर.
जब विनय नहीं माना समुद्र अभिमानी ने.
जब मार्ग नहीं छोड़ा सागर के पानी ने.
तब कमल-नयन के नयन,अग्नि से दहक उठे.
कोमल-शरीर श्री राम,सूर्य से भभक उठे.
मैं जीवन भर था रहा अहिंसा का साधक.
पर, कभी नहीं था शौर्य-प्रदर्शन में बाधक.
जो भय के कारण हिंसा को अपनाते हैं.
वे कभी वास्तविक वीर नहीं कहलाते हैं.
मैंने सुखदेव, भगत से अतिशय प्यार किया.
पर, उनकी हिंसा को भी अस्वीकार किया.
मैंने चाहा सुभाष, नेहरू के साथ चलें.
पर, दुःख ! सुभाष, रास्ते पर एकाकी निकले.
चंपारण से जो शुरू हुआ था अश्वमेध.
वह पूर्ण हुआ सैंतालिस में कर,लक्ष्य-वेध.
भारत,स्वतंत्र हो उगा, सूर्य सा चमक उठा.
अपने हांथो में ही अब अपना शासन था.
मैं एक बात अब दुःख से कहना चाहूंगा.
भितिहरवा के बारे में यह बतलाउगा.
वह दुनिया का पर्यटन केंद्र बन सकता था.
पिछड़ा बिहार, मुद्रा अर्जित कर सकता था.
अपने भारत के सफल राजनीतिग्य सभी.
भितिहरवा की यात्रा करते हैं नहीं कभी.
सबके मन में है भरा अंधविश्वास यही.
जो गया वहां,सत्ता-च्युत होगा शीघ्र वही.
मैंने सुन रखा है बिहार कुछ बदल रहा.
ईमान भरा है एक व्यक्ति, इस वक्त वहां.
कोई उस तक मेरा सन्देश अगर दे दे.
विश्वास मुझे , शायद वह कुछ ना कुछ कर दे.
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मैं वर्ष २००५ में चंपारण क्षेत्र का डी आई जी था.
भितिहरवा आश्रम की तीर्थयात्रा पर मैं जब जाने लगा तो मुझसे मेरे एक सहकर्मी ने कहा ,
'सर, वहां कोई साहब लोग नहीं जाते .कोई नेता भी नहीं जाता.वहां जाने से कुर्सी चली जाती है ..'
मै कुछ मुस्कुराया .फिर,कुछ रूककर कहा ,' चलो गांधी जी से ही पूछेंगे कि वे क्यों कुर्सी ले लेते हैं भितिहरवा दर्शनार्थियों की..वैसे मेरी कुर्सी भी छोटी ही है .चली भी जायेगी तो गांधी जी से जिद करके इससे बड़ी कुर्सी ले लेगे.'
मैंने वहां की आगंतुक-पंजी में कुछ लिखा और देखा तो बरसों बरस तक के पृष्ठों मे किसी अधिकारी का आगंतुक के रूप में हस्ताक्षर नहीं मिला..
किसी राजनीतिग्य का भी..
श्री चंद्रशेखर जी का मैं सादर स्मरण कर रहा इस प्रसंग में क्योंकि वे भितिहरवा आश्रम गए थे और वहां कुछ निर्माण कार्य भी कराया था.
एक बात का उल्लेख ज़रूरी है..भितिहरवा आश्रम की यात्रा के कुछ ही दिनों बाद चंपारण क्षेत्र के डी आई जी पद से मेरा स्थानान्तरण हुआ. किन्तु , महात्मा गांधी के हस्तक्षेप से, मैं मगध क्षेत्र (गया ) के डी आई जी पद पर पदस्थापित किया गया.. महात्मा गांधी की अहिंसा-साधना की विचार-गंगोत्री बोधगया .. अमिताभ बुद्ध.. मेरा स्वप्न पूरा हुआ-बुद्ध के निकटतम रहने का..उस भूमि को प्रतिदन स्पर्श करने का जहां कभी राजकुमार सिद्धार्थ, ज्ञान-पिपासा से विकल होकर आये थे और परम ज्ञान प्राप्त कर सर्वव्यापी बुद्ध होकर लौटे थे..
मेरा चंपारण से बोधगया जाना महात्मा गांधी का हस्तक्षेप ही था .क्योंकि बाद में मुझे बताया गया कि प्रस्तावक ने मुझे मुख्यालय में रखने का प्रस्ताव दिया था किन्तु जिसे निर्णय लेना था, उनके शब्द थे-''इन्हें यहाँ रखने का प्रस्ताव क्यों दे रहे हैं.ये तो टफ आफिसर हैं.इन्हें गया मे कीजिये..''
और इस तरह मैं गया का डी आई जी बना.
चंपारण से मैंने अहिंसक पुलिसिंग का अपना अभियान तेज़ किया.दोनों विवाद-ग्रस्त पक्षों को प्रेरणा देकर अब तक हज़ारों भूमि-विवाद के मुकदमे ख़त्म कराये..झूठे मुकदमों में उलझे हुए दोनों पक्षों को गले मिलाया...
और अंत में, भितिहरवा आश्रम और कामनवेल्थ गेम मे खर्च हो रहे धन और निवेश की गई रूचि की तुलना करना उपलक्षणीय है..
तथास्तु !!!!!
आज की कविता मनुष्य द्वारा कहे जाने वाले उस सबसे प्रचलित किन्तु अशुद्ध प्रयोग के मिथ्यात्व को दर्शित करती है जिसमें कहा जाता है कि सूर्य अस्त हो गए.. वास्तविकता यह है कि हम स्वयं, पृथ्वी की परिधि में विवश , पृथ्वी के साथ घूर्णन कर रहे होते हैं और एक विन्दु पर, सूर्य का दर्शन निरुद्ध हो जाता है .. वातव में, हम स्वयं पृथ्वी के साथ अस्त हो जाते हैं किन्तु कहते है कि सूर्य अस्त हो गए.. चिंतन का विषय...
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स्वामी विवेकानन्द अंगरेजी साहित्य की कक्षा में, एकाग्र मन से, अपने प्राध्यापक श्री हेस्टी का वक्तव्य सुन रहे थे..श्री हेस्टी उस समय विलियम वर्ड्सवर्थ की प्रकृति संबंधी कविताओं की वास्तविक दिव्यता को व्यक्त करने का प्रयास करते हुए यह कह रहे थे की प्रकृति के सान्निध्य में , मनोरम उपवनों, वन-प्रान्तरों ,लता-गुल्मों के मध्य अपनी ध्वनि-सुगंध विस्तीर्ण करती हुई कोयल जैसी सुरीली प्राणवती पुष्प-कलिकाओं को देख कर वर्ड्स वर्थ समाधिस्थ हो जाते थे और उस समाधि से वापस आने पर वे कवितायें लिखते थे.इसीलिये उनकी कवितायें इतना गहन प्रभाव डालती हैं.........
श्री हेस्टी ने यह भी कहा कि अगर इस भाव् -समाधि को प्रत्यक्ष देखना चाहते हो तो दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण परमहंस को जाकर देखो.......................................
और यही से नरेन्द्रनाथ का मन श्री रामकृष्ण के दर्शन , उनकी भाव् -समाधि के प्रत्यक्षीकरण के लिए व्याकुल होता है..
वे अवसर देखते है कि कैसे उनसे मिला जाय.. जिस सत्य का ,, निरपेक्ष सत्य का, अतीन्द्रिय सत्य का , अज्ञेय सत्य का ज्ञान वे करने के लिए तड़प रहे थे , उन्हें लगा कि अब वह क्षण निकट है..और अंततः वह क्षण आता है जब वे श्री रामकृष्ण के निकट जाते हैं और नरेन्द्रनाथ से स्वामी विवेकानन्द के रूप में उनका जन्म होता है ..
In my adolescence , I used to study Shri Ramkrishna Vachanaamrit every night before sleep and used to dream to be A Sanyaasi like Swami Vivekanand but Alas ! I failed to be ...
Destiny Dragged me into Indian Police Service.
My Lust to be A Sanyasi will be alive until it happens..
I know I have to come to this earth again to meet my desire..!!
प्रिय मित्र ! कल प्रोफाइल में किसी ने किसी का फोटो शेअर किया और दुखित मन से लिखा कि कुछ लोग '' दबाव '' में काम न कर पाने की वजह से सिविल सेवाएं छोड़ देते हैं ,, छोड चुके हैं,, छोड़ देने वाले हैं ,, तो दो पंक्तियाँ कल निकली .. आज समय मिला तो उन दो को और सशक्त कर दिया बस.. आपके क्या विचार हैं.. आप से सच कहूँ-- इन लोगो द्वारा परिभाषित '' दबाव '' क्या होता है ,,अपने २० से अधिक वर्षों की सेवा के बाद भी मैंने नहीं देखा ,, न महसूस किया....
============== आज भी, यदि कोई, किसी को शूली पर चढ़ा दे, शूल की भयानक वेदना से वह व्यक्ति तड़प रहा हो, रक्त बहता जा रहा हो, बेहोशी छाती जा रही हो, और ऐसे में ,ऐसा व्यक्ति शूली पर चढाने वाले के लिए अपने पिता परमेश्वर से प्रार्थना करे कि -
'' हे पिता ! इन्हें क्षमा करना क्योकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं..''
जब श्री प्रह्लाद जी ऩे कहा कि श्री हरि सर्वत्र हैं तब भीषण क्रोध के आवेश में हिरण्यकशिपु ऩे सामने दिखाई दे रहे एक विशाल खम्भे को दिखाकर पूछा , '' अच्छा, क्या इसमें भी तेरा हरि है ??
प्रह्लाद जी ऩे कहा , '' हाँ , इसमें भी वे श्री हरि निवास करते हैं..''
इतना सुनते ही मृत्यु के वशीभूत उस महाराक्षस ऩे अपने खड्ग से उस खम्भे पर प्रहार किया ..
श्री मद्भागवत में वर्णित है कि -- प्रहलाद के वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए श्री हरि उस खम्भे से नृसिंह रूप में प्रकट हो गए.................''
जिन लोगो ऩे श्रीमद्भागवत का पाठ एवं मनन नहीं किया , मेरी दृष्टि में, वे एक विलक्षण असीम , अनंत आनंद के भोग से वंचित हैं...
इन चार पंक्तियों में उसी महाभाव को प्रकट किया गया है कि जब, जहाँ जो नहीं है , वह , वहाँ भी प्रकट हो सकता है यदि दर्शक और दृश्य में अनन्य सम्बन्ध हो .. यदि यह नहीं तो दृश्य , अपनी प्रकृति अर्थात अपने स्वार्थ के अनुसार ही दर्शक के समक्ष प्रकट होता है और दर्शक को भ्रम होता है कि वह दृश्य , उसके लिए प्रकट हुआ.. संसार में यही दिखाई देता है .. सूर्य , चन्द्र, तारक, पुष्प, फल, आदि अपनी प्रकृति के वशीभूत उदय-अस्त , प्रफुल्ल-शुष्क हो रहे किन्तु .. मनुष्य-मनुष्य के बीच सारे सम्बन्ध इसी प्रकृति के हैं ..किन्तु , मोह और अज्ञानवश प्रेम , स्नेह का भ्रम होता है...
स्वामी विवेकानंद ऩे माया की व्याख्या करते हुए कहा -- पुत्र, माता का अपमान करता है, किन्तु माता , पुत्र के प्रति स्नेह ही रखती है,, यही माया है.......,
उपनिषद् कहते हैं की ऋषियों ने मन्त्रों का दर्शन किया , उन्हें लिखा या उनकी रचना नहीं की जैसे कवी या लेखक करते हैं.. यह व्यवहार में भी देखा जाता है कि जो जिस कवि या लेखक में अनुभूति जितनी ही गहन होती है उसकी कविता या साहित्य उतना ही प्रभाव उत्पन्न करता है ..
सदा से ही अधिकांश धर्म के प्रवाचकों में स्वयं के अनुभव का अभाव रहता है.. वे किसी तथाकथित गुरु या सम्प्रदाय के ग्रंथों को पढ़कर या याद करके उसे ही लोगो को सुनाया करते हैं और लोग उनका अनुकरण करना प्रारम्भ कर देते हैं ..
मेरी उपर्युक्त कविता इसी भाव को प्रस्तुत करती है...
मानो '' हाला '' वह अनुभूति है जो किसी साधना से साधक को प्राप्त होती है..
'' किसी दूसरे का प्याला '' का अर्थ दूसरे संत द्वारा अनुभव किया गया ज्ञान ..
अधिकांश कथित संत या धर्म-प्रवक्ता किसी दूसरे के अनुभव को ही बताते हैं...
'' मेरी खुद की मधुशाला '' मेरी आत्मा , मेरा अपना अनुभविता ..
आज श्री हरिवंश राय बच्चन के जन्म दिवस पर, मैं अपने द्वारा १५ वर्ष की उम्र में लिखे गए उस छंद को प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मैंने अपने पिता जी द्वारा दी गई '' मधुशाला '' के प्रथम पृष्ठ पर अंकित किया था..
पुलिस वह रक्षक-संगठन है जो प्रतिदिन , रात-दिन ,हमारी रक्षा में तत्पर रहता है ..अपनी लाख कमियों के बावजूद, पुलिस ही है जो ताज होटल और ताजपोशी के सपने के साथ जी रहे लोगों की और बिना सोचे समझे ताजपोशी किसी की भी कर देने वाले आम लोगो की रक्षा करती है..
हम भारत के लोगों को चाहिए कि हम अपने रक्षकों का भी सुखद जीवन सुनिश्चित करें और उन्हें सम्मान देना सीखें ..इसके लिए हमें चाहिए कि हम पश्चिम के विकसित देशों में पुलिस को दी जा रही सुविधाओं और सम्मान समतुल्य ही अपने देश में भी पुलिस को वही सुविधाएं और सम्मान दें...
जिनके कराल-मुख में प्रविष्ट होकर, विनष्ट होते नक्षत्र.
जो घनीभूत स्वयमेव तमोगुण किन्तु,सृजन करतीं सर्वत्र.
जिनके करूणा-कटाक्ष से मैं हूँ आप्तकाम,निष्काम,अकाम.
उन श्री दक्षिण काली के श्री चरणों में मेरा कोटि प्रणाम.
बहुत दिनों की मेरी कामना थी कि - रामकृष्ण परमहंस के लिए जीवंत किन्तु अज्ञान से ढकी हुई आँखों के लिए प्रस्तर-मूर्ति मात्र , जगन्माता दक्षिणेश्वर कालिका का, दक्षिणेश्वर जाकर, दर्शन करूं..यह मनोकामना पूरी हुई..
गगन-मार्ग से यात्रा के क्रम में भगवान् सविता के दर्शन के अनुभव पर कुछ पंक्तियाँ कल..
महारास : नौ वर्षों की आयु कृष्ण की,सजल-जलद सी काया.
· अरविन्द पाण्डेय
१
एक निशा में सिमट गईं थीं मधुमय निशा सहस्र .
एक चन्द्र में समा रहे थे अगणित चन्द्र अजस्र.
स्वर्गंगा का सुरभि-सलिल उच्छल प्रसन्न बहता था.
सकल सृष्टि में महारास का समाचार कहता था.
२
शरच्चंद्रिका निर्मल-नभ का आलिंगन करती थी.
अम्बर के विस्तीर्ण पृष्ठ पर अंग-राग भरती थी.
तारक,बनकर कुसुम,उतर आये थे मुदित धरणि पर.
प्रभा-पूर्ण थी धरा , शेष थीं किरणें नही तरणि पर.
३
गर्व भरी गति से यमुना जी मंद मंद बहतीं थीं .
मैं भी कृष्ण-वर्ण की हूँ - मानो सबसे कहतीं थीं.
शुभ्र चंद्रिका,कृष्ण-सलिल पर बिछी बिछी जाती थी.
कृष्णा, आलिंगन-प्रमुग्ध, आरक्त छिपी जातीं थीं.
४
पृथुल पुलिन पर, पारिजात,पुष्पित-वितान करता था.
पवन, उसे कम्पित कर,कुसुमास्तरण मृदुल रचता था.
प्रकृति,परम प्रमुदित,कण-कण,क्षण-क्षण प्रसन्न हंसता था.
आज धरा पर , प्रतिक्षण में शत-कोटि वर्ष बसता था.
५
नौ वर्षों की आयु कृष्ण की, सजल जलद सी काया.
कनक-कपिश पीताम्बर, नटवर वपु की मोहक माया.
श्रीवत्सांकित वक्ष , वैजयंती धारण करता था.
कर्णिकार दोनों कर्णों में श्रुति-स्वरुप सजता था.
६
मस्तक पर कुंचित अलकावलि पवन-केलि करती थी .
चारु-चन्द्र-कनकाभ-किरण चन्दन-चर्चा भरती थी.
चन्दन-चर्चित चरण ,सृष्टि को शरण-दान करता था.
करूणा-वरुणालय-नयनों से रस-निर्झर बहता था.
७
पारिजात का भाग्य, आज उसकी शीतल छाया में.
श्री व्रजराज तनय राजित थे, निज निगूढ़ माया में.
उधर, गगन में चारु चंद्रिका, नवल नृत्य करती थी.
इधर, कृष्ण के मधुर अधर - पुट पर वंशी सजती थी.
८
महाकाल , तब महारास के दर्शन हेतु पधारे .
व्रज-वनिता का रूप , मुग्ध,साश्चर्य देव थे सारे.
व्रज-सुन्दर ने सस्मित देखा, वंशी मधुर बजाया.
क्लींकार का गुंज गोपिकाओं में मात्र, समाया.
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महारास के रहस्य पर श्री कृष्ण को अर्पित मेरी लम्बी कविता का यह एक अंश है .. मेरी यह लम्बी कविता , मेरी आगामी पुस्तक का प्रमुख अंश होगी..
जैसे आइन्स्टीन के द्वारा देखे गए सापेक्षता के रहस्य को विश्व में बस दो-चार लोग ही पूरी तरह समझ पाते हैं , उसी तरह महारास के रहस्य को विश्व में श्री कृष्ण-कृपा-प्राप्त कुछ लोग ही, वास्तव में, समझ पाते हैं.
महारास के समय श्री कृष्ण की अवस्था नौ वर्ष की थी ..
जिन गोपिकाओं ने महारास में भाग लिया था उनमे सभी , श्री कृष्ण से अधिकतम दो वर्ष मात्र बड़ी थीं.
कोटि कोटि सूर्यों की आभा एक ज्योति में हुई प्रविष्ट
· अरविन्द पाण्डेय
जगन्माता धूमावती -यन्त्र
महानिशा में किया प्रज्ज्वलित माँ को अर्पित दीप,विशिष्ट
कोटि कोटि सूर्यों की आभा एक ज्योति में हुई प्रविष्ट.
देखा सूर्य - चन्द्र को लेते जन्म और फिर देखा अंत.
देखा माँ की मधुर-मूर्ति , फिर देखा भीषण रूप , दुरंत.
सो अकामयत एकोsहं बहुस्यां प्रजायेय ..
उन्होंने -- ईश्वर ऩे कामना की कि मैं एक हूँ , अनेक को जन्म दूं...
और ये अनंत अपरिसीम ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो गया..
पृथ्वी माता , प्रति सेकेण्ड ३० किलोमीटर की गति से , भगवान सूर्य की परिक्रमा कर रही हैं..
एक सेकेण्ड के लिए भी उनकी यात्रा रुकी नहीं .. जन्म से अब तक...
क्या हम पृथ्वी पर अपने अपने अहंकार में डूबे हुए लोगो को यह अनुभव होता है कि हम एक ऐसे पिंड पर जीवन बिता रहे हैं जो इतनी तेज़ गति से यात्रा कर रहा है अंतरिक्ष में..
विज्ञान कहता है की जिस दिन मनुष्य को यह अनुभव हो जाय , उस व्यक्ति की तुरंत मृत्यु हो जायेगी..
मुझसे कई मित्रों ने पूछा कि आप प्रेम की कवितायें या नज़्म किसे लक्षित कर लिखते हैं .. क्योंकि लिखते समय लेखक की दृष्टि में कोई व्यक्ति या वस्तु तो रहनी ही चाहिए जिसे लक्षित कर शब्दों के माध्यम से प्रकट भाव, अपनी यात्रा कर सकें .. इन प्रश्नों पर मैंने कई बार सोचा ।
मैनें एक दिन , किसी प्रणयिनी के प्रसन्न-मन की तरह अनंत रूप से विस्तृत और खिलखिलाते हुए आकाश को देख कर, खुद से प्रश्न किया था ---
'वह कौन जिसे देख गुनगुना उठा ये मन .
वह कौन जिसे छूके गमगमा उठा ये तन
वह कौन जिसे आँख देखती ही रह गयी,
महकी हुई हवा ये बही सन सनन सनन ..
मैनें जब किसी सांस्कृतिक-कार्यक्रम में - चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल' गाया तो भी यही प्रश्न मुझसे कुछ मित्रों ने किया कि आखिर गाते समय जो भाव, स्वर-लहरियों में पग कर, छलकते हैं, वे किसको भिगोने को बेताब होते हैं ॥
ये प्रश्न मुझे अति प्रासंगिक लगे थे और इन प्रश्नों पर मेरा अपना चिंतन है . मै समझता हूँ कि मेरा यह चिंतन, वैज्ञानिक और यथार्थवादी भी है .
चांदी जैसा रंग - क़तील शिफाई की बेहतरीन खूबसूरत नज़्म, जब मैंने पढा तो मुझे लगा कि ये नज़्म , बज्मे कुदरत के लिए लिखी गयी ..
मगर इश्क की हकीकत से महरूम लोगों नें ये समझा कि ये किसी खूबसूरत, परीजाद जैसी स्त्री के हुस्न की तारीफ़ में लिखी गयी .
सत्य यह है कि दुनियावी खूबसूरती एक ऐसा सितारा है जिसे पाने को जो जितना ही आगे बढे वह सारी कोशिशों के बाद , खुद को उतना ही पीछे महसूस करता है ।
एक कार्यक्रम में मैंने ' चांदी जैसा रंग ' गाने के पहले श्रोताओं से पूछा - ' क्या आपमें से किसी ने कोई ऐसी स्त्री देखी है जिसकी देह का रंग चांदी जैसा चमके और जिसके बाल सोने की तरह कान्तिमान हों ।'
सभी ने एकस्वर से कहा - नहीं देखा ।
तो मैंने गाना शुरू किया और कहा की इस गीत को मैं उस मातृभूमि - धरती माता को समर्पित करते हुए गा रहा हूँ जिसका रंग सचमुच चांदी जैसा है और जिसके बाल . वास्तव में स्वर्णिम कान्ति से विभूषित हैं । तालियाँ बजी लोगों ने गीत का स्वाद लिया , आनंदित हुए ..
नयी दृष्टि ने उन्हें बौद्धिक दृष्टि से भी समृद्ध भी बनाया ..
प्रेम की शुद्ध वैज्ञानिक परिभाषा और लक्षण नारद भक्तिसूत्र में प्राप्त होता है । श्री नारद ने प्रेम का लक्षण निरूपित करते हुए कहा -- तत्सुखे सुखित्वं स्यात् अर्थात जिस पुरूष में यह लक्षण मिले कि वह किसी स्त्री के सुखी हो जाने पर स्वयं सुख का अनुभव करता है । या कोई स्त्री, किसी पुरूष के सुखी होने में स्वयं सुखी होने का अनुभव कर रही तो यह लक्षण प्रेम का है ।
मगर संसार में हो क्या रहा अक्सर ? स्त्री और पुरूष एक दूसरे के अस्तित्व का प्रयोग, स्वयं को सुखी करने में कर रहे । तो यह प्रेम का लक्षण तो है नही । फ़िर , चाँद-फ़िज़ा जैसी कथाएं , प्रेम के नाम पर , आतंक का प्रतीक बन, प्रेम शब्द के प्रति भयग्रस्त बना रहीं लोगों को ।
वस्तुओं के प्रति प्रेम ने समाज को घायल कर रखा है । दहेज़-प्रताड़ना के मामलों में अक्सर मैनें पाया कि पत्नी अत्यन्त रूपवती है फ़िर भी उसके रूप की संपत्ति को न आंक पाने के कारण पति ने पैसे के लिए उसे प्रताडित किया । और जब उसे मैंने इस बात के बारे में समझाया तो उसे गलती का एहसास हुआ और पत्नी-पति के सम्बन्ध सुधर गए ।
एक बात और । संसार में जो आकर्षण है स्त्री -पुरूष का एक दूसरे के प्रति, वह किसी भौतिक -गुण के प्रति आकर्षण है न कि उस व्यक्ति के प्रति जिसके प्रति कोई आकर्षित हो रहा । ऐसे आकर्षणों में स्त्री या पुरूष के वे भौतिक गुण यदि अधिक मात्रा में किसी अन्य स्त्री या पुरूष में दिखाई पड़ेंगे तो आकर्षण की दिशा निश्चित रूप से बदल जायेगी । उस ओर जहा वे गुण अधिक दिखाई पड़ रहे । फ़िल्म उद्योग और शोभा डे की सितारों भरी रात्रियों की मस्ती में डूबने वालों के विशिष्ट समुदाय , में इस प्रणय - विचलन की घटनाएँ प्रचुर संख्या में प्राप्त हैं ।
वास्तव में अनंत प्रेम या तो ईश्वर के प्रति ही हो सकता है या जिसे ईश्वर मान लिया जाय उसके प्रति हो सकता है । क्योंकि इश्वर में ही अनंत मात्रा में सौन्दर्य, माधुर्य, कोमलता , ऐश्वर्य , पौरुष, यशस्विता , श्री , उपलब्ध है जिसके कारण कोई भी किसी के प्रति संसार में आकर्षित होता है ।
अनेक प्रेम-अपराधों के अनुसंधान में मैंने यही पाया कि अपराध इसलिए हुआ क्योंकि श्री नारद की परिभाषा के अनुरूप वहाँ प्रेम था ही नही मात्र प्रेम का आभास था जिसे प्रेम कहा जा रहा था । लोग स्वयं को सुखी बनाने के लिए दूसरों की ताकत का प्रयोग कर रहे थे और यह स्वयमेव एक अपराध है ।
समाज को समृद्ध , शांत और सुंदर बनाने के लिए यह ज़रूरी है की लोग प्रेम का प्रशिक्षण प्राप्त करें , उसे समझें और यह देखें कि वे जिसे प्रेम करते हैं उसे कितना सुखी बना रहे । दूसरों को सुखी करने वाले में ही प्रेम घटित हो सकता है वरना इश्के मिजाजी का तो यही हाल देखा और लिखा -
श्री राधाष्टमी:तुम अगर साथ देने का वादा करो : मेरे स्वर में
· अरविन्द पाण्डेय
जय जय श्री राधे : श्री राधाष्टमी :
तुम अपनी बांसुरी के सुर मुझे जब जब सुनाते हो .
कोई नगमा अनूठा दिल से मेरे बह निकलता है.
मेरी हस्ती नहीं कुछ, पर,मुझे मालूम है इतना -
मेरे नगमों से भी कुछ पल,तुम्हारा दिल बहलता है.
I feel fortunate to learn and sing this song from the Music Director of this song , Shri Ravi .. I was posted as City S.P. Ranchi , Jharkhand..(1994 ) He visited my house , stayed with us, told so many unheard stories about Rafi sahab , Lata ji , Mukesh ji , Kishor Da and other legends of Hindi Film Music Industry ..
हरतालिका तृतीया के महापर्व पर : मैं तो बनूगी शिव की पुजारन:नंदिता पाण्डेय के स्वर में.
· अरविन्द पाण्डेय
हरतालिका तृतीया :
सकल विश्व की माताओं को सतत प्रणाम !!!
कालिदास का यह छंद मुझे अत्यंत प्रिय है और मेरे द्वारा किया गया इसका अनुवाद भी मुझे अतिशय प्रिय है..आप सभी इसे ज़रूर पढ़ें और अपने विचार लिखें .
कुमार संभव में कालिदास :
तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसांगयष्टिः
निक्षेपणाय पदमुद्ध्रितमुद्वहन्ती
मार्गाचलव्यतिकराकुलितेवसिन्धु:
शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ.
मेरा अनुवाद:
उन्हें देखकर पुलक-सुगन्धित,कम्पितदेह शिवानी.
तत्पर जो अन्यत्र गमन को,शिव-सरसांग भवानी.
पथ-स्थित-अचलारुद्ध नदी सी आकुल,पर,आनंदित.
न तो स्थित रहीं न तो कहीं अन्यत्र हो सकीं प्रस्थित.
यह दृश्य उस समय का है जब शिव-प्राप्ति हेतु किया जा रहा जगन्माता पार्वती का तप पूर्णप्राय हो चुका होता है.भगवान शिव, वटु-वेश में वहां आते हैं और शिव-निंदा करते हुए पार्वती को तप से निवारित करने का प्रयास करते हैं..पहले तो माता उन्हें तर्क से परास्त करने का प्रयास करतीं हैं.किन्तु, वे रुकते नहीं..पुनः कुछ कहना चाह रहे होते हैं..माता अपनी सखियों से कहती हैं-
निवार्यतामालि किमप्ययं वटु:
पुनः विवक्षु: स्फुरितोत्ताराधर:
न केवलं यो महतोSपभाशते
शृणोति तस्मादपि यः स पापभाक.
इतना कह कर वे अपना पैर वहां से हट जाने के लिए उठाती ही हैं कि वटु-वेशधारी सदाशिव उनके सामने प्रकट हो जाते हैं..उस समय माता की जो स्थिति होती है उसी का वर्णन कालिदास ने उक्त छंद मे किया है जो सम्पूर्ण विश्व-साहित्य के सर्वोत्तम काव्य में माना जाता है.भारतीयों द्वारा ही नहीं , भारतविद्या के जर्मन, अंग्रेज,आदि विद्वानों द्वारा भी.
कुमारसंभवं का यह प्रसंग मेरे पिता जी बचपन से ही मुझे सुनाया करते थे.
इतना सरस प्रसंग -- वह भी अपनी माता और पिता का प्रेम प्रसंग ..कितना समाधिकारक है यह..
जो लाखों लोग हिफाज़त तुम्हारी करते हैं.
कड़कती धूप, ठण्ड, शीतलहर सहते हैं.
तुम जिनके दम पे अब लेते हो दम आज़ादी का.
उन्हें भी देखना किस हाल में वो रहते हैं.
अगर अवाम के तन पर नहीं कपडे होंगे,
अगर गरीब हिन्दुस्तान के भूखे होंगे.
समझ लो फिर ये आज़ादी अभी अधूरी है.
अभी मंजिल में और हममे बहुत दूरी है.
अगर बारिश हो तो हर शख्स नाच नाच उठे .
अगर जो शाम ढले, सबके दिल में गीत उठे.
सभी बेख़ौफ़ घूमते हों रात , राहों में.
हर एक दिल हो यहाँ इश्क की पनाहों में.
हर एक दिल में ही जब ताजमहल सजता हो.
हर एक शख्स ही जब शाहजहां लगता हो.
हर एक दिल में हो खुदा-ओ-कृष्ण का ईमां.
मुझे तो चाहिए बस आज वही हिन्दुस्तां.
हर एक शख्स में जब शायराना मस्ती हो.
हर एक शय खुद अपने आपमें जब हस्ती हो.
तभी आज़ादी का सपना मेरा पूरा होगा.
ज़रा भी कम जो मिले, लक्ष्य अधूरा होगा.
कक्षा ८ में अध्ययन के समय ही मैंने श्री मैथिलीशरण गुप्त में महाकाव्य '' साकेत '; ''पंचवटी'' चिरगांव, झांसी से मंगाया था.साकेत के प्रथम पृष्ठ पर एक प्रसिद्द छंद अंकित था-
राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है.
कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है.
उसी छंद के नीचे ही मैंने अपनी उपर्युक्त दो पंक्तियाँ अंकित कर दी थीं.मेरे पास उपलब्ध साकेत की प्रति आज मेरे सामने है और आज पुनः वह छंद मेरे समक्ष समुज्ज्वल है
रफ़ी साहब को ये पंक्तियाँ समर्पित.आज उनकी पुण्यतिथि है.इस देश के लोगों को उन्हें इसलिए भी याद करना चाहिए क्योकि वे पाकिस्तान गए.वहाँ उन्होंने प्रसिद्द भजन - ओ दुनिया के रखवाले-- गाया.और कुछ इस तरह से गाया कि हमारे पाकिस्तानी भाइयों ऩे मज़हब का भेद भूलकर, Once More - का नारा लगाया .और रफ़ी साहब को वो गीत दुबारा गाना पडा. जो हमारे पुरोधा आज तक नहीं कर सके और शायद न कर पाएगें, उसे रफ़ी के दिव्य स्वर ऩे सहजता से कर दिया था..वे होते और मैं इन चार पंक्तियों को गीत का रूप देता और वे गाते इसे..ये स्वप्न धरती पर कभी यथार्थ बन पाए तो .....
दुनिया के युद्धों से थक कर, कल मैं उड़ा गगन की ओर.
किया संतरण सतत शून्य में,मिला न यात्रा-पथ का छोर.
महासूर्य का लोक दिखा फिर, देश-काल था जहाँ अनंत.
बस,प्रकाश का एकमेव अस्तित्व,तमस का अविकल अंत.
स्वप्रकाशमानंदं ब्रह्म ..
कुरुक्षेत्र में विराटरूप दर्शन में अर्जुन ऩे श्री कृष्ण को देखा था - मानों आकाश में करोड़ों सूर्य एक साथ उदित हो उठे हों..जय श्री कृष्ण..वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में एक ऐसे प्रकाश-पुंज का संकेत मिला है जो हमारे सूर्य से १४० अरब गुना बड़ा हैं एवं जिसका प्रकाश, हम तक आने में, १४० अरब प्रकाश वर्ष का समय लगता है..
उस नरेंद्र का हुआ मुदित मुखमंडल,सद्यः कांति-विहीन.
दीपशिखा-रथ बढ़ जाने से पथ-प्रासाद हुआ ज्यों दीन.
कालिदास की सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वरमणीय उपमा का उदाहरण-
यह देवी इंदुमती के स्वयंवर का वर्णन है रघुवंश का.
वे वरमाला लेकर वर के वरण हेतु संचरण कर रही हैं..............................शेष आप दृश्य को अपनी चेतना में रूपायित करें और सहृदय-हृदय-संवेद्य रस-स्वरुप होकर , अलौकिक आनंद का भोग करे..
यह पांच छंद-समूह, कल से प्रारंभित, मेरी स्वप्न शीर्षक लंबी कविता का द्वितीय प्रक्रम है ..एक बार , स्वामी विवेकानन्द और अपने संबंधो के विषय में चर्चा करते हुए भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस ने बताया था कि स्वामी विवेकानन्द सप्तर्षियों में से एक ऋषि थे जिन्होंने श्री भगवान के आदेश पर, मानव रूप में जन्म लिया था.एवं स्वयं श्री रामकृष्ण परमहंस ईश्वरावतार थे..आज की कविता में सप्तर्षि का उल्लेख था और इससे सम्बंधित छंद लिखते समय स्वामी जी का स्मरण हुआ तो उन्ही का चित्र इस कविता के साथ संसक्त कर दिया है..
५२ छंदों में लिखी गई '' स्वप्न '' शीर्षक यह कविता मैंने २/४/१९७९ से प्रारम्भ कर ८/४/१९७९ को पूर्ण की थी.यह मेरे एक स्वप्न-दर्शन पर आधारित है..जिसको मैंने अक्षरशः सत्य घटित होते हुए पाया है.उस समय मै , कालिदास , भारवि, दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त,पन्त, निराला , महादेवी आदि कवियों का साहित्य नियमित पढ़ रहा था..और मेरे मन में, कविता को उसी रूप में सृजित करने की प्रेरणा होती थी जो संकृत की गंगोत्री से प्रवाहित शास्त्रीय हिन्दी के रूप में अभिरूप पदों से सुमधुर हो ..
इसमे मेरी शैली, मुझे हिन्दी-कविता के उस स्वर्णयुग का स्मरण कराती है जब हम यह कह सकते थे कि हिन्दी कविता भी विश्व-कविता की पंक्ति में , समान स्थिति में, ,स्वाभिमान के साथ, अपनी उपस्थिति का बोध करा सकती है.
यह कविता , प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ '' में सम्मिलित है..
स्वर्णिम-स्वप्न-मयी कल्पना से सुगन्धित माँ की यह स्तुति मैंने १०/०६/१९८३ को जगन्माता को अर्पित की थी जो मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ '' में प्रकाशित है..आज नवरात्र महापर्व की द्वितीया को पुनः माँ के चरणों में समर्पित करता हूँ..
''मैच'' हुआ फिर ''फिक्स'',और दोनों दल थे खुशबख्त .
दिया बहत्तर घंटे तक वापस होने का वक्त.
अफ़ज़ल और कसाब उन्हीं के ऐसे ''बल्लेबाज़''.
''विकेट'',जिन्हें दो सौ तक का,लेने का अब भी नाज़.
मगर उन्हें '' बाहर '' करने के खतरे का जो मोल,
कैसे, कौन चुकाए, हैं खामोश सभी के बोल.
इसी तरह, अक्साईचिन का ''क्रिकेट मैच'' हम हारे.
बासठ में चीनी सेना के हाथों बने बेचारे.
सैन्य-कारखाने में बनना बंद हुआ हथियार .
युद्धाभ्यास छोड़, हमने था किया शांति-व्यापार.
पञ्चशील के भ्रम में, जब हम शान्ति सहित सोते थे.
उसी समय, उनके सैनिक , हथियारों को ढोते थे.
तभी, अचानक ''मैच'' हुआ घोषित चीनी सेना का .
क्रीडा-दक्ष सजग हो खेला करता सदा शलाका.
हम तो खुदमुख्तार और आज़ाद वतन कहलाते.
पर, अपनी ही सीमा पर, जब जब भी, हम हैं जाते.
पूछा करते हैं अधिकारी अपने दोस्त वतन के.
''अरुणाचल में क्यों प्रधानमंत्री आये भारत के .''
यहाँ सभी हैं विकेट,क्रिकेट, बल्लेबाजी में अटके.
ताकतवर बनने का रास्ता छोड़, नौजवां भटके.
और,श्रेष्ठ रहनुमा यहाँ छल-छद्मों में मशगूल.
ताज,मुंबई,कन्दहार,संसद हमले को भूल.
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एवं यह मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ ''में प्रकाशित है तथा मुझे अत्यंत प्रिय भी है.
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आज जापान, मानवता की वैज्ञानिक-प्रज्ञा के सर्वश्रेष्ठ शिखर के रूप में सार्वभौम स्वीकृति प्राप्त कर चुका है..किन्तु वही जापान, पृथ्वी के चित्त में पल रहे भीषण क्रोध , महासागर की शीतल तरंगो के संभावित तप्त कोप का पूर्वानुमान नहीं कर पाया और क्रुद्ध धरती एवं कुपित महासागर के समक्ष उन नगरों और नगरवासियों को दया की भिक्षा माँगने का अवसर भी नहीं मिल पाया जो उस क्रोध के प्रत्यक्ष कारण नहीं थे.
यह परिणाम हमें दुःख के महासागर में डुबोता ही है मगर डुबोते हुए भी हमें '' सार्वभौम समानुभूति '' एवं '' सार्वभौम संवेदनशीलता '' ( Empathy ) का उपदेश भी दे रहा है ..
समानुभूति सिर्फ मनुष्य या अन्य जीवित प्राणियों से ही नहीं अपितु समस्त प्रकृति से भी ..
प्रकृति के उन क्षुद्र अवयवों से भी जिनकी हम अपने कथित विकास की प्रक्रिया को पूरा करने में उपेक्षा करते रहे है..
प्रकृति को भी कष्ट होता है जब हम उससे दान न मांग कर बलपूर्वक कुछ लेना चाहते हैं..
जिस महासागर ने अपनी प्रकुपित तरंगों से जापान को आहत किया है उसी महासागर ने देह धारणकर, श्री राम के समक्ष प्रकट होकर , अपने वक्ष पर सेतु - निर्माण की स्वीकृति दी थी..
हम भारत के लोग सम्पूर्ण प्रकृति को चेतन देखते रहें हैं..ये दृष्टि अगर लुप्त होगी तो इसी दृष्टि को पुनः प्राप्त करने के लिए मानवता को भीषण त्रासदी से गुज़रना ना होगा..
मनुष्य के प्रति मनुष्य का संवेदनहीन होकर व्यवहार करना , कर्ता के लिए संभव है, देर से प्रतिकूल परिणाम उत्पन्न करे परन्तु महाप्रकृति,अपने विरूद्ध प्रकट संवेदनहीनता के परिणाम को विलंबित नहीं करेगी..
यह दुखद परिणाम, हमें इसी संवेदनहीनता के कारण देखना पडा है जिससे बचने का व्यपदेश उन तथागत बुद्ध ने किया था जिनकी अहिंसा की प्रबल तरंगों के सामने तथा जिनके विकसित कमल सदृश नेत्रों से निकलती हुई करुणा-सलिल-धारा में अभिषेक कर , खद्गोत्थित-हस्त अंगुलिमाल उनके चरणों पर गिर पडा था ..
नास्त्रादेमस ने कहा था जापान के बारे में कुछ ..
उसका उल्लेख न करते हुए हम सभी परमात्मा से प्रार्थना करे उस सुन्दर, सुरभित, सुललित, सुपुष्पित , सुसलिल पृथ्वी की रक्षा के लिए जो अनंत श्री भगवान् के अवतार के समय उनके श्री चरणों के स्पर्श से धन्य हुआ करती है ..
पितामह भीष्म द्वारा शर शैय्या पर की गई श्री कृष्ण की स्तुति : मेरे स्वर में.
· अरविन्द पाण्डेय
ॐ कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं
स्वर भी तुम हो शब्द भी.
ध्वनि भी तुम आकाश.
दृश्य तुम्हीं ,दर्शक तुम्हीं,
तम भी तुम्हीं प्रकाश ..
शर शैय्या पर भीष्म द्वारा श्री कृष्ण की स्तुति :
अपनी प्रतिज्ञा भंग करके, भक्त भीष्म की प्रतिज्ञा की रक्षा करने के लिए भीष्म की ओर रथ का पहिया लेकर दौड़ते हुए भी भीष्म पर परम कृपा पूर्ण नेत्रों से करुणा की वर्षा करनेवाले श्री कृष्णचंद्र के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ ..
मुझे श्रीमद भागवत में, शर-शैय्या पर लेटे हुए पितामह भीष्म द्वारा ,श्री कृष्ण का दर्शन करते हुए,अपनी मृत्यु के समय की गयी श्रीकृष्ण की स्तुति अत्यंत प्रिय है जिसे पढ़कर रोमांच होने लगता है और आंसू बहने लगते है ..भीष्म के सम्मुख स्वस्थ.प्रसन्न श्री कृष्ण, पांडवों और अन्य ऋषियों के साथ खड़े थे ..अपने समक्ष उन्हें देखकर भी,भीष्म का मन. श्रीकृष्ण के उस रूप के चिंतन में तन्मय हो गया जो उन्हें अत्यंत प्रिय था ..
भीष्म की प्रेमपूर्ण वाणी भगवान की स्तुति करने लगी --
'' भगवान, त्रिभुवन-सुन्दर , तमाल-नीलवर्ण,रवि-रश्मि- उज्जवल,ज्योतिर्मय-पीताम्बर-परिधान,घुंघराली अलकों से सुशोभित मुखमंडल से सारी सृष्टि को आनंदित करनेवाले आप अर्जुन के सखा में मेरी प्रीती बनी रहे .युद्धभूमि में अश्वों के खुरों से उड़ती हुई धूलि से सनी हुई अलकें जिनके श्रीमुख के चारों ओर छाई हुई है, मेरे तीक्ष्ण बाणों से जिनका कवच और जिनकी त्वचा छिन्न भिन्न हो गई है, वे श्री कृष्ण मेरे परम आराध्य हैं ..अपने सखा अर्जुन की बात सुनकर,अपने और शत्रुपक्ष की सेना के मध्य रथ लाकर खडा करके जो अपनी आँखों से ही शत्रुपक्ष की आयु का हरण कर रहे है --ऐसे पार्थसखा श्रीकृष्ण में मेरी प्रीति अविचल हो . .
सम्मुख उपस्थित सेना को देखकर,स्वजनों के संहार की आशंका से धर्मयुद्ध में दोषदृष्टि करते हुए युद्ध से विमुख होनेवाले अर्जुन की कुबुद्धि को जिन्होंने गीता के उपदेश द्वारा शुद्ध किया - वे महायोगी श्री कृष्ण मुझपर करुणा करते रहें ..
अपनी मर्यादा मिटाकर,मेरी प्रतिज्ञा सत्य करने के लिए रथ से कूदकर, हाथी का वध करने के लिए दौड़ते सिंह की तरह मेरी ओर दौड़ते हुए श्रीकृष्ण के कोमल चरण मेरे चित्त में स्थिर बने रहें ..
मुझ आततायी के तीक्ष्ण बाणों से जिनका कवच फट गया था, जिनकी पूरी देह क्षत विक्षत हो गयी थी, जो मुझे मार देने का अभिनय करते हुए मेरी ओर दौड़े आ रहे थे ऐसे भगवान मुकुंद में मेरी शुद्धा भक्ति अविचल हो..
जिनकी ललित -गति, मंद-मुसकान,प्रेमपूर्ण दृष्टि से अत्यंत समानिता गोपियाँ उन्मत्त के समान उनकी लीलाओं का अनुकरण करती हुई उनमे तन्मय हो गई उन रसेश्वर श्री कृष्ण में मेरी परम प्रीति हो ..
ईश्वर को परम रमणीय रमणी की रूप में देखना और स्वयं को उनका प्रेमी मानते हुए मस्त रहना--यह , विश्व के समस्त दार्शनिक प्रस्थानो को फारसी शायर संतो की विलक्षण देन है..जिसे हृदयंगम करना, अमृत बन जाने के समान है..एवं, जिस पर ईश्वर की प्रेमपूर्ण कृपा होती है वही इसे हृदयंगम कर पायेगा..
स्मृति में धर्म और नैतिकता की एक सार्वभौम परिभाषा दी गई है--
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं, श्रुत्वा चैवावाधार्यताम.
आत्मनः प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत .
अर्थात-
जो है अपने प्रतिकूल करो मत वह व्यवहार किसी से.
प्रसिद्द जर्मन दार्शनिक इमानुअल कांट ने भारत द्वारा नैतिकता की उपर्युक्त परिभाषा को यथावत स्वीकार करते हुए अपना प्रथम नैतिक नियम प्रतिपादित किया था-
''उसी नियम के अनुसार चलो जिसे तुम सार्वभौम बनाने का संकल्प कर सको.''
उसने उदाहरण दिया कि तुम चोरी अपने यहाँ नहीं होने देना चाहते इसलिए दूसरे के यहाँ तुम्हारे द्वारा चोरी किया जाना तुम्हारे लिए अनैतिक है..और चूंकि,यह स्वस्थ बुद्धि के मनुष्यों की सार्वभौम इच्छा होती है इसलिए चोरी किया जाना सार्वभौम रूप से अनैतिक है.. समाज द्वारा सार्वभौम रूप से स्वीकृत नैतिक-आचरणों के सम्बन्ध में भाषण देने वाले इस नियम के अनुसार स्वयं अनैतिक आचरण कर रहे होते हैं..रजनीश से लेकर अन्य सभी स्वघोषित वैचारिक क्रांति-कारियों की यही स्थिति है..
छः दिसंबर कल था और वाराणसी के पवित्रतम प्रसिद्द घाटों - दशाश्वमेध घाट शीतला घाट पर श्री गंगा जी की आरती के समय बम विस्फोट किया गया जिसमें श्री गंगा-भक्त हताहत हुए.. इस देश के एक अरब से अधिक लोग उन कर्णधारों से सलीके से, सही तरीके से यह नहीं पूछ रहे कि तुमने इस बम विस्फोट से पहले जो विस्फोट हुए थे उनके अपराधियों को सज़ा दिलाने कि ज़िम्मेदारी क्यों नहीं निभाई.. कंदहार जाकर उन राक्षसों को क्यों मुक्त किया जो भारत पर हमले के अपराधी थे..?? और , जब तक उनसे सही तरीके से यह नहीं पूछा जाएगा तब तक आतंक का यह सिलसिला शायद निश्चिन्त होकर चलाया जाता रहेगा.. !!
Aravind Pandey Speaks Benefits of not Taking Bribe .wmv
· अरविन्द पाण्डेय
यह वीडिओ पटना के रैदिएन्त स्कूल के एक वार्षिकोत्सव में मेरे द्वारा बच्चों के बीच दिए गए व्याख्यान से सम्बंधित है.
इसका सारतत्त्व यह है कि भारत को महाशक्ति बनने में सबसे भयानक बाधा है - यहाँ के राजनीतिज्ञों और सरकारी अधिकारियों के एक समूह द्वारा योजनाबद्ध रूप से भ्रष्टाचार करना और भारतीय जनता के धन को विदेशी बैंकों में जमा करना.. अगर हम यह रोक दे तो हमारा देश १० वर्षों में ही विश्व की ऐसी महाशक्ति बन जाएगा जो अमेरिका की तरह हिंसा के प्रसार और समर्थन के लिए नहीं जाना जाएगा बल्कि जो विश्वशांति को चिरस्थायी बनाने के लिए विश्व इतिहास में एक बार पुनः सम्मानित होगा..